अर्थशास्त्र

राष्ट्रीय पर्यावरण नीति 2006 | राष्ट्रीय पर्यावरण नीति के प्रमुख उद्देश्य | भारत की राष्ट्रीय पर्यावरण नीति की एक रूपरेखा

राष्ट्रीय पर्यावरण नीति 2006 | राष्ट्रीय पर्यावरण नीति के प्रमुख उद्देश्य | भारत की राष्ट्रीय पर्यावरण नीति की एक रूपरेखा | National Environment Policy 2006 in Hindi | Major Objectives of National Environment Policy in Hindi | An Outline of India’s National Environment Policy in Hindi

राष्ट्रीय पर्यावरण नीति 2006

(National environment policy 2006)

2006 राष्ट्रीय पर्यावरण नीति, 2006 में प्रमुख उद्देश्य निम्नवत हैं-

  1. संकटग्रस्त पारिस्थैति की प्रणाली और संसाधनों और अमूल्य प्राकृतिक एवं मानव निर्मित स्मारक (heritage) जो जीवन सम्बल (life-support), जीविकोपार्जन, आर्थिक विकास और मानव कल्याण की विस्तृत अवधारणा हेतु आवश्यक हैं, उनका संरक्षण एवं परिरक्षण करना।
  2. सामान्य तौर पर समाज के सभी वर्गों हेतु पर्यावरणीय संसाधनों एवं गुणवत्ता तक पहुँच सुनिश्चित करना और विशेष तौर पर गरीब समुदायों को, जो अपने जीविकोपार्जन हेतु पर्यावरणीय संसाधनों पर पूर्णत अवलम्बित हैं, सुनिश्चित करना कि ऐसे संसाधनों तक उनकी पहुँच सुनिश्चित हैं।
  3. वर्तमान एवं भावी पीढ़ियों की आवश्यकताओं तथा महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने हेतु पर्यावरणीय संसाधनों का न्याय संगत (judicious use) प्रयोग सनिश्चित करना
  4. पर्यावरणीय सहभागिता को नीतियों योजनाओं, कार्यक्रमों एवं प्रोजेक्टों और आर्थिक तथा सामाजिक विकास की योजनाओं को समन्वित करना
  5. आर्थिक उत्पाद (output) की प्रति इकाई प्रयोग में पर्यावरणीय संसाधनों के प्रभावकारी प्रयोग में कमी लाना तथा पर्यावरणीय प्रभाव के कुप्रभावों को न्यून करना,
  6. पर्यावरणीय संसाधनों की प्रबन्धन एवं विनियन के प्रयोग में अच्छा प्रशासन- पारदर्शिता, युक्तियुक्तता, उत्तरदायित्व, समय लागत में कमी, भागीदारी तथा विनियमनकारी स्वतन्त्रता के सिद्धांतों को लागू करना
  7. वित्त, प्रौद्योगिकी, प्रबन्धन कौशल सहित पारम्परिक ज्ञान और स्थानीय समुदायों लोक एजेन्सियों, अकादमिक एवं शोध समुदाय निवेशकों और बहुपक्षीय एवं द्विपक्षीय विकास साझेदारों के बीच वित्त, प्रौद्योगिकी, प्रबन्धन कौशल, पारम्पारिक ज्ञान पर आधारित उच्चतर संशोधनों की वृद्धि सुनिश्चित करना।

राष्ट्रीय पर्यावरण नीति, 2006 इस मान्यता पर विकसित की गयी हैं कि ऐसा विकास  पोषणीय हैं। जो पारिस्थैतिकीय विविशता (ecological constraints) और न्याय के तकाजा पर आधारित हैं। राष्ट्रीय नीति का उद्देश्य पूरा करना सरकार और लोगों द्वारा निम्न सिद्धान्त अपनाये जाने पर आधारित होगा।-

क. लोगों की प्रकृति संगत स्वस्थ एवं उत्पादक हकदारी

ख. वर्तमान एवं भावी पीढ़ियों के विकास एवं पर्यावरणीय आवश्यकताओं के ढाँचे में लोगों का विकास का अधिकार

ग. विकास प्रक्रिया के अभिन्न अंग के तौर पर पर्यावरण संरक्षण

घ. पर्यावरण संसाधनों को अपक्षय (damage) से रोकना, और

पर्यावरण संरक्षण में आर्थिक कुंशलता को यथार्थ रूप देना।

भारत में पंचवर्षीय योजनाओं तथा अन्य माध्यमों से पर्यावरण नीति अपनायी गयी हैं।

मुख्य रूप से इन नीतियों को तीन भागों में विभक्त किया जा सकता हैं- (i) संविधानोत्तर प्रथम दो दशकों की पर्यावरण नीति, (ii) मानव पर्यावरण सम्मेलन के बाद के दशक दो दशकों की नीति और (iii) 1990 के दशक की पर्यावरणीय नीति।

(i) प्रथम दो दशक अर्थात् प्रथम से तृतीय पंचवर्षीय योजनान्तर्गत अपनायी गयी पर्यावरण नीति

मूलसिद्धांत निम्न हैं-

मूल कार्यों के आधार पर वनों का वर्गीकरण।

वनों पर बुरा प्रभाव रोकने हेतु अनियंत्रित और अत्यधिक चराई का विनियमितीकरण । 

भूमि के सर्वाधिक उत्पाद एवं कम ह्रास हेतु संतुलित एवं सम्पूरक व्यवस्था का मूल्यांकन।

वनों से जोत योग्य भूमि के विस्तार को हतोत्साहित करना।

राष्ट्रीय वन नीति के चार मुख्य उद्देश्य बताये गये-

(1) सम्पूर्ण भौगोलिक क्षेत्र के एक-तिहाई भाग को वनाच्छादित करना जिसमें 60% पहाड़ी क्षेत्रों में और 20% समलत क्षेत्रों में हों।

(2) वनो का संरक्षण वन’, राष्ट्रीय वन और ग्राम्य वनों के रूप में वर्गीकरण

(3) सर्वोच्च प्राथमिकता पर राष्ट्रीय हितों का संरक्षण, और

(4) कृषि के बेतहाशा विस्तार का नियंत्रण

प्रथम पंचवर्षीय योजना का 0.49% अर्थात् 9.7 करोड़ वृक्षारोपण हेतु निर्धारित किया गया था। इस योजना में वनों की कटान को कम किया गया। इसके अतिरिक्त 52,000 हेक्टेयर भूमि पर वन लगाये गये।

द्वितीय पंचवर्षीय योजना में 1,64,000 हेक्टेयर क्षेत्र में वन लगाये गये। वन संसाधनों का प्रयोग कर विकास योजनाएँ और नदी घाटी परियोजनाएँ चलायी गयीं। वन्य जीवों के संरक्षण का प्रयास किया गया और वनों पर 19.3 करोड़ रुपये की राशि आवंटित की गयी।

(ii) 1970 के दशक एवं 1988 तक की पर्यावरण नीति

इस अवधि में मानव पर्यावरण सम्मेलन 1972 की छाप स्पष्टत दृष्टिगोचर होती हैं। चतुर्थ पंचवर्षीय योजना में पहले-पहल पर्यावरण को दीर्घ कालिक परिवेश में मूल्यांकित किया गया। पर्यावरण का प्रति ध्यान आकर्षित किया गया कि “यह प्रत्येक पीढ़ी का दायित्व हैं कि वह भूमि, वायु, जल और अन्य जीवन की उत्पाद क्षमता इस तरह संरक्षित रखे कि भावी लोगों द्वारा स्वस्थ पर्यावरण निर्माण में विकल्प मिल सके। भौतिक पर्यावरण प्रगतिशील, संश्लिष्ट एवं अन्तर्सम्बन्धित हैं जिसमें एक भाग में की गयी कार्यवाही दूसरे भाग को प्रभावित करती हैं। जीवित प्राणियों और भूमि, वायु एवं जल में भी अन्तर्सम्बन्ध हैं। सामंजस्यपूर्ण विकास की योजना प्रकृति एवं मानव की इस एकात्मकता को पहचानती हैं। ऐसी योजना केवल पर्यावरण मुद्दों, विशेषतः आर्थिक और पारिस्थितिक के व्यापक मूल्यांकन के आधार पर ही सम्भव हैं।

इस उद्देश्यों का पंचम पंचवर्षीय योजना में ठोस रूप प्रदान किया गया। न्यूनतम आवश्यकता कार्यक्रम जैसे, प्राथमिक शिक्षा, देहाती स्वास्थ्य और आरोग्य, पोषण, पेयजल, गृहनिर्माण स्थल, मलिन बस्ती सुधार और देहाती शिक्षा की वरीयता पर लागू कर जीवन की गुणवत्ता बढ़ाने का प्रयास किया गया। इनके माध्यम से पर्यावरण प्रदूषण और गरीबी स्तर कम करने का प्रयास किया गया।

1970 के दशक में पर्यावरण के क्षेत्र में प्रमुख घटना स्टाकहोम सम्मेलन 1972 द्वारा मानक पर्यावरण पर लिये गये निर्णय हैं। भारत की प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी ने गरीबी उन्मूलन के माध्यम से पर्यावरण विकास की पुरजोर दलील दी थी। भारत में 1970 के दशक की नीतियाँ स्टाकहोग कान्फ्रेन्स के निर्णयों से पूर्णत दलील हैं। सन् 1976 से संविधान में अनु 48-A और अन. 51-A संविधान 42वें संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा जोड़े गये। इसके साथ ही वन्य जीवन (संरक्षण) अधिनियम, 1972, जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिमियम, 1974 और जल (प्रदूषण नियंत्रण) उपकर अधिनियम, 1977 पारित किये गये।

षष्ठ पंचवर्षीय योजना के दौरान सामाजिक-आर्थिक विकास हेतु पारिस्थितिकी संतुलन पर बल दिया गया। राष्ट्रीय विकास परिषद् के शब्दों में योजना का उद्देश्य पारिस्थितिकीय एवं पर्यावरणीय मूल्यों के संरक्षण को बढ़ावा देकर अल्पकालिक एवं दीर्घकालिक विकास के बीच संतुलन कायम करना हैं। पष्ठ पंचवर्षीय योजना में पर्यावरण एवं विकास पर पूरा एक खण्ड रखा गया हैं। ठोस पर्यावरणीय एवं पारिस्थितिकीय विद्वानों के विकास हेतु पर्यावरण ह्रास की समस्या का भूमि प्रयोग कृषि, वन, वन्य जीवन, जल, वायु, सामुद्रिक पर्यावरण खनिज मत्स्य, नवीनकरणीय, संसाधनों, ऊर्जा, मानव आवास आदि के सन्दर्भ में विचार करना अपेक्षित माना गया हैं। षष्ठ पंचवर्षी का मुख्य आधर ‘विनाश बिना विकास’ हैं।

1980 के दशक में कई प्रमुख कार्य हुए। सन् 1980 में नारायण दल तिवारी समिति बैठायी गयी जो पर्यावरण संरक्षण के प्रशासनिक एवं विधायी पहलुओं पर व्यापक दृष्टिकोण स्पष्ट करें तिवारी समिति ने पोषणीय विकास हेतु पर्यावरण विभाग तथा राष्ट्र के पारिस्थितिकी आधार के संरक्षण हेतु केन्द्रीय भूमि आयोग की स्थापना की सिफारिशें की। इसके साथ ही राज्यों और केन्द्रशासित प्रदेश वन विभाग की स्थापना तथा हर स्तर पर प्रकृति के बारे में शिक्षा की सिफारिशें भी की गयीं। तिवन समिति की रिपोर्ट स्वीकार कर केन्द्रीय सरकार द्वारा केन्द्र में पर्यावरण विभाग, पर्यावरण योजना पर राष्ट्रीय समिति तथा अनेक अन्य समितियों की स्थापना की गयी।

(iii) पर्यावरण नीति, 1988

सन् 1988 में उपरोक्त खामियों को दूर करने के प्रयास किए गये। इस दिशा में का महत्वपूर्ण कदम उठाये गये। अष्टम पंचवर्षीय योजना में नवीन नीतिगत पर्यावरण नीति अपनायी गयी।

सन् 1988 में राष्ट्रीय वन नीति को स्वीकार किया गया। इसके साथ ही राष्ट्रीय वन्य जीवन कार्य योजना, प्रदूषण अल्पीकरण एवं राष्ट्रीय संचय नीति पर अभिकथन और पर्यावरण पर नीतिगत अभिकथन पर दस्तावेज जारी किये गये। नयी पर्यावरण नीति के निम्नलिखित सकारात्मक लक्षण थे-

(1) हमारे राष्ट्रीय जीवन और विकासात्मक प्रक्रिया के ताने-बाने में पर्यावरणीय विचार-विमर्स को बुनने के द्वारा आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच उचित संतुलन कायम करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है।

(2) नयी पर्यावरणीय नीति विनिमयनात्मक एवं निवारक दृष्टिकोण का सम्मिश्रण हैं। यह विनियमन के साथ-साथ पर्यावरण के लिए हानिकारक उपायों पर जोर देती हैं।

(3) नयी पर्यावरण नीति पारिस्थितिकीय आधुनिकीकरण की दिशा में अगला कदम हैं। जो पोषणीय विकास प्राप्त करने का प्रयास करती हैं।

(IV) 1990 के दशक की पर्यावरणीय नीति

आठवीं पंचवर्षीय योजना के अध्याय चार में “पर्यावरण एवं वन’ शीर्षक के अन्तर्गत पर्यावरणीय ह्रास की चुनौतियों से मुकाबला करने हेतु 8 प्रमुख कार्य स्वीकार किये गये- (1) प्राकृतिक पर्यावरण की सुरक्षा करना, (2) ह्रासमान पारिस्थितिकीय तंत्र का पुननिर्माण एवं पुनर्स्थापन और उनकी उत्पादकता में वृद्धि और ऐसी गतिविधियों के माध्यम से नियोजन उत्पन्न करना, (3) प्रकृति एवं प्राकृतिक संसाधनों पर नियन्त्रण क विकेन्द्रीकरण, (4) प्रकृति एवं प्राकृतिक प्रक्रियाओं के बारे में जानकारी विकसित करना तथा हिस्सेदारी निर्धारित करना, (5) पर्यावरण हेतु राष्ट्रीय नीति निर्मित करना तथा नीति के समर्थन में उचित संस्थागत एवं विधिक  ढाँचा तैयार करना, (6) प्रकृति एवं प्राकृतिक संसाधनों के पोषणीय प्रयोग के संरक्षण को ध्यान में रखकर समन्वित और एकीकृत सरकारी कार्यवाहियों को सुनिश्चित करना, (7) व्यक्तियों और संस्थाओं को पर्यावरण और पारिस्थितिकीय तंत्र का उल्लंघन करने वाले उनके कार्यों के लिए। लोगो के प्रति ज्यादा जवाहदेह बनाना, (8) पर्यावरण की स्थिति का निदेशन करना।

पर्यावरण संरक्षण को प्रभावकारी बनाने हेतु योजना में कई सुझाव दिये गये। अस्तु, प्रदूषण के स्त्रोतों की पहचान कर विस्तृत रिपोर्ट तैयार करना, घरेलू और कृषिक प्रदूषण के बारे में समान रिपोर्ट तैयार करना, केन्द्र एवं राज्य प्रदूषण बोर्डों की कार्यविधि मजबूत करना तथा ज्यादा पारदर्शी बनाना, पर्यावरण क्षति के आकलन हेतु व्यापक तथा यथार्थवादी मानदण्ड निर्धारित करना, उद्योगों द्वारा आत्मसात उपाय हेतु सरकार से प्रदूषण निवारण लागत आदि के बारे में बातचीत करना, पर्यावरण प्रदूषण निवारण में लोक भागीगारी तथा गैर सरकारी संगठनों का सहयोग आमंत्रित करना, प्रदूषण, वनों, वन्य जीवन और अन्य पर्यावरणीय विषयों पर लोक सतर्कता को प्रोत्साहित करने हेतु उत्प्रेरक राशि (Incentive) प्रदान करना और राज्य के विनियामक कार्यों का विकेन्द्रीकरण आदि पर जोर दिया गया।

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Pankaja Singh

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