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एकांकी कला की दृष्टि से ‘तौलिए’ का मूल्यांकन | एकांकीकला के तत्वों के आधार पर तौलिये’ का मूल्यांकन | उपेन्द्रनाथ अश्क के एकांकी तौलिये’ की समीक्षा एकांकी के तत्वों के आधार

एकांकी कला की दृष्टि से ‘तौलिए’ का मूल्यांकन | एकांकीकला के तत्वों के आधार पर तौलिये’ का मूल्यांकन | उपेन्द्रनाथ अश्क के एकांकी तौलिये’ की समीक्षा एकांकी के तत्वों के आधार

एकांकी कला की दृष्टि से ‘तौलिए’ का मूल्यांकन

उपेन्द्रनाथ ‘अश्क‘ द्वारा विरचित ‘तौलिये’ एकांकी मनोवैज्ञानिक आधार पर निर्मत हुई है। सबकी कुछ-न-कुछ सनक होती है, जो जाने-अनजाने प्रकट होती रहती है। कभी-कभी यह सनक परिवार में झगड़े और मनमुटाव का कारण भी बन जाती है। एकांकी के तत्वों के आधार पर ‘तौलिये’ की समीक्षा प्रस्तुत है-

कथानक-

एकांकी का कथानक पारिवारिक एवं सामाजिक है। मध्यमवर्गीय परिवार में पति बसन्त है, फर्म में मैनेजर है, ढाई सौ रूपया मासिक वेतन है वह भी दिल्ली जैसे नगर में। पत्नी मधु है आधुनिकता की प्रतीक। दिखावटी सफाई पसन्द। पति से ज्यादा प्रेम उसको अपनी दिखावटी दुनिया से है। तौलिये भी प्रतीक रूप में प्रयोग किये गये हैं। हजामत के लिए अलग तौलिया, नहाने के लिए अलग तौलिये, लड़के के लिए अलग तौलिये और सब भिन्न रंग के तौलिये। पति और पत्नी के बीच तौलिये को लेकर कहा-सुनी होती है। और यहीं से एकांकी की कथा प्रारम्भ होती है। बसन्त का यह मानना है कि अलग रहना, अलग जीवन यापन के ढंग की अपेक्षा एक साथ रहना, एक रजाई में भाई-भाई का बैठना, गन्दा करना, चाय पीना अच्छा है। पत्नी मधु मानती है कि एक तौलिये का उपयोग एक ही व्यक्ति करे तो ज्यादा अच्छा, बीमारी का डर नहीं, परन्तु मानव मन उठती प्रेम की तरंग इसको नकार देती है। घृणाविहीन व्यक्ति घृणायुक्त व्यक्ति से ज्यादा अच्छा है। इसी बात को लेकर पति-पत्नी में वाद-विवाद होता है। पत्नी नाराज होकर अपने मायके जाना चाहती है कि अचानक बसन्त को अपने फर्म के काम से बनारस जाना पड़ता है, दो महीने के लिए।

इन दो महीने के अन्तराल ने मधु के हृदय में परिवर्तन ला दिया। वह प्रेम के महत्व को समझने लगी। सहेलियों के साथ एक ही लिहाफ में बैठकर चाय पीने लगी। सारी कृत्रिमता बह सी गयी। वह कहती है, “बचपन में जो संस्कार मैंने पाये हैं, उनसे मुक्ति पाना मेरे लिये उतना आसान नहीं। पर नहीं, मैं अपनी इस सारी सनक को छोड़ दूंगी। पुरानी आदतों से छुटकारा पा लूँगी। वे समझते हैं मैं उनसे नफरत करती हूं।” बसन्त के वापस लौटने पर एकांकी में एक नया मोड़ आ जाता है। मधु हर तरह से उसको प्यार देने का प्रयास करती है। वह कहती है, “जी आपकी दुनिया। जाने आप किस दुनिया में रहते हैं। अब तो ऐनक नहीं । ऐनक हो तो कौन आकपे कुछ दिखायी देता है।” यह ऐनक भी एक प्रतीक की तरह प्रयोग हुआ है। यहाँ आकर एकांकी का समापन हो जाता है।

पात्र एवं चरित्र-चित्रण-

इस एकांकी में पाँच पात्र हैं। एक पुरुष पात्र बसन्त और चार स्त्री-पात्र बसन्त की पत्नी मधु, मधु की सहेलियाँ-सुरो और चिन्ती तथा बसन्त की नौकरानी मंगला। इस एकांकी की प्रमुख पात्र मधु हैं। शेष पात्रों में बसन्त प्रमुख है। बसन्त ऐसा युवक है जो सफाई की अपेक्षा स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान देने का पक्षधर है। उसने अपना बचपन अभाव और निर्धनता में बिताया है। वह दूसरे व्यक्ति द्वारा प्रयोग की गयी तौलिया से शरीर पोंछने में कोई बुराई नहीं समझता। उसकी पत्नी मधु सफाई का बहुत ध्यान रखती है और गलत तौलिया लेकर हजामत बनाने पर बसन्त से क्रोधित हो जाती है। बसन्त मधु की बात हँसकर टालना चाहता है। वह अपने छह भइयों द्वारा एक ही तौलिया से शरीर पोंछकर स्वस्थ रहने की बात बताकर भी अपनी पत्नी को नहीं समझा पाता। वह अपनी पत्नी के मौसा और मामा का मजाक उड़ाता है जो सफाई का बहुत अधिक ध्यान रखते हैं- “तुमने फिर अपने मामा और मौसा की कथा छेड़ी। माना कि वे विलायत हो आये हैं, किन्तु इसका मतलब तो नहीं कि जो वह कहते हैं, वह वेद-वाक्य है। उस दिन तुम्हारे मौसा आये थे। उन्होंने हाथ धाये तो मैंने उन्हें भूल से तौलिया पेश कर दिया। उन्होंने दाँत निपोर दिये- मैं किसी दूसरे के तौलिये से हाथ नहीं पोंछता- और वे अपने रूमाल से हाथ पोंछने लगे। मैं पूछता हूँ  अगर वे उस तौलिये से हाथ पोंछ लेते तो उन्हें कौन सी बीमारी चिपट जाती।” बसन्त भुलक्कड़ स्वभाव का है। वह हमेशा गलत तौलिया ले लेता है तथा अपनी पत्नी के टोकने पर चश्मा न पहनने का बहाना कर देता है।

बसन्त की पत्नी मधु सम्पन्न वातावरण में पली है। उसे सफाई और सुरुचि का पूरा ध्यान है। सफाई और सुरुचि का उसका भाव सनक गया है। अपने पति बसन्त को गलत तौलिये का प्रयोग करते देखकर वह इतनी क्रोधित हो जाती है कि उचित-अनुचित का ध्यान न करके अपने क्रोध को घृणा में परिवर्तित कर देती है। उसे सफाई के समाने घर के सुख-चैन का भी ध्यान नहीं रहता। वह समझ लेती है कि वह अपने पति को कोई सुख नहीं दे सकेगी, इसलिए उसका ससुराल छोड़कर पीहर जाना ही उचित है। बसन्त के बनारस चले जाने पर वह अपनी भूल समझती है तथा अपने आपको अपने पति के अनुकूल बनाने की चेष्टा करती है । वह अपने आपको परिवर्तित भी कर लेती है। वह मंगला के सामने स्वीकार करती है- “यदि मैं ऐसे वातावरण में पली हूँ जहाँ सफाई और सलीके का बेहद ख्याल रखा जाता है तो इसमें मेरा क्या दोष है? वे सफाई और सुचित को मेरी घृणा बताते हैं। मैं बहुत यत्न करती हूँ कि सब सफाई-अफाई को छोड़ दूँ, इस तकल्लुफात को तिलांजलि दे दूं, पर अपने इस प्रयास में कभी-कभी मुझे अपने आपसे घृणा होने लगती है। बचपन में मैंने जो संस्कार पाये हैं, उनसे मुक्ति पाना मेरे लिये उतना आसान नहीं है पर नहीं, मैं अपनी इस खराब सनक को छोड़ दूंगी। पुरानी आदतों से छुटकारा पा लूँगी। वे समझते हैं मैं उनसे घृणा करती हूँ।” वह अपने आपको वास्तव में बदल लेती है और घर का नक्शा बदल जाता है। इसे देखकर बसन्त प्रसन्न होता है। बसन्त को सुरो और चिन्ती द्वारा हाथ पोंछे गये तौलिये से हाथ पोंछना देखकर मधु पुनः मुंह फुला लेती है, क्योंकि वह अपने स्वभाव को पूर्णतया बदलने में असमर्थ है।

सुरो तथा चिन्ती मधु की सहपाठियों का इस एकांकी में विशेष महत्व नहीं हैं, वे केवल मधु के चरित्र को प्रकाशित करने में सहयोग देती हैं। सभी पात्रों का चरित्र लेखक ने अत्यन्त कुशलता और सावधानी से अंकित किया है। सभी पात्र जीवन्त एवं वर्ग-विशेष का प्रतिनिधित्व करते हैं। पात्रों के चरित्र-चित्रण में लेखक ने संवादों और घटनाओं दोनों में सहायता ली हैं

संवाद अथवा कथोपकथन-

इसके संवाद स्वाभाविक नहीं हैं। मधु और बसन्त के कथन प्रायः लम्बे होने के कारण व्याख्यान जैसे प्रतीत होते हैं। छोटे-छोटे और स्वाभाविक संवाद इस एकांकी में बहुत कम हैं। मंगला के अतिरिक्त सभी पात्र बड़े-बड़े संवाद बोलते हैं। अपनी बात का समर्थन करने और किसी घटना की सूचना देने वाले संवाद लम्बे हो जाते हैं। स्वाभाविक एवं प्रभावशाली संक्षिप्त कथानकों का एक उदाहरण प्रस्तुत है-

मधु- मंगला ?

मंगला – जी बीबी जी।

मधु – मंगला, जरा मेरी ओर देखकर बता तो, क्या मैं सचमुच बदल गयी हूँ।

मंगला – (चुप रहती है)

मधु – (जैसे अपने आप से) मेरी सहेलियाँ कहती हैं, मैं बदल गयी हूँ। पड़ोसिने भी यही कहती हैं। मेरी ओर जरा देखकर बता तो मंगला। क्या मैं सचमुच बदल गयी हूँ?

मंगला – मैं तो आठों पहर आपके साथ रहती हूँ बीबीजी! मैं क्या जान?

भाषा-

मंगला को छोड़कर इस एकांकी के सभी पात्र पढ़े-लिखे और योग्य हैं। सभी शालीन एवं संस्कृत तत्सम प्रधान खड़ी बोली का प्रयोग करते हैं। उर्दू के शब्द इस भाषा की शोभा बढ़ाते हैं और अंग्रेजी का भी कोई शब्द कहीं-कहीं आ गया है। भाषा में मुहावरों का भी प्रयोग है। वाक्य प्रायः अधिक बड़े नहीं हैं। इस एकांकी की भाषा का एक उदाहरण प्रस्तुत है-

“मैंने तुम्हें कितनी बार कहा है कि अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखा करो। सेहत-सेहत-दुनिया में जो कुछ है सेहत है। जीवन में तुम्हारी यह सफाई और सुघड़ता, यह सुरुचि-संस्कृति, यह नजाकत-नफासत उतना काम न देगी, जितना सेहत। यदि यही ठीक नहीं रहती तो वे सब किस काम  की?”

देश काल और वातावरण-

इस कहानी का देश अर्थात् स्थान कोई भी महानगर हो सकता है। इसका काल अर्थात् समय आधुनिक काल है। कहानी का वातावरण घरेलू है। लेखक ने चाय, लिहाफ, ड्राइंग-रूम, नौकरानी, हजामत आदि के द्वारा वातावरण को घरेलू बनाने में पूरी तरह सफलता प्राप्त की है।

उद्देश्य-

इस कहानी का उद्देश्य इस मनोवैज्ञानिक सिद्धान्त पर प्रकाश डालना है कि जिसको जो आदत पड़ जाती है, उसे वह बदल नहीं सकता। स्वभाव को बदलने के सभी प्रयत्न व्यर्थ हो जाते हैं। इस एकांकी के मधु और बसन्त दोनों ही पात्र अपना स्वभाव नहीं बदल पाते। मधु को सफाई की सनक है और बसन्त लापरवाह है।

अभिनेयता-

एकांकी को अभिनय के योग्य होना ही चाहिए। प्रस्तुत एकांकी के अभिनय में कोई असुविधा नहीं होती, रंगमंच पर कभी तीन से अधिक पात्र एकत्र नहीं होते। केवल लम्बे-लम्बे संवाद अभिनय को प्रभावहीन बनाते हैं।

संकलन त्रय-

इस एकांकी में संकलन त्रय का पालन पूर्णरूप से नहीं हुआ है। इसमें कार्य-संकलन की एकता पायी जाती है, क्योंकि इसमें स्वभाव का परिवर्तन होने पर बल दिया गया है। पूरा एकांकी बसन्त और मधु के घर में अभिनीत हो जाता है, इस प्रकार स्थान संकलन का भी निर्वाह हुआ है। समय-संकलन का निर्वाह इसमें नहीं है, क्योकि दो महीने की घटनाएँ एक घण्टे में अभिनीत होती हैं।

इस प्रकार स्पष्ट है कि इसमें एकांकी के लगभग सभी तत्वों का निर्वाह हुआ है।

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Pankaja Singh

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