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‘तीसरी कसम’ कहानी की समीक्षा | ‘तीसरी कसम’ कहानी, कहानी कला के तत्त्वों की दृष्टि से उच्चकोटि की कहानी है

तीसरी कसम’ कहानी की समीक्षा | ‘तीसरी कसम’ कहानी, कहानी कला के तत्त्वों की दृष्टि से उच्चकोटि की कहानी है

तीसरी कसम’ कहानी की समीक्षा

किसी भी कहानी की समीक्षा उसके कलात्मक तत्त्वों को ध्यान में रखकर ही की जाती है जो निम्नलिखित हैं- कथावस्तु, पात्र-योजना, संवाद-योजना, देश-काल, भाषा-शैली और उद्देश्य। इन्हीं विन्दुओं के आलोक के प्रस्तुत कहानी ‘तीसरी कसम’ की समीक्षा करना भी समीचीन होगा-

कथावस्तु-

तीसरी कसम रेणु जी की प्रसिद्ध आंघलिक कहानी है। यह अत्यंत लोकप्रिय कहानी है। इसका फिल्मांकन भी हो चुका है। इसका कथानक सुगठित, सुव्यवस्थित, संक्षिप्त एवं स्पष्ट है। बिहार प्रान्त के पूर्णिया जनपद की आंचलिकता को रेणुजी ने बड़ी कुशलता एवं सफलतापूर्वक निरूपित किया। सम्पूर्ण कहानी में आंचलिक तत्त्वों का वर्चस्व है। इसमें सजीवता, मार्मिकता एवं संवेदनात्मकता का पर्याप्त समावेश है। हीरामन नाम का एक गाड़ीवान इस कहानी का नायक है। पिछले वर्षों से वह लगातार यही कार्य करता आ रहा है। कभी मोरंग, कभी धान, कभी कुछ और। वह चोरबाजारी का माल सीमा पर पहुँचाया करता था। एक बार उसकी गाड़ी पकड़ ली जाती है। हीरामन बड़ी शीघ्रता एवं चालाकी दिखाते हुए बैलों को खोलकर भाग निकला और सरगड़ गाड़ी वहीं पर छोड़ दिया। घर आने पर दो दिन तक बेहोश रहता है और होश आने पर कान पकड़कर कसम खाता है, कि अब अपनी गाड़ी पर कभी भी चोरी का माल लदनी नहीं करूंगा। इसी प्रकार एक बार उसकी गाड़ी पर बाँस लदा था। बांस का आगुआ एक घोड़ागाड़ी में घुस गया। घोड़ा गाड़ी वाले ने चावुक से मारते हुए हीरामन को गालियाँ दी। हीरामन ने दूसरी कसम खायी कि  वह अब कभी भी अपनी गाड़ी पर बाँस की लदनी नहीं करेगा। इस बार वह मथुरा मोहन कम्पनी में लैला बनने वाली हीराबाई को लेकर फारबिसगंज आया है। रास्ते भर जिस हीराबाई की रक्षा, रखवाली और सेवा वह तन-मन से करता आया, उसी हीराबाई के आदमी नेजब हीरामन को किराये के पचार रूपये दिये तो हीरामन का दिल टूट गया। हीराबाई के पास भी दिलवाये। हीरामन अपने साथियों के साथ नौटंकी देखने गया। किसी ने हीराबाई को रंडी, पतुरिया कह दिया, हीरामन अपने साथियों के साथ उस पर टूट पड़ा, क्योंकि हीराबाई को वह प्राणों से भी ज्यादा मानता था। नौटंकी की समाप्ति पर हीराबाई रेलगाड़ी से वापस जा रही है। वह हीरामन को उसके पैसों की थैली वापस करती है और रेलगाड़ी में बैठकर चुपचाप चली जाती है। हीरामन को आंतरिक क्लेश होता है और वह क्षुब्ध हृदय से तीसरी कसम खाता है कि आज के बाद अब किसी नौटंकी वाली औरत को अपनी गाड़ी पर नहीं बैठायेगा।

पात्र-योजना-

इस कहानी के प्रमुख पात्र हैं- हीरामन और हीराबाई। समस्त घटनाचक्र इन्हीं के इर्द-गिर्द घूमता रहता है। इसके अतिरिक्त कथा को विस्तार तथा गति प्रदान करने हेतु रचनाकार ने जिन पात्रों का उल्लेख किया है, वे हैं- लालमोहर मुनीर जी, दारोगा जी, पलटदास धुत्रीराम, लहसनवा, बक्सा ढोने वाला आदमी आदि। हीरामन चालीस वर्ष का हृष्ट-पुष्ट युवक है, जिसका रंग काला है। घर में उसका बड़ा भाई खेती करता है जो बाल-बच्चों वाला है। वह अपनी भाभी की बहुत इज्जत करता है और उनसे डरता है। बचपन में हीरामन की शादी हुई थी, किन्तु गौने से पूर्व ही दुल्हन की मृत्यु हो गयी। वह हृदय का निश्छल और व्यवहारकुशल है। लोकगीत गाने में उसकी रुचि है। इसीलिए हीराबाई के आग्रह पर उसे ‘महुआ घटवारिन’ का लोकगीत भी सुनाता है। हीराबाई के प्रति वह हृदय से आकर्षित होत है और उससे बेइन्तहाँ प्यार करता है। वह चरित्रवान, दृढ़-प्रतिज्ञ और सिद्धान्त का पक्का है।

हीराबाई नौटंकी कंपनी में लैला की भूमिका निभाने वाली सुन्दर एवं सुशील युवती है। उसकी आवाज अत्यंत मीठी एंव सुरीली है। वह अतिशय उदार, सहनशील, हँसमुख और अपनी कला में पारंगत है। उसके अन्दर उच्चकोटि की मानवीय भावना विद्यमान है। हीराबाई के मन में भी हीरामन के प्रति प्रेम तथा सहज आत्मीयता का भाव विद्यामान है। यही कारण है कि जब वह उसे मिलने के लिए बुलाती है, तब अपने सुरक्षाकर्मियों से उसे अपना आदमी कहकर उसका परिचय कराती है। इस प्रकार हम देखते हैं कि रचनाकार ने हीराबाई को हीरामन के प्रेम में अनुरक्त होने के बावजूद अत्यन्त विवश, भावुक और अवसादग्रस्त दिखाया है। अस्तु, पात्र योजना की दृष्टि से यह कहानी अत्यन्त सफल एंव पूर्णतया परिपक्व है।

संवाद-योजना-

प्रस्तुत कहानी की संवाद-योजना बहुत संयत, संक्षिप्त, पात्रों की विशेषताओं को उजागर करने वाली और प्रभावोत्पादक है। इस कहानी के संवाद अत्यंत सरल, सजीव तथा प्रसंग के सर्वथा अनुकूल है। यथा- ‘कौन, पलटदास कहाँ की लदनी लाद लाये? लालमोहर ने पराये गाँव के आदमी की तरह पूछा।’

पलटदास ने हाथ मलते हुए माँफी। ‘कसूरवार हैं, जो सजा दो तुम लोग सब मंजूर है, लेकिन सच्ची बात कहें कि कितिया सुकुमारी…………….।’

हीरामन के मन का पुरइन नगाड़े के ताल पर विकसित हो चुका है।

बोला- “देख पलटा, यह मत समझना कि गांव-घर की जनाना है। देखों, तुम्हारे लिए भी पास दिया है। पास ले लो अपना तमाशा देखो।”

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Pankaja Singh

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