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ग्रामीण बेरोजगारी का अर्थ | ग्रामीण बेरोजगारी का स्वरूप | ग्रामीण बेरोजगारी के कारण | ग्रामीण बेरोजगारी दूर करने के सरकारी प्रयास | ग्रामीण बेरोजगारी दूर करने सम्बन्धी उपाय

ग्रामीण बेरोजगारी का अर्थ | ग्रामीण बेरोजगारी का स्वरूप | ग्रामीण बेरोजगारी के कारण | ग्रामीण बेरोजगारी दूर करने के सरकारी प्रयास | ग्रामीण बेरोजगारी दूर करने सम्बन्धी उपाय | Meaning of Rural Unemployment in Hindi | Nature of Rural Unemployment in Hindi | Due to rural unemployment in Hindi | Government efforts to remove rural unemployment in Hindi | Measures to remove rural unemployment in Hindi

ग्रामीण बेरोजगारी का अर्थ

भारत की लगभग 68 प्रतिशत जनसंख्या गाँवों में निवास करती है, इसका प्रमुख व्यवसाय कृषि करना है। लेकिन इस जनसंख्या को गाँवों में पूरे समय काम नहीं मिल पाता है। अतः गाँवों में जो बेरोजगारी पायी जाती है, उसे ग्रामीण बेरोजगारी कहते हैं। इस प्रकार जब ग्रामीणों को उनकी क्षमतानुसार चाहते हुए भी वर्ष भर कार्य नहीं मिलता है तो इसे ग्रामीण बेरोजगारी की स्थिति कहते हैं।

ग्रामीण बेरोजगारी का स्वरूप

भारत में गाम्रीण बेरोजगारी निम्न प्रकार की पायी जाती है-

(1) मौसमी बेरोजगारी- भारत में किसनों द्वारा सामान्यतया वर्ष में दो फसलें ली जाती हैं। ऐसी स्थिति में उनके लिए 8 माह ही काम रहता है और 4 माह उनके लिए कोई काम नहीं रहता है।

(2) अदृश्य बेरोजगारी- अदृश्य या छुपी हुई बेरोजगारी भी गाँवों में विशेष रूप से विद्यमान है। अधिकांश कृषकों की कृषि जोतें बहुत छोटी हैं, किन्तु कृषि कार्य में उनका पूरा  परिवार लगा रहता है, जबकि वास्तव में इतने श्रम की आवश्यकता नहीं होती है। यह एक तरह से अदृश्य बेरोजगारी है।

ग्रामीण बेरोजगारी के कारण

भारत में ग्रामीण क्षेत्र में बेरोजगारी के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं-

(1) ग्रामीण जनसंख्या में वृद्धि- ग्रामीण जनसंख्या में वृद्धि की दर ज्यादा तीव्र रही है। अशिक्षा एवं अन्धविश्वासों के कारण ग्रामीण अपने परिवारों को सीमित नहीं रख पाते हैं। ऐसी स्थिति में गाँवों में बेरोजगारी बढ़ना स्वाभाविक है।

(2) भूमि के प्रति प्रेम-अधिकांश कृषक अलाभकारी खेती होने पर भी उसे नहीं छोड़ते, क्योंकि उन्हें अपनी भूमि से लगाव व प्रेम होता है।

(3) कृषि पर जनसंख्या का भार बढ़ना- भारत में कृषि पर जनसंख्या का भार 70 प्रतिशत है। जब कृषि पर इतनी जनसंख्या आश्रित हो, तो अल्प बेरोजगारी एवं अदृश्य बेरोजगारी का पाया जाना स्वाभाविक है।

(4) मानसून पर निर्भर कृषि-भारतीय कृषि मानसून का जुआ कहलाती है। जिस वर्ष अतिवृष्टि या अनावृष्टि हो जाती है, उस वर्ष कृषि कार्यों में कमी हो जाती है और आकस्मिक बेरोजगारी उत्पन्न हो जाती है।

(5) मौसमी कृषि- भारत में किसानों के लिए वर्ष भर कृषि कार्य नहीं रहता है। वर्ष में केवल दो फसलें ली जाती हैं। ऐसी स्थिति में किसान 4 से 6 महीने के लिए बेकार रहता है।

(6) सहायक कार्यों का अभाव- बड़े उद्योगों के विकास के कारण ग्रामीण उद्योगों का पतन-सा हो गया है। पहले ग्रामीण लोग गुड़ बनाना, चटाई बुनना, टोकरी बनाना, आदि कार्यों में लगे रहते थे, इससे उनके फालतू समय का उपयोग हो जाता था। औद्योगीकरण के कारण दस्तकारी, बुनाई, जूते बनाना, आदि कार्य कारखाने करने लगे हैं। इससे गाँवों के लाखों चर्मकार, जुलाहे, आदि बेकार हो गये हैं।

(7) पूँजी का अभाव- हमारे देश में किसानों की दशा काफी चिन्ताजनक है। आय कम होने के कारण किसान बचत नहीं कर पाते हैं, परिणामस्वरूप उनके पास पूँजी का अभाव रहता है। पूँजी की कमी से किसानों के पास कृषि से सम्बन्धित साधनों की कमी बनी रहती है, साथ ही किसानों को वैकल्पिक कार्य भी नहीं मिल पाता है।

(8) व्यापक निरक्षरता- हमारे देश में ग्रामीण क्षेत्रों में निरक्षरता आज भी व्यापक स्तर पर विद्यमान है। निरक्षरता के कारण लोग उचित प्रशिक्षण प्राप्त नहीं कर पाते हैं। निरक्षरता के कारण लोग कृषि के सहायक उद्योग-धन्धों को चलाने में खुद को असमर्थ पाते हैं।

(9) सामाजिक स्थिति- हमारे देश में भारतीय ग्रामीण समाज अत्यधिक जकड़ा हुआ है। इसके कारण यह वैज्ञानिक तौर तरीकों को नहीं अपना पाता है, जिसके कारण उसका आर्थिक विकास नहीं हो पाता है। सामाजिक स्थिति नये रोजगार के अवसर विकसित कराने में काफी असमर्थ रहती है। इसके विपरीत सोच आदि आधुनिक हो तथा कुरीतियों को तोड़ने वाली हो तो रोजगार के अवसर भी निकलने लगते हैं।

(10) जमींदारी प्रथा का अन्त- जमींदारी प्रथा के अन्त के कारण गाँवों में हजारों व्यक्ति बेकार हो गये हैं। पहले ये लोग जमींदारों की विभिन्न सेवाओं में लगे रहते थे।

(11) कृषि का यन्त्रीकरण-कृषि के यन्त्रीकरण के कारण कृषि में मानव श्रम की महत्ता कम हो गई है। बुवाई, सिंचाई के आधुनिक साधनों ने कई ग्रामीणों को बेरोजगार कर दिया है।

(12) ग्रामीणों में गतिशीलता का अभाव- ग्रामीणों में गतिशीलता का अभाव है। गाँवों में काम मिले या ना मिले, वे गाँव नहीं छोड़ना चाहते हैं। दूर जाना तो दूर, पास वाले गाँव में भी कार्य करने नहीं जाते हैं।

ग्रामीण बेरोजगारी दूर करने के सरकारी प्रयास

स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी दूर करने एवं रोजगार उपलब्ध कराने हेतु अनेक योजनाएँ चलायी गयी हैं। प्रारम्भ में इन योजनाओं और कार्यक्रमों की संख्या काफी कम रही है। जिनमें उत्तरोत्तर वृद्धि की जाती रही। पिछले सात-आठ वर्षों में सरकार द्वारा विभिन्न अवसरों पर नई-नई योजनाओं की घोषणा करके उनकी संख्या में काफी वृद्धि की गयी। कुछ- पुरानी योजनाओं के स्थान पर नई-नई योजनाओं की भरमार-सी हो गयी।

वर्ष 1999-2000 में सरकार द्वारा योजनाओं की संख्या में कमी लाने के उद्देश्य से ग्रामीण विकास की 6 प्रमुख योजनाओं I.R.D.P. TRYSEM, DWCRA, SITRA गंगा कल्याण योजना एवं दस लाख कुआँ योजना (MWS) के स्थान पर स्वर्ण जयन्ती ग्राम स्वरोजगार योजना (SGSY) नाम की एकल योजना की 1 अप्रैल, 1999 को घोषणा की गयी। लेकिन उसके बाद अन्नपूर्णा योजना (1999), शिक्षा मित्र योजना (1999), स्वर्ण जयन्ती ग्रामीण आवास वित्त योजना (2000) प्रधानमन्त्री ग्रामोदय योजना (2000), प्रधानमन्त्री ग्राम सड़क योजना (2000) जैसी अनेक योजनाओं की घोषणा एवं संचालन किया गया। इन योजनाओं के अतिरिक्त रोजगार सृजन की दृष्टि से जवाहर ग्राम समृद्धि योजना (1999), सुनिश्चित रोजगार योजना (1993) प्रधानमन्त्री की रोजगार योजना (1993), स्वर्ण जयन्ती शहरी रोजगार योजना (1997), कुटीर ज्योति कार्यक्रम (1988) ग्रामीण स्वच्छता कार्यक्रम (1990), ग्रामीण सम्पूर्ण योजना (1996), आदि को लागू किया गया।

ग्रामीण बेरोजगारी दूर करने सम्बन्धी उपाय

ग्रामीण बेरोजगारी दूर करने के लिए उपाय निम्नलिखित हैं-

(1) कृषि में संस्थागत पविर्तन- कृषिगत विकास करके रोजगार के अवसरों में वृद्धि की जा सकती है, किन्तु कृषिगत विकास के लिए संस्थागत व तकनीकी परिवर्तन एक साथ किया जाना चाहिए।

(2) ग्रामीण पंचायतों का दायित्व- ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय रोजगार का दायित्व ग्राम पंचायतों पर छोड़ दिया जाना चाहिए। ग्रामीण योजनाओं के प्रबन्धकर्ताओं को विकास का दायित्व सौंप दिया जाये।

(3) गाँव में रोजगारोन्मुख परिवर्तन- ग्रामीण क्षेत्रों में अध्यापकों, इन्जीनियरों, ओवरसियरों, डाकियों, डाक्टरों, मोटर चालकों तथा मिस्त्रियों, आदि अन्य व्यक्तियों के लिए रोजगा की काफी सम्भावनाएँ हैं। ग्रामीण विद्युतीकरण से गाँवों में आधुनिक जीवन की सभी सुविधाओं को उपलब्ध कराके अधिक से अधिक लोगों को रोजगार प्रदान किया जा सकता है।

(4) बहुफसली कृषि को प्रोत्साहन- हमारे देश में बहुफसली कृषि को प्रोत्साहन दिया जाये ताकि श्रमिकों को पूर्ण रोजगार मिल सके। बहुफसली कार्यक्रम के लिये यह अत्यन्त आवश्यक है कि उन्नत बीज, साख, सिंचाई, आदि की व्यवस्था की जाये।

(5) भूमि सुधार कार्यक्रमों का क्रियान्वयन- रोजगारों में वृद्धि के लिए भारत में भूमि सुधार कार्यक्रमों का क्रियान्वयन शीघ्रता से किया जाये। जिन लोगों को भूमि आवंटित की गयी है उनको तथा छोटे किसानों को कृषि से सम्बन्धित आवश्यक साधन उपलब्ध कराये जायें।

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Pankaja Singh

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