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महाराजा का इलाज कहानी की समीक्षा | कहानी-कला के तथ्वों के आधार पर “महाराजा का इलाज” कहानी की समीक्षा

महाराजा का इलाज कहानी की समीक्षा | कहानी-कला के तथ्वों के आधार पर “महाराजा का इलाज” कहानी की समीक्षा

महाराजा का इलाज कहानी की समीक्षा

कथानक या कथावस्तु-

‘महाराजा का इलाज’ एक अत्यन्त छोटी कहानी है। इस कहानी में उत्तर प्रदेश के मोहाना रियासत के महाराजा की बीमारी का वर्णन किया गया है। महाराजा की बीमारी कोर्ट कचहरी, गवर्नर तथा उस समय के बड़े-बड़े प्रभावशाली राष्ट्रीय नेताओं की चिन्ता का विषय बन गयी है। महाराज को होने वाली बीमारी कोई सामान्य, साधारण बीमारी नहीं थी। देश विदेश के बड़े-बड़े डॉक्टर असफल होकर वापस जा चुके हैं। गर्मियों के महीने में महाराजा मसूरी में रहते हैं, जहाँ बड़े-बड़े डॉक्टरों को बुलाया जाता है। वे सभी डॉक्टर बारी-बारी से महाराजा का चेकअप करते हैं और अपना-अपना मत प्रकट करते हैं, लेकिन महाराजा के हृदय सिर की पीड़ा में न तो कोई अन्तर आता है और न ही उनके जुड़ गये घुटनों में कोई गति ही आती है। डॉ. कोराल बम्बई से आमंत्रित किये गये हैं। डॉक्टर संघटिया वियाना से मानसिक चिकित्सा अनुसंधान करके बम्बई लौटे हैं। इस बार उन्हें भी महाराजा के इलाज के लिए बुलाया गया है। डॉक्टरों के खाने-पीने रहने सोने का विशेष इन्तजाम किया गया है। डॉक्टर एक-एक करके उनका परीक्षण करते हैं। महाराजा एक पहिया लगी आराम कुर्सी पर विराजित होते हैं। उनके चेहरे पर न रोगी की उदासी और न दयनीय चिन्ता। असाधारण दुर्बोध रोग के बोझ को उठाने का गर्व और गम्भीरता अवश्य है। कोई डॉक्टर उन्हें न्यूयार्क जाने की राय देता है तो कोई सोवियत जाने का सुझाव देता है। डॉक्टर संघटिया ने महाराजा के रोग की तुलना एक मेहतर के रोग से कर दी जिससे महाराजा उत्तेजित होकर काँपते हुए उठकर खड़े हो गये। यही नहीं, क्रोध की उत्तेजना में डॉक्टर संघटिया को भला बुरा कह, महाराज द्वारा बुरा कहने का दुःख था, लेकिन महाराज के ठीक हो जाने का सुख भी था।

(2) पात्र एवं चरित्र चित्रण-

यशपाल जी की प्रस्तुत कहानियों के पात्र समाज के सम्मानित पात्र हैं। कहानी के पात्रों में “अहं’ का तीव्रतम रूप दिखाई देता है। बौद्धिक तटस्थता के फलस्वरूप प्रस्तुत कहानी में किसी प्रकार का सैद्धान्तिक आग्रह नहीं मिलता। फिर भी व्यक्तिवादी आग्रह की प्रबलता पाई जाती है। कहानी के पात्रों की पहली विशेषता यह है कि वे स्वयं से सम्बन्धित समस्याओं से संघर्ष करने के साथ-साथ सभी प्रकार की समस्याओं से भी संघर्ष करते हैं।

(3) देशकाल या वातावरण-

प्रस्तुत कहानी में सामन्ती समय के महाराजा के क्रिया  कलाप का पूरा नक्शा प्रस्तुत करना है। कहानी के पात्रों में गम्भीरता और रोचकता के साथ साथ पैनापन तथा उपयोगिता जैसे उपयोगी तत्वों की अधिकता है। वातावरण में एक रूपता नहीं अनेक रूपता भी दृष्टिगोचर होती है। मंसूरी के वातावरण में डॉक्टरों की सभा का आयोजन तथा महाराजा का उत्तेजित होकर अपशब्द कहना सर्वहारा वर्ग का द्योतक है। इस प्रकार कहानी में देशकाल और वातावरण तीनों का सुन्दर निर्वाह हुआ है। इन तीनों ही तत्वों को कहानीकार ने अत्यधिक संवेदना की दृष्टि से उभारने की कुशलता दिखाई है।

(4) कथोपकथन या सम्वाद-

‘महाराजा का इलाज’ कहानी का कथोपकथन अत्यन्त स्वाभाविक और यथार्थपूर्ण है। उदाहरणार्थ डॉक्टर संघटिया उठकर बोले महाराज के शरीर की परीक्षा और रोगों के इतिहास के आधार पर मेरा विचार है कि महाराजा का यह रोग साधारण शारीरिक उपचार द्वारा दूर होना दुसाध्य होगा।

महाराज ने युवा डॉक्टर की विसमता के समर्थन में एक गहरा श्वास लिया उनकी गर्दन जरा और ऊंची हो गयी। महाराज ध्यान से नये डॉक्टर की बात सुनने लगे।

डॉक्टर संघटिया बोले “मुझे इस पकार के एक रागी का अनुभव है। कई वर्ष से बम्बई मेडिकल कॉलेज के एक मेहतर को ठीक इसी प्रकार घुटने जुड़ जाने और हृदय तथा सिर की पीड़ा का दुस्साध्य रोग ………..।

“चुप बत्तमीज।”

महाराजा सेवकों द्वारा हाल से कुर्सी पर ले जाने की प्रतीक्षा न कर कांपते हुए पाँवों से हाल के बाहर चले गये।

दूसरे डॉक्टर पहले विस्मित रह गये फिर उन्हें अपने सम्मानित व्यवसाय के अपमान पर क्रोध आया और साथ ही उनके ओंठों पर मुस्काल भी फिर गयी।

डॉक्टर संघटिया ने सबसे अधिक मुस्करा कर कहा – “खैर जो हो, बीमारी का इलाज तो हो गया ………….।

(5) भाषा शैली-

महाराजा का इलाज कहानी की भाषा शैली निम्न मध्यम वर्गीय समाज-तानाशाह-व्यक्ति समाज की भाषा शैली है। पात्रानुकूलता और घटनापूर्णता इस कहानी की भाषा की सबसे बड़ी पहचान है। अंग्रेजी व उर्दू के वे ही शब्द प्रयोग हुए हैं जो सामान्य और साधारण पाठक वर्ग के अनुकूल हैं। वाक्य-विधान गठित और विस्तृत है। कहानी की शैली वर्णनात्मक शैली है। मधुरता और रोचकता के साथ-साथ इसकी प्रवाहमयता अधिक आकर्षक है। प्रभावोत्पादकता की दृष्टि से भी इस कहानी की शैली अधिक उपयुक्त है।

(6) उद्देश्य

यशपाल जी का दृष्टिकोण प्रगतिवादी दृष्टिकोण रहा है, इसलिए इस कहानी में उन्होंने अपनी प्रगतिशीलता का परिचय दिया है। हम देखते हैं कि यशपाल जी ने समाज की सड़ी-गली परम्पराओं के पोषक तत्वों के नकाब को बेनकाब करने में बहुत सार्थक प्रयास किया है। मैं महाराजा हूँ, मेरी बीमारी भी असाधारण है, फिर मेरी एक मेहतर से तुलना कैसे की गयी और तुलना का परिणाम क्या निकला, रोग ठीक हो गया। चूंकि महाराजा अपने रोग को असाधारण और महाराजाओं का रोग मानते थे इसीलिए ठीक नहीं हो रहे थे डॉक्टर संघटिया इस चीज को भांप चुके थे अतः उन्होंने उनकी इस मनोवृत्ति पर चोटकर, रोग को ठीक करने के अपने उद्देश्य में सफल रहे।

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Pankaja Singh

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