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तकनीक द्वैतवाद का सिद्धान्त | तकनीकी द्वैतवाद के सिद्धान्त की आलोचनात्मक व्याख्या

तकनीक द्वैतवाद का सिद्धान्त | तकनीकी द्वैतवाद के सिद्धान्त की आलोचनात्मक व्याख्या | Theory of Techno Dualism in Hindi | Critical Explanation of the Theory of Technical Dualism in Hindi

तकनीक द्वैतवाद का सिद्धान्त

(Theory of Technological Dualism)

बेन्जामिन हिगिन्स (Benjamin Higgins) ने अपनी पुस्तक ‘Economic Development’ में तकनीक द्वैतवाद का सिद्धान्त’ प्रतिपादित किया है। ‘तकनीकी द्वैतवाद’ का अर्थ अल्पविकसित अर्थव्यवस्था के आधुनिक एवं परम्परागत क्षेत्रों में भिन्न- भिन्न उत्पादन-फलनों के प्रयोग से है। हिगिन्स का सिद्धान्त अल्पविकसित अर्थव्यवस्था के दोनों क्षेत्रों में सीमित रोजगार अवसरों (बाजार सम्बन्धी अपूर्णताओं तथा साधन-सम्पन्नता एवं उत्पादन-फलनों की भिन्नता के कारण) की विद्यमानता से सम्बन्धित है। अल्पविकसित देशों में साधन-स्तर पर संरचनात्मक असन्तुलन पाया जाता है। ऐसा असन्तुलन विभिन्न प्रयोगों में किसी साधन द्वारा प्राप्त प्रतिफलों की भिन्नता या साधनोंके बीच कीमत-सम्बन्धों का उनकी उपलब्धताओं के प्रतिकूल होने के कारण उपस्थित हो सकता है। यह असन्तुलन अल्पविकसित देशों में बेरोजगारी या अर्द्ध-बेरोजगारी की समस्या दो प्रकार से उत्पन्न करता है- (1) कीमत-प्रणाली की अपूर्णतायें या दोषपूर्ण संचालन तथा (2) प्रचलित तकनीक की सीमायें या अतिरेक श्रम की समस्या को जनम देने वाली माँग-संरचना। इस प्रकार, अल्पविकसित देशों में तकनीकी बेरोजगारी का अभिप्राय साधनों के दोषपूर्ण आवंटन, माँग की संरचना और तकनीकी रुकावट से उत्पन्न ‘अतिरेक श्रम’ (Surplus Labour) की समस्या से है।

सिद्धान्त की व्याख्या-

हिगिन्स का सिद्धान्त दो वस्तुओं, उत्पत्ति के दो साधनों तथा अर्थव्यवस्था के दो क्षेत्रों (उनकी साधन-सम्पन्नता और उत्पादन-फलनों सहित) की मान्यता पर आधारित है। अर्थव्यवस्था का ‘औद्योगिक क्षेत्र’ बागान, खनन, खनिज तेल की खुदाई एवं परिष्करण तथा विशालस्तरीय उद्योगों में संलग्न होता है। यह क्षेत्र पूँजी-गहन और स्थिर तकनीकी गुणांक वाला होता है अर्थात् उत्पत्ति के साधन निश्चित अनुपातों में प्रयुक्त होते हैं तथा उनके बीच तकनीकी स्थानापन्न सम्भव नहीं होता। अर्थव्यवस्था का ‘ग्रामीण क्षेत्र’ खाद्य सामग्री और दस्तकारियों के उत्पादन तथा बहुत छोटे उद्योगों में संलग्न होता है। इसमें तकनीकी गुणांक परिवर्तनशील होता है अर्थात् तकनीकों की विस्तृत श्रृंखला तथा श्रम एवं पूँजी के वैकल्पिक‌संयोगों द्वारा समान निर्गत (Output) प्राप्त किया जा सकता है। औद्योगिक क्षेत्र को उत्पादन- फलन निम्न रेखाकृति में दर्शाया गया है।

रेखाकृति में Q समोत्पाद-वक्र है, जो निर्गत का निश्चित’ स्तर उत्पादित करने वाले ON पूँजी और OM श्रम के संयोग का प्रतिनिधित्व करता है। Q’, Q” और Q”’ समोत्पाद-वक्र निर्गत के ऊँचे स्तरों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो श्रम और पूँजी की समान अनुपात में इकाइयाँ बढ़ाकर ही सम्भव है। A, B, C और D बिन्दु विभिन्न निर्गत स्तरों को उत्पादित करने वाले श्रम और पूँजी

के स्थिर संयोग दर्शाते हैं। इन बिन्दुओं को जोड़ने वाली OE रेखा ‘औद्योगिक क्षेत्र का विस्तार- पथ’ है जिसका ढलान दोनों साधनों का स्थिर अनुपातों में प्रयोग दर्शाता है। N’M’ रेखा दर्शाती है कि उत्पादन प्रक्रिया पूँजी-गहन है। Q निर्गत के उत्पादन हेतु पूँजी की ON तथा श्रम की OM इकाइयों की आवश्यकता पड़ती है। यदि वास्तविक साधन-सम्पन्नता A की बजाय S बिन्दु पर है, तब इसका अर्थ यह होगा कि Q’ निर्गत के उत्पादन हेतु पूँजी की उपलब्धता पूर्ववत् (ON) रहते हुये श्रम की अधिक इकाइयाँ (OM’) उपलब्ध है। परन्तु स्थिर तकनीकी गुणांक के कारण श्रम की आधिक्य पूर्ति उत्पादन-तकनीक को प्रभावित नहीं कर पायेगी तथा श्रम MM’ इकाइयाँ बेरोजगार रहेंगी। आधिक्य श्रम को औद्योगिक क्षेत्र में लगाने के लिये पूँजी-स्टॉक में SF तक वृद्धि आवश्यक है।

ग्रामीण क्षेत्र का उत्पादन-फलन निम्न रेखाकृति में दर्शाया गया है-

रेखाकृति में Q. Q’, Q”‘ और Q” समोत्पाद-वक्र उत्पादन के परिवर्तनशील गुणांक दशति हैं। अधिक निर्गतके उतपादन हेतु पूँजी (उर्वर भूमि) की अपेक्षा अधिक श्रम प्रयुक्त किया जाता  है। अन्ततोगत्वा उर्वर भूमि स्वल्प बन जाती है तथा ऊँची श्रम-गहन तकनीक द्वारा E बिन्दु पर (जहाँ अधिकतम निर्गत का स्तर ON प्राप्त हो जाता है) सभी उपलब्ध भूमि पर खेती की जाने लगती है।

अर्थव्यवस्था के दोनों क्षेत्रों में विभिन्न उत्पादन फलनों की विद्यमानता के अन्तर्गत हिगिन्स ने उस प्रक्रिया का विश्लेषण किया है, जिसके द्वारा तकनीकी द्वैतवाद की प्रवृत्ति तकनीकी और अदृश्य बेरोजगारी उत्पन्न करने की होती है। अल्पविकसित अर्थव्यवस्था में औद्योगिक क्षेत्र का विकास एवं विस्तार विदेशी पूंजी की सहायता से होता है। पूँजी-गहन तकनीक के प्रयोग और स्थिर तकनीकी गुणांक के कारण औद्योगिक क्षेत्र बढ़ती हुई श्रमशक्ति को रोजगार दिलाने में असमर्थ रहता है। विस्तार प्रक्रिया की आरम्भना से पहले ग्रामीण क्षेत्र में साधनों की न तो न्यूनता होती है और न बहुलता। प्रारम्भ में अधिक भूमि को खेती के अन्तर्गत लाकर ग्रामीण क्षेत्र में अतिरिक्त श्रमशक्ति का अवशोषण सम्भव होता है। इसमें श्रम और पूंजी (उर्वर भूमि) के अनुकूलतम संयोग को जन्म मिलता है। कुछ समय बाद अच्छी भूमि स्वल्प बन जाती है। पूँजी औरके साथ श्रम का अनुपात धीरे-धीरे बढ़ता जाता है। अन्ततोगत्वा समस्त उपलब्ध भूमि पर ऊँची श्रम-गहन तकनीक द्वारा खेती की जाने लगती है। श्रम की सीमान्त उत्पादकता गिरकर या ऋऋणात्मक हो जाती है। किसानों में अधिक पूँजी का निवेश या श्रम-बचत तकनीक प्रयुक्त करने की प्रेरणा नहीं रह जाती। न तो प्रति व्यक्ति उत्पादन बढ़ाने हेतु कोई उन्नत तकनीक उपलब्ध होती है और न श्रमिकों में उत्पादकता बढ़ाने की प्रेरणा परणामतः उत्पादन की तकनीक, श्रम की उत्पादकता तथा सामाजिक-आर्थिक कल्याण के स्तर नीचे बने रहते हैं।

हिगिन्स के अनुसार, विगत दो शताब्दियों में ग्रामीण क्षेत्र में तकनीकी प्रगति नगण्य हुई है; जबकि औद्योगिक क्षेत्र में तेजी से तकनीकी प्रगति हुई है। इससे अदृश्य बेरोजगारी की मात्रा बढ़ी है। श्रम संगठनों के कार्य-कलापों यासरकारी नीति द्वारा मजदूरी की दरें कृत्रिम रूप से ऊँचीक्षरहने के कारण अदृश्य वेरोजगारी की समस्या अधिक सघन बनी है, क्योंकि श्रम-उत्पादन की अपेक्षा औद्योगिक श्रमिकों की ऊँची मजदूरी ने उद्यमियों को ‘श्रम-बचत तकनीक’ अपनाने के लिये प्रेरित किया है।

सिद्धान्त की आलोचना-

हिगिन्स द्वारा प्रतिपादित तकनीकी द्वैतवाद के सिद्धान्त की निम्नलिखित आधारों पर आलोचना की जाती है –

(1) औद्योगिक क्षेत्र में स्थिर गुणांक नहीं- औद्योगिक क्षेत्र में स्थिर तकनीकी गुणाक के आधार पर उत्पादन की मान्यता सन्देहपूर्ण है। व्यवहार में औद्योगिक क्षेत्र का तकनीकी गुणांक स्थिर नहीं रहता।

(2) साधन-कीमतें साधन-सम्पन्नता पर ही निर्भर नहीं – हिगिन्स का सिद्धान्त बताता है कि साधन-सम्पन्नता और उत्पादन-फलनों की भिन्नता ग्रामीण क्षेत्र में अदृश्य बेरोजगारी को जन्म देती है। यह विश्लेषण साधन-कीमतों के ढाँचे से सम्बन्धित है; जबकि साधन-कीमतें परपूर्णतया साधन-सम्पन्नता पर निर्भर नहीं होती।

(3) संस्थागत तत्वों की अवहेलना- साधन-अनुपात को प्रभावित करने वाले कुछ संस्थागत और मनोवैज्ञानिक घटक भी होते हैं, जिनकी हिंगिन्स ने पूर्णयता अवहेलना की है।

(4) श्रम-अवशोषक तकनीकों के प्रयोग की उपेक्षा- हिंगिन्स का यह विचार कि औद्योगिक क्षेत्र में प्रयोग हेतु ऊँची पूँजी-गहन तकनीकों का आयात किया जाता है, श्रम-  अवशोषक तकनीकों के प्रयोग की अवहेलना करता है। सभी आयातित तकनीकें श्रमत की बचत करने वाली नहीं होती। उदाहरण के लिये, धान की जापानी खेती पूँजी-गहन तकनीक के प्रयोग पर आधरित नहीं है। यह उन्नत किस्म के बीजों, उर्वरकों के बढ़ते हुये प्रयोग और सुधरी कृषि- पद्धतियों पर आधारित है।

(5) अदृश्य बेरोजगारी के आकार एवं स्वरूप का स्पष्टीकरण नहीं- हिंगिन्स ने ग्रामीण क्षेत्र में विद्यमान अदृश्य बेरोजगारी की प्रकृति तथा औद्योगिक क्षेत्र में विद्यमान श्रम की आधिक्य पूर्ति को स्पष्ट नहीं किया है। उन्होंने तकनीकी द्वैतवाद के कारण उत्पन्न अदृश्य बेरोजगारी की वास्तविक सीमा का भी उल्लेख नहीं किया है।

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Pankaja Singh

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