अर्थशास्त्र

मुद्रा का परिमाण सिद्धान्त । मुद्रा के परिमाण सिद्धान्त की प्रमुख मान्यतायें । मुद्रा की चलन गति को प्रभावित करने वाले कारक । मुद्रा परिमाण की आलोचनायें । मुद्रा परिमाण सिद्धान्त के फिशर दृष्टिकोण

मुद्रा का परिमाण सिद्धान्त मुद्रा के परिमाण सिद्धान्त की प्रमुख मान्यतायें मुद्रा की चलन गति को प्रभावित करने वाले कारक मुद्रा परिमाण की आलोचनायें मुद्रा परिमाण सिद्धान्त के फिशर दृष्टिकोण

मुद्रा का परिमाण सिद्धान्त

(Quantity Theory)-

मुद्रा के परिमाण सिद्धान्त के अनुसार मुद्रा के मूल्य का निर्धारण इटैलियन अर्थशास्त्री दवन जैती (Dauan Zatti) को माना जाता है। इसके बाद जॉन लॉक (John Locke) तथा डेविड ह्यूम (David Huem) ने इसमें सुधार करके सविस्तार व्याख्या की। रिकार्डो तथा जे.एस.मिल. ने भी इस सिद्धान्त का विवेचन किया। लेकिन पूर्ण रूप से इस सिद्धान्त को विकसित करने का श्रेय प्रो. इरविंग फिशर (Irving Fisher) को मिला।

विभिन्न अर्थशास्त्रियों ने इस सिद्धान्त की निम्न प्रकार से व्याख्या की-

प्रो. जे.एस. मिल- “अन्य बातों के समान रहने पर, मुद्रा का मूल्य उसी मात्रा के विपरीत दिशा में परिवर्तित होता है। मुद्रा की मात्रा में प्रत्येक वृद्धि मुद्रा के मूल्य को उसी अनुपात में घटाती है और मुद्रा की मात्रा में प्रत्येक कमी उसी अनुपात में बढ़ाती है।”

प्रो. टॉजिंग (Prof. Taussing) के अनुसार- “यदि अन्य बातें समान रहें, तो मुद्रा के परिणाम दो दुगुना करने पर कीमतें पहले की अपेक्षा दुगुनी हो जायेंगी और मुद्रा का मूल्य पहले से आधा रह जायेगा। यदि अन्य बातें समान रहें तो मुद्रा के परिमाण को आधा करने पर कीमतें पहले की अपेक्षा आधी रह जायेंगी और मुद्रा का मूल्य पहले से दुगुना हो जायेगा।”

मुद्रा के परिमाण सिद्धान्त की प्रमुख मान्यतायें

(Assumptions of the Quantity Theory of Money)

  1. व्यापार की मात्रा स्थिर रहनी चाहिए अथवा मुद्रा की माँग में कोई परिवर्तन नहीं होना चाहिए- मुद्रा परिमाण सिद्धान्त तभी कार्यशील होता है जबकि मुद्रा द्वारा किए जाने वाले कार्यों में अथवा व्यापार की मात्रा में कोई परिवर्तन नहीं होता। जैसा हम देख चुके हैं कि मुद्रा की माँग देश के व्यापार की मात्रा से निश्चित होती है। जब देश के व्यापार की मात्रा स्थिर रहती है तब मुद्रा की माँग भी स्थिर रहती है। मुद्रा के परिमाण सिद्धान्त में इस बात की कल्पना की गयी है कि व्यापार की मात्रा अथवा मुद्रा की माँग में परिवर्तन होते हैं तो मुद्रा का परिमाण सिद्धान्त लागू नहीं होगा। उदाहरणार्थ, यदि देश में मुद्रा की मात्रा दुगुनी हो जाती है परन्तु इसके साथ ही देश के व्यापार की मात्रा अथवा मुद्रा की माँग भी दुगुनी हो जाती है तो इससे देश के सामान्य कीमत- स्तर पर कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ेगा, अर्थात् कीमत-स्तर स्थिर रहेगा।
  2. वस्तु-विनिमय सौदों में किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं होना चाहिए- जैसे हम जानते हैं, प्रत्येक देश में कुछ सौदे वस्तु-विनिमय प्रणाली (barter System) द्वारा किए जाते हैं। ऐसे सौदों में मुद्रा विनिमय-माध्यम का कार्य नहीं करती, अर्थात् ये सौदे बिना मुद्रा के ही किए जाते हैं, मुद्रा के परिमाण सिद्धान्त के अनुसार इस प्रकार के सौदों की मात्रा में परिवर्तन नहीं होने चाहिए, क्योंकि यदि इस प्रकार के सौदों की मात्रा में परिवर्तन होता है तो मुद्रा का परिमाण सिद्धान्त कार्यशील नहीं हो सकता।
  3. साख-मुद्रा की मात्रा में कोई परिवर्तन नहीं होना चाहिए- जैसे विदित है, आधुनिक अर्थ-व्यवस्था में साख-मुद्रा भी कानूनी मुद्रा की भाँति काम करती है। देश के अधिकांश सौदों का भुगतान बैंकों, हुण्डियों, ड्राफ्टों तथा विनिमय-विपत्रों (bill of cxchange) जैसे साख-पत्रों द्वारा किया जाता है। अतएव साख-मुद्रा की मात्रा में घट-बढ़ हो जाने पर देश की कुल मात्रा में भी घट-बढ़ हो जाती है। मुद्रा-परिमाण सिद्धान्त इस मान्यता पर आधारित है कि साख-मुद्रा की मात्रा का परिमाण सिद्धान्त पूर्णतः लागू नहीं होता। उदाहरणार्थ, यदि देश की कानूनी मुद्रा में वृद्धि होती है, परन्तु किसी कारणवश साख-मुद्रा में कमी हो जाती है तो इससे देश की कीमत-स्तर पर विशेष प्रभाव नहीं पड़ेगा। इसका कारण यह है कि बढ़ी हुई कानूनी मुद्रा का प्रभाव साख-मुद्रा की कमी के कारण तटस्थ हो जाता है और अन्ततः देश की कीमत-स्तर पर कुछ प्रभाव नहीं पड़ता।
  4. साख-मुद्रा तथा विधिग्राह्य मुद्रा (चलन) का अनुपात स्थिर रहना चाहिए- मुद्रा-परिमाण सिद्धान्त की एक मान्यता यह भी है कि साख-मुद्रा तथा विधिग्राह्य (कानूनी) मुद्रा का आपसी अनुपात स्थिर रहना चाहिए। जैसे विदित है, साख-मुद्रा का निर्माण विधिग्राह्य मुद्रा अथवा चलन के आधार पर होता है और इन दोनों में एक प्रकार का आपसी अनुपात बना रहता है। यदि साख-मुद्रा तथा विधिग्राह्य मुद्रा का यह अनुपात स्थिर नहीं रहता तो इससे मुद्रा के परिमाण सिद्धान्त की कार्यशीलता पर अवश्य असर पड़ता है।

MV + MV = PT

MV + M V/ T=P

इस समीकरण में M= मुद्रा की कुल मात्रा (कुल विधिग्राह्य मुद्रा) अर्थात् धातु-मुद्रा + कागजी मुद्रा, V= विधिग्राह्य मुद्रा का संचलन वेग (velocity of cl culation), M1= साख-मुद्रा अर्थात् चैकों, ड्राफ्टों इत्यादि की मात्रा तथा V1= साख-मुद्रा का संचलन-वेग, P= वस्तुओं तथा सेवाओं का सामान्य कीमत-स्तर (general price level) तथा T= व्यापार की मात्रा (समस्त व्यापारिक सौदे)। इस प्रकार किसी देश में मुद्रा की पूर्ति = MV + M1V1। यह फिशर के समीकरण का एक भाग है। दूसरे भाग में, मुद्रा को व्यक्त किया गया है। मुद्रा की माँग =PT फिशर के उपर्युक्त समीकरण के आधार पर वस्तु का मूल्य व मुद्रा का मूल्य ज्ञात करने के लिए समीकरण के सभी अंगों अर्थात् M,V, M1V1 तथा T कल्पित मूल्य निर्धारित कर लेते हैं जैसे-

M=1000,V=4,T=2000,

M1=500,V1=2

इस मूल्यांकन से

P=1000×4+500×2/2000 = 2.5

अर्थात् एक वस्तु का मूल्य 2.5 इकाइयाँ हुआ। एक मुद्रा का मूल्य = 1/2.5 वस्तुयें होगा।

फिशर ने मुद्रा की पूर्ति के अन्तर्गत मुद्रा की चलन गति को सम्मिलित किया है। मुद्रा की एक इकाई एक निश्चित समय में जितनी वस्तुओं एवं सेवाओं के क्रय करने का कार्य करती है उसे मुद्रा की चलन गति कहते हैं।

मुद्रा की चलन गति को प्रभावित करने वाले कारक

मुद्रा की चलन गति निम्नलिखित बातों से प्रभावित होती है-

  1. मुद्रा की मात्रा (Quantity of Money)- जनता के पास मुद्रा की मात्रा अधिक होने पर चलन गति अधिक हो जाती है।
  2. जनता की तरलता पसंदगी (Liquidity Preference)- जनता की तरलता पसंदगी अधिक होने पर चलन गति कम हो जाती है।
  3. उपभोग प्रवृत्ति (Propensity to consume)- उपभोग प्रवृत्ति अधिक होने पर जनता अधिकतम सीमा तक रुपया खर्च करती है जिससे चलन गति अधिक होती है।
  4. मजदूरी के भुगतान का ढंग (Method of Wage payment)- मजदूरी भुगतान की अवधि लम्बी होने पर मजदूरी को धन बचाकर रखना पड़ता है, इसलिए चलन गति कम हो जाती है।
  5. उधार सम्बन्धी सुविधायें (Facility of borrowing)- इन सुविधाओं से क्रंय- विक्रय को प्रोत्साहन मिलता है जिससे चलन गति तेज हो जाती है।
  6. यातायात एवं संदेशवाहन के साधान (Means of transport and communication)- इससे विनिमय का क्षेत्र विस्तृत हो जाता है जिसके परिणामस्वरूप चलन गति बढ़ जाती है।
  7. नकद क्रय-विक्रय की प्रवृत्ति (Tendency of cash transaction)- इस प्रकार की प्रवृत्ति पाये जाने से मुद्रा की चलन गति तेज हो जाती है।
  8. आर्थिक विकास का स्तर (Level of Economic Development)- आर्थिक विकास का स्तर ऊँचा होने से विनिमय बढ़ता है और चलन गति में वृद्धि होती है।
  9. कीमत सम्बन्धी भावी अनुमान (Future expectation of prices)- भविष्य में मूल्यों के बढ़ने के अनुमान की स्थिति में व्यक्ति वर्तमान में अपनी खरीदारियाँ बढ़ा देता है जिससे चलन गति तेज हो जाती है।
  10. राजनीतिक शान्ति (Political peace)- राजनैतिक शान्ति होने पर उधार की प्रथा बढ़ती है और चलन गति कम हो जाती है।
  11. साख मुद्रा की गतिशीलता (Velocity of credity money)- देश की आर्थिक सम्पन्नता, आर्थिक विकास में प्रगति तथा बैंकिंग प्रणाली का विकास साख मुद्रा की चलन गति को बढ़ाता है।

मुद्रा परिमाण की आलोचनायें

(Criticism of the Quantity Theory of Money)-

परिमाण सिद्धान्त की प्रमुख आलोचनायें निम्नलिखि हैं-

  1. अवास्तविक मान्यतायें (Unrealistic Assumptions)- परिमाण सिद्धान्त की ऊपर बतायी गयी मान्यतायें अवास्तविक होने के कारण यह सिद्धान्त भी गलत प्रतीत होता है।
  2. समीकरण के तत्वों की माप कठिन होती है (Difficult to Measure the Factors of the Equation)- इस समीकरण के विभिन्न तत्वों जैसे मुद्रा की मात्रा, व्यापार की मात्रा तथा मुद्रा की चलन गति इत्यादि की माप करना कठिन होता है।
  3. कीमत स्तर न केवल मुद्रा की मात्रा पर बल्कि अन्य बातों पर निर्भर करता है (Price Level isAffected by other Factorsk other than the Money)- वस्तुओं के मूल्यों को प्रभावित करने में मुद्रा के अतिरिक्त माँग में असाधारण परिवर्तन, राजनैतिक अशान्ति, उत्पादन की मात्रा तथा लागत में परिवर्तन, सरकार की वित्तीय नीति एवं विदेशी बाजारों के उतार- चढ़ाव इत्यादि अन्य कारण भी होते हैं।
  4. परिमाण सिद्धान्त में मुद्रा की पूर्ति पर बहुत जोर दिया गया है (Quantity theory has laid much emphasis on the supply of money)- इस सिद्धान्त में मुद्रा की माँग को स्थिर मान लिया गया है और केवल मुद्रा की पूर्ति में होने वाले परिवर्तनों को मूल्य परिवर्तनों का कारण माना गया है जो सर्वथा गलत है।
  5. परिमाण सिद्धान्त यह स्पष्ट नहीं करता कि मुद्रा की मात्रा (M) में परिवर्तन का P पर किस प्रकार से प्रभाव पड़ता है (This theory does not throw light of the route by which moeny comes to influences the price level)- यह सिद्धान्त केवल मुद्रा के परिमाण एवं मूल्य तल के पारस्परिक सम्बन्ध का उल्लेख कराता है किन्तु यह नहीं बतलाता कि मुद्रा के परिमाण में परिवर्तन का मूल्य तल किस प्रकार प्रभाव डालता है।
  6. परिमाण सिद्धान्त मुद्रा की चलन गति की विवेचना नहीं करता- यह सिद्धान्त उन कारणों की विवेचना नहीं करता जिनके द्वारा मद्रा की चलन गति प्रभावित होती है।
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