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जनसंचार माध्यम | जनसंचार माध्यम के विविध प्रकार

जनसंचार माध्यम | जनसंचार माध्यम के विविध प्रकार

जनसंचार माध्यम

‘संचार शब्द ‘सं + चर्’ धातु के योग से बना है जिसका सीधा शब्दिक अ है-‘समान रूप से रखना या चलना’ अथवा ‘साथ-साथ चलना या रखना’। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि संचार में दो का होना आवश्यक है-एक श्रीता एवं दूसरा वक्ता का। आज जब हम ‘संचार’ का उपयोग करते हैं, तब हमारे सामने वैज्ञानिक तथा तकनीकी क्षेत्र का स्वरूप उभर आता है, जिसमें ‘कम्यूनिकेशन (Communication) शब्द का प्रयोग होता है। इसकी कम्यूनिकेशन के हिन्दी-पर्याय के रूप में संचार’ का प्रयोग हो रहा है। व्यक्ति अपने अनुभवों, विचारों, संदेशों, धारणाओं, सूचनाओं, विश्वासों, मतों, दृष्टिकोणों आदि को आज संचार माध्यमों के द्वारा बड़ी ही शीघ्रता से संप्रेषित कर पा रहा है, इसका प्रमुख कारण है- संचार माध्यमों में आयी क्रान्ति। कुछ वर्ष तक केवल प्रिण्ट मीडिया और श्रव्य-मीडिया ट्रांजिस्टर-रेडियो आदि ही इसके साधन थे, किन्तु आज संचार-साधनों में दूरदर्शन एवं मल्टीमीडिया के उपयोग ने सम्पूर्ण विश्व को जैसे समेट दिया है। (हिन्दी आज सम्पूर्ण भारत में बोली जाती है और कभी-कभी उस पर प्रांतीय भाषाओं का प्रभाव भी परिलक्षित होता है। यह तथ्य भी किसी से छिपा नहीं है कि हिन्दी आज विश्व की द्वितीय भाषा के रूप में स्थापित होने की दिशा में अग्रसर है।) भारतीय हिन्दी-भाषी जन-समुदाय के साथ हिन्दी भी विदेशों में जाकर अपना स्थान बना रही है। किन्तु संचार माध्यमों आदि में जो हिन्दी भाषा प्रयोग की जा रही है उसके स्वरूप को देखकर निश्चय ही शुद्ध हिन्दी प्रेमी समुदाय को चिन्ता एवं व्याकुलता घेर लेती है कि क्या इसी हिन्दी की प्रतिष्ठा विश्व में द्वितीय भाषा के रूप में होगी। क्या हम हिन्दी को ‘हिंगलिश (Hinglish) कहते है तो उसके इस रूप के कारण ही। वास्तव में यह प्रश्न अवश्य चिन्ता का विषय है कि क्या यही अच्छी हिन्दी है ? अथवा क्या यह हिन्दी है संचार माध्यमों में सबसे सशक्त माध्यम आज दूरदर्शन या टी.वी. है। इसमें प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों की हिन्दी एवं समाचार आदि की भाषा में हिन्दी का जो-रूप रहता है, वह अंग्रेजी, हिन्दी तथा कभी-कभी अरबी-फारसी के शब्दों के मेल से बनी खिचड़ी भाषा का होता है, यथा-

(1) असम में हुए Train accident में death toll five hundred का number cross कर चुका है। इसकी जिम्मेदारी accept करते हुए Railways minister ने अपना Resignation prime minister के पास भिजवा दिया है।

(समाचार का एक अंश)

(2) शुक्रवार रात साढ़े नौ बजे दिखये-मिशन फतेह

(धारावाहिक)

(3) नया डेन्ड्रफ फ्री आल क्लीयर क्लीनिक शैम्पू,क्या ट्राय किया (विज्ञापन)

मोटे तौर पर संचार माध्यमों को दो भागों में बाँटा जा सकता है-

1. परपरागम माध्यम

2. आधुनिक माध्यम

  1. परंपरागत माध्यम (Traditional Media)

वे माध्यम जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी विकसित होते आये हैं और समाज में जिनकी प्रासंगिकता आज भी किसी न किसी रूप में बनी हुई है। शुरुआती दौर में हमारे देश में संचार माध्यम यांत्रिक नहीं व्यक्तिपरक थे। यदि पौराणिक कथाओं में विश्वास करें तो नारद मुनि ही देवाओं ओर मनुष्यों के बीच संचार बनाये रखने के प्रमुख माध्यम थे। इसकी तरह अविश्सनीय लगने वाली आकाशवाणियों की चर्चा भी की जा सकती है। महाभारत में तो नेत्रहीन धृतराष्ट्र के सम्मुख आखों देखा हाल सुनने के लिए संजय की चर्चा आज भी की जाती है। वैदिक युग में विद्वानों के बीच होने-वाले शास्त्रार्थ और वाद-विवाद की संचार के प्रमुख साधन माने जाते थे।

भारत में मिलने वाले परंपरागत संचार माध्यमों को प्रो० हरिमोहन ने अपनी पुस्तक ‘सूचना प्रौद्योगिकी और जन माध्यम’ में इस प्रकार व्यक्त किया है-

(1) वार्ता (2) कथा (3) मेले (4) उत्सव तथा पर्व (5) लोकगीत (6) लोकनाट्य (रासलीला, रामलीला, कठपुतली, तमाशा, नौटंकी आदि) (7) शिलालेख (8) लोककलाएं (ब्रज की सांझी, बिहार की मधुबनी, काँगड़ा शैली, अल्पनाएँ इत्यादि)

  1. आधुनिक माध्यम (Modern Media)

आधुनिक संचार माध्यमों का संबंध हमारी वैज्ञानिक एवं तकनीकी प्रगति से जुड़ा हुआ है। भाषा और लिपि के विकास के क्रम में मनुष्य की सबसे बड़ी खोज मुद्रण तकनीक है। छपे हुए अक्षरों से जिस आधुनिक संचार की शुरुआत हुए थी, अब उसने ध्वनि तथा दृश्य का रूप ले लिया है। आधुनिक संचार माध्यमों का ही कमाल है कि हम घर बैठे दुनिया भर की गतिविधियों से पलक झपकते वाकिफ हो जाते हैं। दुनिया के किसी कोने में अपनी भावनाओं, सूचनाओं या जानकारियों को पल भर में भेज सकते हैं और मनोनुकूल सूचनाएं या जानकारियाँ प्राप्त कर सकते हैं। मुद्रण से लेकर आज तक संचार माध्यमों के क्षेत्र में जो प्रगति हुई है, उसे निम्न प्रकार से व्यक्त कर सकते हैं-

  1. शब्द संचार माध्यम या मुद्रण माध्यम
  2. श्रव्य संचार माध्यम
  3. श्रव्य एवं दृश्य संचार माध्यम

1. शब्द संचार माध्यम या मुद्रण माध्यम (Print Media)

राब्द संचार माध्यम या मुद्रण माध्यम एक प्रकार से आधुनिक संचार माध्यमों की शुरुआत थी। इसके अन्तर्गत समाचार पत्र, पत्रिकाएँ, पुस्तकें, जर्नल, पंफलेट, हैंडबिल और पोस्टर आदि की गणना की जाती है। पुस्तकों, पंफलेटों, हैंडबिलों तथा पोस्टरों को छोड़ भी दें तो मुद्रित जन माध्यमों में प्रेस ने या कहें कि समाचार पत्र और पत्रिकाओं ने हमारे समाज को जागरूक बनाने में अहम भूमिका निभाई।

  1. श्रव्य संचार माध्यम (Audio Media)

श्रव्य संचार माध्यम वे हैं जिनके माध्यम से हम सूचना को सुनकर ग्रहण करते हैं। रेडियो तथा ऑडियो कैसेट इसी तरह के माध्यम हैं। इसके अलावा टेलीफोन, कार्डलेस, मोबाइल तथा सेल्युलर फोन को भी इस श्रेणी में रख सकते हैं लेकिन इनका प्रयोग जब व्यक्तिगत कारणों से होता है, तब इन्हें सीमित संचार के साधन के तौर पर ही देखा जाता है, लेकिन ज्यों ही इनका उपयोग कोई पत्रकार रिपोटिंग के लिए करता है, तब निश्चय ही ये जन माध्यम की कोटि में आ जाते हैं। यही बात आडियो कैसेट के लिए भी लागू होती है। प्राय आडियो कैसेट का इस्तेमाल व्यक्तिगत रूप से होता है, लेकिन कभी-कभी जनहित में भी होता है। जैसे, यदि महात्मा गाँधी या पं0 जवाहर लाल नेहरू का कोई भाषण टेपबद्ध किया गया है

रेडियो-लेकिन श्रव्य संचार माध्यमों में जन माध्यम के रूप में रेडियो की जितनी प्रतिष्ठ है, उतनी अन्य माध्यमों की नहीं। इसका मूल कारण शायद यह है कि यह माध्यम सर्वसुलभ है, दूसरे इसमें व्यय भी कम होता है। गरीब से गरीब व्यक्ति भी रेडियो रख सकता है। टेलीविजन के बढ़ते प्रभाव के बावजूद रेडियो सर्वधारणा की चीज है। जो कुछ समाचार पत्रों में छपता है या टीवी पर दिखाया जाता है, वह सब कुछ रेडियो अकेले ही प्रसारित करने में सक्षम है। यह बात सच है कि रेडियो के कार्यक्रमों का लेखन एवं प्रसारण एक जटिल प्रक्रिया है। यहाँ भाषा की ध्वनि अथवा ‘श्रव्यता’ के गुणों को उभारना पड़ता है, क्योंकि समाचार पत्रों की तरह यहाँ न तो छपे हुए शब्द सामने होते और न टेलीविजन की तरह दृश्य ही।

आजादी के बाद से आकाशवाणी/आल इंडिया रेडिया का व्यापक प्रसार हुआ है। 1947 में जहाँ पूरे देश में केवल 6 प्रसारण केन्द्र, एक दर्जन ट्रांसमीटर और दो-ढाई लाख रेडियो-सेट थे, वहीं अब 100 से अधिक रेडियो स्टेशन हैं, और लगभग 3 करोड़ या इससे भी अधिक रेडियो सेट हैं। 1957 में ‘विविध भारती’ व 1966 में ‘उर्दू सर्विस शुरू होने के बाद से आकाशवाणी बेहद लोकप्रिय हो गयी है। अब ‘एफ0 एम0 बैंड के प्रसारणों के बाद से तो युवा वर्ग में भी रेडियों की लोकप्रियता और बढ़ गयी है। समाचार-विचार के अलावा साहित्य, संस्कृति, ज्ञान-विज्ञान और मनोरंजन के तरह-तरह के कार्यक्रमों को जन-जन तक पहुंचाने में आकाशवाणी ने अहम भूमिका निभाई है। लेकिन आज भी कुछ मामलों में ‘बीबीसी’ जैसी विश्वसनीयता और क्षिप्रता की उम्मीद आकाशवाणी से बनी हुई है। टेलीविजन की चुनौतियों का सामना करते हुए, आकाशवाणी उसके कार्यक्रमों से बेहतर प्रसारण कैसे करेगी और कितनी सफल होगी, ऐसे कितने ही सवाल उसके सामने हैं जिनका हल आकाशवाणी को खोजना है।

  1. श्रव्य एवं दृश्य संचार माध्यम (Audio Visual Media)

श्रव्य एवं दृश्य संचार माध्यमों के अन्तर्गत फिल्म, टेलीविजन तथा वीडियो कैसेट्स की गणना की जाती है। वीसीआर व वीसीपी भी इसी श्रेणी में आते हैं। नयी सदी के उत्तरार्द्ध में दृश्य एवं श्रव्य संचार माध्यमों ने अभूतपूर्व उन्नति की है। उपग्रह प्रणाली के चलते कितने ही नवीन साधनों की ईजाद हुई है जिनमें कम्प्यूटर प्रणाली, इंटरनेट, सी0 डी0, वी0 डी0 ओ0 टैक्स्ट, वीडियो फोन, टेली कांफ्रेंस, हाइब्रिड मेल सर्विस की गणना की जा सकती है।

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Pankaja Singh

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