अर्थशास्त्र

निजीकरण से आशय | नयी आर्थिक नीति में निजीकरण से सम्बन्धित प्रावधान | निजीकरण की नीति की आलोचनाएँ | उदारीकरण से तात्पर्य | उदारीकरण सम्बन्धी प्रावधान

निजीकरण से आशय | नयी आर्थिक नीति में निजीकरण से सम्बन्धित प्रावधान | निजीकरण की नीति की आलोचनाएँ | उदारीकरण से तात्पर्य | उदारीकरण सम्बन्धी प्रावधान | Meaning of privatization in Hindi | Provisions related to privatization in the new economic policy in Hindi | Criticisms of the Policy of Privatization in Hindi | Meaning of liberalization in Hindi | liberalization provisions in Hindi

निजीकरण से आशय | भूमण्डलीकरण | वैश्वीकरण

उद्योगों की स्थापना से सम्बन्धित चार क्षेत्र सार्वजनिक क्षेत्र, निजी क्षेत्र, संयुक्त क्षेत्र एवं सहकारी क्षेत्र होते हैं। अर्थव्यवस्था की वह प्रक्रिया जिसमें अन्य क्षेत्रों को सीमित करके निजी क्षेत्र का विस्तार एवं विकास किया जाता है, निजीकरण की प्रक्रिया कहलाती है। निजीकरण की प्रक्रिया में अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा निजी क्षेत्र को अधिक महत्व दिया जाता है। निजीकरण की नीति का आधार यह है कि किसी भी उद्योगपति को किसी भी उद्योग एवं व्यवसाय में प्रवेश की स्वतन्त्रता रहेगी। इसके अन्तर्गत आर्थिक क्रियाओं का बड़ा भाग निजी क्षेत्र के सिद्धान्तों के आधार पर चालित होता है अर्थात् बाजार की प्रमुख शक्तियों, जैसे-मूल्य, लाभ, माँग एवं पूर्ति आर्थिक क्रियाओं को शासित एवं संचालित करती है।

नयी आर्थिक नीति में निजीकरण से सम्बन्धित प्रावधान

भारत सरकार ने नयी आर्थिक नीति में निजीकरण से सम्बन्धित जो प्रावधान किये हैं, वे नयी औद्योगिक नीति, विदेशी विनियोग नीति तथा सार्वजनिक क्षेत्र सम्बन्धी नीति में निहित हैं। इनकी विस्तृत व्याख्या इस प्रकार है-

(अ) औद्योगिक नीति से सम्बन्धित प्रावधान- नयी औद्योगिक नीति में निजीकरण हेतु निम्नलिखित प्रावधान किये गये हैं-

  1. नयी नीति के अन्तर्गत लाइसेंसिंग नीति को शिथिल किया गया है। अब केवल 18 विनिर्दिष्ट उद्योगों को छोड़कर अन्य समस्त उद्योगों के लिए लाइसेंस लेने की आवश्यकता नहीं होगी।
  2. एकाधिकार एवं प्रतिबन्धित व्यापार व्यवहार अधिनियम (MRTP Act) से सम्बन्धित कम्पनियों को अब विनियोग निर्णयों के लिए एम. आर. टी. पी. आयोग से स्वीकृति नहीं लेनी पड़ेगी। इसी प्रकार एकाधिकारी घरानों को अपनी विस्तार योजनाओं, नये उद्यम स्थापित करने, विलयन एवं अधिग्रहण के लिए सरकार से इजाजत नहीं लेनी होगी।

(ब) विदेशी विनियोग नीति- विदेशी विनियोग नीति में निजीकरण से सम्बन्धित निम्नलिखित प्रावधान किये गये हैं-

  1. इस नीति में विदेशी निजी पूंजी अन्तर्प्रवाहों की संरचना में अनेक महत्वपूर्ण परिवर्तन किये गये हैं, ताकि ऋण उत्पन्न करने वाले प्रवाहों की अपेक्षा अंश पूंजी की आर्थिक मात्रा प्राप्त की जा सके।
  2. बहुत-से उद्योगों में 51% विदेशी अंश पूंजी के स्वामित्व की सीमा तक प्रत्यक्ष विदेशी विनियोग की स्वतः स्वीकृति दी जायेगी। इसके पूर्व सभी विदेशी विनियोग सामान्यतः 40% तक सीमित था।
  3. सरकार उच्च प्राथमिकता वाले उद्योगों में तकनीकी संधियों के लिए स्वतः स्वीकृति (Automatic Approval) प्रदान करेगी। यह सुविधा अन्य उद्योगों को भी प्राप्त होगी, यदि ऐसी संधियों में विदेशी मुद्रा की आवश्यकता न हो।

(स) सार्वजनिक क्षेत्र सम्बन्धित नीति- निजीकरण को अपनाने के लिए यह आवश्यक था कि सरकार सार्वजनिक क्षेत्र को सीमित करें। इस हेतु किये गये प्रमुख प्रावधान इस प्रकार हैं-

  1. सार्वजनिक क्षेत्र के लिए आरक्षित उद्योगों की संख्या को 18 से घटाकर 8 कर दिया गया है अर्थात् उद्योगों को निजी क्षेत्र में स्थापित करने की छूट दे दी गयी। शेष 8 उद्योगों में भी चयनात्मक रूप में निजी क्षेत्र के सहयोग की इजाजत दी जायेगी। विदेशी कम्पनियों के साथ साझे अब सम्भव हो सकेंगे।
  2. निजीकरण के अन्तर्गत सरकार ने एक अन्य अत्यन्त महत्वपूर्ण निर्णय सार्वजनिक उद्योगों में विनिवेश का लिया है। इसका अर्थ यह है कि अब सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों के अंश-पत्र निजी व्यक्तियों को बेचेंगी। इस तरह सरकार को जो पूँजी प्राप्त होगी उससे सार्वजनिक क्षेत्र में विवेकीकरण एवं आधुनिकीकरण की प्रक्रिया को अपनाकर वहाँ के घाटे को कम करने का प्रयास किया जायेगा। प्रारम्भ में सरकार के लाभ कमा रहे 31 सार्वजनिक उद्योगों में लगी अपी पूँजी का 5% भाग को विनिवेश करेगी। मार्च, 1993 तक विनिवेश से सरकार ने 4,950 करोड़ रूपये एकत्रित कर लिए हैं। सरकारी उद्योगों में निजी व्यक्तियों के स्वामित्व से वहाँ के कर्मचारियों एवं श्रमिकों के छँटनी होने की सम्भावना है। ऐसी छँटनी से प्रभावित होने वाले श्रमिकों एवं कर्मचारियों को उचित संरक्षण देने के उद्देश्य से सरकार ने 3 अरब रूपये से एक राष्ट्रीय नवीकरण कोष स्थापित किया है। इस कोष से स्वेच्छा से सेनानिवृत्त हुए कर्मचारियों को क्षतिपूर्ति भी की जायेगी।
  3. सरकार ने यह निर्णय लिया है कि अब जहाँ सरकारी उद्योगों का सामाजिक महत्व कम है और यदि वहाँ निजी क्षेत्र अधिक कुशल हैं तो उनमें निजी क्षेत्र को विनियोग की अनुमति की जायेगी।
  4. घाटे में चल रही सरकारी औद्योगिक इकाइयों को भारी हानि करने की इजाजत नहीं दी जायेगी। साथ ही उनको सरकार से मिल रही आर्थिक सहायता धीरे-धीरे कम की जायेगी।

निजीकरण की नीति की आलोचनाएँ

निजीकरण की नीति की निम्नलिखित आधारों पर आलोचनाएँ की जाती हैं-

  1. निजीकरण की नीति अन्तर्राष्ट्रीय दबावों के कारण अपनायी गयी हैं- संसद में विपक्षी सदस्यों ने सरकार की निजीकरण की नीति की इस आधार पर आलोचना की है कि इसे विदेशी ताकतों के दबाव में आकर अपनाया गया है। आलोचकों के अनुसार भारतीय अर्थव्यवस्था में सार्वजनिक क्षेत्र का अभी भी पर्याप्त अभाव है।
  2. श्रम संघों द्वारा विरोध-सरकार की निजीकरण की नीति का श्रम संघों ने भी विरोध किया है। उनका मत है कि इससे श्रमिकों में बेरोजगारी फैलने का भय है। जब सरकारी उद्योगों पर निजी व्यक्तियों का स्वामित्व होने लगेगा तो कुछ श्रमिक इसलिए बेरोजगार हो जायेंगे, क्योंकि वे आवश्यकता से अधिक है और कुछ श्रमिकों की छँटनी तकनीक में परिवर्तन के कारण हो जायेगी। इसलिए श्रम संघ सरकारी उद्योगों को विनिवेश की नीति को समाप्त करने पर जोर दे रहे हैं।
  3. सरकार ने केवल लाभ वाले उद्योगों के शेयर ही बेंचे हैं- सरकार की निजीकरण की नीति की आलोचना इस आधार पर की जाती है कि सरकार केवल उन सार्वजनिक उद्योगों के शेयर निजी व्यक्तियों को बेच रही है जो लाभ में चल रहे हैं। इससे भविष्य में सरकार की आय में कमी हो जायेगी। होना यह था कि सरकार घाटे में चल रहे उद्योगों के शेयर निजी व्यक्तियों को बेचती, ताकि वह अपने घाटे के बोझ में कमी महसूस करती।
  4. निजी उद्योगपतियों द्वारा आलोचना- जो उद्योगपति सरकारी उद्योगों के शेयर खरीद रहे हैं, वे भी सरकार की इस नीति की आलोचना करते हैं। उनका मत है कि “सरकार शेयर बेचकर निजी क्षेत्र से पूँजी तो एकत्रित कर रही है, परन्तु इन उद्योगों पर नियन्त्रण अभी भी सरकार का पूर्ववत् ही है।”
  5. आम जनता की आशंका- आम जनता उन उद्योगपतियों को भी शंका की नजर से देख रही है जो सरकारी उद्योगों के शेयर खरीद रहे हैं। जनता का विश्वास है कि इन उद्योगपतियों की रूचि इस बात में बिल्कुल नहीं है कि इन उद्योगों की प्रबन्ध व्यवस्था एवं तकनीक में सुधार करके इन्हें लाभप्रद इकाई बनाया जाये। इनकी गिद्ध दृष्ट वास्तव में सरकारी उद्योगों की अपार- सम्पति पर है जिसे भविष्य में ये हड़पने की सोच रहे हैं।

उदारीकरण से तात्पर्य

आर्थिक जगत् में ‘उदार’ शब्द एक विशिष्ट अर्थ में प्रयुक्त किया जाता है। जब सरकार उद्योग, व्यापार, व्यवसाय, आयात-निर्यात आदि क्षेत्रों में कोई प्रतिबन्ध या नियन्त्रण नहीं लगाती है या नाममात्र के प्रतिबन्ध या नियन्त्रण लगाती है तब उसे उदार सरकार की संज्ञा दी जाती है। इस आधार पर उदारीकरण एक प्रक्रिया है, जिसके अन्तर्गत उद्योग, व्यापार, व्यवसाय, आयात-निर्यात आदि क्षेत्रों में पहले से हुए प्रतिबन्धों एवे नियन्त्रणों को शिथिल या कम किया जाता है।

उदारीकरण सम्बन्धी प्रावधान

भारत की नयी आर्थिक नीति में उदारीकरण से सम्बन्धित निम्प प्रावधान किये गये हैं-

  1. औद्योगिक क्षेत्र से सम्बन्धित प्रावधान- 24 जुलाई, 1991 को घोषित औद्योगिक नीति के अन्तर्गत कुछ उद्योगों को छोड़कर शेष के लिए लाइसेंस की आवश्यकता नहीं है। एकाधिकार और प्रतिबन्धित व्यापार की सम्पत्ति सीमा जो पहले 100 करोड़ रूपये थी, पूरी तरह समाप्त कर दी गयी है। सार्वजनिक क्षेत्र के लिए आरक्षित 18 उद्योगों को घटाकर केवल 8 कर दिया गया है। अब सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनियों के शेयर निजी क्षेत्र द्वारा भी खरीदे जा सकते हैं। पंजीकरण व्यवस्थाओं को समाप्त कर दिया गया है तथा दस लाख से कम आबादी वाले शहरों में औद्योगिक इकाइयों की स्थापना के लिए अब पूर्व अनुपति की आवश्यकता नहीं है। इस प्रकार कठोर औद्योगिक नीति में अनेक परिवर्तन करके सरकार द्वारा औद्योगिक क्षेत्र में लगे प्रतिबन्ध को समाप्त किया जा रहा है।
  2. आयात-निर्यात से सम्बन्धित प्रावधान- 31 मार्च, 1993 को घोषित संशोधित आयात-निर्यात नीति में उदारीकरण से सम्बन्धित अनेक प्रावधानों को शामिल किया गया है। निर्यात की निषेधात्मक सूची में कटौती की गयी है। अब निषेधात्मक सूची की 344 वस्तुओं में से 144 वस्तुओं के निर्यात क्षेत्र का विस्तार करने के लिए निर्यात के लिए लाइसेंस की आवश्यकता नहीं होगी। अद्योगों के समान ही निर्यातोन्मुखी कृषि इकाइयों को भी निर्यात संसाधन योजना के अन्तर्गत शुक्ल रहित आयात की सुविधा प्राप्त होगी। ऐसी इकाइयाँ अपने शेष 50 प्रतिशत् उत्पादों को घरेलू बाजार में बेच सकेंगी। अब डॉक्टर, इंजीनियर आदि 15 प्रतिशत की रियायती दर पर उपकरणों का आयात कर सकेंगे। व्यापार तथा सीमा शुल्क के वर्गीकरण में एकरूपता लायी गयी है। इलेक्ट्रानिक उद्योग में उपयोग होने वाले कुछ कच्चे माल और उपकरणों पर आयात शुल्क में कमी की गयी है।
  3. विदेशी पूँजी निवेश से सम्बन्धित प्रावधान- देश में अपनाये जा रहे नवीनतम आर्थिक सुधार तब तक अधूरे हैं जब तक कि उनमें विदेशी पूँजी-निवेश को आकर्षित करने के लिए पर्याप्त प्रावधान नहीं किये जायें। उदारीकरण की नीति में विदेशी पूँजी को आकर्षित करने के लिए अनेक प्रावधान किये गये हैं। अब देशी उद्योगों में विदेशी पूँजी निवेश की सीमा 40 प्रतिशत से बढ़ाकर 51 प्रतिशत कर दी गयी है। विदेशी पार्टियो से जो समझौते किये जायेंगे, उनमें कोई सरकारी हस्तक्षेप नहीं होगा। प्राथमिकता वाले उद्योगों में विदेशी तकनीक के समझौते पर स्वतः स्वीकृति मिल जायेगी। 1 मार्च, 1993 से रूपये की पूर्ण परिवर्तनशीलता लागू कर दी गयी है।
  4. शेयर निर्गमित करने सम्बन्धी प्रावधान- सरकार ने उदारीकरण की नीति का विस्तार देश के पूंजी बाजार तक भी किया है। देश में स्थापित होने वाली कम्पनियों को अपने शेयर बेचने के लिए पूंजी निर्गमन (नियन्त्रण) अधिनियम के अन्तर्गत नियन्त्रण से अनुमति लेना अनिवार्य था। नियन्त्रण अनुमति प्रदान करे में अनावश्यक विलम्ब करता था। परिणामस्वरूप कम्पनियों के संस्थापकों को अनेक कठिनाइयों का समाना करना पड़ता था। सरकार ने उदारीकरण की नीति के अन्तर्गत 29 मई, 1992 को एक अध्यादेश जारी करके अनुमति प्राप्त करने की उपर्युक्त अनिवार्यता को समाप्त कर दिया है। इससे निजी क्षेत्र की कम्पनियों को साधन जुटाने में सुविधा होगी।
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