अर्थशास्त्र

आधुनिक ब्याज सिद्धान्त | बचत विनियोग वक्र | तरलता पसन्दगी-द्रव्य मात्रा वक्र | ब्याज दर का निर्धारण

आधुनिक ब्याज सिद्धान्त | बचत विनियोग वक्र | तरलता पसन्दगी-द्रव्य मात्रा वक्र | ब्याज दर का निर्धारण

आधुनिक ब्याज सिद्धान्त

हिंक्स, हेन्सन इत्यादि आधुनिक अर्थशास्त्रियों के अनुसार, ब्याज का एक उचित निर्धारणीय सिद्धान्त बनाना सम्भव है। इस हेतु केन्ज और प्रतिष्ठित सिद्धान्त में समन्वय करने पर निम्नांकित चार तत्व प्राप्त होंगे-(1) विनियोग माँग रेखा, बचत रेखा, (3) तरलता पसन्दगी रेखा व (4) द्रव्य की मात्रा।

आधुनिक ब्याज सिद्धान्त के अनुसार, इन चार तत्वों की पारस्परिक प्रतिक्रिया ब्याज की दर को निर्धारित करती है। इन चार में से 2 तत्व (बचत एवं विनियोग) वास्तविक हैं, जो प्रतिष्ठित सिद्धान्त से लिये गए हैं तथा 2 तत्व (नगद द्रव्य की माँग या तरलता पसन्दगी और नगद द्रव्य की पूर्ति) मौद्रिक हैं, जो केन्ज के सिद्धान्त से लिए गये हैं। उधार देय कोष सिद्धान्त में भी ये चार तत्व शामिल थे परन्तु इसमें इनका उचित एवं वैज्ञानिक ढंग से समन्वय न होने का कारण ब्याज दर (प्रतिष्ठित एवं केन्जियम सिद्धान्तों की भाँति)अनिर्धारणीय रही। किन्तु हिक्स एवं हेन्सन द्वारा निर्मित आधुनिक सिद्धान्त के अनुसार, ब्याज का निर्धारण करना सम्भव हो गया है। इसमें इन विद्वानों ने एक पाँचवा तत्व-आय तत्व भी शामिल कर लिया है।

विभिन्न रेखाएँ निकालना-

प्रतिष्ठित सिद्धान्त में ब्याज के निर्धारण के लिए बचत और विनियोग का सन्तुलन होता है। इसकी सहायता से ‘बचत विनियोग वक्र’ प्राप्त किया जाता है। यह रेखा वास्तविक क्षेत्र के सन्तुलन की सूचक है। केन्ज के सिद्धान्त में ब्याज के निर्धारण हेतु तरलता पसन्दगी और द्रव्य की मात्रा में सन्तुलन होता है। इसकी सहायता से ‘तरलता पसन्दगी’ और ‘द्रव्य मात्रा वक्र’ प्राप्त होता है, जो कि मौद्रिक क्षेत्र के सन्तुलन का सूचक है। ये दो रेखाएँ एक-दूसरे को जिस बिन्दु पर काटेंगी, वहीं पर ब्याज निर्धारित होगी। इस बिन्दु पर चार तत्व (बचत विनियोग, तरलता पसन्दगी एवं द्रव्य मात्रा) आय के एक ही स्तर पर बराबर होंगे। आगे IS- रेखा और LM रेखा को निकालने की बात का विवेचन किया गया है।

(1) बचत विनियोग वक्र निकालना-

जैसा कि अन्यत्र बता आये हैं, बचत आय के स्तर पर निर्भर करती है, अर्थात आय के विभिन्न स्तरों पर बचत विभिन्न होगी। मान लीजिए कि Y1,Y2,Y3,Y4………………….. आय के बढ़ते हुए विभिन्न स्तर हैं।

चित्र (अ) में इन स्तरों से सम्बन्धित बचत रेखाएँ S1Y2, S2Y2,S3 Y3, और S4Y4 हैं, जो क्रमशः दाएँ का सरकाते हुए हैं, क्योंकि आय की वृद्धि के साथ बचत में भी वृद्धि होती है। II- रेखा विनियोग रेखा है। यह रेखा बचत रेखा S1Y1को P1 बिन्दु पर काटती है जिससे ब्याज दर P1Q1अर्थात R1 निर्धारित होगी अर्थात आय के स्तर Y पर बचत एवं विनियोग का सन्तुलन ब्याज दर R1 पर होगा (R1 ब्याज दर पर बचत एवं विनियोग दोनों OQ1के बराबर है)। यह प्रारम्भिक स्थिति है।

IS-रेखा निकालना (आधुनिक ब्याज सिद्धान्त)

अब मान लीजिए कि आय स्तर Y1 से बढ़कर Y2 हो जाता है। इसके अनुसार, बचत रेखा S2Y2 है, जिसे विनियोग रेखा P2 पर काटती है। अत: ब्याज दर R2 (or P2 Q2) है और इस पर बचत एवं विनियोग दोनों ही 0Q2 के बराबर है।

इसी प्रकार, अन्य आय स्तरों (Y3और Y 4) पर ब्याज दरें क्रमश: R3 और R4 हैं तथा इन पर बचत एवं विनियोग में सन्तुलन होगा।

यदि आय के विभिन्न स्तरों (Y1, Y2, Y3, और Y4) और सम्बन्धित ब्याज दरों (R1,R2,R3और R4) के सम्बन्ध को एक रेखा द्वारा बतायें तो चित्र (ब) में दिखाये अनुसार, IS रेखा प्राप्त हो जाती है। यह रेखा आय स्तरों और ब्याज दरों के सम्बन्ध को बताती है। इस रेखा पर प्रत्येक बिन्दु बचत और विनियोग के सन्तुलन का सूचक है। चूँकि यह रेखा विभिन्न आय स्तरों से सम्बन्धित बचत रेखाओं के एक परिवार या समूह तथा विनियोग रेखा के आधार पर निकाली जाती है, इसलिए यह स्पष्ट है कि आय बचत रेखाओं तथा विनियोग रेखा में परिवर्तन होने पर IS- वक्र की स्थिति में भी परिवर्तन हो जायेगा।

ध्यान दीजिए कि IS- रेखा नीचे को गिरती हुई होती है, अर्थात उसका ढाल ऋणात्मक होता है। कारण, IS- रेखा ब्याज एवं आय स्तर के बीच उल्टे सम्बन्ध की सूचक है, अर्थात जैसे-जैसे आय का स्तर बढ़ता जाता है (Y1 से Y4 तक), ब्याज दर घटती जाती हैं (R1 से R4 तक)। इस प्रकार ऊँचे आय स्तरों पर अधिक बचतें होंगी, जिससे पूँजी की पूर्ति अधिक होगी और इस प्रकार ब्याज दर नीची हो जायेगी।

(2) तरलता पसन्दगी-द्रव्य मात्रा वक्र निकालना-

बढ़ती हुई आय स्तरों (Y1, Y2, Y3 और Y4) के अनुरूप तरलता पसन्दगी रेखाएँ (मान लीजिए कि) निम्नांकित चित्र (अ) में दिखाये अनुसार, क्रमश:L1Y1, L2Y2, L3Y3 और L4Y4 हैं। चूँकि आय बढ़ने के साथ तरलता पसन्दगी बढ़ती है, इसलिए तरलता पसन्दगी रेखाएँ बाएँ को ऊपर की ओर खिसकती जाती हैं। मान लीजिए कि नगद द्रव्य की वास्तविक मात्रा दी हुई है और वह OQ के बराबर है।

उपर्युक्त मान्यताओं के सन्दर्भ में बनाये गये चित्र (अ) को देखने से यह पता चलता है कि प्रारम्भिक आय स्तर Y1 पर ब्याज दर R1 (or P1Q) होगी, क्योंकि इस दर पर नगद द्रव्य की माँग (अर्थात तरलता पसन्दगी) और ‘नगद द्रव्य की वास्तविक मात्रा’ एक-दूसरे के बराबर है।

LM-वक्र निकालना (आधुनिक ब्याज सिद्धान्त)

अब मान लीजिए कि आय स्तर Y1 से बढ़कर Y2 हो जाता है। इस दशा में ब्याज दर R2 (orP2O) होगी, क्योंकि P2 बिन्दु पर नगद द्रव्य की माँग और ‘नगद द्रव्य की वास्तविक मात्रा’ दोनों बराबर अर्थात OQ के बराबर है। इस प्रकार, Y3 और Y4 आय स्तरों पर ब्याज दर क्रमश: R3 और R4 होंगी तथा इन पर ‘नगद द्रव्य की माँग’ और ‘नगद द्रव्य की वास्तविक मात्रा में बराबरी होगी।

यदि आय के विभिन्न स्तर (Y1, Y2, Y3 और Y4) तथा सम्बन्धित ब्याज दरों (R1, R2, R3,और R4) के सम्बन्ध को एक रेखा द्वारा बताएँ तो चित्र (ब) में दिखाये अनुसार, LM- रेखा प्राप्त हो जाती है। यह रेखा आय-स्तरों और ब्याज दरों के सम्बन्ध को बताती है। इस रेखा का प्रत्येक बिन्दु नगद द्रव्य की माँग (या तरलता पसन्दगी) और नगद द्रव्य की वास्तविक मात्रा के सन्तुलन का सूचक है। चूँकि यह रेखा विभिन्न आय स्तरों से सम्बन्धित दी हुई तरलता पसन्दगी रेखाओं के परिवार और ‘नगद द्रव्य की वास्तविक मात्रा’ (जो कि दी हुई है) के आधार पर निकाली जाती है, इसलिए स्पष्ट है कि तरलता पसन्दगी और नगद द्रव्य की वास्तविक मात्रा में परिवर्तन होने पर LM- रेखा की स्थिति में भी परिवर्तन हो जायेगा।

ध्यान दीजिए कि LM- रेखा ऊपर की ओर चढ़ती हुई होती है देखिए चित्र (ब) अर्थात उसका ढाल धनात्मक होता है। कारण यह रेखा आय स्तर और ब्याज दर के बीच सीधे सम्बन्ध को बताती है, अर्थात जैसे-जैसे आय स्तर Y1 से बढ़ते हुए Y4 हो जाता है वैसे-वैसे ब्याज दर भी बढ़ती है और R1 से R4 हो जाती है। इस प्रकार ऊँचे आय स्तरों पर नगद द्रव्य की माँग (= तरलता पसन्दगी) अधिक होगी और इसलिए (जबकि नगद द्रव्य की वास्तविक मात्रा दी हुई है) ब्याज दर भी ऊँची होगी।

(3) ब्याज दर का निर्धारण-

जैसा कि चित्र में दिखाया गया है, IS- रेखा और LM- रेखा का कटान बिन्दु ब्याज दर को निर्धारित करता है। इनका कटाव बिन्दु P है। अत: ब्याज दर PY (या R) निर्धारित होगी।

R (जो कि सन्तुलन ब्याज दर है) पर आय के स्तर Y पर एक ओर तो वास्तविक क्षेत्र में बचत और विनियोग बराबर होंगे और दूसरी ओर मौद्रिक क्षेत्र में नगद द्रव्य की माँग और नगद द्रव्य की वास्तविक मात्रा बराबर होगी अर्थात सन्तुलन ब्याज दर R पर आय के ही स्तर अर्थात Y पर चारों तत्व (बचत विनियोग, तरलता पसन्दगी और द्रव्य की मात्रा) बराबर है। अन्य ब्याज दरों (जैसे कि R1) पर ऐसा नहीं होगा। R1 दर पर (जो कि सन्तुलन ब्याज दर नहीं है) या तो आय के Y1 स्तर पर विनियोग और बचत बराबर होंगे (जैसा कि A बिन्दु द्वारा सूचित होता है) या आय के Y2 स्तर तरलता पसन्दगी और द्रव्य की मात्रा बराबर होंगे जैसा कि बिन्दु B बताता है) परन्तु चारों तत्व एक ही आय स्तर पर बराबर नहीं होंगे। स्पष्ट है कि केवल ब्याज दर R ही सन्तुलन दर होगी, क्योंकि इसी पर आय के एक ही स्तर पर चारों तत्व बराबर हैं।

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Pankaja Singh

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