शिक्षाशास्त्र

समन्वय का अर्थ | समन्वय की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि | सह-सम्बन्ध का अर्थ तथा उसके प्रकार | इतिहास का अन्य शास्त्रों से समन्वय

समन्वय का अर्थ | समन्वय की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि | सह-सम्बन्ध का अर्थ तथा उसके प्रकार | इतिहास का अन्य शास्त्रों से समन्वय | Meaning of coordination in Hindi | Historical Background of Coordination in Hindi | Meaning and types of correlation in Hindi | Coordination of history with other disciplines in Hindi

समन्वय का अर्थ

समस्त ज्ञान अखण्ड है। उसको पृथक्-पृथक् भागों में विभाजित नहीं किया जा सकता; परन्तु पठन-पाठन को सुविधा के लिए हमने उसका वर्गीकरण ‘विषय’ नामक वर्गों में कर लिया है; परन्तु ‘विषय’ ज्ञान का विभाजन नहीं है वरन् ‘ज्ञान’ के अध्ययन का दृष्टिकोण मात्र है। ये विषय एक-दूसरे से सम्बन्धित है। अतः इन विषयों द्वारा प्राप्त ज्ञान समन्वित होगा। आधुनिक मनोवैज्ञानिक शक्ति-मनोविज्ञान में विश्वास नहीं करते। वे मन (Mind) को एक सम्बन्धित इकाई के रूप में मानते हैं। समस्त विषयों की सामग्री उसी मन के द्वारा ग्रहण की जाती है। मन भिन्न-भिन्न अनुभवों का पारस्परिक सम्बन्ध; तुलना तथा मिश्रण आदि करके उन्हें प्राप्त करता है। अनुभव करने के साथ ही सम्बन्धीकरण क्रिया प्रारम्भ हो जाती है और जो भी ज्ञान हमारे मन में संचित होता है, यह इन्हीं सम्बन्धों का ज्ञान है। ज्ञान की अखण्डता, मन की अविभाज्यता एवं सम्बन्धीकरण-क्रिया को देखने से स्पष्ट हो जाता है कि एक विषय का दूसरे विषयों से सम्बन्ध स्थापित करना आवश्यक है।

गुयाऊ के शब्दों में “घटनाओं तथा विचारों का मानसपटल पर स्थायी एवं उपयोगी प्रभाव तभी पड़ता है जब मन उन्हें अन्य आगन्तुक घटनाओं एवं विचारों के साथ व्यवस्थित एवं सम्बद्ध करता है।”

(Fact and ideas have a real and useful influence over the mind only when the mind systematises and co-ordinates them with other facts and ideas, as they are produced.)

टी० रेमण्ट (T. Raymont) का कथन है कि “No subject is ever well understood and no art is intelligently practised, if the light which the other studies are able to throw upon it is deliberately shut out,”

समन्वय की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

शिक्षा-जगत् सदैव इस क्षेत्र में शिक्षाशास्त्री हरबार्ट (Herbart) का ऋणी रहेगा। उसने इस सिद्धान्त की नींव डाली। उसने अपने ‘पूर्व ज्ञान के सिद्धान्त’ (Doctrine of Mass of Appreciation) का प्रतिपादन किया और बताया कि सम्पूर्ण मानसिक शक्तियों का विकास तभी सम्भव हो सकेगा जबकि विषयों का समन्वित रूप में शिक्षण किया जाय। उसने इस सिद्धान्त को ‘समन्वय के सिद्धान्त’ (Principle of Correlation) के नाम से पुकारा। उसके इस सिद्धान्त को उसके शिष्य जिलर ने और बढ़ाकर ‘केन्द्रीयकरण का सिद्धान्त’ (Principle of Concentration) का नाम दिया। इसके अनुसार एक विषय को केन्द्र बनाकर अन्य विषयों की शिक्षा प्रदान की जाती है। जिलर ने इतिहास को केन्द्रीय विषय बनाया। गांधीजी ने ‘क्राफ्ट’ को केन्द्रीय विषय बनाया, जॉन ड्यूवी ने ‘शिक्षालय तथा समाज के जीवन’ को केन्द्रबिन्दु बनाया। उसने अपने हम सिद्धान्त का नाम ‘Principle of Integration’ रखा । इस सह-संध्वन्ध के सिद्धान्त को और विस्तृत करके शिक्षाणास्त्रियों ने केन्द्रीय पाठ्यक्रम (Core-curriculum), ‘सायुज्जयन’ (Fusion) तथा ‘व्यापक क्षेत्रीय पाठ्यक्रम’ के सिद्धान्त बनाये ।

सह-सम्बन्ध का अर्थ तथा उसके प्रकार

समन्वय या सह-सम्बन्ध का अर्थ है- ‘सम्बन्ध स्थापित करना’ । शिक्षा में इसका आशय एक विषय का दूसरे विषय से सम्बन्ध स्पष्ट करना है, लेकिन यह एक दृष्टिकोण है जिससे हम यह जानते हैं कि ज्ञान एक समग्र के रूप में विकसित होता है और इसलिए न तो किसी भी विषय को पृथक्-पृथक् कणों के रूप में पढ़ाना सम्भव है और न उपयुक्त । इस समन्वय के तीन रूप हैं। वे इस प्रकार हैं:-

अ- शीर्षात्मक सह-सम्बन्ध (Vertical Correlation)

ब- अनुप्रस्थीय सह-सम्बन्ध (Horizontal Correlation)

स- जीवन से सह-सम्बन्ध (Correlation with Life )

(अ) शीर्षात्मक सह-सम्बन्ध – इसके अनुसार एक ही विषय के विभिन अंगों में सम्बन्ध स्थापित किया जाता है।

(ब) अनुप्रस्थीय सह-सम्बन्ध – इसके अनुसार विभिन्न विषयों का एक दूसरे से सम्बन्ध स्थापित किया जाता है। इस प्रकार का सह-सम्बन्ध दो ढंगों से स्थापित किया जा सकता है। वे ढंग इस प्रकार हैं:-

(i) आकस्मिक समन्वय (Incidental Correlation)

(ii) पूर्व-आयोजित समन्वय (Pre-planned Correlation)

उदाहरणार्थ- शिक्षक झांसी

(i) आकस्मिक समन्वय – इस प्रकार के समन्वय में पूर्व योजना की आवश्कता नहीं। शिक्षक अपनी विषय-सामग्री को स्पष्ट एवं बोधगम्य बनाने के लिएद विषय के प्रसंगों से सम्बन्ध स्थापित कर देता है; उदाहरणार्थ – शिक्षक झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के विषय में पढ़ाते समय यह भी बता सकते हैं कि उसकी वीरता के विषय में अमुक कवि ने इस प्रकार चित्रण किया है। उसकी कविता से हमें इस प्रकार के तथ्य प्राप्त होते हैं।

(ii) पूर्व आयोजित समन्वय– इस प्रकार के समन्वय में शिक्षक अपने पाठ केको दूसरे विषयों के प्रसंगों से सम्बन्ध स्थापित करने के लिए पूर्व ही व्यवस्था कर लेता है। वर्तमान शिक्षा संसार में समन्वय का प्रचलित प्रयोग इसी प्रकार के समन्वय के लिए किया जाता है।

(स) जीवन से सह-सम्बन्ध- इसमें जीवन की ठोस परिस्थितियों से सम्बन्ध स्थापित किया जाता है ।

इतिहास का अन्य शास्त्रों से समन्वय

(1) इतिहास तथा साहित्य – प्राचीनकाल में इतिहास साहित्य का ही एक अंग था। हजारों वर्षों के इतिहास की शिक्षा हमें साहित्य के ही रूप में प्राप्त होती है । अतः इतिहासकारों का एक वर्ग ऐसा है जो साहित्य के उस अग पर अत्यधिक बल देता है जिसमें ऐतिहासिक चरित्रों तथा घटनाओं का धारावाहिक वर्णन प्राप्त है। वे इतिहास को साहित्य के ही रूप में प्रदान करना चाहते हैं, परन्तु ऐसी स्थिति में इतिहास का अपना कोई अस्तित्व ही नहीं रहता। इस प्रकार इन दोनों में सहसम्बन्ध का कोई प्रश्न ही नहीं उठता, क्योंकि इतिहास पूर्ण रूप से साहित्य हो जाता है।

वैज्ञानिक प्रवृत्ति ने इतिहास को एक वैज्ञानिक विषय बनाया। इस दल के समर्थकों का कहना है कि इतिहास एक विज्ञान है । उसका साहित्य से कोई सम्बन्ध नहीं होना चाहिए। इस प्रकार इन दोनों में समन्वय स्थापित नहीं किया जा सकता। इन दोनों दलों के कट्टर विचारों के देखने के पश्चात् यह प्रश्न उठता है कि दोनों की वास्तविक स्थिति क्या होनी चाहिए ?

(i) ग्रिम (Grinm) का मत है, “ज्ञान की इन दोनों शाखाओं के पृथक्करण ने इनमें अप्राकृतिक खाई उत्पन्न कर दी है। इनका समन्वय ज्ञान के प्रति रुचि जाप्रत करने के लिए किया जाना आवश्यक है। “”

(ii) प्रो० घाटे (Ghate) का कहना है, “इतिहास के शिक्षक को साहित्य का उपयोग ऐतिहासिक वातावरण उत्पन्न करने तथा विभिन्न कालों की सामाजिक दशा का ज्ञान प्रदान करने के हेतु करना चाहिए। यदि इतिहास का सम्बन्ध साहित्य से स्थापित नहीं किया जायगा तो वह अत्यन्त सूक्ष्म और अवयक्तिक हो जायगा।”

इतिहास मानव के विचारों तथा कार्यों की विवेचना करता है और साहित्य भी मानव के विचारों, संवेगों, कल्पनाओं तथा भावनाओं का लेखा-जोखा है। अतः इन दोनों में समन्वय स्थापित करना आवश्यक है। हमारी भाषा के साहित्य में अनेक ऐतिहासिक उपन्यास, नाटक, कवितायें तथा कया कहानियाँ हैं जिनका संयत रूप में उपयोग किया जा सकता है; उदाहरणार्थ- यदि शिक्षक महाकाव्य काल, राणाप्रताप, ग्वालियर के राजा मानसिंह, शिवाजी आदि के विषय में पढ़ा रहा है तो वह रामायण महाभारत, साकेत, श्यामनारायन पाण्डेय द्वारा रचित पुस्तक, ‘हल्दीघाटी’ तथा भूषण द्वारा रचित कविताओं का उपयोग कर सकता है ।

(2) इतिहास तथा भूगोल- इतिहास तथा भूगोल में अध्यन्त घनिष्ठ सम्बन्ध है । दोनों विषय समाजशास्त्र के अंग हैं और दोनों का ये मानव समाज की गति का स्पष्टीकरण करना है; परन्तु इतिहास अतीत से सम्बन्धित है और भूगोल वर्तमान से । मानव जिस-जिस स्थल पर गया तथा जहाँ-जहाँ उसने जीवन बिताया, उन सबका वर्णन इतिहास है और उनके वर्तमान रहन-सहन का वर्णन भूगोल है। इतिहास तथा काल के आधार पर चलता है और स्थल का विस्तारपूर्वक अध्ययन भूगोल द्वारा प्रदान किया जाता है। इसमें कोई सन्देह नहीं है कि एक देश के निर्माण में भूगोल का महत्त्वपूर्ण हाथ है। लेकिन हमको यह भी नहीं भूलना चाहिए कि जिस प्रकार इतिहास में भौगोलिक तत्व है उसी प्रकार भूगोल में भी ऐतिहासिक तत्व होता है।

इतिहास के शिक्षक का यह परम कर्त्तव्य है कि वह इन दोनों तत्त्वों का समुचित रूप से ध्यान करके अपना शिक्षण कार्य करे; उदाहरणार्थ- इतिहास के शिक्षक को शिवाजी, जाति-व्यवस्था आदि के विषय में पढ़ाते समय भूगोल से समन्वय स्थापित करना चाहिए । वह यह बताए कि दूरी तथा धरातल की बनावट पृथक् हो जाने के कारण तथा एक ही स्थान के संकुचित वातावरण में बहुत समय तक रहने के कारण भारत में अनेक जातियाँ बन गई। शिवाजी की सफलता का एक प्रमुख कारण उसके प्रदेश की भौगोलिक परिस्थितियाँ थीं। इस कारण वह छापामार रणनीति को अपना सका और इस रणनीति के कारण वह मुगलों की विशाल सेना का मुकाबला कर सका। उसके पराक्रम ने शत्रु के छक्के छुड़ा दिये।

भौगोलिक परिस्थितियों ने ही भारत के इतिहास को दो भागों में बाँट दिया अर्थात् उत्तरी भारत का इतिहास तथा दक्षिणी भारत का इतिहास । इन दोनों भागों की पृथक्-पृथक् संस्कृति के निर्माण में भौगोलिक परिस्थितियों ने महत्त्वपूर्ण योग प्रदान किया। भारत में प्रचलित विभिन्न भाषाओं के निर्माण में भी भौगोलिक तत्त्व का हाथ है। अन्त में हम कह सकते हैं कि जब तक इन दोनों विषयों में समन्वय स्थापित नहीं किया जायेगा तब तक इन दोनों का अध्यापन सफल नहीं हो सकेगा।

(3) इतिहास तथा नागरिकशास्त्र – नागरिकशास्त्र वर्तमान काल की सामाजिक एवं राजनीतिक समस्याओं का विवेचन करता है; परन्तु इतिहास मानव सभ्यता का कोष है जिससे सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक सांस्कृतिक उत्पति का विश्लेषण प्राप्त होता है । इतिहास के द्वारा अतीत की सहायता से वर्तमान को स्पष्ट किया जाता है। इतिहास यह बतलाता है कि मानव जाति ने किस प्रकार वर्तमान सभ्यता को प्राप्त किया है। कुछ लोग इतिहास को अतीत की राजनीति कहते हैं। इन दोनों शास्त्रों में घनिष्ठ सम्बन्ध है। इतिहास का शिक्षक यदि भारतीय गणतन्त्रों के विषय में पढ़ रहा है तो वह आज के गणतन्त्र से उसकी तुलना करके उनकी समानताओं तथा मसमानताओं को स्पष्ट कर सकता है। इतिहास को पढ़ाते  समय विभिन्न कालों की शासन व्यवस्था का ज्ञान वर्तमान काल की शासन व्यवस्था की सहायता से स्पष्ट करे, क्योंकि वर्तमान बालकों के लिए स्थूल है।

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Pankaja Singh

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