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भूख कहानी की समीक्षा | चित्रा मुद्गल– भूख | कहानी कला की दृष्टि से ‘भूख’ का मूल्यांकन | कहानी कला के तत्वों के आधार पर ‘भूख’ कहानी की समीक्षा

भूख कहानी की समीक्षा | चित्रा मुद्गल – भूख | कहानी कला की दृष्टि से ‘भूख’ का मूल्यांकन | कहानी कला के तत्वों के आधार पर ‘भूख’ कहानी की समीक्षा

भूख कहानी की समीक्षा

(1) कथानक या कथावस्तु-

प्रस्तुत कहानी भूख एक मजदूर वर्ग के एक महिला की विवशता, वेदना की मार्मिक कहानी है। मुम्बई महानगर की झोपड़ी में रहने वाली लक्षमा का पति मिस्त्री था, एक बहुमंजिली इमारत का निर्माण कार्य करते हुए वह ऊंचाई से फिसलकर गिर गया, जिसके फलस्वरूप उसकी मौत हो गयी। लक्ष्मा के तीन बच्चे हैं। वह काम की तलाश में दर-दर भटकती रही लेकिन उसे काम नहीं मिला। तीन बच्चों की माँ होना, उसे काम न मिलने का एक  प्रमुख कारण था। सावित्री अक्का भी उसे काम नहीं दिला पाती। लक्ष्मा के पास इतने पैसे भी नहीं थे कि वह हेनी होड़ी खरीदकर टोकी लगानी और अपना तथा अपने बच्चों का पेट पालती। अपने बच्चों को भूख से व्याकुल देखकर वह सावित्री की सलाह से अपने एक बच्चे को भिखारिन को दो रूपये प्रतिदिन के किराये पर दे देती है। भिखारिन बच्चे को भूखा और बेहाल कर रुलाती है और कुछ लोग उस पर दयाकर उसे पैसे दें। लक्ष्मा समझती है कि भिखारिन वादे के अनुरूप उसके बच्चे को खूब खिलाती-पिलाती होगी। लेकिन ऐसा था नहीं। एक दिन बच्चा भूख से बेहाल होकर माँ के पास आया और खूब रोने लगा। माँ ने समझा बच्चा जिद कर रहा है अतः उसने बच्चे की पिटाई कर दी फलतः बच्चे की आँख उलट गयी उसे सावित्री अक्का की मदद से अस्पताल ले जाया गया जहाँ उसकी मृत्यु हो गयी। डॉक्टर ने बताया कि बच्चा भूख से मर गया। उसकी आँते सूखकर चिपक गयीं थीं।

(2) पात्र चरित्र चित्रण-

लेखिका एक कुशल चित्रकार एवं शिल्पकार है उसने पात्र की स्थिति उसका मनोविज्ञान समाज, पात्र का पारस्परिक सम्बन्ध और व्यक्ति की विवशता एवं निरीहता अंकन कर पाठकों के हृदय में उनके प्रति सहानुभूति उत्पन्न करना चित्रा मुद्गल का मुख्य लक्ष्य रहा है।

(3) देशकाल या वातावरण-

चित्रा मुद्गल ने जीवन और वातावरण को सूत्रवत जोड़कर अपनी कहानी का सृजन किया है, इनकी कहानी का परिवेश भारतीयता की मिसाल है। जहाँ देश के कर्णधार नाना प्रकार के दम्भ भरते हैं और गरीब, बेसहारा लाचार जीवन भूख से तड़पकर मर रहा है।

(4) कथोपकथन या संवाद-

प्रस्तुत कहानी के सम्वाद चुस्त, पैने और परिस्थिति विशेष को उजागर करने वाले हैं। उनमें स्पष्टता एवं सरलता है। संवादों में मन को झकझोर देने की असीम शक्ति है। धीमे से अक्का ने निढाल लक्ष्मा को छुआ ग्लूकोज का एक चम्मच बाटली को खाली होते चार तास (घंटे) लगते। अक्खा रात एइसा खड़ा होने से चलेगा? सोच तेरी तबियत बिगड़ी न, पिच्छू तेरे को देखना कि छोटू को संभालना।

“डाक्टर बोले हुश्यार इधर के सब ठीक होएगा। अक्का ने ढांढस बंधाया।

जैसे ही कोई नर्स बोर्ड से बाहर आती दिखती अधीर लक्ष्मा अशास्पद भाव से उसकी ओर लपक पड़ती तकरीबन ढाई घण्टे की असाध्य प्रतीक्षा के बाद डॉक्टर वार्ड से उनकी ओर आते हुए दिखे। उन्होंने निकट पहुंचकर सबसे पहला सवाल पूछा चारों में से बच्चे की माँ कोन है?

साथ आई कांबले ताई ने लक्ष्मा की ओर संकेत किया।

डाक्टर ने पल भर लक्ष्मा को भेदती नजरों से देखा फिर रूखे स्वर में बोले बच्चे को खाने को नहीं देती थी क्या? बच्चा भूख से मर गया – उसकी आँते सूखकर चिपक गई थी।

“क्या” लक्ष्मा के गले से आरी सी काटती एक करुण चीख फूट पड़ी पन कइसा? वो तो बोलती होती कि उसको दूध देती, बिस्कुट खिलाती उस पर बेहोशी सी छाने लगी।

भाषा शैली- ‘भूख’ कहानी की भाषा शैली मराठी मिश्रित हिन्दी है। इसमें स्थान-स्थान पर हिन्दी के अतिरिक्त मराठी के शब्दों का प्रयोग हुआ है। हिन्दी मराठी मिश्रित कहानी में बेबसी का ऐसा मार्मिक चित्रण है कि पाठकों के मन से करुणा फूट पड़ती है।

उद्देश्य- चित्रा मुद्गल की कहानी का मूल उद्देश्य है आधुनिक समाज के लिए संत्रस्त मानव के ज्यों का त्यों प्रस्तुत कर देना। इसके लिए लेखिका ने न तो किसी आदर्श को थोपा हे और न ही नग्न पदार्थ का रोना रोया है।

विशेष- चित्रा मुद्गल जो मराठी मिश्रित हिन्दी लेखिका हैं। उन्होंने मुम्बई में निवास करने वाले महान गरीब मजदूरों के जीवन को चित्रांकित किया है। उन गरीबों के जीवन को जीवन्त कर दिया है। इस कहानी में गरीबी, लाचारी, बेबसी का ऐसा मार्मिक चित्रण है कि पाठकों का भी हृदय कराह उठता है। उनके अन्तर्मन से करुणा फूट पड़ती है। आज जब भारत स्वतन्त्र है ऐसे में सामान्य व्यक्ति की ऐसी दुर्दशा अन्तस् को कहीं-न-कहीं कचोटती अवश्य है। इस पूरी व्यवस्था के समझ पर एक जबरजस्त प्रश्नचिन्ह खड़ा करती है।

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