अर्थशास्त्र

भारतीय अर्थव्यवस्था से गरीबी दूर करने के उपाय | उदारीकरण के भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव | विश्वव्यापीकरण से तात्पर्य | विश्वव्यापीकरण के भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव | गरीबी दूर करने के सरकार के प्रयास

भारतीय अर्थव्यवस्था से गरीबी दूर करने के उपाय | उदारीकरण के भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव | विश्वव्यापीकरण से तात्पर्य | विश्वव्यापीकरण के भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव | गरीबी दूर करने के सरकार के प्रयास

भारतीय अर्थव्यवस्था से गरीबी दूर करने के उपाय

भारतीय अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के लिए सर्वप्रथम देश से निर्धनता दूर करना आवश्यक होगा जिसके लिए निम्नलिखित उपाय करने होंगे-

  1. कृषि उत्पादन में वृद्धि- आर्थिक विकास के लिए कृषि योग्य भूमि के क्षेत्र का विस्तार करके उस पर नवीन साधनों का प्रयोग करके प्रति हेक्टेयर उत्पादन सरलता से बढ़ाया जा सकता है। इससे जनसंख्या को कृषि पर भार कम करने में भी मदद मिलेगी। बागवानी, कृषि जैसे जूट, कपास, चाय, तम्बाकू इत्यादि जैसी फसलों के उत्पादन में वृद्धि करके भारतीय अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ किया जा सकता है।
  2. राष्ट्रीय उत्पादन में वृद्धि- निर्धनता दूर करने के लिए राष्ट्रीय आय एवं प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि करना आवश्यक है। आय में वृद्धि होने से बचत की क्षमता बढ़ जाती है जिससे पूंजी निर्माण एवं विनियोग की दर में वृद्धि की जा सकती है।
  3. प्राकृतिक साधनों का विदोहन- भारत में प्रदत्त प्राकृतिक साधनों का पूर्ण एवं तकनीकी की नवीन तरीकों द्वारा विदोहन करके कुल उत्पादन में वृद्धि की जा सकती है जिससे लागत व्यय घट जाता है।
  4. पूँजी निर्माण में वृद्धि- पूँजी-निर्माण में वृद्धि के लिए बचतों को बढ़ावा दिया जाय, उत्पादकता में वृद्धि की जाय, बेरोजगारी को कम किया जाय। पूँजी निर्माण में वृद्धि होने से पूँजी की गतिशीलता में वृद्धि होने लगती है जिससे भविष्य में पूँजी-निर्माण अधिक तीव्र गति से हो सकता है।
  5. उद्योगों का विस्तार- गरीबी दूर करने के लिए नये-नये उद्योगों का विकास होना चाहिए। आधुनिक युग में बढ़ती हुई बेरोजगारी से छुटकारा पाने के लिए देश में औद्योगिकीकरण को प्रोत्साहन देना चाहिए।
  6. क्षेत्रीय विषमता को दूर करना- आर्थिक एवं क्षेत्रीय विषमताओं को दूर करने के लिए स्थानीय संसाधनों के द्वारा अविकसित एवं पिछड़े क्षेत्रों में लघु एवे कुटीर उद्योगों की स्थापना करना चाहिए। इसमें धन का वितरण न्यायिक ढंग से करना चाहिए।

उदारीकरण के भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

आर्थिक उदारीकरण के फलस्वरूप भारत 1991 के भयंकर आर्थिक संकट से उबरने में काफी सीमा तक सफल हुआ है। विदेशी निवेशों में वृद्धि हुई है। देश के भुगतान सन्तुलन की स्थिति में सुधार हुआ है। 1991 के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था का विश्व स्तर पर बेहतर तालमेल हुआ है तथा आर्थिक क्षेत्र में अत्यधिक गतिशीलता आयी है। वैधानिक जटिलताओं तथा राजकीय नियमनों से क्रमशः मुक्ति के कारण उद्योग, कृषि, ऊर्जा, परिवहन बिजली एवं वित्त के क्षेत्र में निजी एवं विदेशी कम्पनियों की व्यापक सहभागिता निरन्तर बढ़ती जा रही है। उदारीकरण के कारण देश में बैंकिंग एवं वित्त के क्षेत्र में नवीन क्रांति का संचार हुआ है। इन सबके फलस्वरूप विश्व स्तर पर भारतीय अर्थव्यवस्था एक महत्वपूर्ण आर्थिक खिलाड़ी के रूप में उभरी है।

उदारीकरण की नीति के उपर्युक्त अच्छे प्रभावों के बावजूद भी यह कहा जाता है कि उदारीकरण के बाद देश की गरीबी, बेरोजगारी, मुद्रा स्फीति, विदेशी ऋण, राजकोषीय घाटे तथा कृषि की स्थिति में कोई विशेष सुधार नहीं हुआ है। चार वर्ष की अवधि बीत जाने के बाद भी उदारीकरण को लेकर अर्थव्यवस्था में भय एवं अनिश्चितता का वातावरण बना हुआ है।

विश्वव्यापीकरण से तात्पर्य

विश्वव्यापीकरण शब्द आज से अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर गुंजायमान हो रहा है। यह शब्द व्यापार अवसरों की जीवन्तता एवं उनके विस्तार की द्योतक है। विश्वव्यापीकरण वस्तुतः व्यापारिक क्रिया-कलापों विशेषकर विपणन सम्बन्धी क्रियाओं का अन्तर्राष्ट्रीयकरण करना है, जिसमें सम्पूर्ण विश्व बाजार को एक ही क्षेत्र के रूप में देखा जाता है। दूसरे शब्दों में, “विश्वव्यापीकरण वह प्रक्रिया है, जिसमें विश्व बाजारों के बीच पारस्परिक निर्भरता उत्पन्न होती है और व्यापार देश की सीमाओं में प्रतिबन्धित न रहकर विश्व बाजारों में निहित तुलनात्मक लागत सिद्धान्त के लाभों को प्राप्त करने में सफल हो जाता है।” 18वीं शताब्दी में एडम स्मिथ ने जिस अहस्तक्षेप की नीति को यह कहकर परिभाषित किया था कि इसमें देशी व्यापार और विदेशी व्यापार में कोई भेद नहीं किया जाता है। विश्वव्यापीकरण एडम स्मिथ की उसी अहस्तक्षेप की नीति का नवीनतम संस्करण है।

विश्वव्यापीकरण से तात्पर्य

विगत चार वर्षों के आर्थिक सुधार एवं उदारीकरण की नीति के प्रयास अपनी युवावस्था को भी प्राप्त नहीं कर पाये थे कि भारतीय अर्थव्यवस्था को विश्वव्यापीकरण की दिशा में मोड़ना अपरिहार्य हो गया। बढ़ते विदेशी ऋण-भार एवं भुगतान सन्तुलन की प्रतिकूलता की समस्या ने भारतीय अर्थव्यवस्था को बंद एवं प्रतिबन्धित अर्थव्यवस्था बनाये रखने की विचारधारा पर एक प्रश्नचिह्न लगा दिया। जहाँ विश्व व्यापार देश की सीमाओं में प्रतिबन्धित न रहकर सम्पूर्ण विश्व तक विस्तृत रूप धारण कर रहा है, ऐसी दशा में भारतीय अर्थव्यवस्था का विश्वव्यापीकरण करना एक अनिवार्यता बन गयी है।

यह अनुभव किया गया कि विश्व व्यापार में अपना स्थान बनाये रखने के लिए भारतीय व्यापार का अन्तरर्राष्ट्रीय मानदण्डों के आधार पर विश्वव्यापीकरण कर दिया जाये। यही कारण है कि नब्बे के दशक में आरम्भ किये गये विभिन्न आर्थिक सुधारों एवं उदारीकरण की नीति को विश्वव्यापीकरण की प्रक्रिया के रूप में देखा जाता है।

सरकार ने 31 मार्च, 1993 को घोषित संशोधित आयात-निर्यात नीति में आयात शुल्कों में भारी कटौती का प्रावधान किया गया है। विदेशी विनियोग नीति में किये गये परिवर्तन के अनुसार अब किसी भी भारतीय कम्पनी की अंश पूंजी में विदेशी विनियोग 51 प्रतिशत तक हो सकता है। पहले इसकी सीमा 40 प्रतिशत तक थी। अब तक विदेशी तकनीक के प्रत्येक समझौते के लिए सरकार की

करने के लिए यातायात एवं संचार के साधनों में वृद्धि करनी चाहिए जिससे गरीब किसान आसानी से अने अनाजों का उचित मूल्य पाने के लिए शहरो में जा सकें। कृषि शून्य काल मे मजदूर एक स्थान से दूसरे स्थान को मजदूरी करने के लिए जा सके।

स्वतंत्रता के बाद भरत सरकार ने देश के निवासियों का जीवन स्तर ऊँचा उठाने के लिए गरीबी मिटाने और बेरोजगारी दूर करने के लिए सन् 1950 ई0 में प्रथम नियोजन कमीशन की स्थापना की। प्रथम पंचवर्षीय योजना का आरम्भ अप्रैल, 1951 में किया गया जिसका मुख्य उद्देश्य अन्नोत्पादन, मूल्य स्थिरीकरण, उद्योग तथा वाणिज्य में विकास करना था। द्वितीय पंचवर्षीय योजना का मुख्य लक्ष्य राष्ट्रीय आय में वृद्धि करना, खाद्यानों में आत्मनिर्भरता प्राप्त करना, इस्पात, रसायनों, ईंधन और बिजली जैसे आधारभूत उद्योगों का विस्तार, रोजगार के अवसरों का पर्याप्त विस्तार करना, अन्न तथा सम्पत्ति की विषमताओं को दूर करना था। चौथी पंचवर्षीय योजना में विशेषकर रोजगार एवं शिक्षा के माध्यम से कमजोर और कम सुविधा प्राप्त वर्गों की दशा में सुधारने पर विशेष बल दिया गया। पांचवीं पंचवर्षीय योजना में मुद्रा स्फीति पर नियन्त्रण करने और आर्थिक स्थिति में स्थिरता लाने को उच्च प्राथमिकता दी गयी थी। छठी पंचवर्षीय योजना इस उद्देश्य से तैयार की गयी थी कि विशेष कार्यक्रमोंके द्वारा ग्रामीण और असंगठित क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों में वृद्धि हो। सातवीं पंचवर्षीय योजना में गरीबी दूर करने को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गयी है।

अतः उपर्युक्त योजनाओं के लक्ष्यों का विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट होता है कि मूलतः देश से गरीबी हटाने का ही प्रयास किया जा रहा है।

गरीबी दूर करने के सरकार के प्रयास

1951 से नवीं योजना के निर्माण की अवस्था तक गरीबी उन्मूलन प्रत्येक योजना का लक्ष्य रहा है। अभी तक के विभिन्न अवधियों में ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में प्रारम्भ किये गये कार्यक्रम निम्नानुसार हैं-

(अ) ग्रामीण गरीबी को दूर करने के लिए किये गये सरकार के उपाय

  1. अन्त्योदय योजना- यह योजना 1977-78 में प्रारम्भ की गयी। गांव के सबसे गरीब परिवरों को आर्थिक दृष्टि से स्वावलम्बी बनाना इस योजना का उद्देश्य है।
  2. लघु किसान विकास कार्यक्रम (SFDP)- यह योजना 1974-75 में प्रारम्भ हुई। इसका उद्देश्य है छोटे किसानों को तकनीकी एवं वित्तीय सहायता प्रदान करना।
  3. सूखा क्षेत्र कार्यक्रम (DAAP)- इसका आरम्भ वर्ष 1973 में हुआ एवं उद्देश्य सूखाग्रस्त क्षेत्रों में पर्यावरण सन्तुलन, भूमि, जल और अन्य प्राकृतिक संसाधनों को विकसित करके सूखे या अवर्षा से बचाव के उपाय करना है।
  4. बीस सूत्रीय कार्यक्रम- 1975 में आरम्भ इस कार्यक्रम का उद्देश्य गरीबी निवारण एवं जीवन स्तर में सुधार करना है।
  5. काम के बदले अनाज कार्यक्रम- यह कार्यक्रम 1977-78 में शुरू किया गया। उद्देश्य है विकास परियोजनाओं में श्रम कार्य के पारिश्रमिक के रूप में खाद्यात्र प्रदान कराना।
  6. न्यूनतम आवश्यकता कार्यक्रम- इस कार्यक्रम का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में गरीब परिवारों की न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति करना तथा इस हेतु उनकी क्रय- क्षमता को स्थापित करना है।
  7. समन्वित ग्रामीण विकास कार्यक्रम (IRDP)- 2 अक्टूबर, 1980 में आरम्भ इस कार्यक्रम का उद्देश्य ग्रामीण गरीब परिवारों को स्व-रोजगार हेतु ऋण की व्यवस्था करना है।
  8. राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम (NREP) – 1980 में आरम्भ। कार्यक्रम की उद्देश्य है ग्रामीण गरीबों को लाभकारी रोजगार के अवसर उपलब्ध करवाना।
  9. ग्रामीण खेतिहर मजदूर रोजगार गारण्टी कार्यक्रम (RLEGP)- 15 अगस्त, 1983 को आरम्भ। इस कार्यक्रम का उद्देश्य भूमिहीन कृषकों को रोजगार उपलब्ध कराना।
  10. जवाहर रोजगार योजना (JRY)- अप्रैल, 1989 में आरम्भ। कार्यक्रम का उद्देश्य है ग्रामीण बेरोजगारों को रोजगार प्रदान करना।
  11. ट्राइसेम (TRYSEM)- 15 अगस्त, 1979 में आरम्भ। इस कार्यक्रम का उद्देश्य है ग्रामीण युवा वर्ग की बेरोजगारी को दूर करने हेतु प्रशिक्षण देना।
  12. रोजगार आश्वासन योजना (EAY ) ।
  13. जनसंख्या नियन्त्रण हेतु परिवार नियोजन कार्यक्रम।
  14. ग्रामीण कारीगरों को उन्नत औजार किटों की आपूर्ति योजना- जुलाई, 1992 में आरम्भ। उद्देश्य है ग्रामीण शिल्पकारों एवं अन्य समस्त प्रकार के कारीगरों को आधुनिक औजारों की आपूर्ति करना।
  15. अन्य उपाय- अन्य उपायों में बंधुआ मजदूरी को कानूनन समाप्त किये गये तथा धन के केन्द्रीकरण को रोकने हेतु सम्बन्धित कानूनों में संशोधन किये गये।
  16. ग्रामीण क्षेत्रों में महिला एवं बाल विकास कार्यक्रम (DWCRA)- सितम्बर, 1982 में आरम्भ। इस कार्यक्रम का उद्देश्य है गरीबी की रेखा से नीचे जीवन जी रहे ग्रामीण परिवारों की महिलाओं को स्व-रोजगार के उपयुक्त अवसर उपलब्ध करवाना।
  17. महिला समृद्धि योजना (MSY)-1993 में आरम्भ। इसका उद्देश्य है डाकघर बचत खातों में जमा करने के लिए ग्रामीण महिलाओं को प्रोत्साहित करना।
  18. राष्ट्रीय सामाजि सहायता योजना- 1995 में आरम्भ। इस कार्यक्रम में गरीबी की रेखा से नीचे रहने वालों को सहायता प्रदान करने का उद्देश्य है।

(ब) शहरों में गरीबी को दूर करने के लिए किये गये सरकार के उपाय

  1. नेहरू रोजगार योजना (NRY)- अक्टूबर, 1989 में आरम्भ। इस योजना का उद्देश्य है शहरी क्षेत्रों के बेरोजगारों को रोजगार उपलब्ध करवाना।
  2. शहरी गरीबों के लिए स्वरोजगार कार्यक्रम- सितम्बर, 1986 में कार्यक्रम आरम्भ किया गया उद्देश्य है शहरी गरीबों को स्व-रोजगार हेतु वित्तीय एवं तकनीकी सहायता देना।
  3. शहरी आवासों के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करने की व्यवस्था की गयी तथा शहरी आवास और आश्रम सुधार स्कीम (SHASU) 1990 में आरम्भ की गयी। एक लाख से बीस लाख की आबादी वाले नगरों, शहरों में आश्रम (आवास) उन्नयन के माध्यम से रोजगार प्रदान करने का लक्ष्य रखा गया।
  4. शिक्षित शहरी युवाओं के लिए स्व-रोजगार (SEEVY) कार्यक्रम- 1983-84 में आरम्भ इस कार्यक्रम का उद्देश्य है-स्वरोजगार हेतु वित्तीय एवं तकनीकी सहयोग प्रदान करना।
  5. प्रधानमंत्री की रोजगार योजना (PMRY)- आठवीं योजना के दौरान उद्योग, सेवा तथा कारोबार में सात लाख लघुतर इकाइयाँ स्थापित करके 10 लाख से भी अधिक व्यक्तियों को रोजगार देने का लक्ष्य रखा गया। इसके लिए चुने हुए आठवीं कक्षा उत्तीर्ण शिक्षित बेरोजगारों (ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों के) को जिनकी आयु 18 से 40 वर्ष के बीच है तथा जिनकी पारिवारिक आय 40,000रू वार्षिक से कम है, को व्यापारिक कारोबार के लिए एक लाख तथा अन्य गतिविधियों के लिए 2 लाख तथा भागीदारी में 10 लाख के ऋण प्रदान करने की व्यवस्था है। 1993-94 से यह पहले शहरी तथा बाद में ग्रामीण क्षेत्रों में भी लागू कर दी गयी । 1994 की शिक्षित बेरोजगार योजना को इसमें एकीकृत कर दिया गया है।
  6. तीन घटकों वाली राष्ट्रीय सामाजिक सहायता योजना-इस योजना में ग्रामीण एवं शहरी गरीबों को सहायता प्रदन करने की व्यवस्था है।
  7. प्रधानमंत्री का समन्वित शहरी गरीबी निवारण कार्यक्रम- 18 नवम्बर, 1995 में आरम्भ 50 हजार से 1 लाख तक जनसंख्या वाले 345 छोटे शहरो में निर्धनता निवारण तथा मूल नागरिक सुविधाएं उपलब्ध करवाना उद्देश्य है।
  8. स्वर्ण जयन्ती शहरी रोजगार योजना- दिसम्बर, 1997 में आरम्भ। यह शहरी क्षेत्रों में गरीबी उन्मूलन का कार्यक्रम है।
  9. ग्रामीण राहत ऋण योजना- 1990 से आरम्भ इस कार्यक्रम के अन्तर्गत ग्रामीण कारीगरों, बुनकरों आदि के 10,000 रू. तक का बैंक ऋण मुक्त करने का प्रावधान है।
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Pankaja Singh

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