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काव्य में विम्ब का स्वरूप | विम्ब का अर्थ | काव्य में विम्ब का महत्व | विम्ब के भेद

काव्य में विम्ब का स्वरूप | विम्ब का अर्थ | काव्य में विम्ब का महत्व | विम्ब के भेद

काव्य में विम्ब का स्वरूप

विम्ब शब्द को अंग्रेजी के ‘इमेज’ शब्द का रूपान्तर माना जाता है। विम्व एक ऐसा शब्द चित्र है जो भावों को मूर्त रूप प्रदान करता है। पाश्चात्य स्वच्छन्दतावादी कवियों ने कहा कि यदि कल्पना काव्य को मूल शक्ति है तो उसका मुख्य कार्य है काव्य में विम्य का विधान डॉ० नगेन्द्र के अनुसार, “काव्यविम्य शब्दार्थ के माध्यम से कल्पना द्वारा निर्मित एक ऐसी मानव-छवि है, जिसके मूल में भाव की प्रेरणा रहती है।” डॉ० देवीशरण रस्तोगी ने विम्ब के लिए निम्नलिखित तीन तत्वों की आवश्यकता स्वीकार करते हैं-

(1) कल्पना, (2) भाव, (3) ऐन्द्रियकता।

डॉ० नगेन्द्र विम्व के विधान में राग अथवा भाव को उपस्थिति आवश्यक मानते हैं। डॉ० कुमार विमल का कहना है कि “विम्ब विधान कला का क्रिया-पक्ष है जो कल्पना से उत्थित होता है। डॉ० केदारनाथ सिंह विम्ब की ऐन्द्रियकता पर बल देते हैं। इनके अनुसार विम्ब में ऐन्द्रियक गुणों का होना आवश्यक है। अन्य विचारकों ने भी काव्यगत विम्व-तत्व पर विचार किया है। वे विम्ब में चित्रात्मकता, शब्दरूपात्मकता, ऐन्द्रियिकता, भावानुभूति तथा अरोपण के उद्भाव को आवश्यकता मानते हैं। डॉ० शातिस्वरूप गुप्त ने विम्ब के निम्नांकित सात तत्वों का निर्देश किया है-

  1. वस्तुनिष्ठता, 2. ऐन्द्रियबोध, 3. भावोद्रेक, 4. स्मृति, 5. कल्पनाशीलता, 6. संवेग-संकुलता एवं 7. भाषाधिकार ।

विम्ब विधान के लिए कृवि का भाषा पर अधिकार होना बहुत जरूरी है। सूर एवं तुलसी के काव्यों में विम्ब के प्रकर्ष का एक यह भी कारण है कि ये कवि कभी भी भाषा के पीछे नहीं चले, बल्कि भाषा ही इन महाकवियों के पीछे चली।

कल्पना काव्य प्रणयन का सबसे उपयोगी तत्व है। जो कवि जितना हो अधिक कल्पनाशील होता है उसके काव्य में उतनी ही अधिक उदात्तता आती है। जयदेव के ‘गीत गोविन्द’ में कल्पना की प्रचुरता अपने चरम सीमा पर पायी जाती है। इसीलिए इस काव्य का विम्व विधान आज भी अनुपमेय है।

‘लेविस’ जो पाश्चात्य काव्यशास्त्रीय विद्वान् है ने विम्बों के तीन गुणों का निर्देश किया है जो इस प्रकार है-

(1) नवीनता या प्रत्यग्रता

नवीनता के अभाव में काव्य में प्रयुक्त विम्य सहृदय हृदयाहादन का कार्य नहीं कर पाता है। अगर देखा जाय तो प्रत्यमता वह तत्व है जो काव्यगत विम्ब विधान को सदा नवौन सा बनाये रहता है। इसी में स्वर के आरोहावरोह एवं पदलालित्य का भी अन्तर्भाव हो जाता है।

(2) संक्षिप्तता अथवा अर्थगाम्भीर्य

संक्षिप्तता के द्वारा कवि काव्य में गागर में सागर का कार्य किया करता है, अर्थात् कवि संक्षिप्त शब्दावली के माध्यम से बड़े से बड़े अर्थ को कह देता है। यह विम्व विधान का वह तत्व है जो काव्य में अर्थवत्ता को उद्धृत करने का कार्य करता है।

(3) भावोत्तेजन की शक्ति अथवा उद्बोधनशीलता

उदबोधनशीलता काव्य का वह तत्व है जिसके माध्यम से कवि अपने अन्तःकरण में उदबुद्ध भावों को समाज के लोगों के अन्तःकरण तक सम्प्रेषित करता है। इसे ‘बिम्ब’ की प्रेषणीयता भी कहते हैं।

डा. नगेन्द्र ने विम्ब के निम्नवत् तीन गुणों का उल्लेख किया है-

(1) सजीवता (2) समृद्धि (3) औचित्य

काव्य-विम्बों में  जीवन्तता का होना अनिवार्य है। इसी के द्वारा विश्व के आकार-प्रकार पूर्णतया स्पष्ट होते हैं और लगता है कि सामाजिक जैसे उसका साक्षात्कार कर रहा हो। विम्बू के समृद्ध तत्व के अन्तर्गत उसके माधुर्य, प्रसाद, ओजस्विता, सम्प्रेषणीयता प्रभृति काव्योपयोगो समस्त तत्वों का अन्तर्भाव हो जाता है। औचित्य एक ऐसा तत्व है जो सहृदयहृदयावर्जन में परिपूर्णता लाता है, रसमयता लाता है और काव्य को विकर्षण से बचाता है।

ध्वन्यालोककार आचार्य आनन्दवर्धन का कहना है कि-

“अनाचित्यादतनान्यद्रसभंगस्य कारणम्”

विम्ब भेद

विम्बों के भेद के सम्बन्ध में विद्वानों में मतभेद हैं। डॉ० नगेन्द्र ने निम्नलिखित सात आधारों पर बिम्बों का वर्गीकरण किया है-

  1. एन्डियक आधार पर – (क) चाक्षुष या दृश्य, (ख) श्रव्य, (ग) स्पृश्य, (घ) आप्रेय अथवा घातव्य, (ङ) रस्य अथवा आस्वा ।
  2. काल्पनिक आधार पर (क) स्मृतिविम्य, (ख) कल्पित विम्ब।
  3. प्रेरक अनुभूति के आधार पर (क) सरल, (ख) मिश्र, (ग) जटिल एवं (घ) पूर्ण अथवा समाकालित विम्ब ।
  4. खंडित अनुभूति के आधार पर- (क) खण्डित विम्ब (ख) विकीर्ण विम्ब।
  5. काव्यार्थ की दृष्टि से- (क) एकल-विम्ब, (ख) संश्लिष्ट वविम्य
  6. अन्य दृष्टि से- (क) घटना-विम्ब, (ख) प्रकरण विम्ब।
  7. काव्य की दृष्टि से- (क) वस्तुपरक विम्ब, (ख) स्वच्छन्द विम्ब।

स्केलटन ने बिम्बों को निम्नलिखित दस वर्गों में विभाजित किया है-

  1. सरल विम्ब, 2. भावातीत विम्ब, 3. आशुविम्य, 4. विकीर्ण विम्व, 5. अमूर्त विम्ब, 6. संयुक्त विम्ब, 7. संकुल विम्य, 8. संयुक्तभाववाची विम्ब 9. संकुल अमूर्तविम्ब और 10. अमूर्त संयुक्त चित्र।

काव्य में विम्ब का महत्व

कवि के अन्तःकरण में जो अनुभूतियाँ उठती हैं उन्हें वह काव्य में प्रयुक्त विम्यों के माध्यम से ही सहृदयों के हृदय-पटल पर ज्यों की त्यों उतार देने में सक्षम होता है। काव्य में प्रयुक्त विम्ब एक ओर तो सहृदयों द्वारा की जाने वाली रसानुभूति में सहायक होते हैं और दूसरी ओर कवि की संवेदनाओं को मूर्त रूप प्रदान कर उन्हें उद्भूत करने का काम किया करते हैं। आचार्य शुक्ल की मान्यता है कि कविता में अर्थग्रहण मात्र से काम नहीं चलता, अपितु विम्ब-ग्रहण की भी अपेक्षा होती है। वे यह भी मानते हैं कि काव्य की सूक्तियाँ कानों तक पहुँच कर सहृदय के अन्तःकरण पर वक्ता एवं बोद्धव्य की मूर्ति ठरेह देते हैं। इस तरह स्पष्ट है कि काव्य में विम्ब चित्र भाषा का काम करते हैं।

विम्ब के विधान को कविता के लिए आवश्यक बतलाते हुए श्री रामधारी सिंह ‘दिनकर’ कहते हैं- “चित्र कविता का एक आवश्यक गुण है। प्रत्युत कहना चाहिए कि यह कविता का एक मात्र शाश्वत तत्व है जो उससे कभी छूटता नहीं।”

सुमित्रानन्दन पंत- के शब्दों में- “कविता के लिए चित्र-भाषा की आवश्यकता पड़ती है। उसके शब्द सस्वर होने चाहिए, जो बोलते हाँ, जो अपने भाव को अपनी ही ध्वनि में आँखों के सामने चित्रित कर सकें, जो झंकार में चित्र और चित्र में झंकार हो।”

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