अर्थशास्त्र

सार्वजनिक ऋण की आवश्यकता । सार्वजनिक ऋण की आवश्यकता सम्बन्धी कारण

सार्वजनिक ऋण की आवश्यकता । सार्वजनिक ऋण की आवश्यकता सम्बन्धी कारण

सार्वजनिक ऋण की आवश्यकता क्यों हैं?

सार्वजनिक ऋण प्राप्त करने का औचित्य क्या है? क्या सार्वजनिक ऋण ‘राष्ट्रीय अस्मिता’ को खतरे में नहीं डाल देते हैं? सार्वजनिक ऋण की वैशाखियों के बजाय आन्तरिक संसाधनों पर निर्भरता एवं स्वावलम्बन का मार्ग देश क्यों नहीं अपनाता है? ऐसे अनेकानेक ज्वलन्त प्रश्न प्रेरित करते हैं, आजकल सार्वजनिक ऋण को खतरे की घंटी के रूप में नहीं देखा जाता है, बल्कि ऋण लेकर जनहित के कार्य निर्बाध के रूप में करना उपयोगी तथ्य समझा जाता है। ऐसा विचार रखने पर सार्वजनिक ऋण के औचित्य का प्रश्न अत्यन्त गम्भीर हो जाता है क्योंकि प्राचीन काल में लोक ऋण को राजा या सरकार के दिवालियापन या कंगाली का स्वरूप समझकर दुर्भग्यपूर्ण कहते थे, वहीं आधुनिक युग साख का युग है। वर्तमान परिवेश में प्राचीन विचारधारा संकीर्ण प्रतीत होती है। क्योंकि वर्तमान युग की लोकतांत्रिक सरकारों का स्वरूप लोक कल्याण के अधिकाधिक कार्य सम्पन्न करके अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिस्पद्धा में राष्ट्र को प्रस्तुत करने का उद्देश्य निहित हो गया हैं। ऐसी दश में सरकार के अनिवार्य आगम केवल कर उत्पादन एवं सेवाओं से प्राप्त आय ही पर्याप्त नहीं है बल्कि ‘सार्वजनिक ऋण’ सरकारी ऋण का अति आवश्यक अंग बन चुके हैं। आजकल सार्वजनिक ऋण को प्राप्त करने में सरकारें संकोच नहीं करती हैं बल्कि अन्धाधुन्ध लोक ऋणों के प्रयत्न किये जाते हैं।

इस युग में ऋण या कर्ज सम्बन्धी नियम सर्वभौमिक हो चुका है कि एक व्यक्ति ऋण प्राप्त किये बगैर उत्पादन एवं उपभोग सम्बन्धी कार्य सम्पन्न कर सकता है, लेकिन वह ब्याज देकर दूसरे से ऋण प्राप्त करके कार्य सम्पन्न करना लाभकारी मानता है।

यही तथ्य सरकार के लिए अक्षरशः लागू होता है क्योंकि सरकार मूलतः दो कारणों से ऋण प्राप्त करती है।

(अ) सरकार को ऊँचे धन की आवश्यकता होती है जो सरकार के आगम स्रोतों से तुरन्त नहीं मिल पाता है, फलतः सरकार को ऋणों (Debts) का सहारा लेना पड़ता है।

सार्वजनिक ऋण की आवश्यकता सम्बन्धी कारण हैं-

(1) सरकार के व्यय ढाँचे में वृद्धि (increasing in govt. Expenditure Structure)

सरकार के व्ययों में निरन्तर वृद्धि हो रही है, क्योंकि सरकार के सामान्य आकस्मिक, योजनागत व्यय बढ़ते जा रहे हैं। इसी प्रकार सरकार के उत्पादक एवं अनुत्पादक व्यय में अनवरत वृद्धि की पूर्ति सार्वजनिक ऋणों से ही सम्भव है। फलस्वरूप सार्वजनिक ऋण की आवश्यकता पूर्व की तुलना में कई गुनी बढ़ चुकी है।

(2) घाटे की वित्त व्यवस्था (Deficit financing)

यों तो प्रो. जे. एम. कीन्स ने (General Theory of Employment Interest and money) नामक पुस्तक में मन्दीकाल से निपटने के लिए घाटे के बजट’ को प्रोत्साहित करने का तथ्य प्रकट किया है, परिणामस्वरूप सरकारों ने घाटे के बजट घोषित करने प्रारम्भ कर दिये, जो वर्तमान युग में सरकार की एक अनिवार्य आदत बन चुका है। पहले तो ‘घाटे’ की पूर्ति नवीन करों के माध्यम से पूरी कर ली जाती थी, लेकिन विगत दो दशकों से सरकार घाटे के बजट की पूर्ति को नये करों पर न छोड़कर बल्कि उनकी पूर्ति बाद में ऋण (Debt) द्वारा की जाती है। इससे सरकार के सार्वजनिक ऋण करोड़ों अब तो अरबों रूपये में पहुँच गये हैं, इसलिए भी सार्वजनिक ऋण की आवश्यकता है।

(3) योजनाबद्ध विकास (Planed Development)-

आधुनिक युग आधिक नियोजन का युग है जिसमें योजनाबद्ध विकास के कार्यक्रम व्यापक रूप में घोषित होकर उन पर अमल हो रहा है, फलतः बड़े पैमाने पर ऊँचे धन की आवश्यकता पड़ती है। अतः सार्वजनिक ऋणों में वृद्धि होना स्वाभाविक है।

(4) आर्थिक-स्थायित्व (Economic Stability)-

सरकार का मुख्य कार्य आर्थिक स्थायित्व प्रदान करना भी है क्योंकि मुद्रा प्रसार अथवा मन्दी की स्थितियाँ जब उत्पन्न हो जाती है तो आर्थिक तेजी या मन्दी से आर्थिक अस्थिरता उत्पन्न हो जाती है। ऐसी दशा में मन्दी का सामना करने के लिए सरकार सार्वजनिक व्यय में वृद्धि करती है, रोजगार के अवसर सृजित किये जाते हैं, फलस्वरूप सरकार बाह्य सार्वजनिक ऋणों को प्राप्त करती है। मुद्रा प्रसार को नियंत्रित करने के लिए सरकार प्राणों की अदायगी हेतु करारोपण करती है।

(5) अन्य कारण (Other Causes)

सार्वजनिक ऋणों की आवश्यकता या वृद्धि के अन्य कारणों में यह है कि जब सरकारी कोष में संक्रान्ति काल चल रहा होता है तो सरकार सार्वजनिक ऋणों द्वारा वित्तीय संकट से निपटने का प्रयास करती है।

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Pankaja Singh

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