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प्रतीक के स्वरूप एवं विशेषताएँ | काव्य में प्रतीक के प्रयोग एवं महत्व

प्रतीक के स्वरूप एवं विशेषताएँ | काव्य में प्रतीक के प्रयोग एवं महत्व

प्रतीक के स्वरूप एवं विशेषताएँ

आज के सामान्य समालोचक जो संस्कृत वाङमय से अपरिचित है, उनका मानना है कि प्रतीक-विधान पाश्चात्य काव्यशास्त्र की देन है। किन्तु वास्तविकता यह है कि संस्कृत के वैदिक वाङ्मय से लेकर लौकिक संस्कृत के आधुनिकतम रूपों तक स्थान स्थान पर कथ्य को भी मूर्त रूप देने के लिए प्रतीक का उपयोग किया जाता है।

प्रतीक को हिन्दी और अंग्रेजी साहित्य के विद्वानों ने विभिन्न प्रकार से परिभाषित किया है। डॉ० देवीशरण रस्तोगी के  अनुसार, “किसी देवता का प्रतीक सामने आने पर जिस प्रकार उसके स्वरूप और उसकी विभूति की भावना मन में आ जाती है उसी प्रकार काव्य में आयी हुई कुछ वस्तुएँ विशेष मनोविकारों या भावनाओं को जागृत कर देती हैं। जैसे कमल माधुर्यपूर्ण कोमल सौन्दर्य की भावना जागृत कर देता है।”

हिन्दी साहित्य कोश के अनुसार, “प्रतीक शब्द का प्रयोग उस दृश्य वस्तु के लिए किया जाता है, जो किसी अदृश्य, अगोचर या अप्रस्तुत विषय का प्रतिनिधित्व उसके साथ अपने साहचर्य के कारण करती है। अथवा कहा जा सकता है कि किसी अन्य स्तर का समान रूप वस्तु द्वारा किसी अन्य स्तर के विषय का प्रतिनिधित्व करने वाली वस्तु प्रतीक है।”

प्रतीक एक ऐसा शब्द-चिन्ह है जो किसी सूक्ष्म वस्तु या विचार को साकार करने के लिए प्रयुक्त होता है। प्रतीकों को कुछ विशेषताएं होती हैं :

  1. प्रतीक अप्रस्तुत का प्रतिनिधित्व करने वाले प्रस्तुत का नाम है।
  2. वह मन में शीघ्र ही किसी भावना विशेष का उक्त कर देता है।
  3. प्रतीकों पर देश, काल, संस्कृति एवं मान्यताओं की छाप होती है।
  4. कवियों द्वारा प्रयोग किये जाने वाले बहुत से नये प्रतीक जो व्यक्तिगत होते हैं, धीरे-धीरे वे आगे चलकर रूढ़ हो जाते हैं।

आचार्य शुक्ल ने प्रतीकों के दो भेदों को स्वीकार किया है:

  1. मनोविकार सम्बन्धी प्रतीक, 2. भाव-विचार सम्बन्धी प्रतीक।

डॉ० प्रेमनारायण शुक्ल के अनुसार प्रतीकों को चार भागों में विभक्त किया जा सकता है:

  1. परम्परागत, 2. वेशगत, 3. व्यक्तिगत, 4. युगगत ।

वस्तुतः प्रतीकों के कई भेद किये जा सकते हैं। कुछ का यहाँ पर सामान्यतः परिचय दिया जा रहा है।

  1. राग प्रधान प्रतीक- ऐसे प्रतीकों में राग अथवा अनुराग की प्रधानता रहती है। कमल, चन्द्रमा, कुमुद आदि ऐसे ही प्रतीकों के उदाहरण हैं। आचार्य शुक्ल ने ऐसे प्रतीकों को भावोत्पादक प्रतीक कहा है।
  2. विचारोत्पादक प्रतीक- ऐसे प्रतीकों से किसी प्रकार के विचार की उत्पत्ति होती है। जैसे- अत्यन्त क्रूर व्यक्ति के लिए रावण, बहुत सोने वाले के लिए कुम्भकरण, किसी बुद्धिमान् व्यक्ति के लिए बृहस्पति आदि प्रतीक हैं।’
  3. भावात्मक प्रतीक- जब प्रतीक शब्दगत न होकर भावगत हो जाते हैं, तब ऐसे प्रतीकों को भावात्मक प्रतीक कहते हैं। जैसे-ऊषा का था उर में आवास मुकुल का मुख में मृदुल विकास इन पंक्तियों में ‘उषा’ और ‘मुकुल’ इन दो प्रतीकों के प्रयोग किये गये हैं जो क्रमशः स्फूर्ति एवं प्रबोधता को सूचित करते हैं।
  4. उपचारात्मक प्रतीक- जब किसी साम्य विशेष को लेकर प्रतीकों का प्रयोग किया जाता है तो वे प्रतीक उपचारात्मक प्रतीक कहलाते हैं। जैसे-किसी शौर्य, वीर्य, पराक्रम सम्पन्न व्यक्ति को सिंह कहना, किसी मन्दबुद्धि वाले व्यक्ति को बैल कहना, और किसी सीधे-सादे व्यक्ति को गो कहना इत्यादि। ऐसे प्रतीकों का प्रयोग संस्कृत साहित्य के प्रत्थों में बहुत अधिक मिलता है।
  5. वैयक्तिक प्रतीक- जब कवि अपने अनुभव एवं प्रेरणा के आधार पर किसी प्रतीक विशेष का प्रयोग करता है तो वे प्रतीक वैयक्तिक प्रतीक कहलाते हैं। जैसे-

‘चलती चक्की देख के दिया कबीरा रोय।

दो पाटों के बीच में साबुत बचा न कोय ॥’

इस पद्य में संसार-चक्र को चलती चक्की कहा गया है। श्रीमद्भगवद्गीता में परिवर्तनशील संसार को संसारचक्र कहा गया है और उसके द्वन्द्रों को मात्रा स्पर्श कहा गया है। डॉ० देवीशरण रस्तोगी ने हिन्दी साहित्य कोश-भाग 1 के आधार पर प्रतीकों की कई प्रकार की विशेषताओं को बतलाया है, जो निम्नांकित प्रकार की हैं-

  1. विषय की व्याख्या- प्रतीकों के द्वारा प्रतिपाद्य विषय बोधगम्य एवं सर्वजनसंवेद्य बन जाते हैं। जैसे-झीनी झीनी बीनी रे चदरिया’ इत्यादि पद्य में कबीर ने प्रतीक के माध्यम से शरीर तथा उसको नश्वरता आदि को बड़ी ही सुन्दर व्याख्या की है। जीवन के लक्ष्य से विचलित होकर यदि कोई महापुरुष उन्मार्गगामी हो जाय, तो वह इस शरीर-रूपी चादर को मैली कर देता है :

‘मैली कीनी चदरिया’

  1. विषय को स्वीकृति के योग्य बनाना- प्रतीक के माध्यम से कवि प्रतिपाद्य विषय को स्वीकृति के योग्य बना देता है:

दुनिया के वीरो सावधान,

दुनिया के पापी जार सजग,

जाने किस दिन फुफकार उठे,

पददलित काल सर्पों के फन

  1. पलायनवादी प्रवृत्ति की अभिव्यक्ति का अवसर- देखा जाता है कि हिन्दी के छायावादी कवियों में संसार की कठिनाइयों से पलायन की प्रवृत्ति अधिक पायी जाती है और इसकी अभिव्यक्ति प्रतीकों के माध्यम से की जाती है। जैसे-

‘चल उड़ जा रे पंछी, अब यह देश हुआ बेगाना’।

इसी तरह से प्रसाद भी कहते हैं-

‘ले चल मुझे भुलावा देकर, मेरे नाविक धीरे-धीरे’

  1. सुपुप्त अनुभूतियों की अभिव्यक्ति का साधन- कवि कभी-कभी प्रतीकों के माध्यम से अपनी मनोगत सुषुप्त भावनाओं को भी अभिव्यक्त किया करता है। उदाहरणार्थ-निराला की ‘जूही की कली’ शीर्षक कविता की इन पंक्तियों को देखा जा सकता है-

निर्दय उस नायक ने

निपट निठुराई की

कि झोकों की झाड़ियों में

सुन्दर सुकुमार देह सारी झकझोर डाली।

  1. अलंकरण का साधन- रामचरित मानस, पद्मावत, कामायनी आदि प्रन्थों में प्रतीकों के आधार पर मनोहर रूपक-विधान किये गये हैं। रामचरित मानस के ‘जंगम-प्रयाग’, ‘ज्ञान- दीपक’, ‘भक्ति-चिन्तामणि’ आदि सांगरूपक ऐसे ही प्रतीकों के उदाहरण हैं।

इस विवेचना के स्फीत आलोक में यह कहा जा सकता है कि प्रतीक-विधान काव्यों में प्रयोग किया जाने वाला वह तत्व है जिसके द्वारा कवि दुरूह भावों को भी बड़ी सरलता से अभिव्यक्त किया करता है और अपने काव्य को सजाने-संवारने का काम किया करता है।

भारतीय भाषाओं में वैदिक वाङ्मय से लेकर साम्प्रतिक हिन्दी भाषा पर्यन्त के प्रख्यात कवियों ने प्रतीकों का भरपूर प्रयोग किया है। हिन्दी के तुलसीदास, सूरदास, जायसी, पन्त, निराला, प्रसाद आदि कवियों के भावों को समझने के लिए उनके द्वारा प्रयुक्त प्रतीकों के आशय को पहले समझना होगा। इस तरह स्पष्ट है कि काव्यों में प्रतीक-विधान का बहुत बड़ा महत्व है।

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