अर्थशास्त्र

मूल्य प्रभाव, आय प्रभाव व प्रतिस्थापन प्रभाव के बीच संबंधों की विवेचना

मूल्य प्रभाव, आय प्रभाव व प्रतिस्थापन प्रभाव के बीच संबंधों की विवेचना

मूल्य प्रभाव, आय प्रभाव व प्रतिस्थापन प्रभाव के बीच संबंधों की विवेचना  – 

प्रोफ़ेसर हिक्स ने मुल्य को दो भागों में विभाजित किया है-

  • प्रतिस्थापन प्रभाव और
  • आय प्रभाव।

अर्थात मूल्य-उपभोग रेखा में आय प्रभाव व प्रतिस्थापन प्रभाव सम्मिलित हैं। दूसरे शब्दों में,

Price Effect (PE) = Income Effect (IE) +Substitution Effect (SE)

चित्र में इन दोनों प्रभाव को प्रो. हिक्स की रीति पृथक पृथक किया गया है। उपभोक्ता की आय तथा वस्तुओं (X और Y) के मूल्य दिए हुए हैं जिसके आधार पर P0 L0 मूल्य था खींची गई है, उपभोक्ता E0 बिंदु पर संतुलन की स्थिति में है, यह उसकी प्रारंभिक स्थिति है। मान लीजिए X वस्तु के मूल्य में कमी आ जाती है (जबकि Y-वस्तु का मूल्य यथावत बना रहता है) तो उपभोक्ता X-वस्तु की यदि की कहानियां खरीदेगा। ऐसी स्थिति में उपभोक्ता की नई मूल्य रेखा P0L2 होगी। नई मूल्य रेखा में उपभोक्ता का नया संतुलन बिंदु E2 तटस्थता- वक्र IC2 पर स्थित है, इसलिए यह संयोग से प्राप्त होने वाली उपयोगिता E0 संयोग की तुलना में अधिक होगी, क्योंकि E2 बिंदु ऊंचे तटस्थता वक्र पर स्थित है। इस प्रकार E0 बिंदु से E2 बिंदु तक का क्षेत्र मूल्य प्रभाव का क्षेत्र होगा। यह X- वस्तु की X0 से X2 के बीच के क्षेत्र के अनुरूप है। इसलिए E0 E2 को जोड़कर बनने वाली रेखा को मूल्य उपभोग वक्र (Pee) कहां गया है। इस क्षेत्र के भीतर आय-प्रभाव व प्रतिस्थापन प्रभाव में छिपे हुए हैं जिन्हें अब हम पृथक करते हैं।

वस्तु X के मूल्य में कमी आने से दोनों ही वस्तुओं (X और Y) के सापेक्षिक मूल्य में परिवर्तन आ जाता है। मूल्य में कमी के कारण उपभोक्ता की वास्तविक आय बढ़ जाती है प्रतिस्थापन प्रभाव का ज्ञात करने के लिए यह आवश्यक है कि वास्तविक आय में हुई वृद्धि के प्रभाव को नष्ट कर दिया जाए।

प्रो.हिक्स के अनुसार, द्राव्यिक आय को उस मात्रा तक कम करना होगा जिससे उपभोक्ता को संतोष यथावत रहे, अथवा उपभोक्ता पूर्व के तटस्थता वक्र पर आ जाये।

इसके लिए हम नयी मूल्य रेखा P0 L2 के समांतर एक नयी काल्पनिक मूल्य रेखा P1 L1 खींच लेते हैं जो प्रारंभिक तटस्थता वक्र (IC1) के E1 बिंदु को स्पर्श करती है यह मूल्य रेखा X और Y के नए अनुपातों को दर्शाती है। इस नयी मूल्य रेखा P1 L1 से हमें ‘आय क्षतिपूर्ति परिवर्तन’ प्राप्त हो जाते हैं जो कि P0 P1 के बराबर है, अर्थात द्राव्यिक आय में P0 P1 के बराबर कमी देने से उपभोक्ता पहले तटस्थता वक्र (IC1) के E1 बिंदु पर संतुलन प्राप्त कर लेता है और उसका संतोष पूर्ववत ही दर्शाता रहता है, क्योंकि E0 E1संतुलन बिंदु एक ही उदासीनता वक्र (IC1) पर स्थित है अतः E0 E1 तक का क्षेत्र प्रतिस्थापन प्रभाव को दर्शाता है (जिसे चित्र में तीर के निशान से X0 X1 के रूप में दर्शाया गया है।) जिस द्राव्यिक आय P0 P1 को हमने क्षतिपूर्ति के अंतर्गत कम कर दिया था उतनी ही आय उपभोक्ता को पुनः लौटा दी जाए तो आय मैं वृद्धि के परिणाम स्वरुप उपभोक्ता IC1 के E1बिंदु से IC2 वक्र के E2 बिंदु पर पहुंच जाएगा। अतः E1 से E का क्षेत्र ‘आय प्रभाव’का क्षेत्र होगा। चित्र में इसे तीर के निशान से X1 X2 के रूप में दर्शाया गया है। इस विवेचन को संक्षेप में निम्न प्रकार रख सकते हैं-

X1X2 = X0X2 + X1X2 के

कीमत प्रभाव = प्रतिस्थापन प्रभाव + आय प्रभाव

चित्र में जो मूल्य उपभोग रेखा खींची गई है आवश्यक नहीं है कि इसका आकार सदैव ऐसा ही हो। वास्तव में यह निर्भर करता है कि IC2 E2 बिंदु कहां स्थित है इसी आधार पर वस्तु की स्थिति का भी अनुमान लगाया जा सकता है। इस बात को निम्न चार प्रकार से भी समझाया जा सकता है।

  • यदि E2 बिंदु E1 बिंदु के दाहिनी ओर स्थित है (जैसा कि पूर्व पृष्ठांकित चित्र में है) तो प्रतिस्थापन प्रभाव (X0 X1) तथा आय प्रभाव (X1 X2) दोनों धनात्मक होंगे और इस प्रकार X- वस्तु का मूल्य – घटाने से उसकी कुछ मांग X0 X2 बढ़कर हो जाएगी। ऐसा सामान्य वस्तुओं की दशा में होता है।
  • यदि E2 बिंदु E1 बिंदु की उदग्र सीध में होता है तो धनात्मक प्रतिस्थापन प्रभाव X0 X1 के साथ आय प्रभाव सुना होगा। फिर भी कुल अर्थात मूल्य प्रभाव X0 X1 के रूप में धनात्मक होगा। ऐसी किसी भी वस्तु को सामान्य ही कहा जा सकता है।
  • यदि E2 बिंदु E1 बिंदु के बायीं और तथा E0 बिंदु के दायीं और मूल्य, तो आय प्रभाव ऋण आत्मक होता है लेकिन वह धनात्मक प्रतिस्थापन प्रभाव X0 X1 से कम होता है। यद्यपि इस दशा में मूल्य घटने से मांग कुछ-न-कुछ बढ़ती अवश्य है लेकिन ऐसी वस्तु को अग्र कोर्ट की वस्तु कहा जाता है।
  • यदि E2 बिंदु E0 की बायीं ओर स्थित होता है तो ऋणात्मक आय प्रभाव धनात्मक प्रतिस्थापन प्रभाव X0 X1 से भी अधिक होता है तथा कुल प्रभाव ऋणात्मक होता है अर्थात X-वस्तु का मूल्य घटने से इसकी मांग घट जाती है। ऐसा सामान्यतः गिफिन वस्तुओं की दशा में होता है। गिफिन वस्तुएं मांग के नियम का यह अपवाद मानी जाती है।

उपर्युक्त तीसरे तथा चौथे बिंदुओं से स्पष्ट है कि गिफिन वस्तु में निम्न कोर्ट की वस्तुएं होती हैं किंतु निम्न कोर्ट की वस्तु गिफिन वस्तु नहीं होती है।

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Pankaja Singh

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