अर्थशास्त्र

तकनीक का चयन शासित करने वाले मुख्य घटक | तकनीक के चुनाव में कठिनाइयाँ

तकनीक का चयन शासित करने वाले मुख्य घटक | तकनीक के चुनाव में कठिनाइयाँ | Key factors governing the selection of technology in Hindi | Difficulties in choosing technology in Hindi

तकनीक का चयन शासित करने वाले मुख्य घटक

(Important Factors Which Govern the Choice of Technique)

तकनीक का अन्तिम रूप से चयन ‘श्रम-गहन’ और ‘पूँजी-गहन’ तकनीकों के बीच निहित होता है। किसी अर्थव्यवस्था में तकनीक का चयन निम्न घटकों से शासित होता है –

(1) पूर्व-प्राप्त तकनीकी स्तर – प्रत्येक विकसित या अर्द्धविकसित देश में कुछ-न- कुछ पूर्व प्राप्त तकनीकी स्तर अवश्य होता है, जो देश की परिस्थितियों, रीति-रिवाजों, तकनीकी ज्ञान, प्रशिक्षण सुविधाओं आदि पर निर्भर करता है। तकनीकी विकास का कार्यक्रम निर्धारित करते समय पूर्व प्राप्त तकनीकी स्तर ध्यान में रखना होगा। इसी को आधार मानकर नई तकनीकी सीखने का उत्साह होना आवश्यक है। इसके लिये संगठन, उत्पादन-विधि एवं सामाजिक व्यवस्थाओं में परिवर्तन लाने होंगे।

(2) संस्थागत व्यवस्था- किसी राष्ट्र का तकनीकी-स्तर निश्चित करते समय आर्थिक राजनीतिक एवं सामाजिक व्यवस्था, जनता के व्यवहार एवं दृष्टिकोण को महत्वपूर्ण स्थान दिया जाता है। कृषि क्षेत्र में तकनीकी सुथार से पूर्व भूमि-सम्बन्धी अधिकारों के नियमों एवं उपनियमों को सुधारना आवश्यक है। तकनीकी विकास के लिये उन संस्थागत घटकों का पतन होना आवश्यक है, जो उत्पादन-साधनों का स्वतन्त्र हस्तांतरण रोकते हैं। देश की सामाजिक पद्धति बदलती हुई तकनीक के साथ समायोजित होनी चाहिये। इसके लिये संस्थागत सुविधायें एवं सामाजिक सुधार लाने होंगे। समाज में सुख और शान्ति का वातावरण स्थापित करना मी आवश्यक है, ताकि व्यक्ति नई तकनीक सहर्ष स्वीकार कर सकें।

(3) साधन-अनुपात- किसी अर्थव्यवस्था में प्रयुक्त साधन-अनुपात वर्तमान तकनीक से प्रभावित होता है। तकनीकी परिवर्तन, साधनोंमें गुणातमक और संख्यात्मक परिवर्तन लाये बिना सम्भव नहीं है। अतः तकनीकी परिवर्तन के लिये वर्तमान तकनीक को आधार मानकर कार्य करना पड़ेगा, परन्तु यह एक धीमी विधि है। नियोजित अर्थव्यवस्था में यह कार्य शीघ्रता से भी किया जा सकता है।

(4) साधनों की उपलब्धता- किसी देश में तकनीक का चुनावसाधनों की उपलब्धता पर निर्भर करता है। ‘पूँजी’ विकास के साधनों में प्रमुख स्थान रखती है। जो तकनीक जितनी अधिक पूँजी-प्रधान होती है, उतनी ही अधिक विकसित मानी जाती है। परन्तु अकेली पूँजी ही तकनीकी प्रगति नहीं ला सकती। इसके लिये संगठन-कौशल एवं प्राकृतिक साधनों का सहयोग भी आवश्यक है। अर्द्धविकसित देशों में पूँजी एवं सहयोगी साधनों का अभाव पाया जाता है। अतः अत्यधिक महत्वाकांक्षी कार्यक्रमों से साधनों का क्षय होता है। इससे यत्र-तत्र नई तकनीक अपनाने में कुछ सफलता प्राप्त हो सकती है, किन्तु अर्थव्यवस्था का मुख्य-क्षेत्र तकनीकी प्रभाव से अछूता रह जायेगा। पूँजी मात्रा एवं उत्पादन कार्य में उसका आनुपातिक सन्तुलन ही अर्थव्यवस्था को पूँजी-अवशोषण शक्ति प्रदान करता है। तकनीक का चुनाव करते समय साधनों की पर्याप्तता एवं पूँजी-अवशोषण शक्ति कम होती है। इन राष्ट्रों के नियोजित विकास हेतु यह आवश्यक है कि वे विकसित राष्ट्रों की तकनीक शनैः शनैः अपनायें। तकनीकी विकास की अत्यधिक समाजवादी योजना अनार्थिक सिद्ध होगी। यह अर्थव्यवस्था में विभिन्न प्रकार के असुन्तलनों को जन्म देगी।

(5) सरकार की आर्थिक नीति- तकनीक का चयन सरकार की आर्थिक नीति तथा उसे उद्देश्यों से प्रभावित होता है। यदि सरकार विदेशी पूँजी के पक्ष में नहीं है तथा देश की बढ़ती हुई श्रम- शक्ति के लिये रोजगार की सुविधाओं का अधिकतम विस्तार करना चाहती, तब श्रम-गहन- तकनीक’ को वरीयता दी जायेगी। परन्तु यदि सरकार विदेशी पूँजी की समर्थक है तथा उसका उद्देश्य न्यनूतम लागत पर अधिकतम उत्पादन करना है, तब ‘पूँजी-गहन तकनीक’ को वरीयता मिलेगी।

(6) अन्य घटक- विकासशील देशों में तकनीक का चयन करते समय तीन अन्य आधारों पर ध्यान देना आवश्यक है – (1) कुल उत्पादन, (2) पुनर्निवेशयोग्य अतिरेक तथा (3) रोजगार। पूँजी-गहन तकनीक की अपेक्षा श्रम-गहन तकनीक का ‘पुनर्निवेश योग्य अतिरेक’ का आधार तो कमजोर होता है किन्तु ‘उत्पादन वृद्धि’ के आधार सबल होते हैं। अतः जनाधिक्य और पूँजी-स्वल्प देशों में श्रम-गहन तकनीक को वरीयता मिलनी चाहिये। ‘स्थिरता के साथ विकास’ के ध्यये की पूर्ति श्रम-गहन तकनीक से ही सम्भव है।

तकनीक के चुनाव में कठिनाइयाँ

(Difficulties in Choice of Technique)

विकासशील देशों को विकसित राष्ट्रों में प्रचलित आधुनिक तकनीक का प्रयोग करते समय उम्र समस्याओं एवं कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है-

(1) प्रयोग की समस्या- विकसित राष्ट्रों में तकनीकी विकास धीमी गति से हुआ है। अतः रीति-रिवाज एवं सभ्यता का भी तकनीक के साथ-ही-साथ विकास हुआ है। अल्प- विकसित राष्ट्रों में रीति-रिवाज एवं सभ्यता अपरिवर्तित रही है। अतः उनमें नई तकनीक का प्रयोग करने पर अनेक प्रकार की कठिनाइयाँ उपस्थित हो जाती हैं। उदाहरण के लिये कृषि- व्यवस्था में कृषक प्राचीन ढंग से कृषि करना उचित समझता है। वह नई तकनीक के प्रयोग के सम्बन्ध में प्रायः उदासीन रहता है।

(2) जनसंख्या का अशिक्षित होना- अल्पविकसित देशों की अशिक्षित जनसंख्या को नई तकनीक से परिचित कराने के लिये शिक्षण सम्बन्धी कार्यक्रम चलाने की आवश्यकता होगी। इस कार्य हेतु भारी मात्रा में पूँजी निवेश की आवश्यकता होगी, जिसका अर्द्ध-विकसित राष्ट्रों में अभाव पाया जाता है।

(3) संस्थागत परिवर्तन की समस्या- नई तकनीक का प्रयोग करने से पूर्व अल्पविकसित देश की आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक, कानूनी एवं राजनीतिक संस्थाओं में परिवर्तन लाने होंगे, जो अत्यनत कठिन कार्य है।

(4) पूँजी का अभाव- नई तकनीक के प्रयोग में नवीन उपकरणों एवं अन्य सुविधाओं की आवश्यकता होती है। परन्तु अर्द्धविकसित राष्ट्रों में, कीमती मशीनरी एवं उपकरण खरीदने के लिये वित्तीय साधनों का अभाव बना रहता है।

(5) उपयुक्त वातावरण की समस्या- नई तकनीक का विकास प्रायः विकसित राष्ट्रों में हुआ है, जो वहाँ की आवश्यकता और वातावरण को ध्यान में रखकर किया गया है। अल्पविकसित देशों का वातावरण और आवश्यकतायें विकसित राष्ट्रों से भिन्न हैं। नई तकनीक अपनाने के लिये अल्पविकसित राष्ट्रों के वातावरण में पर्याप्त परिवर्तन लाने होंगे, जो अत्यन्त कठिन कार्य है।

(6) अप्रचलन की समस्या- अल्पविकसित देशों में जब तक नई तकनीक पहुँचती है, तब तक वह पुरानी पड़ जाती है। अतः उससे इच्छित लाभ प्राप्त नहीं हो पाता है।

(7) अवशोषण-क्षमता का अभाव- मूलभूत आर्थिक सुविधाओं की अपर्याप्तता  तथा सामाजिक वातावरण की अनुपयुक्तता के कारण अल्पविकसित देशों की पूँजी-अवशोषण क्षमता बहुत कम होती है। अतः इन देशों के लिये आधुनिक पूँजी-गहन तकनीक अपनाना कठिन है।

(8) साधन-अनुपात- अल्पविकसित देशों में श्रम का बाहुल्य तथा पूँजी की स्वल्पता पाई जाती है। अतः पूँजी-गहन तकनीक अपनाना इन देशों की आवश्यकताओं एवं परिस्थितियों के अनुरूप नहीं है।

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Pankaja Singh

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