शिक्षाशास्त्र

स्वामी विवेकानन्द का जीवन-वृत्त | स्वामी विवेकानन्द के दार्शनिक विचार | स्वामी विवेकानन्द की शैक्षिक विचारधारा | स्वामी विवेकानंद का शिक्षा के क्षेत्र में योगदान

स्वामी विवेकानन्द का जीवन-वृत्त | स्वामी विवेकानन्द के दार्शनिक विचार | स्वामी विवेकानन्द की शैक्षिक विचारधारा | स्वामी विवेकानंद का शिक्षा के क्षेत्र में योगदान | Biography of Swami Vivekananda in Hindi | Philosophical Thoughts of Swami Vivekananda in Hindi | Educational Ideology of Swami Vivekananda in Hindi | Contribution of Swami Vivekananda in the field of education in Hindi

स्वामी विवेकानन्द का जीवन-वृत्त

स्वामी विवेकानन्द का वास्तविक नाम नरेन्द्रनाथ था। उनका जन्म 12 जनवरी, 1863 ई० को कलकत्ते में हुआ था। उनके पिता का नाम विश्वनाथ दत्त और माता का नाम भुवनेश्वरी देवी था। उनके पिता कलकत्ता हाईकोर्ट में एक विख्यात वकील थे। उनके घर का वातावरण धार्मिक था। पिता ज्ञानी, उदारमना, परोपकारी एवं गरीबों की रक्षा करने वाले थे। इसका प्रभाव पुत्र पर भी पड़ा। इनकी माता धर्मपरायण होते हुए देवी-देवताओं पर विश्वास रखती यीं। इसको विवेकानन्द ने स्वयं बताया है कि “अपने ज्ञान के विकास के लिए मैं अपनी माँ. का ऋणी हूँ।” बचपन से ही नरेन्द्रनाथ गरीब-दुखी, साधु-संन्यासी के प्रति आकर्षित थे। पाँच वर्ष की अवस्था में विधारंभ हुआ और छठे वर्ष से ही वे विद्यालय जाने लगे। कक्षा में वह होशियार बालक नहीं थे। बाद में घर पर ही शिक्षा का प्रबन्ध हुआ। एक साल के भीतर ही उन्हें व्याकरण कंठस्थ हो गया। सात वर्ष की अवस्था में मेट्रोपोलिटन कालेज में प्रवेश लिया। विद्यालय में पढ़ने-लिखने, खेल-कूद-व्यावाम, संगीत, नाटक आदि में वह सबसे आगे रहते, लेकिन बचपन से ही वह संन्यासी होने का स्वप्न देखते थे। मैट्रीकुलेशन परीक्षा पास करने के बाद वह प्रेसीडेन्सी कालेज में भरती हुए और बाद में जनरल एसेम्बलीज इन्स्टीट्यूशन में पढ़ने लगे। यहाँ पर उन्हें इतिहास, साहित्य और दर्शन के अध्ययन का अवसर मिला। डेकार्टें, हबूम, डीगलस, स्पेन्सर, डार्दिन तथा वईसवर्थ, शैली एवं अन्य भारतीय कवियों की रचनाओं का‌अध्ययन उन्होंने किया। उन्होंने भारतीय एवं पाश्चात्य दर्शन का तुलनात्मक अध्ययन किया और पाश्चात्य दर्शन पर प्राचीन भारतीय दर्शन की प्रभुता को प्रकट किया। अध्ययन के साथ- साथ जीवन में वह ब्रह्मचर्य, नियम-संयम, ध्यान-धारणा, प्रार्थना-उपासना आदि का पालन करते थे। एफ० ए० में अध्ययन करते हुए भी वह ब्रह्म-प्राप्ति के लिए अशान्त हो उठे। एक दिन वह महर्षि देवेन्द्रनाथ ठाकुर के पास पहुंचे और पूछा कि “क्या आपने ईश्वर को देखा  है?” परन्तु सही उत्तर नरेन्द्रनाथ को नहीं मिला। 1881 ई० में नवम्बर माह में नरेन्द्रनाथ का अपने पड़ोसी के द्वारा श्री रामकृष्ण परमहरा के साथ साक्षात्कार हुआ। एफ० ए० पास करने के बाद बी० ए० में पढ़ना शुरू किया लेकिन रामकृष्ण परमहंस का सत्संग भी करते रहे।

1886 ई० में रामकृष्ण परमहंस का स्वर्गवास हुआ। इसके पूर्व ही उन्होंने नरेन्द्र नाथ एवं दस अन्य शिष्यों को गेरुआ वस्त्र देकर दीक्षित किया था। देहावसान के कुछ दिन पूर्व ही उन्होंने नरेन्द्र नाथ को अपना उत्तराधिकार सौंप दिया था। नरेन्द्र नाथ ने उसे स्वीकार किया और स्वामी विवेकानन्द के रूप में गुरु के कार्य को आगे बढ़ाया। धर्म और सेवाकार्य में उनकी बचपन से लगन थी; अतः उन्होंने सेवा के व्रत लेकर संन्यास ले लिया।

1893 ई० को वह विश्व धर्म सम्मेलन में भाग लेने के लिए अमेरिका गये, जिसमें वेदान्त पर उनका भाषण इतना प्रभावशाली हुआ कि उन्हें सर्वोच्च आसन पर प्रतिष्ठित किया गया। विश्व धर्म सम्मेलन में उनके कई भाषण हुए, जिससे अख्यात-अज्ञात स्वामी विवेकानन्द विश्व प्रसिद्ध हो गये। 1895 ई० में वह अमरीका से इंगलैंड गये, पुनः योरोप से इटली, स्विटजरलैंड, जर्मनी, फ्रान्स आदि देशों का भ्रमण किया। इंग्लैंड में पुनः दो बार 1896 ई० में गये तथा वहाँ भी प्रचार किया। इसके बाद वह 15 जनवरी, 1897 ई० को श्रीलंका वापस आ गये। भारत आने पर अपनी यात्रा के संस्मरण लोगों को सुनाया। अमरीका से आने के बाद उन्होंने सारे उत्तरी भारत में धुआँधार प्रचार किया। दिसम्बर, 1898 ई० में उन्होंने बेलूर में रामकृष्ण मठ की स्थापना की। वहाँ पर पूजा आराधना एवं साधना में लीन रहते थे। 20 जून, 1899 ई० को वह पुनः अमरीका गये। जुलाई 1900 ई० में वह पेरिस में विश्व धर्म इतिहास सम्मेलन में भाग लेने के लिए वहाँ गये और विभिन्न देशों का प्रचार करते हुए 24 जुलाई, 1902 ई० को उन्होंने अल्पायु में नश्वर शरीर का त्याग कर दिया।

स्वामी विवेकानन्द एक अद्वितीय व्यक्ति थे। उनका दिव्य व्यक्तित्व आरम्भ से ही मानव के कल्याण के लिए व्याकुल था। धर्म के प्रचार के लिए उन्होंने बहुत से भाषण दिये, मठों की स्थापना की, संस्थाएँ चलायीं। उनका कहना था कि “कोई नूतन सम्प्रदाय स्थापित करने के लिए मैं यहाँ नहीं आया हूँ। मेरे गुरुदेव श्री रामकृष्ण परमहंस देव से मैंने जो बातें पायी हैं उसी का संसार में प्रचार करना ही हमारा उद्देश्य है।”

स्वामी विवेकानन्द का सबसे महान कार्य भारत ही नहीं विदेशों में भी ‘रामकृष्ण मिशन’ नामक संघ बनाना और चलाना था। इस संघ की स्थापना उन्होंने मई सन् 1897 ई० में की थी। दो वर्ष बाद इस संघ से सम्बन्धित मठ को बड़ा नगर से उठाकर बेलूर ले गये। इस संघ का उद्देश्य था-मानव जाति के कल्याण के लिए सत्य का प्रचार और अनुष्ठान करना तथा जनता की सेवा और आत्मिक कल्याण के लिए साधन प्रदान करना तथा सामाजिक सुधार करना | स्वामी विवेकानन्द की पुकार थो कि गरीबों के दुःमोचन, छुआछून का परिमार्जन और पतितों की सामाजिक अत्याचारों से रक्षा करनी। मनुष्यों को उनके वंचित अधिकारों से पुनः प्रतिष्ठित करने का जो काम स्वामी प्रवे नन्द ने आरम्भ किया था वह उनके शरीर छोड़ने के बाद भी चलता रहा। भारतीय दर्शन, भारतीय संस्कृति एवं भारतीय जीवन को पुनः जागृत करने का बड़ा कार्य स्वामी विवेकानन्द ने ही किया ।

स्वामी विवेकानन्द के दार्शनिक विचार

आधुनिक युग के महापुरुषों में स्वामी विवेकानन्द एक दार्शनिक महान संन्यासी, शिक्षा- शास्त्री और विचारक थे। उनका कथन था, निर्भय बनो, भय पाप है। इसका जीवन में कोई स्थान नहीं है। उन्होंने अपने जीवन दर्शन और शिक्षा दर्शन का आधार वेदान्त के सिद्धान्तों एवं आदशों को बनाया और उन्हीं के अनुसार उन्हें निर्मित भी किया। विवेकानन्द के दार्शनिक विचार हमें उनके व्याख्यानों में मिलते हैं जिनका विवेचन इस प्रकार है-

विवेकानन्द ने ईश्वर में सर्वव्यापकता, सर्वगुणमयता एवं सर्वसम्पन्नता माना है। उन्होंने कहा है- “जिस ईश्वर को कोई देख नहीं सकता, जान नहीं पाता अथवा जो ईश्वर हमारे सम्मुख चारों ओर प्रकट एवं ज्ञात है, समय-समय पर वे जगत् में अपने एक-एक दूत भेज देते है जिसके एक हाथ में तलवार रहती है और दूसरे में अभिशाप……..। दूसरी ओर निर्गुण ईश्वर को जीवित रूप में हम अपने सम्मुख देख रहे हैं, वे एक तत्वमात्र हैं। सगुण के बीच में भेद यही है कि सगुण ईश्वर क्षुद्र मानवविशेष मात्र है, और निर्गुण ईश्वर है मनुष्य, पशु, देवता तथा अन्य वह सब जो हम नहीं देख पाते हैं, कारण, सगुण-निर्गुण के अन्तर्गत है और निर्गुण, सगुण, व्यष्टि एवं उसके अतिरिक्त और भी बहुत कुछ है।”

स्वामी विवेकानन्द ने बताया कि ईश्वर (ब्रह्म) विश्व (जगत) का कारण है और विश्व उसकी व्याप्ति है। अतः ईश्वर और विश्व में कारण कार्य का सम्बन्ध है और इसी से ईश्वर को जगतनियन्ता भी कहा जाता है। जिस प्रकार हमारा शरीर है और उसके भीतर आत्मा होती है, उसी तरह विश्व के भीतर जितनी आत्माएँ हैं वे सभी ईश्वर या ब्रह्म के शरीर हैं और उनके भीतर ब्रह्म का वास है। इस प्रकार ज्ञात के भीतर जो ज्ञेय है वह ‘ईश्वर’ है। इससे स्पष्ट है कि जगत जो ज्ञात है उसके भीता अज्ञात रूप में ईश्वर होता है।

स्वामीजी ने यह घोषित किया कि “वेदान्त जगत को उड्डा नहीं देता, उसकी व्याख्या करता है। वह अर्हत्व को मिटाने का उपदेश नहीं करता किन्तु वास्तविक अर्हत्व क्या है यह समझा देता है। वह यह बतलाता है कि जगत् क्या है यह समझो, जिससे वह तुम्हारा कोई अनिष्ट न कर सके। सम्पूर्ण जगत ब्रह्ममय है; अतएव जगत के सभी मानव ब्रह्ममय और आत्मावान हैं। प्रत्येक मानव केवल मांसपिंड स्वरूप नहीं है बल्कि उसमें भौतिक और आध्यात्मिक दो तत्व हैं। इनके अलावा मानव में अन्य गुण भी हैं आत्मविश्वास, शुद्धता, पवित्रता, ज्ञान-विवेक, क्रियाशीलता, प्रेम एवं स्वाधीनता । इन गुणों से युक्त होकर वह अवतीर्ण होता है और ऐहिक अन्त के बाद अनन्त मुक्ति पाता है।

सत्य के संबंध में स्वामी विवेकानन्द का कथन है कि “जो कुछ भी पूर्णता के लिए होता है वह सत्य है। प्रेम सत्य है। घृणा मनुष्य को मनुष्य से अलग करती है; अतएव वह असत्य है। प्रेम बाँधता है और प्रेम एकता लाता है प्रेम ही अस्तित्व है, ईश्वर स्वयं है, और यह जो कुछ प्रकट है केवल उसी प्रेम का रूप है जो कम या अधिक अभिव्यक्ति होता है।” सत्य ही प्रेम है और प्रेम ही ईश्वर है; अतएव ईश्वर ही सत्य है। इस सम्बन्ध में स्वामी विवेकानन्द का कथन है कि “जो कुछ मनुष्य के शरीर, मस्तिष्क और आत्मा को दुर्बल बनाये वह असत्य है। जो कुछ मनुष्य के शरीर, मस्तिष्क और आत्मा को सबल बनाये वह ही सत्य है।”

स्वामी विवेकानन्द की शैक्षिक विचारधारा

स्वामी विवेकानन्द न केवल एक महान दार्शनिक थे अपितु उन्होंने अपने दर्शन के अनुकूल शैक्षिक विचार प्रस्तुत किये हैं। उनके शैक्षिक विचार निम्नवत हैं:-

  1. शिक्षा का अर्थ- स्वामी विवेकानन्द ने शिक्षा का व्यापक एवं व्यावहारिक अर्थ लिया है। शिक्षा वास्तविक ज्ञान है और ऐसा ज्ञान है जिससे व्यक्ति को अपना शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक विकास करने में सहयोग मिलता है। उन्होंने अपने काल की शिक्षा का विरोध किया और उसे निषेधात्मक तथा भावात्मक बतलाया। उन्होंने स्पष्ट कहा है कि “शिक्षा शब्द से मैं यथार्थ कार्यकारी ज्ञानार्जन समझता हूँ केवल पुस्तक की विद्या से काम नहीं चलेगा। हमारा प्रयोजन उसी शिक्षा से है जिसके द्वारा चरित्र-गठन हो, मन का बल बढ़े, बुद्धि का विकास हो और मनुष्य स्वावलम्बी हो सके और जो भावों और विचारों को आत्मसात करे।”

फ्रोबेल का विचार है कि वह स्व-विकास है। इसी प्रकार स्वामी विवेकानन्द का भी मत है कि “हममें से प्रत्येक व्यक्ति अपनी प्रकृति के अनुसार स्वाभाविक रूप में विकास करता है, प्रत्येक व्यक्ति समय आने पर बड़े से बड़े सत्य को जान लेगा, क्योंकि अन्तिम रूप में मनुष्य स्वयं अपने-आपको शिक्षित करता है।” जैसा कि छोटा पौधा स्वयं विकास करता है। इस प्रकार के स्वाभाविक विकास या शिक्षा पर अनावश्यक दबाव नहीं डालना चाहिए, बल्कि उसे स्वतन्त्र रूप में होने देना चाहिए। यह अवश्य है कि स्वामी विवेकानन्द स्वतन्त्र का अर्थ अपने आप पर नियन्त्रण करना मानते हैं।

  1. शिक्षा का स्वरूप- अन्य शिक्षा– विचारकों की भाँति स्वामी विवेकानन्द ने भी शिक्षा के विभिन्न प्रकारों पर जोर दिया है और तत्सम्बन्धी विचार भी प्रकट किया है। नीचे इसी संबंध में कुछ विचार प्रस्तुत हैं:-

(i) जन शिक्षा- भारत की अवनति का सबसे महान् कारण यही है कि यहाँ पर जन- शिक्षा का अभाव है और कुछ लोगों की शिक्षा पर एकाधिपत्य कर लेना है। उनके विचारानुसार मनुष्य की गरीबी और दुःख का एकमात्र कारण अज्ञानता है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि शिक्षा गरीबों तक पहुँचे वे चाहे खेत जोतने वाले हों, चाहे फैक्टरी में काम करने वाले हों अथवा अन्य कहीं भी हों। प्रयत्नशील संन्यासियों एवं व्यक्तियों को गाँव-गाँव में और घर-घर में जाकर धर्म एवं धर्मेतर शिक्षा देनी चाहिए। इस शिक्षा के लिए उनकी मातृभाषा को माध्यम बनाना चाहिए। यदि गरीब बालक शिक्षा ग्रहण करने नहीं आ सकता तो यदि जनसाधारण में शिक्षा का इस प्रकार प्रचार किया जायेगा तो निस्सन्देह भारत का भाग्य उज्ज्वल होगा और उन्नति के पथ पर वह अग्रसर होगा।

(ii) स्त्री-शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द ने आवाज उठायी कि “उस परिवार अथवा देश की उन्नति की सम्भावना नहीं जहाँ स्त्रियों का आदर न हो, जहाँ वे दुखी रहें (जहाँ वे शिक्षित न हो), इस कारण सर्वप्रथम उन्हें ऊपर उठाना है।” स्त्री-शिक्षा का केन्द्र धर्म है। क्योंकि स्त्रियाँ ही धर्मधारिणी और धर्मपालिका हैं। इसलिए आध्यात्मिक, धार्मिक एवं चारित्रिक शिक्षा, उपयोगी शिक्षा एवं शारीरिक उत्कर्ष की शिखा देकर स्त्रियों को पूर्ण रूप से तैयार किया जा सकता है। यहाँ पर स्वामीजी ने स्त्रियों को केवल घर के अन्दर बन्द रहने वाली तथा चूल्हे- चक्की के चक्कर में पड़ने वाली ही नहीं माना है, बल्कि उसे आत्मा और समाज कल्याण के लिए अपना योगदान करने के लिए अनिवार्य माना है, और उसी ढंग की शिक्षा भी देने को कहा है जो नवीन शिक्षाशास्त्रियों के विचार से किसी प्रकार भी कम नहीं है।

(iii) धार्मिक शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द के अनुसार “धर्म तथ्य का प्रश्न है न कि बार्तालाप का। हमलोग अपनी आला का विश्लेषण करना पसन्द करते हैं और पता लगाते हैं कि वहाँ क्या है। हमलोग जो समझना पसन्द करते हैं और जो कुछ समझते हैं उसकी अनुभूति करते हैं। यहाँ धर्म है। धर्म तो साक्षात् ब्रह्म है जिसकी जिज्ञासा उसके साक्षात्कार से पूरी होती है न किसी प्रकार के चित्र, मूर्ति या ने साधनों से। धर्म व अनुभूतिमूलक तत्व है जिसके लिए सतत साधना, भक्ति एवं प्रेम कथा आस्था की आवश्यकता है। धर्म ह्रदय में दैवी प्रकाश है। इस प्रकार के प्रकाश का होना वर्तमान शिक्षा पद्धति में असंभव है।

धर्म शिक्षा में चारित्रिक, नैतिक एवं आध्यात्मिक गुणों का विकास होना चाहिए। सबसे पहले व्यक्ति में आत्मविश्वास और आत्मश्रद्धा हो। इस गुण को कार्यान्वित करने के लिए व्यक्ति में नैतिक बल और साहस होना जरूरी है पूर्णविराम इसके कारण वह आदर्शों की स्थापना और उनका अनुपालन कर सकेगा; अतः उसे अपने समक्ष राम, कृष्ण, बुध, दुर्गा (काली), परमहंस रामकृष्ण देव आदि महान पुरुषों का आदर्श रखकर नैतिक एवं आचारिक बल प्राप्त करना चाहिए।

धर्म यदि एक और अनुभूति है और गुणों की प्राप्ति है और उनका प्रयोग है तो दूसरी ओर उत्कर्ष भी है। हमारे भीतर कुछ दुर्बलताएं होती हैं। अज्ञान एवं दुर्बलता है इसके लिए हमें ज्ञान उत्कर्ष की ओर बढ़ना चाहिए और ‘सत्य’ का पता लगाना चाहिए जिसका मूलोद्गम वेद, उपनिषद, वेदांता दी है। दूसरी ओर शारीरिक उत्कर्ष भी आवश्यक है। शरीर को बल कैसे मिलता है, इसके लिए स्वामी विवेकानंद ने ब्रम्हचर्य को प्रमुखता दी है। ब्रम्हचर्य विचार और कार्य दोनों रूपों में होना आवश्यक है। अतः ब्रम्हचर्य का पालन और धारण करना धर्म शिक्षा के अंतर्गत है। इससे स्पष्ट है कि विवेकानंद के अनुसार धर्म एक तप और साधना है और उसकी शिक्षा एक क्रम भी है जो ऊपर वर्णित है। विवेकानंद ने कहा भी है कि धर्म तो व्यक्ति में पुरुषत्व लाता है।

(iv) राष्ट्रीय शिक्षा- स्वामी दयानंद के समान स्वामी विवेकानंद ने ‘वेदांत की ओर लौटो’ की भोसड़ा की। वेदांत ज्ञान का असीम स्रोत है, जिससे संपूर्ण मानवता के कल्याण की भावना करती है। विवेकानंद ने इसी को अपनाया जिसके कारण वे मानव के कल्याण में लगे और मानवता को ऊंचा उठाया। उन्होंने शिक्षा का एक प्रमुख उद्देश्य बालकों में देश प्रेम की भावना करना बतलाया। उनका विचार था कि जो शिक्षा देशभक्ति की प्रेरणा नहीं देती, वह राष्ट्रीय शिक्षा नहीं कही जा सकती। इस प्रकार वह केवल भारत के राष्ट्र प्रेम के संबंध में उपदेश नहीं दे रहे थे बल्कि ‘’उनका राष्ट्रप्रेम उस प्रकार का था जो अपने आप भारतीय राष्ट्रप्रेम में बदल गया और जो अंतरराष्ट्रीय प्रेम का एक अंश था।”

(v) व्यवसायिक शिक्षा- स्वामी विवेकानंद करते थे कि वर्तमान शिक्षा पद्धति में कुछ अच्छी बातें अवश्य है, की अपेक्षा बहुत अधिक भयंकर दोष भी है।…… वर्तमान शिक्षा पद्धति केवल क्लर्क तैयार करने का यंत्र मात्र है।” वह ऐसी शिक्षा देने के पक्ष में थे जो खाली पेट ना रखें और ना क्लर्क ही बनावे। इसका तात्पर्य यह है कि वह तकनीकी और वैज्ञानिक शिक्षा देना चाहते थे ताकि लोगों को कुछ व्यवसायों का ज्ञान हो जाए और वह अपने उदर पूर्ति के साथ दूसरों की कुछ सेवा भी कर सके। रामकृष्ण मिशन द्वारा संचालित एवं स्थापित जो विद्यालय हैं उनमें व्यवसायिक शिक्षा भी दी जाती है।

  1. शिक्षा के उद्देश्य- स्वामी विवेकानंद का कथन था कि “शिक्षा मनुष्य में पाई जाने वाली पूर्णता का बाह्य प्रकाशन है।” उनके कथनानुसार ज्ञान तो मनुष्य के मन में अंतर्निहित है। इस कथन से स्पष्ट है कि स्वामी विवेकानंद के अनुसार शिक्षा का प्रथम लक्ष्य व्यक्ति की आंतरिक पूर्णता को बाह्य जगत में प्रकट करना है ताकि वह अपने आप को भलीभांति सांसारिक कार्य हेतु उपयुक्त समझें।

शिक्षा का दूसरा लक्ष्य उपर्युक्त मानव-निर्माण या पूर्णतया प्रकाशन के साथ ही जुड़ा है। इसे धर्म-शिक्षा का लक्ष्य कहा जाता है। व्यक्ति में मनुष्यत्व को लाना धर्म का कार्य है। यह मनुष्यत्व क्या है? यह वास्तव में व्यक्ति द्वारा उन लौकिक एवं सद्गुणों का धारण करना है जिससे वह दिव्य पुरुष बनता है। ये सद्गुण है-आत्म-विश्वास, आत्म-श्रद्धा, आत्म-त्याग, आत्म-नियंत्रण, आत्म-निर्भरता एवं मानव-प्रेम। यदि व्यक्ति को अपनी आत्मा में विश्वास होता है तो वह निस्संदेह आगे बढ़ने का प्रयत्न करता है। इसके कारण व्यक्ति की शक्तियों सचेष्ट एवं सचेतन होती हैं और वह क्रिया करता है।

शिक्षा का तीसरा लक्ष्य स्वामी विवेकानन्द के अनुसार मानव एवं समाज सेवा है। विचार में मनुष्य के भीतर ईश्वर है और यथार्थ शिक्षा का लक्ष्य मनुष्य की सेवा द्वारा ईश्वर की सेवा करना है। इसलिए स्वामी विवेकानन्द ने शिक्षा के सामाजिक लक्ष्य की ओर संकेत किया है और उनके विचार से समाज में ही व्यक्ति में छिपी हुई दिव्यता का प्रकाशन सेवा-रूप में होता है।

शिक्षा का एक और लक्ष्य भी स्वामी विवेकानन्द ने बताया है; इसे शारीरिक विकास कहते हैं। उन्होंने कहा है कि “संसार में यदि कोई पाप है तो वह दुर्बलता है। दुर्बलता का परित्याग करो। उपनिषद् की महान शिक्षा यही थी। वर्तमान में ऐसे बलिष्ठ मनुष्यों की आवश्यकता है जिनकी पेशियाँ लोहे के समान दृढ़ और स्नायु फौलाद की तरह कठिन हो।”

शिक्षा का आर्थिक लाभ भी होना चाहिए, ऐसा संकेत उनके विचारों में मिलता है। उनका विचार था कि भारत में आज करोड़ों व्यक्ति भूखे हैं, उनके लिए भोजन-व्यवस्था करना है, करोड़ों गरीब हैं उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति करनी है। उन्होंने कहा कि शिक्षा के द्वारा भौतिक सुखों को प्राप्त करना चाहिए तभी तो आध्यात्मिक विकास सम्भव है।

अन्त में शिक्षा का लक्ष्य विश्व बन्धुत्व एवं विश्व-चेतना प्रदान करना होना चाहिए। सारे विश्व के प्राणी समान रूप में हैं। अतः वही व्यक्ति शिक्षित है जो गीता के शब्दों में ‘समदर्शी’ है अर्थात् जिसमें विश्व-बन्धुत्व की भावना हो और जो विश्व के प्रति चेतन हैं।

  1. शिक्षा का पाठ्यक्रम- पाठ्यक्रम के सम्बन्ध में सविस्तार स्वामी विवेकानन्द के विचार अलग संगठित नहीं मिलते हैं; यत्र-तत्र संकेत स्वरूप हैं। उन्होंने नहीं बताया है कि किसके लिए क्या-क्या और कितना पढ़ाया जावे। इसीलिए पाठ्य-विषय के सम्बन्ध में बहुत थोड़ा परिचय मिलता है। दार्शनिकता की पृष्ठभूमि पर ही उन्होंने शिक्षा का पाठ्यक्रम और आगे शिक्षा की विधि भी बतायी है। पाठ्यक्रम के सम्बन्ध में एक दूसरी बात यह है कि स्वामी विवेकानन्द ने उसे दो भागों में बाँटा है-लौकिक एवं आध्यात्मिक । लौकिक विषयों एवं क्रियाओं के अन्तर्गत भौतिक सुख एवं समृद्धि के विषय एवं कार्य आते हैं तथा आध्यात्मिक- पाठ्यक्रम के अन्तर्गत आत्मा के विकास, आत्मानुभूति से सम्बन्धित विषय एवं क्रियाएँ रखी जाती हैं। लौकिक पाठ्यक्रम में भाषा (संस्कृत), मातृभाषा या प्रादेशिक भाषा (अंग्रेजी), विज्ञान, मनोविज्ञान, गृहविज्ञान, तकनीकीशास्त्र (कल-यन्त्रों की शिक्षा), उद्योग-कौशल, कला (संगीत, अभिनय तथा चित्रण), कृषि, व्यवमायों की शिक्षा, इतिहास, भूगोल, गणित, राजनीति और अर्थशास्त्र (जीवन के उपयोगी विषय), खेल-कूद-व्यायाम, समाज एवं राष्ट्र- सेवा । आध्यात्मिक पाठ्यक्रम में ये विषय हैं-धर्म और दर्शन (विशेषकर हिन्दू धर्म एवं वेद- वेदान्त एवं उपनिषदों का ज्ञान), पुराण तथा उपदेश-श्रवण, कीर्तन, धर्म-गीत (भजन), साध संगति ।
  2. शिक्षण विधि- शिक्षा की विधि में स्वामी विवेकानन्द का अपना एक विशिष्ट स्थान है। उनकी शिक्षा-विधि एक मात्र आध्यात्मिक कही जा सकती है, जिसका आधार धर्म है। इस विचार से उन्होंने धर्म की विशेष पद्धति को अपनाकर शिक्षा देने के लिए कहा है।

(i) योग-विधि- यह धर्म-पद्धति योग की है जिसे गीता के शब्दों में चित्त की वृत्तियों का निरोध कहा गया है। इसका लक्ष्य है-युक्त करना या एकीकरण करना। योग की कई सीढ़ियाँ हैं जो क्रमिक हैं, इनमें-(i) कर्मयोग अर्थात् क्रिया द्वारा ईश्वर के साथ एकीकरण करना; (ii) भक्तियोग अर्थात् प्रेम-श्रद्धा आदि भावों की अनुभूति द्वारा एकीकरण करना; (iii) ज्ञान-योग अर्थात् आत्मज्ञान द्वारा एकीकरण करना; (iv) राज-योग अर्थात् मन की शक्तियों का नियन्त्रण करके एकीकरण करना। अतएव स्पष्ट है कि ये विभिन्न योग-मार्ग एक ही केन्द्र की ओर ले जाने वाले हैं और साधक को इस प्रकार के एकीकरण का अभ्यास करना पड़ता है। इस प्रकार के अभ्यास में श्रवण, कीर्तन, स्मरण, मनन और निदिध्यासन की क्रियाएँ भी आती हैं।

(ii) केन्द्रीयकरण की विधि- स्वामी विवेकानन्द द्वारा अनुपालित विधि है- केन्द्रीकरण की। यह विधि आन्तरिक रूप से अथवा आत्मा में सत्यों की खोज करने की विधि है। उनके विचार से ज्ञान प्राप्त करने की सबसे उत्तम विधि एकाग्रता है। इससे मन की चंचलता दूर होती है और व्यक्ति सही ढंग से चिन्तन-मनन में लगता है। यह चित्त को केन्द्रित करने कई विधि केवल मनुष्य के द्वारा ही सम्भव है।

(iii) उपदेश विधि- स्वामी विवेकानन्द ने अध्यापक द्वारा उपदेश की विधि के प्रयोग की ओर संकेत किया है। उन्होंने कहा है कि “शिक्षा से मेरा विचार गुरु-गृहवास से है।” गुरुकुल में रहकर शिक्षा ग्रहण करने की परिपाटी प्राचीन है। प्राचीन समय में 7-8 वर्ष की आयु से लेकर कम से कम 25 वर्ष की आयु (ब्रह्मचर्याश्रम) तक गुरु-गृहवास होता था, जहाँ नित्य गुरु के उपदेश मिलते थे और शिक्षा का कार्य पूरा होता था। आधुनिक समय में जो व्याख्यान विधि है वह इसी का एक मात्र है। गुरु-गृहवास में छात्र गुरु के चारों ओर बैठते थे जैसा कि आज भी सेमिनार या ट्यूटोरियल कक्षाओं में होता है तथा विषय पर विचार-विमर्श, तर्क-वितर्क, शंका और समाधान तथा शास्त्रार्थ भी करते थे, तब जाकर सत्यों और रहस्यों की जानकारी होती थी। अतः इस प्रकार विचार-विमर्श, तर्क, व्याख्यान आदि अन्य शिक्षण विधियों के प्रयोग का संकेत हमें स्वामीजी के विचारों में मिलता है।

(iv) अन्य विधियाँ- कुछ अन्य विधियों के प्रयोग का भी संकेत हमें स्वामी विवेकानन्द के विचारों में मिलता है। उदाहरण के लिए-

साधु-संगति, भ्रमण क्रिया तथा व्यवहार की विधियाँ हैं। साधु-संगति का ही प्रभाव था  कि परमहंस रामकृष्ण देव के प्रसाद से नरेन्द्रनाथ स्वामी विवेकानन्द बने। मठों और मिशन की स्थापना इसी विधि के प्रयोग हेतु हुई। भ्रमण विधि से ज्ञान और अनुभव बढ़ता है तथा विभिन्न लोगों के सम्पर्क में आने का और विभिन्न वस्तुओं एवं स्थानों के निरीक्षण का अवसर मिलता है। शिक्षा के लिए यह एक उपयोगी विधि है और सेवाकार्य तो इसी के द्वारा सम्भव है। व्यावहारिक विधि विज्ञान, गृह-विज्ञान, तकनीको विषय, कृषि जैसे पाठ्य-विषय में प्रयुक्त होगी यह निश्चय है और इन विषयों को पढ़ाने का समर्थन विवेकानन्द के द्वारा हुआ है।

शिक्षासंबंधी अन्य विचार

(i) शिक्षक, विद्यार्थी और विद्यालयसम्बन्धी विचार- स्वामी विवेकानन्द के अनुसार शिक्षा गुरु-गृहवास है। स्वामी विवेकानन्द ने कहा भी है कि “शिक्षक का चरित्र, उसका व्यक्तित्व, उसके गुण सभी बालक के निर्माण में पथ-प्रदर्शक एवं सहायक होते हैं। शिक्षक एवं विद्यार्थी के बीच जो सम्पर्क होता है उसमें मधुरिमा, गरिमा और महिमा होती है, तभी तो छात्र आचार्य के समान महान बनता है और दिव्य प्रकाश विकीर्ण करता है।”

उनके विचार से शिक्षकों में धार्मिकता भी हो और धर्मग्रंथों के सारतत्वों को उसने समझा हो, ग्रहण किया हो और जीवन में पालन करता हो अन्यथा उसका सारा ज्ञान व्यर्थ है। साथ ही उनमें उसका लौकिक एवं व्यावहारिक ज्ञान भी होना चाहिए तभी तो वह मानव-निर्माण में सफल हो सकता है। अध्यापक को सफल मनोवैज्ञानिक होना जरूरी है जिससे कि वह विद्यार्थी की आत्मा, प्रवृत्ति, स्वभाव, आवश्यकता और झुकाव आदि को पहचान सके और तदनुसार शिक्षा दे सके। इसके साथ-साथ अध्यापक को ब्रह्मचर्यपूर्ण, निष्णप, पवित्रतापूर्ण, सद्हृदय, शीलवान, धैर्यवान, क्षमाशील और बलवान भी होना जरूरी है। उसमें ममानव-प्रे एवं कल्याण-भावना इतना हो कि वह निःस्वार्थ भाव से विद्यार्थी के विकास में सहयोग दे।

शिक्षक और विद्यार्थी के संबंध की ओर भी स्वामी विवेकानन्द ने संकेत किया है। उनके विचार से विद्यार्थी और शिक्षक का सम्बन्ध वास्तव में आत्मिक होना चाहिए। गुरु को शिष्य में दिव्यता देखना चाहिए और शिष्य को गुरु की दिव्यता का बोध होना चाहिए।

विद्यालय के सम्बन्ध में स्वामी विदेकानन्द का बहुत थोड़ा-सा संकेत मिलता है। उन्होंने यदि शिक्षा को गुरु-गृहवास बताया है तो विद्यालय निश्चय ही गुरु-गृह होगा। यदि अध्यापक पवित्र है, शुद्ध हृदय एवं विचारवाला है, अच्छे आचरण एवं व्यवहारवाला है, अच्छे स्वास्थ्य और मन वाला है तो निःसन्देह उसका वासस्थान उस वातावरण से पूर्ण होगा जिससे उपर्युक्त गुणों का विकास सम्भव हो सके। शुद्ध वायु से पूरित, शान्त, सुड़द एवं सुरम्य स्वत में और आध्यात्मिक विकास में सहायक वातावरण विद्यालय का होना चाहिए। प्राचीन परम्परा के अनुसार उन्होंने विद्यालय को ‘मठ’ के साथ जोड़ा है परन्तु उनके साथियों ने आधुनिक विद्यालयों को जहाँ उचित स्थान मिला वहाँ स्थापित किया है। इस प्रकार विवेकानन्द के अनुसार विद्यालय व्यक्ति के शारीरिक, बौद्धिक, भावात्मक एवं आध्यात्मिक विकास के केन्द्र है।

(ii) अनुशासनसम्बन्धी विचार- विवेकानन्द का विचार था कि बालकों को शिक्षा देने में दण्ड का प्रयोग न करके सहानुभूति का प्रयोग किया जावे। स्वामी विवेकानन्द दूसरी ओर यह भी चाहते थे कि विद्यार्थी में ब्रह्मचर्य-पालन का गुण हो तथा यह अपनी ज्ञानेन्द्रियों पर पूर्ण नियन्त्रण रखे और शुद्ध एवं सरलतम, रागरहित जीवन व्यतीत करे। इसके अलावा गुरु की आज्ञा का पालन करना और नम्रता से शीश झुकाना शिष्य का परम कर्त्तव्य है। अतः स्पष्ट है कि स्वामी विवेकानन्द चरित्र, कार्य एवं विचार के प्रभाव से अनुशासन स्थापित करने के पक्ष में हैं। इस प्रकार वह प्रभाववादी सिद्धान्त के मानने वाले भी हैं।

(iii) जन-समूह की शिक्षा- स्वामीजी ने देश और मानव-कल्याण की दृष्टि से जन समूह की शिक्षा के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। उनका कथन था कि जन-समूह की अवहेलना करना एक राष्ट्रीय अपराध है। उनके विचार से जन-समूह शिक्षा के प्रसार से ही देश उन्नत कर सकता है और इन्हें शिक्षित करके इनकी दशा को सुधारना जनसाधारण का कर्त्तव्य है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जनसाधारण की शिक्षा उनकी निजी भाषा में होनी चाहिए। उनका कथन था कि जो गरीब बालक शिक्षा ग्रहण करने नही आ सकता, तो उसके घर-घर शिक्षा पहुँचाना चाहिए। इस प्रकार स्वामीजी ने प्रत्येक व्यक्ति को शिक्षित करने पर बल दिया।

स्वामी विवेकानंद का शिक्षा के क्षेत्र में योगदान

स्वामी विवेकानंद एक महान शिक्षा शास्त्री एवं दार्शनिक थे। शिक्षा के क्षेत्र को उन्होंने बहुत प्रभावित किया है-

(1‍) स्वामी विवेकानंद ने वैदिक शिक्षा का समर्थन करके उसे जनप्रिय बनाने का प्रयास किया।

(2) उनका दूसरा योगदान शिक्षा का प्रचार है। उन्होंने कहा शिक्षा ही एकमात्र शिक्षा है। उन्होंने सभी के लिए अच्छी शिक्षा, इसका आधार वेदांती बनाया, देने के लिए कहा है। जनसाधारण, गरीबों, स्त्रियों को विशेषकर शिक्षा देने के लिए उन्होंने आवाज उठाई। उन्होंने कहा कि वह तो प्रत्येक शिक्षित व्यक्ति का कर्तव्य है कि वहां के लाखों भूखों तथा अक्षों को शिक्षा दें और जब तक ऐसे लोगों को दरिद्रता और अज्ञानता से मुक्ति नहीं मिलती यहां के लोगों के लिए लानत है।

(3) स्वामी विवेकानंद ने अपने वेदांती दर्शन को जनसाधारण, धार्मिक एवं स्त्री शिक्षा ने प्रयोग करने को कहा है, जिससे भारत की राष्ट्रीय शिक्षा की नींव बने। उन्होंने बताया कि धर्म में असीम शक्ति है, विशेषकर वेदांती धर्म में; अतः धर्म के मूल्यों पर स्थापित शिक्षा योजना को चालू कर हम भारत का विकास कर सकेंगे।

(4) स्वामी विवेकानंद का यह तीसरा बड़ा योगदान शिक्षा की आध्यात्मिक विधि प्राप्त करने में है। उन्होंने कहा है कि यदि मुझे फिर से शिक्षा लेनी पड़ी तो मैं तथ्यों को नहीं पढ़ूगा। माय एकाग्रता एवं निस्पृहता की शक्ति का विकास करूंगा।

(5) स्वामी विवेकानंद ने शिक्षा का लक्ष्य आत्मानुभूति कहां है। छोटी की आयु में उन्होंने अपने 2 गुरुओं के सामने एक छोटा सा प्रश्न किया था। प्रथम गुरु ने नकारात्मक उत्तर दिया इसलिए असंतुष्ट मन होकर विवेकानंद ने दूसरे गुरु- रामकृष्ण परमहंस- से वही प्रश्न किया- “क्या आपने ईश्वर को देखा है?” उत्तर दिया- हां”। यही कारण था कि उन्होंने उन्हें अपना परम गुरु मानकर उनसे ‘आत्मा-साक्षात्कार’ का उपदेश लिया और यह उपदेश भी वेदांत का है-ज्ञान व्यक्ति के अंतर में है। जब ऐसी स्थिति है तो शिक्षा का लक्ष्य भी उसी के अनुसार होगा- ‘अपने आप को जानो’ यदि व्यक्ति को यह ज्ञान मिल गया तो समझो उसे आत्मसाक्षात्कार हो गया।

(6) स्वामी विवेकानंद का योगदान हमें उनके भारतीय ज्ञान, संस्कृति एवं महानता को विदेशों के समक्ष वास्तविक रूप में रखने में मिलता है। जिस संस्कृति एवं ज्ञान के वह जानने वाले थे उसको जिस समय उन्होंने प्रथम बार शिकागो के धर्म सम्मेलन में रखा सारा अमरीका क्या सारा विश्व आश्चर्य में हो गया।

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Pankaja Singh

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