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पुरस्कार कहानी की समीक्षा | जयशंकर प्रसाद – पुरस्कार | कहानी कला के तत्वों के आधार पर पुरस्कार कहानी की समीक्षा

पुरस्कार कहानी की समीक्षा | जयशंकर प्रसाद – पुरस्कार | कहानी कला के तत्वों के आधार पर पुरस्कार कहानी की समीक्षा

पुरस्कार कहानी की समीक्षा

इतिहास और कल्पना के इन्द्रधनुषी रंग में रंगकर अत्यन्त सजीव एवं मोहक चित्र प्रस्तुत करने में जयशंकर प्रसाद हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ कहानीकार हैं। प्रसाद जी की अनेक कहानियाँ ऐतिहासिक धरातल को आधार मानकर लिखी गयी है, किन्तु ‘पुरस्कार’ कहानी एक भावप्रधान-आदर्शवादी कहानी है। इस कहानी में प्रेम, करुणा और आनन्द का पूर्ण संयोजन पर सामाजिक मर्यादाओं तथा मान्यताओं के प्रति विवेकपूर्ण दृष्टिकोण अपनाया गया है। प्रसाद जी एक समूचे युग, समस्त भाव-धारा में तारतम्यता लाने के प्रयास में अपनी संवेदनाओं को विस्तृत कर कथा में चारुता उपस्थित कर देते हैं। प्रेम की उदात्तता और कर्तव्य की महानता अर्थात् वैयक्तिता और राष्ट्रीयता में अद्भुत सामंजस्य कर कल्पना के रंगों में सजाकर आदर्श और यथार्थ के समन्वय से इस कहानी का निर्माण किया है। अनेक विद्वानों ने प्रसाद की आलोच्य कहानी ‘पुरस्कार’ की भूरि-भूरि मुक्तकंठ से प्रशंसा की है। कहानी कला के तत्वों के आधार पर प्रसाद की कहानी ‘पुरस्कार की समीक्षा निम्नलिखित है-

  1. कथानक –

इतिहास और कल्पना के अद्भुत समन्वय से सिंचित इस कहानी का‌ कथानक अत्यन्त सशक्त और मार्मिक है। इस कथानक का आधार सांस्कृतिक चेतना, मनोवैज्ञानिक‌ सौन्दर्य और प्रेम तथा कर्त्तव्य के अनूठे सामंजस्य से है। इस कहानी की कथावस्तु में क्रमबद्धता के साथ-साथ कौतुहल एवं चमत्कार का भी महत्व है। इसकी कथा कौशल के वार्षिक कृषि-उत्सव के‌ साथ आरम्भ होती है। परम्परानुसार राजा किसी एक खेत में हल चलाकर बीजारोपण करता था और उसके स्वामी को बहुत सा पुरस्कार देकर ‘राजा को खेत’ नाम से घोषित किया जाता है। इस वार्षिकोत्सव में इस बार प्राणों की बाजी लगाकर कौशल राज्य को बचाने वाले सेनापति सिंह भित्र की एकमात्र कन्या मधूलिका का खेत चुना गया है। आज उसी खेत में राजा हल चला कर उसे बहुत सा पुरस्कार देने की चेष्टा करते हैं, किन्तु मधूलिका राजा की ओर से दिये बहुमूल्य पुरस्कार को अस्वीकार कर भूमि का मूल्य लेने से इन्कार करती है। इस उत्सव में सम्मिलित मगध का राजकुमार अरुण मधूलिका के अपूर्व सौन्दर्य पर मुग्ध हो जाता है। वह मधूलिका से प्रणय निवेदन करता है, किन्तु वह अस्वीकार कर देती है।

अभाव एवं दारिद्रय का क्लेश सहन करती मधूलिका वृक्ष के नीचे अपनी टूटी झोपड़ी में तीन वर्ष व्यतीत कर देती है। शीत की वर्षा में एक युवक आश्रय मांगता है। बिजली की चमक में दोनों एक दूसरे को पहचान जाते हैं। वह युवक अरूण है, जो मगध से निर्वासित होकर कौशल में जीविका की तलाश में आया है। दोनों निराश्रित प्रेम-बंधन में बंध जाते हैं। अरुण की प्रेरणा पर गधूलिका कोशल नरेश से कुछ भूमि किले के निकट माँग लेती है। अरुण यहाँ से कोशल-दुर्ग पर आधिपत्य करने की योजना बनाता है। मधूलिका का मातृभूमि-प्रेम इस कुकृत्य पर विद्रोह कर देता है। वह अपने प्रेम को ठुकराकर मातृभूमि के प्रेम में कौशल के सेनापति से यह रहस्य बता देती है। अरुण बन्दी हो जाता है तथा उसे प्राणदण्ड की सजा मिलती है। मधूलिका अपने पुरस्कार में अरुण के साथ‌ स्वयं को भी प्राणदण्ड का आदेश माँग लेती है। यहाँ पहुँचकर अपनी सम्पूर्ण संवेदनशीलता, प्रभावात्पादकता एवं पूर्णता का परिचय देती हुई सारी जिज्ञासा और कौतूहल की समाप्ति के साथ कहानी समाप्त हो जाती है।

इस प्रकार, विविध घटनात्मक मोड़ों से परिपूर्ण इस कहानी की कथावस्तु द्वन्द्व एवं संघर्ष के मध्य विकसित हुई है। अतिनाटकीय और जिज्ञासावर्धक आरम्भ नाना घटनाओं से पुष्ट और मार्मिक एवं हृदय द्रावक अन्त से युक्त ‘पुरस्कार’ का कथानक सुगठित, स्वाभाविक और भावपूर्ण है।

  1. पात्र एवं चरित्र-चित्रण –

चरित्र-चित्रण की कसौटी पर ‘पुरस्कार’ कहानी अपनी समग्रता के साथ खरी उतरी है। इस कहानी में मुख्यतः दो पात्र अरुण और मधूलिका हैं। अन्य शेष पात्रों में सेनापति, महाराज, सैनिक आदि हैं, जिनका चरित्र मात्र मधूलिका और ‘अरुण’ के चरित्रों‌को उभारने के लिए है। इसमें मधूलिका का चरित्र ही प्रधान है। कहानी की नायिका मधूलिका का‌ चरित्र बड़े ही स्वाभाविक एवं मनोवैज्ञानिक ढंग से व्यक्त हुआ है। व्यक्तित्व प्रेम-भावना और जन्मभूमि के अनुराग का अन्तर्द्वन्द्व उसके चरित्र को अति सजीव बना देता है। उसका समग्र व्यक्तित्व और मोहक सौन्दर्य अपने मनोहारी रूप में चित्रित किया गया है। उसके सौन्दर्य का वर्णन कहानीकार ने निम्न पंक्तियों में किया है- ‘वह कुमारी थी, सुन्दरी थी, कौशेयवसन उसके शरीर पर इधर-उधर लहराता हुआ स्वयं शोभित हो रहा था। वह कभी थाल संभालती और कभी अपने रूखे अलकों को। कृषक बलिका के शुभ-भाल पर श्रम-कणों को भी कमी न थी। वे सब बरौनियों में गुंथे जा रहे थे। सम्मान और लज्जा उसके अधरों पर मन्द मुस्कुराहट के साथ सिहर उठते।’

मधूलिका का ताना-बाना सहज मानवीयता और उच्च आदर्श से बुना गया है। उसके आन्तरिक द्वन्द्व का सजीव चित्र उपस्थित कर कहानीकार ने सांस्कृतिक वैभव, कर्तव्यनिष्ठ एवं उत्सर्ग‌ की उदात्त भावनाओं को प्रकट किया है। कर्तव्य एवं प्रेम के द्वन्द्व पूर्ण केन्द्र बिन्दु विकसित कर मधूलिका के चरित्र में प्रसाद जी को पर्याप्त सफलता मिलती है।

राजकुमार अरुण का षड़यन्त्रकारी और राज्य लोलुप रूप भी बड़ा स्वाभाविक है। व्यक्तित्व की पूर्ण प्रतिष्ठा एवं द्वन्द्व की प्रधानता से युक्त अरुण साहसी, महत्वाकांक्षी एवं चरित्रगत दृढ़ता से युक्त है। प्रेम का प्रसाद जी ने इतना उज्जवल चित्र उपस्थित किया है कि पात्रों की समस्त क्षुद्रताएँ विलीन होकर उसकी उदात्तता का परिचय देती हैं। राजकुमार अरुण का कथन उसकी महत्वाकांक्षा का परिचायक है- ‘मैं अपने बाहुबल पर भरोसा करता हूँ। नये राज्य की स्थापना कर सकता हूँ, निराश क्यों हो जाऊँ।’

  1. द्वन्द्व –

‘पुरस्कार’ नामक इस कहानी में द्वन्द्व और विद्रोह की मिली-जुली भावना पर्याप्त रूप से देखने को मिलती है। सबसे अधिक द्वन्द्व कहानी की नायिका मधूलिका में है। मधूलिका के मनोलोक में प्रवेशकर उसके अर्न्तजगत की झाँकी प्राप्त करने के साथ अनेक मनोवैज्ञानिक सत्य की उपलब्धि होती है जो उसके द्वन्द्व को रेखांकित करते है। व्यक्तिगत जीवन के असन्तोष, विद्रोह, वेदना उनके जीवन में एक छोर तक छाये हैं। मधूलिका का अतद्वन्द्व अत्यन्त तीव्र है। वहीं अरुण का द्वन्द्व क्षिप्र गति वाला है। विषम परिस्थितियों के मध्य मधूलिका की अन्तश्चेतना अनेक दिशाएँ ग्रहण‌ करती हैं, किन्तु किसी भी दिशा का चुनाव नहीं कर पातीं। कर्तव्य और प्रेम के इस अर्न्तद्वन्द्व में मधूलिका कुछ असामान्य सी हो जाती है, भावावेश के अतिरेक में राजकुमार अरुण से प्रेम और घृणा एक साथ करती है। उसके इसी द्वन्द्व को लेखक ने निम्न में प्रस्तुत किया है-

‘पथ अन्धकारमय था और मधूलिका का हृदय भी निविड़ता से घिरा था ——-।

………….फिर सहसा सोचने लगी- ‘क्यों सफल हो? श्रावस्ती दुर्ग एक विदेशी के अधिकार में क्यों चला जाये? मगध कोशल का चिर शत्रु! ओह उसकी विजय! कोशल नरेश ने क्या कहा, सिंह मित्र की कन्या! सिंह मित्र कोशल का रक्षक वीर, उसी की कन्या आज क्या करने जा रही है? नहीं-नहीं मधूलिका! मधूलिका! मधूलिका- जैसे उसके पिता उसे अन्धकार में पुकार रहे थे।”

  1. कथोपकथन –

कथोपकथन यद्यपि कहानी के विकास में अधिक सहायक नहीं होते हैं, किन्तु भावों और विचारों के आदान-प्रदान के लिए इसकी आवश्यकता अनिवार्य होती है। प्रसाद जी की कहानी ‘पुरस्कार’ में संवादों की बहुलता है, लेकिन इनके संवाद कथा को गति प्रदान करते हैं तथा इसके काव्यगत सौन्दर्य में चारुता उत्पन्न करते हैं। इसमें संवाद-योजना अत्यन्त नाटकीय है तथा सारगर्भिता, संक्षिप्तता तथा वातावरण की सृष्टि में सहायक और पात्रों की चारित्रिक विशेषताओं को स्पष्ट करने वाले हैं। इसमें पात्रों के मनोस्थिति के अनुरूप भावों की व्यंजना हुई है। कहीं-कहीं उदासीनता और नैराश्य का तो कहीं क्षोभ और व्यंग्य की अभिव्यक्ति हुई है। वार्षिकोत्सव में प्रयुक्त अपने खेत का मूल्य अस्वीकार करती मधूलिका कहती है- “राजकीय रक्षण की अधिकारिणी तो पूरा प्रजा है मन्विवर……….! महाराज को भूमि समर्पण करने में तो मेरा कोई विरोध नहीं था और न है, किन्तु मूल्य स्वीकार करना असम्भव है।”

महत्वाकांक्षी अरुण के संवाद उसके स्वभाव और भाव के अनुरूप हैं। अपनी प्रेयसी मधूलिका के प्यार का आश्रय पाकर उसकी लालसा और बढ़ गयी। वह मधूलिका से कहता है-

“तुम्हारी इच्छा हो तो प्राणों से प्राण लगाकर मैं तुम्हें इसी कौशल के सिंहासन पर बिठा दूं। मधूलिका! अरुण के खड्ग का आतंक देखोगी।”

प्रसाद की इस कहानी की समाप्ति भी कथोपकथनों से हुई है। कहानी की मुख्य संवेदना चरित्र के माध्यम से अभिव्यक्ति पाक संवादों के द्वारा निर्मित हुई है। प्रसाद की नाटकीय एवं कवित्वकला ने संवादों को और मनोहारी बना दिया है।

  1. देशकाल तथा वातावरण –

जयशंकर प्रसाद की यह अपनी विशेषता रही है कि उन्होंने गुप्तकालीन सम्राटों के चरित्रों को अपने कथानक का विषय बनाया है तथा इसमें किसी-न-किसी विषय की उदात्तता अवश्य परिलक्षित होती है। इस कहानी का कथानक भी उन्हीं सम्राटों से जुड़ा है, लेकिन कहानी ने सम्राट को प्रकाश में न लाकर मात्र उनके राज्यों का नामोल्लेख किया है। इस कहानी में वातावरण की सृष्टि अपनी रम्यता की चरमावस्था पर पहुंच गयी है। उनकी यह ऐतिहासिक कहानी वातावरण योजना, दृश्य विधान की सफलता एवं प्रभावोत्पादकता से कहानी के विकास में महत्वपूर्ण योगदान करती है। प्रकृति-चित्रण में तो प्रसाद का छायावादी कविरूप खुलकर सामने आ गया है। प्रकृति की मनोहारी सुरम्यता का आंशिक वर्णन निम्न पंक्तियों से हुआ है – “आर्द्रा नक्षत्र, आकाश में काले-काले बादलों की घुमड़, जिसमें दुन्दभी का गम्भीर घोष। प्राची के एक निरभ्र कोने से स्वर्ण-पुरूष झांकने लगा था देखने लगा महाराज की सवारी। शैल-माला के आँचल में, समतल उर्वरा भूमि से सोंधी बास उठ रही थी।”

देशकाल अथवा वातावरण के अन्तर्गत प्रसाद जी ने सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक और आर्थिक परिस्थितियों को तो लिया ही साथ-ही इन पात्रों के अभ्यान्तरितक वातावरण, उनकी मानसिक उथल-पुथल और अचेतन कारणों का भी समावेश कर दिया है। भाव-चित्रों द्वारा वातावरण की सृष्टि के उदाहरण ‘पुरस्कार’ में प्रचुर मात्रा में हैं।

“अरुण ने देखा एक छिन्न मालती-लता वुक्ष की शाखा से च्युत होकर पड़ी है। सुमन मुकुलित थे, भ्रमर निस्पन्द। अरुण ने अपने अश्व को मौन रहने का संकेत दिया, उस सुषमा को देखने के लिए। तुरन्त कोकिल बोल उठी। उसने अरुण से प्रश्न किया – ‘छि. कुमारी के सोये सौन्दर्य पर दृष्टिपात करने वाले धृष्ट तुम कौन हो।”

  1. भाषा शैली-

प्रसाद की भाषा परिष्कृत, कलात्मक एवं संस्कृतनिष्ठ है तथा ललित शैली का माधुर्य, नाटकीयता और काव्यमयी भाषा का गरिमामय प्रयोग उसकी चारुता को और बढ़ा देता है। कहानी के उदात्त एवं ऐतिहासिक धरातल के अनुरूप भाव-चित्र एवं वातावरण उपस्थित करने के प्रसाद जी की भाषा शैली का स्वाभाविक कलात्मक एवं सशक्त कवित्वपूर्ण चित्रण, मोहक अलंकार-विधान और तत्समप्रधान, ओजमयी भाषा के कारण आलोच्य कहानी ‘पुरस्कार’ प्रसाद की प्रतिनिधि कहानी कही जा सकती है।

विदेशी शब्दों और मुहावरों, कहावतों के प्रयोग से अछूती, उनकी भाषा, सौष्ठव एवं लालित्य की मधुरता से युक्त है। इस कहानी में तो नाटकीय शैली प्रधान है’ पर चित्रात्मक, वर्णनात्मक तथा भावाभिव्यक्ति शैलियों का भी यथा-स्थान प्रयोग पटुता एवं निपुणता से हुआ है।

“एक घने कुज में अरुण और मधूलिका एक दूसरे को हर्षित नेत्रों से देख रहे थे। सन्ध्या हो चली थी। उस निविड़ वन में नव नवागत मनुष्यों का देखकर, पक्षीगण अपने नीड़ को लौटते हुए अधिक कोलाहल कर रहे थे।

डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल के शब्दों में, “पुरस्कार’ कहानी में कवि की कल्पना, नाटककार का विश्लेषण तथा निबन्धकार का चिन्तन तीनों का सुन्दर समन्वय है।”

(7) उद्देश्य –

पुरस्कार कहानी में व्यक्तिगत प्रेम और जन्मभूमि के प्रति कर्तव्य के संघर्ष को अधिक महत्व दिया गया है। राष्ट्र और समाज का दायित्व और कर्त्तव्य वैयक्तिक प्रेम पर विजय पाता है। इसमें कहानीकार ने करुणा, सत्य एवं उत्सर्ग का आदर्श उपस्थित किया है और जनमानस को एक प्रेरणा देने का प्रयास किया है। इस कहानी की नायिका एक ओर तो कर्तव्य निर्वाह के लिए अपने प्रेम को राष्ट्र पर न्यौछावर कर देती है तथा दूसरी ओर गौरव की रक्षा हेतु आत्मोत्सर्ग का आदर्श की महानता को उजागर करती है। तत्वतः, यह कहानी प्रेम का सन्देश देती है- चाहे वह देश के प्रति हो या व्यक्तिगत हो, एक दूसरे में बाधक बने बिना दोनों निभाये जायें, यही इस कहानी का महती उद्देश्य है।

इस प्रकार, विवेच्य कहानी ‘पुरस्कार’ शिल्प-विधान और अनुभूति दोनों रूपों से एक उदात्त कहानी है।

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Pankaja Singh

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