अर्थशास्त्र

मुद्रा के मूल्य का अर्थ | मुद्रा का मूल्य निर्धारण | मुद्रा मूल्य निर्धारण का वस्तु सिद्धान्त | मुद्रा का राज्यीय सिद्धान्त | मुद्रा मूल्य निर्धारण के वस्तु सिद्धान्त एवं राज्यीय सिद्धान्त

मुद्रा के मूल्य का अर्थ | मुद्रा का मूल्य निर्धारण | मुद्रा मूल्य निर्धारण का वस्तु सिद्धान्त | मुद्रा का राज्यीय सिद्धान्त | मुद्रा मूल्य निर्धारण के वस्तु सिद्धान्त एवं राज्यीय सिद्धान्त

मुद्रा के मूल्य का अर्थ

(Meaning of Value of Money)-

समस्त वस्तुओं तथा सेवाओं का मूल्य जो समाज में बिक्री हेतु लायी जाती है, मुद्रा में निर्धारित किया जाता है, अतः वस्तुओं के मूल्यों से तात्पर्य वह मुद्रा राशि है जो उन वस्तुओं अथवा सेवाओं के बदले देनी पड़ती है। परन्तु मुद्रा के मूल्य का क्या अर्थ है ? यदि यह कहा जाये कि 250 ग्राम आलू का मूल्य 50 पैसे है तो इस तथ्य का एक पहलू यह भी है कि दो रुपये में एक किलोग्राम आलू मिलते हैं, अर्थात् एक रुपये की क्रय-शक्ति, यदि आलू में मापी जाये तो, आधा किलोग्राम है। स्पष्टतः मुद्रा का मूल्य उसकी क्रय-शक्ति होता है।

1.क्रय-शक्ति (Purchasing Power)- मुद्रा के मूल्य का सर्वाधिक प्रचलित अर्थ उसकी क्रय-शक्ति है अर्थात् मुद्रा की एक इकाई के बदले में कितनी वस्तुयें तथा सेवायें प्राप्त की जा सकती है। यह क्रय-शक्ति प्रायः तुलनात्मक रूप में मापी जाती है अर्थात् किसी एक वर्ष में एक रुपये के बदले में जितनी वस्तुयें तथा सेवायें प्राप्त हो सकती थीं, अब उसकी तुलना में कितनी कम या अधिक प्राप्त हो सकती है। यह माप सूचकांकों (Index Numbers) द्वारा होता है।

2.व्याज दर (Rate of Interest)- मुद्रा-मूल्य का एक अन्य प्रचलित अर्थ है ब्याज की दर, अर्थात मुद्रा को एक निश्चित अवधि, प्रायः एक वर्ष के लिए, उधार देने पर कितनी रकम मिल सकती है। इस अर्थ में मुद्रा-मूल्य का प्रयोग प्रायः कम होता है।

3.विदेशी विनिमय-दर (Foreign Exchange Rate)- मुद्रा-मूल्य के विदेशी विनिमय दर से अभिप्राय, एक देश की मुद्रा के बदले में जितनी विदेशी मुद्रा की इकाइयाँ प्राप्त होती हैं, वे उस मुद्रा का मूल्य कहलाती है। उदाहरण के लिए यदि 45 रु. के बदले एक डॉलर प्राप्त होता है तो 45 रु. का मूल्य एक डॉलर है।

इस प्रकार ऊपर वर्णित समस्त अर्थ समय-समय पर मुद्रा के मूल्य का संकेत देते हैं किन्तु व्यावहारिक जीवन में मुद्रा के मूल्य का वही अर्थ लगाया जाता है जो वस्तुओं के मूल्य का लगाया जाता है, अर्थात् मुदा की एक इकाई के बदले में कितनी वस्तुयें और सेवायें खरीदी जा सकती हैं, यह मुद्रा की क्रय-शक्ति है।

मुद्रा का मूल्य निर्धारण

(Determination of the Value of Money)-

मुद्रा मूल्य निर्धारण के सम्बन्ध में अनेक सिद्धान्त दिये गये हैं। उनका संक्षिप्त विवरण नीचे दिया गया है-

मुद्रा मूल्य निर्धारण का वस्तु सिद्धान्त

(Commodity theory of the Determination the Value of Money)-

इस सिद्धान्त के अनुसार मुद्रा को एक वस्तु माना जाता है तथा जिस प्रकार वस्तु के मूल्य माँग एवं पूर्ति की शक्तियों के द्वारा निर्धारित होता है, उसी प्रकार मुद्रा का मूल्य भी इसकी माँग एवं पूर्ति के द्वारा निर्धारित होता है। जिस बिन्दु पर मुद्रा की माँग एवं पूर्ति का साम्य होगा, वही बिन्दु इसके मूल्य. निर्धारण का बिन्दु होगा। प्रो. राबर्टसन के अनुसार, “मुद्रा अनेक वस्तुओं में से एक है। अतः इसका मूल्य ठीक उन्हीं दो शक्तियों द्वारा निर्धारित होता है, जो अन्य वस्तुओं के मूल्य को निर्धारित करती है।” यहाँ पर यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि मुद्रा की माँग तथा पूर्ति से अभिप्राय उस वस्तु से है, जिससे मुद्रा बनती है। यदि मुद्रा स्वर्ण से बनी है तो मुद्रा का मूल्य स्वर्ण की माँग तथा पूर्ति के आधार पर निर्धारित होगा।

सिद्धान्त की आलोचना (Criticism of the Theory)- इस सिद्धान्त की आलोचना का केन्द्र बिन्दु है मुद्रा को एक वस्तु मानना। आलोचकों का कहना है कि मुद्रा तथा अन्य वस्तुओं में काफी अन्तर है। इसमें से कुछ प्रमुख भेद इस प्रकार हैं-

  1. वस्तुओं का उत्पादन प्रमुख 5 साधनों- भूमि, श्रम, पूँजी, संगठन, साहस द्वारा होता है पर मुद्रा का निर्गमन सरकार द्वारा होता है।
  2. वस्तुओं में मनुष्य की आवश्यकताओं को पूरा करने की प्रत्यक्ष क्षमता होती है पर मुद्रा अप्रत्यक्ष रूप से मनुष्य की आवश्यकताओं को पूरा करने की क्षमता रखती है।
  3. मुद्रा की माँग अल्पकाल में प्रायः स्थिर रहती है, जबकि वस्तुओं की माँग अल्पकाल तथा दीर्घकाल दोनों में घटती बढ़ती रहती है।
  4. मुद्रा के चलन में गति होती है। प्रत्येक हस्तान्तरण में यह अपने बदले में वस्तुयें तथा सेवायें प्राप्त करती है जबकि अन्य वस्तुयें एक ही प्रयोग में आती हैं।

मुद्रा का राज्यीय सिद्धान्त

(State Theory of Money)-

इस सिद्धान्त के अनुसार मुद्रा का मूल्य राज्य द्वारा निर्धारित रहता है। इस सिद्धान्त का प्रतिपादन प्रो. फ्रेड्रिक नैप द्वारा किया गया। प्रो. नैप के अनुसार, “मुद्रा की आत्मा इसकी इकाइयों में प्रयुक्त सामग्री में निहित नहीं है, बल्कि उन कानूनी अध्यादेशों में है जो उसके प्रयोग को नियमित करते हैं।” दूसरे शब्दों में, मुद्रा का मूल्य इसके निर्माण में प्रयुक्त किए गए गये पदार्थ से नहीं, बल्कि राज्यीय सत्ता से निर्धारित होता है। चूंकि आधुनिक काल में मुद्रा का निर्गमन एवं नियंत्रण सरकार द्वारा किया जाता है, अतः सरकार ही इसके मूल्य को निर्धारित करने की स्थिति में है। प्रो. नैप के कथनानुसार राज्य मुद्रा के मूल्य को निम्न प्रकार से निर्धारित करता है।

  1. वैधानिक स्वीकृति- मुद्रा को वैधानिक स्वीकृति देने से ही इसका मूल्य उत्पन्न होता है। यदि किसी पदार्थ को राज्य वैधानिक स्वीकृति प्रदान नहीं करता तो ऐसे पदार्थ को जनता कभी भी मुद्रा के रूप में स्वीकार नहीं करेगी। इसी वैधानिक स्वीकृति के ही कारण मुद्रा विनिमय का माध्यम बन जाती है, यहाँ तक कि भविष्य के सौदे भी मुद्रा के माध्यम से किए जाते हैं। इस तरह मुद्रा का मूल्य राज्य द्वारा प्रदान की गयी वैधानिक स्वीकृति के ही कारण होता है।
  2. मुद्रा-निर्गमन- मुद्रा के निर्गमन को नियमित एवं नियंत्रित करके भी राज्य मुद्रा के मूल्य को निर्धारित करता है। यदि राज्य मुद्रा मूल्य को बढ़ाना चाहता है तो वह मुद्रा की मात्रा में कमी करके ऐसा कर सकता है। वास्तव में, मुद्रा-निर्गमन राज्य के हाथों में एक ऐसा अस्त्र है, जिसके प्रयोग से वह चाहे जिस स्तर पर मुद्रा का मूल्य स्थिर कर सकता है।
  3. वस्तु-कीमत नियंत्रण- पूँजीवादी देशों में कभी-कभी असाधारण समयों में राज्य वस्तु-कीमत नियंत्रण (Price-Control) की नीति अपनाता है। अर्थात् विभिन्न प्रकार की आवश्यक वस्तुओं की कीमतें सरकार द्वारा निर्धारित कर दी जाती हैं। इस नीति द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से सरकार मुद्रा के मूल्य को निर्धारित करती है।

मुद्रा के राज्यीय सिद्धान्त की आलोचना- इस सिद्धान्त की निम्नलिखित आधारों पर आलोचना की गयी है-

  1. आलोचकों का कहना है कि केवल वैधानिक स्वीकृति देकर ही सरकार किसी पदार्थ को मुद्रा का रूप प्रदान नहीं कर सकती। यह भी आवश्यक है कि ऐसे पदार्थ को जनता मुद्रा के रूप में स्वीकार भी करे। यदि जनता किसी पदार्थ को स्वीकार नहीं करती है तो वैधानिक मान्यता होने पर भी वह पदार्थ मुद्रा के कार्य सम्पन्न नहीं कर सकता।
  2. आलोचकों का कहना है कि इस बात में कोई विशेष सार नहीं है कि मुद्रा का निर्गमन करके सरकार इसके मूल्य को निर्धारित करती है। यह सही है कि मुद्रा की पूर्ति में कमी अथवा वृद्धि करके सरकार मुद्रा के मूल्य में क्रमशः वृद्धि अथवा कमी कर सकती है। परन्तु इसका वास्तविक अर्थ तो यह निकलता है कि मुद्रा के मूल्य पर उसकी पूर्ति का प्रभाव पड़ता है। सरकार तो केवल पूर्ति में परिवर्तन का माध्यम-मात्र ही है। मुद्रा के मूल्य का निर्धारण प्रत्यक्षः मुद्रा-पूर्ति के परिवर्तनों से होता है।
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Pankaja Singh

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