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प्रौद्योगिकी क्षेत्रों में अनुवाद | प्रौद्योगिकी क्षेत्रों में अनुवाद के विषय पर एक निबन

प्रौद्योगिकी क्षेत्रों में अनुवाद | प्रौद्योगिकी क्षेत्रों में अनुवाद के विषय पर एक निबन

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प्रौद्योगिकी क्षेत्रों में अनुवाद

आज के वर्तमान युग में प्रौद्योगिकी एवं विज्ञान के क्षेत्र में जो उन्नति एवं अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग प्राप्त हो रहा है वह इस क्षेत्र में अनुवाद की भूमिका को प्रकट कर रहा है। अनुवाद सहयोग के समान प्रतिद्वंद्विता की प्रेरणा भी देता है। कोई भी देश आज भारत हो या अमेरिका विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के मोह से अछूता नहीं है, इसके अभाव में उस देश की उन्नति अर्थात् आर्थिक विकास अवरुद्ध हो जायेगा।

गत सौ वर्षों में अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में इंग्लैण्ड और अमरीका के सितारे बुलन्द थे। उनकी भाषा अंग्रेजी विज्ञान एवं टैकनालाजी के माध्यम से बड़ी सशक्त हो सकी। उप-निवेशवाद ने भारत, बर्मा जैसे देशों में अंग्रेजी का रोब जमा दिया।

वस्तुतः विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विकास में सारे देशों का योग रहा है। इसके प्रारम्भिक विकास पूर्व में हुआ था। अरबों ने इसे यूरोप पहुंचाया। यूरोप में तेरहवीं सदी से ही शिक्षा-प्रसार का गंभीर प्रयास चला था। उसी सदी में पेरिस, आक्सफोर्ड, पादुबा, नेपिल्स आदि के विश्वविद्यालयों का श्रीगणेश किया गया। पन्द्रहवीं सदी से यूरपीय वैज्ञानिकों की उज्जवल परम्परा जारी हुई।

चीन ने कागज-निर्माण, मुद्रण और बारूद-निर्माण की टैकनालाजी संसार को दी थी। आतिशबाजी उसी देश की देन मानी जाती है। अरबों ने वैज्ञानिक आविष्कारों में अत्यधिक क्षमता पाई। कहते है, जब कोई अरब राजा दूसरे देश पर विजय पाता तब संधि की पहली शर्त यह होती कि हारे हुए देश के सारे वैज्ञानिक ग्रंथों को विजेता की सेवा में प्रस्तुत करना चाहिए। नौवीं शती में अरब के जबीर इबन हय्यां ने अल्केमी का आविष्कार किया था। गणित, खगोल विज्ञान, आयुर्विज्ञान एवं भौतिकी में अरबों का योगदान महत्त्वपूर्ण था।

यूरोप के विज्ञान और प्रौद्योगिकी का विकास विभिन्न देशों का योगदान है। इटाली, फ्रांस, जर्मनी, पोलैण्ड आदि देशों में विभिन्न युगों में महान आविष्कारक हुए। इन देशों के वैज्ञानिकों ने अपने ग्रंथों में तकनीकी भाषा के लिए ग्रीक एवं लैटिन शब्द ही बुनियादी तौर पर स्वीकार किए थे। आधुनिक आयुर्विज्ञान धारा ‘एलोपैथी’ की शब्द-व्युत्पत्ति ग्रीक के अलोस (अन्य) एवं पायोस (पीड़ा) के संयोग से मानी गई है। ‘मेडिकल संकेतित शब्दों में अधिकांश ग्रीक से व्युत्पन्न हैं। लैटिन से भी अनेक शब्द व्युत्पन्न हैं। अरबी से औषधि-विज्ञान के बहुत से शब्द लिए गए हैं। फ्रेंच से सीधे या परिवर्तित रूप में शब्द ग्रहण किए गए हैं। इटाली, डच, फारसी और चीनी के भी शब्द शब्दों में प्राप्त होते हैं।

यह निष्कर्ष इस बात को प्रमाणित करता है कि अंग्रेजी की तकनीकी शब्दावली शुद्ध अंग्रेजी शब्दावली नहीं है। अनेक भाषाओं के शब्द मूल रूप में या परिवर्तित रूप में उनमें शामिल हुए हैं।

अनुवाद में मुख्य समस्या वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली के अनुवाद की हैं। इसमें क्रियारूप एवं छोटे-छोटे पदबंध भी शामिल हैं। अनुवाद के विषय में आम लोगों के पक्षधर यही बात दुहराते हैं कि सरल से सरल शब्द स्वीकार कीजिए। वे वैज्ञानिक शब्दों की बारीकियों पर सोचने का कष्ट नहीं उठाते।

वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दों का अनुवाद करते समय हमें सबसे पहले यह देखना है कि मूल ग्रंथ में जिस संज्ञा या संकल्पना का परिचय दिया जा रहा है वह हमारे देश या राज्य के लिए पूर्वपरिचित है कि नहीं। भारत में गणित, खगोल विज्ञान, आयुर्विज्ञान, कूटनीति आदि विषय  काफी प्रौढ़ दशा में रहे थे। अतः उनकी संकेतित शब्दावली और संकल्पनाएं हमें संस्कृत ग्रंथों में मिलती है। जहाँ वे सुलभ हैं वहाँ उन्हें स्वीकार करने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। योरप की आधुनिक भाषाओं ने लैटिन व ग्रीक से बड़ी संख्या में तकनीकी शब्दावली ग्रहण की है। जैसे यूरोप के देशों के लिए लैटिन व ग्रीक मूल भाषाएँ रही हैं वैसे ही आधुनिक भारतीय भाषाओं के लिए संस्कृत मूल भाषा रही है। इस वजह से संस्कृत सारी भारतीय भाषाओं को तकनीकि शब्दावली दे सकती है।

विदेशी वैज्ञानिक व तकनीकी शब्दों के हिन्दी अनुवाद के प्रसंग पर संस्कृत से बचकर व्यावहारिक शब्दों का व्यवहार करने का सुझाव भी नयी नहीं है। इसका प्रयोग भी वहाँ किया गया था। वह प्रयोग हैदराबाद की कार्यशाला नाम से प्रसिद्ध है। स्वतंत्रतापूर्व आयोजित प्रस्तुत कार्यशाला में हजारों शब्द लोकप्रियता की दृष्टि ो गढ़े गए। अफसोस है कि उस्मानिया विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के माध्यम बनने के बाद वह पूरी उर्दू शब्दावली नष्ट-भ्रष्ट हो गई। सुबोधता व लोकप्रियता दोनों गुण उसमें थे। उसमें कई त्रुटियाँ भी थीं। उसके आयोजकों में इस्लामी साम्प्रदायिकता की भावना थी। वे हिन्दी व संस्कृत से जानबूझकर बचते थे। वह प्रवृत्ति शब्द के लिए अनिवार्य नियतार्थता और परस्पर अपवर्जन के तत्व नहीं रहते थे। फिर भी अर्द्धतकनीकी शब्दों एवं तकनीकी शब्दों के रूप में उनका उपयोग अब हो सकता है।

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Pankaja Singh

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