अर्थशास्त्र

गरीबी का अर्थ | भारत में गरीबी की परिभाषा | भारत में गरीबी के कारण | गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम एवं पंचवर्षीय योजनाएं | भारत में गरीबी हटाने के लिए सुझाव

गरीबी का अर्थ | भारत में गरीबी की परिभाषा | भारत में गरीबी के कारण | गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम एवं पंचवर्षीय योजनाएं | भारत में गरीबी हटाने के लिए सुझाव | Meaning of poverty Definition of poverty in India in Hindi | Causes of poverty in India in Hindi | Poverty Alleviation Programs and Five Year Plans in Hindi| Tips to remove poverty in India in Hindi 

गरीबी का अर्थ अथवा धारणा:

आज सरकार, राजनीति, समाज-सुधारक, आदि सभी गरीबी के बारे में बात करते हैं, किन सभी को गरीबी के सही अर्थ का बोध नहीं होता है। गरीबी के दो अर्थ लगाये जाते हैं:

(1) निरपेक्ष गरीबी (Absolute Poverty) (2) सापेक्ष गरीबी (Relative Poverty)।

(1) “एक व्यक्ति की निरपेक्ष गरीबी से अर्थ है कि उसकी आय या उपभोग व्यय इतना कम है कि वह न्यूनतम भरण-पोषण स्तर पर रह रहा है।” इसी बात को दूसरे शब्दों में इस प्रकार कह सकते हैं कि “गरीबी से अर्थ मानव की आधारभूत आवश्यकताओं- खाना, कपड़ा, स्वास्थ्य सहायता, आदि की पूर्ति हेतु पर्याप्त वस्तुओंक्षव सेवाओं को जुटा पाने में असमर्थता से है।”

भारत में गरीबी से अर्थ उस निरपेक्ष गरीबी से है जिसे सामान्य शब्दों में गरीबी के मान से पुकारा जाता है, लेकिन अब प्रश्न यह है कि गरीबी कहां से आरम्भ होती है? इसका उत्तर यह है कि गरीबी के लिए कुछ न्युनतम वस्तुओं और सेवाओं को निर्धारित करना पड़ता है। यदि वे न्यूनतम वस्तुएं भी किसी व्यक्ति को नहीं मिलती हैं तो कहते हैं कि वह गरीबी रेखा से नीचे स्तर पर रह रहा है। यदि उसको वे न्युनतम वस्तुएं व सेवाएं मिल जाती हैं तो कहते हैं कि गरीबी रेखा के बराबर है। अब किसी व्यक्ति को उस न्यूनतम स्तर से अधिक वस्तुएं और सेवाएं मिलती हैं तो इसे गरीबी रेखा से ऊपर कहा जाता है।

इस विवरण से हम इस निष्कर्ष पर आते हैं कि “गरीबी से अर्थ उस न्यूनतम आय से है जिसकी एक परिवार के लिए आधारभूत न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु आवश्यकता होती है तथा जिसे वह परिवार जुटा पाने में असमर्थ होता है।” इस गरीबी को निरपेक्ष गरीबी कहते हैं। जो परिवार उस आय जुटा पाने में असमर्थ होता है उस परिवार को गरीबी रेखा से नीचे जीवन बिता रहे कहा जाता है।

(2) सापेक्ष गरीबी (Relative Poverty) से अर्थ आय की असमानताओं से होता है।” जब दो देशों की प्रति व्यक्ति आय की तुलना करते हैं तो उनमें भारी अन्तर पाते हैं, इस अन्तर के आधार पर हम गरीब व अमीर देश की तुलना कर सकते हैं। यह गरीबी सापेक्षिक होती है।

भारत में गरीबी की परिभाषा एवं अनुमान

(Definition and Estimate of Poverty in India)

भारत में गरीबी की परिभाषा पौष्टिक आहार (Nutritional Intake) के आधार को लेकर दी गयी है। भारतीय योजना आयोग के अनुसार यदि किसी व्यक्ति को गाँव में 2,400 कैलोरीज प्रतिदिन व शहर में 2,100 कैलोरीज प्रतिदिन नहीं मिलता है तो यह माना जायेगा कि वह व्यक्ति गरीबी रेखा के नीचे (Below Poverty Line) अपना जीवन व्यतीत कर रहा है। यदि पौष्टिक आहार को रूपयों में परिणत कर दिया जाता है तो 107 रूपये प्रति व्यक्ति प्रति माह गाँवों में व 122 रुपये प्रति माह शहरों में आता है। परन्तु बाद में गरीबी की परिभाषा में संशोधन किया गया, जिसके अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में 11,060 रुपये व शहरी क्षेत्रों में 11,850 रूपये प्रति गृह वार्षिक उपभोग व्यय का मानदण्ड माना गया है। परन्तु 24 फरवरी, 1997 को संसद में सरकार ने जो विवरण प्रस्तुत किया है उसके अनुसार अधिकतम 15,000 रुपये वार्षिक कमाने वाले व्यक्ति गरीबी रेखा के नीचे जीवन व्यतीत करने वाले माने जायेंगे। सरकार ने यह सिद्धान्त लक्षित सार्वजनिक वितरण योजना के अन्तर्गत अपनाया है। सरकार के अनुसार इस समय देश में 32 करोड़ व्यक्ति गरीबी रेखा के नीचे अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं जो कुल जनसंख्या का 36 प्रतिशत है, लेकिन World Development Report, 1999-2000 के अनुसार भारत में 47 प्रतिशत जनसंख्या गरीब है।

“भारत में सबसे अधिक गरीबी बिहार राज्य में है जहां की 55 प्रतिशत जनसंख्या गरीबी रेखा से नीचे है इसके बाद उड़ीसा का स्थान है जहां पर यह प्रतिशत 48.6 है। तीसरा स्थान मध्य प्रदेश राज्य का है जहां गरीबी का प्रतिशत 42.5 है। अन्य राज्यों का प्रतिशत इस प्रकार है। उत्तर प्रदेश 40.9, तमिलनाडु 35.0 कर्नाटक 33.2, महाराष्ट्र 36.6, पश्चिमी बंगाल 35.7, व राजस्थान 27.4।”

गरीबी एवं विकास

(Poverty and Growth)

जब किसी देश में विकास होता है तो उस देश में गरीबी धीरे-धीरे कम होने लगती है। प्रति व्यक्ति उत्पादन बढ़ने लगता है। राष्ट्रीय आय बढ़ने लगती प्रति व्यक्ति आय बढ़ने लगती है। इसीलिए यह कहा जाता है कि गरीबी व विकास एक-दूसरे से सम्बन्धित है।

यदि किसी देश में विकास की दर तेज होती है तो वहाँ गरीबी तेजी से कम होती जाती हैं। इसके विपरीत, यदि विकास की दर धीमी होती है तो गरीबी भी धीरे-धीरे कम होती है, लेकिन इसके लिए यह आवश्यक है कि जनसंख्या में भारी परिवर्तन न हों।

भारत में सकल राष्ट्रीय आय (Gross National Income) का बराबर विकास हो रहा है। 1950-51 में सकल राष्ट्रीय आय (चालू मूल्यों पर) 8,938 करोड़ रूपये थी जो 1998-99 में बढ़कर 15,97,416 करोड़ रूपये हो गयी है। वह इस बात को बताती है कि राष्ट्रीय आय बढ़ी है और गरीबी में कुछ कमी आयी है।

इसी प्रकार 1950-51 में चालू मूल्यों के आधार पर प्रति व्यक्ति आय जो 239 रूपये मात्र थी वह भी 1998-99 में बढ़कर 14,682 रूपये हो गयी है। यह भी यह बात सिद्ध करती है कि इस अवधि में गरीबी घटी है।

आर्थिक विकास की बाधाएँ या समस्याएँ

(Obstacles or Problems of Economic Development)

प्रत्येक अल्प-विकसित देश अपने विकास में लगा हुआ है, लेकिन उन देशों के समक्ष विकास के रास्ते में कुछ बाधाएँ या समस्याएँ हैं जिनके कारण विकास वांछित तरीके से नहीं हो पा रहा है और उनकी विकास की दर बहुत निम्न है। कुछ बाधाएँ या समस्याएं पुरानी हैं, जबकि कुछ नवीन। इसी प्रकार कुछ आन्तरिक हैं व कुछ बाहरी ।

सामान्य रूप से एक अल्प-विकसित देश के आर्थिक विकास में (1) पूँजी की कमी, (2) निपुण श्रमिकों का अभाव, (3) पिछड़ी. कृषि समस्या, (4) असन्तुलित उत्पादन, (5) व्यापक दरिद्रता (6) कम औसत आय, (7) श्रम शक्ति की अधिकता, (8) प्राकृतिक साधनों का उपयुक्त उपयोग न होना, (9) निरक्षरता, (10) औद्योगीकरण का अभाव, (11) सरकार की विकास के प्रति उदासीनता, आदि बाधाएँ हैं।

प्रो. मेयर एवं बाल्डविन (Meier & Baldwin) ने अपनी पुस्तक ‘Economic Development‘ में आर्थिक विकास की बाधाओं को तीन भागों में बाँटा हैः

(1) निर्धनता का कुचक्र (Vicious Circle of Poverty), (2) बाजार सम्बन्धी अपूर्णताएँ (Market Imperfections) एवं (3) अन्तर्राष्ट्रीय शक्तियाँ (Internatinal Forces)।

लेकिन हम इन समस्याओं व बाधाओं को चार भागों में बाँटकर अध्ययन करेंगे: (1) आर्थिक, (2) सामाजिक, (3) राजनीतिक व प्रशासनिक एवं (4) अन्तर्राष्ट्रीय

(1) आर्थिक

एक अल्प विकसित देश जब अपना आर्थिक विकास करता है तो उसके समक्ष बहुत-सी आर्थिक समस्याएँ आती इन समस्याओं में प्रमुख समस्याएँ निम्न हैं:

(1) पूँजी की कमी-अल्प-विकसित देशों में प्रति व्यक्ति आय इतनी कम होती है कि इस आय से जनसाधारण के लिए पेट भरना कठिन होता है ऐसी स्थिति में उनके द्वारा बचत करना असम्भव ही होता है। देश के आर्थिक विकास के लिए जो पूँजी चाहिए उसका निर्माण नहीं हो पाता है और इस प्रकार इन देशों में पूँजी का अभाव बना रहता है जिससे विकास कार्यों की गति मन्द ही रहता है।

(2) सीमित बाजार- अल्प-विकसित देशों की दूसरी समस्या सीमित बाजार की है। चूँकि यहाँ पर क्रय शक्ति सीमित होती है, अतः नवीन वस्तुओं का बाजार भी सीमित होता है और इस प्रकार नवीन वस्तुओं के उत्पादन को बेचने की समस्या पैदा हो जाती है। इस समस्या के कारण आर्थिक विकास भी मन्द पड़ जाता है।

भारत में गरीबी के कारण
(
Causes of Poverty in India)

भारत में गरीबी का कोई एक कारण नहीं है बल्कि अनेक कारण हैं। इन कारणों को (1) आर्थिक, (2) सामाजिक, (3) राजनतिक कारणों के रूप में व्यक्त कर सकते हैं।

(1) आर्थिक कारण- भारत में गरीबी का मुख्य कारण इसका अल्प विकसित होना हैं हम अभी तक प्रकृति दत्त साधनों का उचित उपयोग नहीं कर पाये हैं। हमारे अधिकांश खनिज, शक्ति, पानी व जंगल साधन या तो बिना उपयोग के रह गये हैं या फिर उनका उपयोग कम मात्रा में ही होता रहा है। हमारी कृषि आज भी पुरानी तकनीक से ही हो रही है। हमारे खेत छोटे व बिखरे हुए हैं। रासायनिक खाद, कीटाणुनाशक दवाएं, अच्छे बीज व वित्त का उपयोग भी कम है तथा उनकी उपलब्धता भी आवश्यकता के अनुसार नहीं है।

उद्योग भी अभी कम उन्नत है। साहसियों की कमी है। शक्ति की पूर्ति अनियमित है। कच्चे माल का अभाव है। श्रमिक अशान्ति है। वित्त प्रदान करने वाले साधन भी कम ही हैं। इन सभी के फलस्वरूप औद्योगिक प्रगति धीमी है। जनसंख्या का अत्यधिक होना व उसमें वृद्धि होते रहना भी यहां की गरीबी का एक महत्वपूर्ण कारण है।

(2) सामाजिक कारण-सामाजिक परिस्थिति भी गरीबी के कारणों में से एक है। जाति- प्रथा, संयुक्त परिवार प्रणाली, उत्तराधिकार नियम, शिक्षा, स्वास्थ्य, आदि भी गरीबी बनाये रखने में योगदान दे रहे हैं। भारतीय युवकों में साहस व सम्पन्नता का अभाव भी गरीबी के कारणों में से है।

(3) राजनीतिक कारण- ब्रिटिश काल में भारत का उपयोग उसके हित के विरूद्ध किया गया। वर्तमान में राजनीतिक नेताओं की कार्यपालिका स्वयं हित की है। राष्ट्रहित व समाज हित अब केवल कहने मात्र के लिए ही है। प्रशासनिक भ्रष्टाचार व अकुशलता बराबर बढ़ती जा रही है। आर्थिक शक्ति का केन्द्रीकरण भी गरीबी को बनाये रखने में योगदान दे रहा है।

गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम एवं पंचवर्षीय योजनाएं

(Poverty Eradication Programmes & Five-Year Plans)

हमारी योजनाओं में ‘सामाजिक न्याय’ (Social Justice) की बात बराबर कही गयी है, लेकिन अभी तक इस सम्बन्ध में कोई अधिक प्रगति नहीं हुई है। स्वयं छठवीं योजना में यह स्वीकार किया गया है कि वहां की लगभग 50 प्रतिशत जनसंख्या पिछले काफी लम्बे समय से गरीबी रेखा से नीचे रह रही है। छठवीं योजना के 10 प्रमुख उद्देश्य थे जिनमें से एक “गरीबी व बेरोजगारी के भार को उत्तरात्तर कम करना” (A progressive reduction in the incidence of poverty and unemployment) था। सातवीं योजना में भी गरीबी उन्मूलन की बात जोरदारी से कही गयी जबकि आठवीं योजना में भी इसे प्रमुख स्थान दिया गया। नवीं योजना में गरीबी उन्मूलन की दृष्टि से कृषि और ग्रामीण विकास को प्राथमिकता देने की बात की गई हैं।

योजनाओं से गरीबी उन्मूलन में कुछ प्रगति हुई है। गांवों में कृषि श्रमिकों को अब अधिक मजदूरी दी जा रही है। छोटे व सीमान्त किसानों को अब अधिक सुविधाएं दी जा रही हैं। छोटे- छोटे उद्योगपति व साहसी अब बनने लगे हैं। सरकार ने गरीबी उन्मूलन के लिए अनेक योजनाएं चलाई हैं जिनमें से कई अभी भी चल रही हैं, जैसे स्वर्ण जयन्ती ग्राम स्वरोजगार योजना (Swarana Jaynti Gram Swarozgar Yogna) जवाहर ग्राम समृद्धि योजना, आश्वासन योजना, प्रधानमन्त्री रोजगार योजना, व स्वर्ण जयन्ती शहरी रोजगार योजना।

भारत में गरीबी हटाने के लिए सुझाव

(Suggestions for Removal of Poverty in India)

भारत में गरीबी हटाने या कम करने के लिए निम्न सुझाव दिये जा सकते हैं :

(1) आर्थिक विकास में तेजी-भारत को सबसे पहले आर्थिक विकास की गति को तेज करना चाहिए जिससे कि जैसे-जैसे विकास की गति बढ़े वैसे-वैसे रोजगार की सुविधाएं भी बढ़ें। इससे गरीबी को हटाने या कम करने में सहायता मिलेगी। साथ ही कृषि व लघु एवं कुटीर उद्योगों को भी अपना विकास करने का अधिक-से-अधिक अवसर दिया जाना चाहिए। इससे भी विकास की गति तेज होगी क्योंकि यह अधिक रोजगार की सुविधाएं देने में समर्थ हैं, अतः गरीबी में कमी करके अपना अच्छा योगदान दे सकते हैं।

(2) ग्रामीण औद्योगिक- आज गांवों में पूर्ण बेरोजगारी व अल्प-बेरोजगारी पायी जाती है, अतः गरीबी भी वहीं अधिक है। अतः गांवों में औद्योगीकरण किया जाना चाहिए। ऐसे छोटे- छोटे कुटीर एवं लघु उद्योग स्थापित किये जाने चाहिए जिनमें अधिक रोजगार सुविधाएं मिलने की सम्भावनाएं हों। इससे न तो अति भीड़, परिवहन, मकान, आदि की समस्या उत्पन्न होगी और न औद्योगिक अशान्ति।

(3) ग्रामीण सार्वजनिक निर्माण कार्य- गांवों में सार्वजनिक कार्य तेजी से शुरू किये जाने चाहिए। इसके लिए सड़कें, नहरें, कुएं, ग्रामीण मकान, बिजली, आदि के निर्माण कार्य प्रारम्भ किये जा सकते हैं। इससे ग्रामीण बेरोजगारी में कमी होगी व गरीबी को कम करने में सहायता मिलेगी।

(4) कृषि विकास व भूमि सुधार- कृषि का विकास किया जाना चाहिए, लेकिन कृषि में यन्त्रीकरण को बढ़ावा न देकर श्रम को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। सिंचाई सुविधा को प्राथमिकता के आधार पर उपलब्ध किया जाना चाहिए। उत्तम बीज, रासायनिक खाद, कीटनाशक दवाइयां व अन्य आवश्यक साज-सज्जा से उपलब्ध करायी जानी चाहिए। गरीबी को कम करने के लिए भूमि सुधार करना भी आवश्यक है। भूमि कानून, अधिकतम जोत कानून, आदि को तेजी एवं प्रभावकारी ढंग से लागू किया जाना चाहिए। इससे भूमिहीन श्रमिकों को रोजगार सुविधाएं मिल सकेंगी व प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि होगी।

(5) सामाजिक सेवाएं व सुरक्षा- राज्य को सामाजिक सेवाएं; जैसे स्वास्थ्य, शिक्षा, मनोरंजन, आदि का विस्तार करना चाहिए और जनता को यह बताना चाहिए कि कम आय में वह किस प्रकार अच्छा जीवन व्यतीत कर सकती है। श्रमिकों व आम जनता के लिए सामाजिक सुरक्षा सेवाओं का विस्तार किया जाना चाहिए। गरीब को अपना मकान बनाने की सुविधा देने के लिए सहायता व अनुदान दिया जाना चाहिए। जीवन बीमा का ग्रामीण क्षेत्रों में विस्तार किया जाना चाहिए। ग्रामीण क्षेत्रों में उचित मूल्य की दुकानों की संख्या बढ़ायी जानी चाहिए।

(6) जनसंख्या नियन्त्रण- बिना जनसंख्या नियन्त्रण के गरीबी में कमी नहीं हो सकती है। अतः जनसंख्या को हर कीमत पर नियन्त्रण किया जाना चाहिए जिसके लिए परिवार कल्याण कार्यक्रम को प्रभावी ढंग से लागू किया जाना चाहिए।

अन्त में गरीबी में कमी करने का कार्य एक चुनौती है जिसे स्वीकार करने के लिए वृहत् व भारी मात्रा में प्रयास करने की आवश्यकता है जिससे कि रोजगार सुविधाएं बढ़ सकें व सामाजिक सेवाओं व सुरक्षा का विकास हो सके।

गरीबी एवं सामाजिक सुरक्षा (Poverty and Social Security)

वे व्यक्ति जो गरीबी की रेखा से नीचे अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं उनके लिए एक सामाजिक सुरक्षा योजना की स्वीकृति केन्द्रीय मन्त्रिमण्डल ने 20 जून, 2000 को दे दी है जिसके अनुसार इस योजना का नाम “जनश्री बीमा योजना” होगा तथा यह उन सभी व्यक्तियों को अपने अन्तर्गत ले लेगी जिनकी उम्र 18 व 60 वर्ष के बीच है। यह योजना एक सामूहिक बीमा योजना है जिसके लिए कम-से-कम 25 या अधिक व्यक्तियों के समूह बनाने होंगे तथा प्रत्येक बीमित व्यक्तियों को 200 रूपये प्रति वर्ष प्रीमियम देना होगा लेकिन इसका आधा अर्थात् 100 रुपये केन्द्रीय सरकार देगी। इस प्रकार बीमित व्यक्ति को केवल 100 रुपए प्रतिवर्ष या लगभग 8 रुपये महीने का बोझ ही सहना होगा। केन्द्रीय सरकार ने राज्य सरकारों से अपील की है कि वे इसका आधा अर्थात् 50 रूपए प्रति वर्ष प्रति व्यक्ति के खुद सहन कर लें तो मात्र 50 रुपए प्रति वर्ष ही प्रति व्यक्ति को दहन करना पड़ेगा। इस योजना के अन्तर्गत यदि बीमित व्यक्ति की मृत्यु प्राकृतिक (Natural) रूप में होती है तो उसके वारिसों को 20,000 रुपए मिलेंगे परन्तु यदि मृत्यु आकस्मिक (Accidental) होती है तो देय राशि 50,000 रुपए होगी। इसी प्रकार यदि बीमित व्यक्ति आंशिक रूप से अयोग्य हो जाता है तो क्षतिपूर्ति की रकम 25,000 रूपए होगी। यह योजना जीवन बीमा निगम (LIC) द्वारा चलायी जावेगी।

केन्द्रीय मन्त्रिमण्डल ने Janta Personal Accident Insurance Policy की भी स्वीकृति दी है जिसमें कोई भी व्यक्ति 15 रूपये प्रीमियम देकर इस पॉलिसी को साधारण बीमा निगम से ले सकता है। इस पॉलिसी की अवधि 1 वर्ष होगी। यदि इस अवधि में बीमाधारक की मृत्यु किसी Accident से हो जाती है तो उसके वारिस को 25,000 रूपए हर्जाने के रूप में मिलेंगे। लेकिन आंशिक रूप से अयोग्य होने पर केवल 12,500 रूपए ही मिलेंगे।

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Pankaja Singh

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