अर्थशास्त्र

रिकार्डो के लगान सिद्धान्त | लगान का स्वभाव | सिद्धान्त की आलोचनाएँ | रिकार्डों के लगान सिद्धान्त का मूल्यांकन 

रिकार्डो के लगान सिद्धान्त | लगान का स्वभाव | सिद्धान्त की आलोचनाएँ | रिकार्डों के लगान सिद्धान्त का मूल्यांकन 

रिकार्डो का लगान सिद्धान्त-

लगान का यथाक्रम व विस्तृत अध्ययन करने का श्रेय रिकार्डो को है। उन्होंने लगान का जो सिद्धान्त प्रतिपादित किया वह लगान का प्रतिष्ठित सिद्धान्त’ कहलाता है। रिकार्डो के अनुसार, केवल भूमि ही लगान प्राप्त कर सकती है, अन्य उत्पत्ति-साधन नहीं। उन्होंने लगान को भूमि से सम्बन्धित किया है, क्योंकि भूमि में कुछ ऐसे लक्षण हैं जो अन्य साधनों में नहीं होते, जैसे-(i) सीमितता या स्थिरता का गुण, एवं (ii) प्रकृति का निःशुल्क उपहार होना।

रिकार्डो के लगान सिद्धान्त के दो मुख्य अंग हैं-

  1. निर्बाधावादियों का कहना था कि लगान एक प्रकार का आधिक्य’ है जो कि प्रकृति की उदारता के कारण प्राप्त होता है। रिकार्डो ने भी लगान को एक आधिक्य माना है परन्तु वे कहते हैं कि यह प्रकृति के उदारता के कारण नहीं, वरन उनकी कंजूसी के कारण प्राप्त होता है। उन्होंने बताया कि भूमि की मात्रा, विशेष रूप से उपजाऊ भूमि की मात्रा, सीमित होती है, जिस कारण मनुष्य को कम उपजाऊ भूमियों पर खेती करने के लिए विवश होना पड़ता है और इससे फिर अधिक उपजाऊ भूमियों पर एक प्रकार का आधिक्य प्राप्त होता है, जिसे उन भूमियों का लगान कह सकते हैं। इस प्रकार रिकार्डो के लगान के उत्पन्न होने के कारण प्रकृति की कंजूसी को मानते थे उसकी उदारता को नहीं। उनका यह भी कहना था कि केवल भूमि को लगान प्राप्त होता है, अन्य उत्पत्ति साधनों को नहीं। कारण, भूमि में कुछ ऐसे लक्षण हैं जो कि अन्य साधनों में नहीं पाये जाते, जैसे-(i) प्रकृति का निःशुल्क उपहार होना, और (ii) सीमितता या स्थिरता का गुण होना।
  2. 2. लगान को उन्होंने भूमि का उपज का वह भाग बताया है, जो कि भूमि के स्वामी को भूमि की मूल और अविनाशी शक्तियों के प्रयोग के लिए दिया जाता है

भूमि के प्रत्येक टुकड़े में कुछ उर्वरा शक्ति प्रकृति से प्राप्त होती है, जो कि मूल और अविनाशी है, किन्तु कुछ उर्वरा शक्ति अर्जित की हुई भी हो सकती है। रिकार्डों के अनुसार किसी भूखण्ड से प्राप्त उपज में जो मूल और अविनाशी शक्तियों के कारण है (न कि अर्जित शक्ति के कारण) और जो कि भूमिपति को दिया जाता है वही लगान कहलायेगा।

लगान का स्वभाव : एक भेदात्मक बचत होना-

रिकार्डो ने बताया है कि लगान सापेक्षिक लाभ अथवा भेदात्मक बचत है। सभी भूखण्ड समान नहीं होते। उर्वरता व स्थिति की दृष्टि से उनमें भेद देखा जाता है और इसी भेद के परिणामस्वरूप उत्तम भूखण्डों को घटिया भूखण्डों की अपेक्षा लाभ या बचत प्राप्त हो जाती है। सापेक्षिक लाभ या भेदात्मक बचत या लगान कैसे उदय होता है इसे निम्न तीन शीर्षकों के अधीन समझाया जा सकता है-(अ) विस्तृत खेती के अन्तर्गत लगान, (ब) गहरी खेती के अन्तर्गत लगान, (स) स्थिति-भिन्नता के अन्तर्गत लगान।

(1) विस्तृत खेती के अन्तर्गत लगान- एक नये देश में प्रायः जनसंख्या प्रारम्भ में कम हुआ करती है, जिससे उनकी खाद्यानों सम्बन्धी आवश्यकता उत्तम अथवा प्रथम श्रेणी की भूमियों पर कृषि करने से पूर्ण हो जाती है। चूँकि जनसंख्या कम है और भूमि अधिक, इसलिए प्रथम श्रेणी की भूमियाँ सहज ही उपलब्ध हो जाती है और प्रयोग के लिए कुछ नहीं देना होता।

जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ती है, खाद्यानों के लिए माँग भी बढ़ती है और फिर उत्तम भूमियों का अभाव अनुभव होने लगता है। अत: अपेक्षाकृत घटिया (क्रमशः द्वितीय, तृतीय व चतुर्थ) श्रेणियों की भूमियाँ कृषि के अन्तर्गत लायी जाती हैं। ऐसी दशा में स्पष्ट है कि समान आकार के भूखण्डों पर समान मात्रा में श्रम और पूँजी का प्रयोग करने से प्राप्त उपज प्रथम श्रेणी की भूमि के सम्बन्ध में सर्वाधिक और चतुर्थ श्रेणी की भूमि के सम्बन्ध में सबसे कम होगी। अन्य शब्दों में, उत्तम भूमियों पर उत्पाद घटिया भूमियों की अपेक्षा कम होगा।

सबसे घटिया भूमि का ‘सामान्त भूमि’ और इससे अच्छी भूमियों को पूर्व सीमान्त भूमियाँ’ कहा जाता है। बाजार में खाद्यान्न की कीमत सीमान्त भूमि की औसत लागत के बराबर होगी। (यह लागत अन्य भूमियों की औसत लागत से ऊँची होती है) यदि ऐसा न हो, तो सीमान्त भूमि को (हानि रहने के कारण) कृषि-कार्य में नहीं लाया जायेगा। इस प्रकार, पूर्व सीमान्त भूमियों के किसानों को, जिनकी औसत लागत सीमान्त भूमि से कम होती है, कुछ आधिक्य या अतिरेक (या बचत) प्राप्त होगा, क्योंकि सभी किसानों का उत्पादन एक ही कीमत पर बिकता है। एक अतिरेक को ही लगान कहा गया है। यह सभी पूर्व सीमान्त भूमियों को प्राप्त होता है किन्तु सीमान्त भूमि पर कोई अतिरेक या लगान नहीं होगा, क्योंकि कीमत उसकी लागत भर के लिए काफी होती है। सीमान्त भूमि को लगान रहित भूमि’ भी कहा जाता है।

तालिका 1 : विस्तृत खेती के अन्तर्गत लगान

(भौतिक उपज एवं द्रव्य के सन्दर्भ में)

भूमि की श्रेणियाँ

अ श्रेणी की भूमि

ब श्रेणी की भूमि

स श्रेणी की भूमि

स श्रेणी की भूमि (सीमान्त भूमि)

कुल उत्पादन

20 क्वि०

15 क्वि०

10 क्वि०

5 क्वि०

लगान (उपज के संदर्भ में)

20-5315 क्वि.

15-5-10 क्वि.

10-5=5 क्वि.

लगान रहित भूमि

कुल लागत (श्रम व पूँजी)

100 रु०

100 रु०

100 रु०

100 रु०

बाजार मूल्य (सीमान्त भूमि की औसत लागत के बराबर)

20 रु० प्रति क्विं०

20 रु० प्रति क्विं०

20 रु० प्रति क्विं०

100/5रु० = 20 रु० प्रति क्विं०

लगान (द्रव्य के रूप में)

(20X20) – (100)=300 रु.

(15X20) – (100) =200 रु.

(10X20) – (100) =100 रु.

(5X20) – (100) = 0

इस प्रकार, लगान को द्राव्यिक रूप से अथवा भौतिक उपज की दृष्टि से, व्यक्त किया जा सकता है। भौतिक उपज की दृष्टि से, श्रेष्ठ भूमि और सीमान्त भूमि इन दोनों की उत्पत्ति के अन्तर को लगान कहा जायेगा। द्रव्य की दृष्टि से, प्रत्येक पूर्व सीमान्त भूमि की उपज को बेचने से प्राप्त कुल आगम में से उसकी कुल लागत को घटाने पर पूर्व सीमान्त भूमि का लगान ज्ञात हो जायेगा।

मान लीजिए कि चार प्रकार की भूमियाँ हैं- (अ), जिस पर 20 क्विंटल; (ब) जिस पर 15 क्विंटल; (स) जिस पर 10 क्विंटल; और (द) जिस पर 5 क्विंटल खाद्यान्न का उत्पादन होता है। प्रत्येक भूमि समान आकार की है और प्रत्येक पर समान मात्रा में श्रम व पूँजी का प्रयोग किया जाता है। सबसे घटिया भूमि सीमान्त भूमि है। इस पर कोई लगान नहीं  है, जैसा कि चित्र में दिखाया गया है। किन्तु पूर्व सीमान्त भूमियों पर क्रमश: 15, 10 और 5 क्विंटल का अतिरेक या लगान है।

(ब) गहरी खेती के अन्तर्गत लगान- बढ़ती हुई खाद्यान्नों सम्बन्धी माँग को भूमि क्षेत्रफल बढ़ाकर (अर्थात विस्तृत खेती के द्वारा) पूरा करने के अतिरिक्त उसी भूमि के टुकड़े पर श्रम और पूँजी की अधिकाधिक मात्राएँ प्रयोग करक (अर्थात गहरी खेती के द्वारा) भी पूरा किया जा सकता है।

तालिका 2 : गहन खेती के अन्तर्गत लगान

(भौतिक उपज एवं द्रव्य के रूप में)

मात्राएँ

प्रथम मात्रा

द्वितीय मात्रा

तृतीय मात्रा

चतुर्थ मात्रा

कुल उत्पादन

5 क्वि०

5 क्वि०

3 क्वि०

1 क्वि०

लगान (भौतिक उपज के रूप में)

5-5=4 क्वि.

4-1=3 क्वि.

3-1=2 क्वि.

लगान रहित भूमि

श्रम एवं पूँजी की एक मात्रा की लागत

100 रु०

100 रु०

100 रु०

100 रु०

बाजार मूल्य (सीमान्त मात्रा की औसत लागत के बराबर)

100 रु० प्रति क्विं०

100 रु० प्रति क्विं०

100 रु० प्रति क्विं०

100/1 रु० = 100 रु० प्रति क्विं०

लगान (द्रव्य के रूप में)

(100X4) – (100)=300 रु.

(100X3) – 100=200 रु.

(100X2) – 100 =100 रु.

(100X1) – 100 = 0

किन्तु उत्पत्ति हास नियम की क्रियाशीलता के कारण हर अगली ‘मात्रा से घटती हुई सीमान्त उपज प्राप्त होगी। यहाँ सीमान्त भूमि के स्थान पर सीमान्त मात्रा वाक्यांश का प्रयोग किया जायेगा। सामान्य मात्रा की लागत के बराबर ही उपज इस मात्रा से प्राप्त होगी। अत: उस पर कोई बचत या लगान न होगा। परन्तु पूर्व-सीमान्त मात्राओं पर होगा, क्योंकि उनकी उत्पादकता उनकी लागत से अधिक होगी (यहाँ पर मान लिया गया है कि सभी मात्राओं की लागत समान है)। इस प्रकार गहरी खेती में लगान भिन्नात्मक लाभ या बचत के रूप में प्राप्त होता है।

चित्र में चतुर्थ मात्रा सीमान्त है, जिस पर कोई लगान नहीं है क्योंकि उत्पादन केवल इतना हो पाता है कि इसकी लागत निकल आये। पूर्व सीमान्त मात्राओं पर लगान प्राप्त हो रहा है।

(स) स्थिति में भिन्नता के कारण लगान- देखा गया है कि मण्डियों के निकट की भूमि को अपेक्षाकृत दूर-स्थित भूमियों के परिवहन व्यय कम करने पड़ते हैं। अत: भले ही ये भूमियाँ उर्वरता की दृष्टि से समान हैं किन्तु स्थिति की भिन्नता के कारण उनमें से कुछ भूमियाँ अन्य भूमियों की अपेक्षा श्रेष्ठता प्राप्त कर लेती हैं। अत: यह कहना सम्भव है कि मण्डी में सबसे अधिक दूर की भूमि सीमान्त भूमि है और अन्य भूमि पूर्व-सीमान्त भूमियाँ हैं। यातायात व्यय कम होने के कारण पूर्व-सीमान्त भूमियों को सीमान्त भूमि की अपेक्षा अतिरेक या लगान प्राप्त हो सकेगा।

सिद्धान्त की आलोचनाएँ-

रिकार्डो के सिद्धान्त की प्रमुख आलोचनाएँ ये हैं-

  1. भूमि की शक्तियाँ मौलिक व अविनाशी होने का विचार अस्पष्ट है। कारण, एक बड़ी मात्रा में भूमि, श्रम और पूँजी के प्रयोग के द्वारा उर्वरता को अर्जित भी करती है यद्यपि यह जानना कठिन है कि उसकी उर्वरता का कितना भाग अर्जित है और कितना भाग प्राकृतिक। साथ ही, भूमि की उर्वरा शक्ति को अविनाशी नहीं कहा जा सकता क्योंकि जहाँ लगातार कृषि के कारण भूमियों की उर्वरा शक्ति कम होती देखी गयी वहाँ कृषि के तरीकों में परिवर्तन करके उर्वरता लौटती हुई भी पायी गयी है।
  2. अवास्तविक मान्यताएँ-रिकार्डो ने अपने सिद्धान्त को पूर्ण प्रतियोगिता एवं दीर्घकाल सम्बन्धी मान्यताओं पर खड़ा किया है, जो हम जानते हैं कि अवास्तविक है।
  3. सीमान्त भूमि की मान्यता उचित नहीं-सिद्धान्त में एक सीमान्त भूमि या लगान रहित भूमि की कल्पना की गयी है किन्तु वास्तविक जीवन में शायद ही किसी देश में इस प्रकार की भूमि का अस्तित्व देखने को मिले।
  4. लगान और कीमत-रिकार्डो ने यह विचार व्यक्त किया कि लगान सीमान्त लागत में प्रवेश न करने के कारण कीमत को, जो कि सीमान्त लागत के बराबर रहती है, प्रभावित नहीं करता है। किन्तु आधुनिक अर्थशास्त्री उसके इस विचार से सहमत नही हैं। उनका कहना है कि कुछ दशाओं में लगान लागत का अंग होता है और इसलिए कीमत को प्रभावित करता है।
  5. लगान भूमि को नहीं, वरन अन्य उत्पत्ति साधनों को भी प्राप्त हो सकता है। अतः केवल भूमि से लगान को सम्बन्धित करना अनुचित है।
  6. जैसा कि ब्रिग्स एवं जोर्डन ने बताया है, रिकार्डो का सिद्धान्त लगान उत्पन्न होने के कारण पर प्रकाश नहीं डालता, केवल यह सामान्य सत्य ही बताता है कि अधिक अच्छी वस्तु की भाँति एक अधिक उपजाऊ भूमि की कीमत (अथवा लगान) कम अच्छी (वस्तु या) भूमि से अधिक होगी।
  7. भूमि के जोतने का क्रम, जिसकी कल्पना रिकार्डो ने की है, इतिहास द्वारा प्रमाणित नहीं होता। आवश्यक नहीं है कि लोग सबसे उत्तम भूमि को पहले काम में लायें और सबसे खराब भूमि को बाद में, वरन प्राय: वही भूमियाँ प्रथम जोती जायेंगी जो सबसे अधिक सुविधाजनक स्थिति में होगी अर्थात शहरों के निकट भूमियों को पहले काम में लाया जाता है।

रिकार्डों के लगान सिद्धान्त का मूल्यांकन (या महत्व)-

उपर्युक्त आलोचनाओं के बावजूद रिकार्डो का लगान सिद्धान्त निरर्थक नहीं है और आज भी उसे अर्थशास्त्र में एक महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। रिकार्डो ने लगान के उदय होने का कारण प्रकृति की कंजूसी को माना था। इससे निर्बाधावादियों के प्राकृतिक व्यवस्था’ सम्बन्धी विचार का महत्व घटा और निराशा का वातावरण बढ़ा। परन्तु क्या हम आज यह नहीं देखते कि तीव्र गति से बढ़ती हुई जनसंख्या के दबाव में घटिया भूमियों पर भी कृषि की जा रही है। यदि प्रकृति ने कंजूसी से काम न लिया होता और उर्वरा भूमियों की प्रचुरता रखी होती, तो क्यों मनुष्य घटिया या कम उर्वरा भूमियों पर खेती करने के लिए विवश होता और फिर क्यों लगान उत्पन्न होता। नि:संदेह केवल भूमि को सीमित समझना और इस आधार पर लगान का सम्बन्ध भूमि से स्थापित करते हुए एक पृथक सिद्धान्त बनाना रिकार्डो की गलती थी, क्योंकि सीमितता का गुण आधुनिक अर्थशास्त्रियों के अनुसार, न्यूनाधिक सभी साधनों में पाया जाता है। रिकार्डो को आदर प्रदान करने की भावना से उन्होंने इस गुण को ‘भूमि पक्ष’ की संज्ञा दी है। चूँकि अन्य साधनों में भी पक्ष होता है, इसलिए वे भी प्राप्त कर सकते हैं। इस प्रकार, लगान सिद्धान्त एक पृथक सिद्धान्त नहीं वरन सामान्य सिद्धान्त माना जाता है और कृषि विकास एवं वैज्ञानिक अनुसंधानों के बावजूद वह कार्यशील देखा जाता है। इसी को लक्ष्य करके प्रो. चार्ल्स जीड ने कहा है कि “जब मनुष्य अण्डे की जरदी को विज्ञान की सहायता से बनाने लगेगा, केवल तभी रिकार्डो का लगान सिद्धान्त गलत प्रमाणित हो सकेगा।”

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Pankaja Singh

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