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मधु का चरित्र-चित्रण | उपेन्द्रनाथ ‘अश्क’ के एकांकी ‘तौलिये’ के आधार पर इसकी प्रमुख स्त्री- पात्र का चरित्र-चित्रण

मधु का चरित्र-चित्रण | उपेन्द्रनाथ ‘अश्क’ के एकांकी ‘तौलिये’ के आधार पर इसकी प्रमुख स्त्री- पात्र का चरित्र-चित्रण

मधु का चरित्र-चित्रण-

उपेन्द्रनाथ ‘अश्क‘ द्वारा विरचित एकांकी मनोवैज्ञानिक आधार पर लिखी गयी है। लेखक ने तौलिये के गलत प्रयोग करने के आधार पर यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि सफाई के मामले में मधु को सदैव सनक सवार रहती थी। मधु के चरित्र की निम्न विशेषताएँ हैं-

(1) उच्च एवं सम्पन्न परिवार में पली-

मधु का जन्म एवं पालन-पोषण उच्च श्रेणी के सम्पन्न परिवार में हुआ है। उसके मामा और मौसा इंग्लैण्ड में रह आये हैं। वह स्वीकार करती है कि उसका लालन-पालन सम्पन्नता में हुआ है- “यदि मैं बचपन में ऐसे वातावरण में पली हूँ, जहाँ सफाई और सलीके का बेहद ख्याल रखा जाता है तो उसमें मेरा क्या दोष है?”

(2) सफाई और सुरुचित का अधिक ध्यान-

मधु को सफाई और सुरुचि का बहुत ध्यान रहता है। उसने घर में अपने, अपने पति बसन्त और अपने पुत्र मदन के प्रयोग के लिए अलग-अलग तौलिये निश्चित कर दिये हैं। उसके पति के अलग-अलग कामों के लिए अलग- अलग तौलिये निश्चित नहाकर शरीर पोंछने का अलग, हजामत का अलग और हाथ-मुंह पोछने का अलग। अगर उसका पति भूल अथवा असावधानी से गलत तौलिये का प्रयोग कर लेता है तो वह मुँह फुलाकर बैठ जाती है और क्रोधित हो जाती है। उसकी सफाई की आदत सनक बन चुकी है। उसके इस स्वभाव के विषय में बसन्त का निम्न कथन सर्वथा सत्य है-

“स्वच्छता बुरी नहीं है, न सुरुचि बुरी है, पर तुम तो हर चीज को सनक की हद तक पहुंचा देती हो और सनक से मुझे चिढ़ है। बनियाइनों और तौलियों की कैद मैंने मान ली, किन्तु मैं गलती से बनियाइन न बदल पाऊँ या गलत तौलिया ले लूँ तो इसका यह मतलब तो नहीं कि में स्वभाव से गन्दा हूँ और मेरे इस स्वभाव पर तुम्हें मुँह फुलाकर बैठ जाना चाहिए या विषैली हंसी बिखेरनी चाहिए।”

(3) असहनशील-

मधु के स्वभाव में सहनशीलता बिल्कुल नहीं है। वह निकट सम्बन्धियों तक की अशिष्टता को, स्वीकार नहीं कर पाती। उसकी दृष्टि में दूसरे के तौलिये का  अथवा गलत तौलिये का प्रयोग करना गलत है। इस बात पर वह अपने पति को कितनी बुरी तरह फटकारती है, इसका प्रमाण इस संवाद में मिलता है-

मधु – यह फिर आपने मदन का तौलिया उठा लिया। मैं कहती हूँ आप।

बसन्त – ओह, ये कमबख्त तौलिये। मुझे ध्यान ही नहीं रहता। बात यह है कि मदन के तौलिये छोटे हैं और हजामत ……..।

मधु – और हजामत के तौलिये-जैसे ही। जी, जरा आँख खोलकर देखिए, हजामत के तौलिये कितने रंगीन हैं, बीसियों धारियाँ पड़ी हुई हैं, उनमें और मदन के कितने सादे और ……….।

बसन्त – लेकिन रोएँदार तो ……..।

मधु – जी, आँखे बन्द करके आदमी दोनों का अन्तर बता सकता है। मैं कहती हूँ।

बसन्त – वास्तव में मेरा ध्यान दूसरी ओर था। लाओ, मुझे हजामत का तौलिया दे दो। कहाँ है? मुझे दिखायी नहीं दिया।

मधु – यह तो टंगा है सामने फिर भी

बसन्त – मैंने ऐनक उतार रखी है और ऐनक के बिना तुम जानती हो हमारी दुनिया ……..।

मधु – जी, आपकी दुनिया। जाने आप किस दुनिया में रहते हैं? अब तो ऐनक नहीं। ऐनक हो तो कौन सा आपको कुछ दिखायी देता है।

(4) पारिवारिक जीवन की भी चिन्ता नहीं-

मधु को अपनी बात का विरोध होते देखकर पारिवारिक जीवन विच्छिन्न करने में भी किसी प्रकार का संकोच नहीं होता। वह इतना ही कहती है कि जिसे उठने-बैठने का सलीका नहीं, वह आदमी नहीं, पशु है। इसे अपने विषय में कहा हुआ समझकर बसन्त कह उठता है कि तुम मुझे पशु समझती हो, तुम्हें मेरे हर काम से घृणा है। बसन्त की इस बात पर मधु का क्रोध बढ़ जाता है और वह कह उठती है-“मेरा ख्याल था, मैं आपको सुख पहुंचा सकूँगी। आपके अव्यवस्थित जीवन को व्यवस्था सिखा दूंगी। किन्तु मैं देखती हूँ कि मेरे सारे प्रयास विफल हैं। आपको इस गन्दगी, इस अव्यवस्था में सुख मिलता है। आपको मेरी सफाई बुरी लगती है। मैं आपकी दुनिया में न रहूंगी। मैं आज ही चली जाऊँगी।” इतना कहकर वह नौकरानी मंगला को आदेश देती है कि मेरा बिस्तर बाँध दे और मेरे सन्दूक भी ले आ।

(5) अधिक हँसना सहन नहीं-

मधु को जोर से हँसना ओर बात-बात पर हँसना भी अशिष्टता लगती है। वह बसन्त की बुआ की लड़कियों-ऊषी और निम्मो को बदतमीज तक कह देती है तथा उनसे बहुत नाराज है। वह उन्हें ऐसा डांटती है कि उन्होंने बसन्त के घर आना ही बन्द कर दिया है। वह ऊषी और निम्मो के विषय में कहती है- “आपने फिर ऊषी और निम्मो की कथा छेड़ी। मुझे हंसना बुरा नहीं लगता। कुछ समय-कुसमय का भी ध्यान होना चाहिए। उस दिन पार्टी में आते ही ऊषी ने मेरे कान में चुटकी ले ली और निम्मो ने मेरी आँखे बन्द कर ली। कोई समय था उस तरह हँसी-मजाक का। मुझे हंसी-मजाक से घृणा नहीं, बदतमीजी से घृणा है।”

(6) अपनी भूल की अनुभूति-

मधु का पति बसन्त जब बनारस चला जाता है और दो महीने तक नहीं लौटता तो वह समझ जाती है कि उसका पति उससे नाराज है। पति का पत्र कभी आया भी है तो उसमें एक-दो लाइनों में कुशलता का समाचार ही रहता है। मधु अपने-आपको अपने पति के अनुसार बदलने का प्रयास करती है। पति के बनारस रहने पर वह घर में उसी की इच्छा के अनुसार परिवर्तन कर देती है। वह अपनी नौकरानी मंगला से कहती है- “वह सफाई और सुरुचि को मेरी घृणा बताते हैं। मैं बहुतेरा यत्न करती हूँ कि इस सब सफाई-अफाई को छोड़ दूं, इस तकल्लुफात को तिलांजलि दे दूं, अपने इस प्रयास में कभी-कभी मुझे अपने आपसे घृणा होने लगती है। बचपन से जो संस्कार मैंने पाये हैं, उनसे मुक्ति पाना मेरे लिये इतना आसान नहीं। पर नहीं, मैं अपनी इस सारी सनक को छोड़ दूंगी। पुरानी आदतों से छुटकारा पा लूंगी। वे समझते हैं, मैं उनसे घृणा करती हूं।”

(7) उच्च शिक्षित-

मधु उच्च शिक्षित है। उसने कॉलेज में शिक्षा पायी है। वह पूरे कालेज में अपनी सुरुचि और सफाई के लिए प्रसिद्ध थी। उसकी सहपाठियों-सुरो और चिन्ती की बातों से इसका पता चलता है।

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Pankaja Singh

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