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डॉ० रामस्वरूप चतुर्वेदी की समीक्षा दृष्टि | डॉ० रामस्वरूप चतुर्वेदी की भाषिक समीक्षा सम्बन्धी मान्यता | डॉ० रामस्वरूप चतुर्वेदी की समीक्षा दृष्टि का अवलोकन

डॉ० रामस्वरूप चतुर्वेदी की समीक्षा दृष्टि | डॉ० रामस्वरूप चतुर्वेदी की भाषिक समीक्षा सम्बन्धी मान्यता | डॉ० रामस्वरूप चतुर्वेदी की समीक्षा दृष्टि का अवलोकन

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डॉ० रामस्वरूप चतुर्वेदी की समीक्षा दृष्टि

हिन्दी आलोचना जगत में एक नव आलोचक के रूप में डॉ० रामस्वरूप चतुर्वेदी का महत्वपूर्ण योगदान है। डॉ० चतुर्वेदी आलोचना के क्षेत्र में एक प्रतिष्ठित हस्ताक्षर माने जाते हैं। डॉ० चतुर्वेदी प्रारम्भ से लेकर आज तक इस विधा को समृद्ध बनाने में लगे हुए हैं। उनके द्वारा लिखे गए ग्रन्थों में हिन्दी नव लेखन तथा भाषा और सम्वेदना विशेष उल्लेखनीय है। हिन्दी नव लेखन’ में उन्होंने नई कविता सम्बन्धी अपना विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत किया है। ‘भाषा और सम्वेदना’ नामक उनका दूसरा ग्रन्थ हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में विशेष चर्चित एवं प्रतिष्ठित हुआ। इसी पुस्तक के आधार पर उनके भाषिक समीक्षा का आकलन किया जा सकता है। भाषा और सम्वेदना के अन्तर्गत काव्य भाषा को कबिता के प्रतिमान के रूप में स्थापित किया है। काव्य भाषा के प्रतिमान की चर्चा करते हुए वे लिखते हैं, ‘वर्तमान युग अर्थात् आज की कविता को जाँचने के लिए, जो अब सचमुच ‘पास के रजत पाश से मुक्त हो चुकी है, अलंकारों की उपयोगिता अस्वीकार कर चुकी है और छन्दों की पायलें उतार चुकी है। काव्य भाषा का प्रतिमान ही अब केवल बचा है। क्योंकि कविता के संगठन ने भाषा प्रयोग की मूल और केन्द्रीय स्थिति है।’

डा. रामस्वरूप चतुर्वेदी ने नूतन प्रतिमानों का व्यावहारिक प्रयोग नई कविता विशेषकर अज्ञेय की कविताओं पर किया है और इस दृष्टि से अज्ञेय का नूतन मूल्यांकन प्रस्तुत किया। अज्ञेय से प्रोत्साहित होकर डॉ० चतुर्वेदी ने मध्ययुग के काव्य रचनाकारों (कवियों) का भाषिक विश्लेषण प्रस्तुत किया है। अतः उन्होंने अपने भाषिक विश्लेषण के अन्तर्गत सन्त कबीर से लेकर भिखारीदास तक प्रायः सभी भक्ति और रीतियुगीन प्रमुख कवियों का भाषिक विश्लेषण प्रस्तुत किया जो निःसंदेह अपने आप में हिन्दी आलोचना जगत की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। तथा साथ ही छायावादी काव्य के प्रमुख कवियों में एक श्री जयशंकर प्रसाद के कामायनी महाकाव्य का पुनर्मूल्यांकन करके उन्होंने हिन्दी में पुनर्मूल्यांकन की समस्या को हल करने का एक सफल प्रयास किया है।

वर्तमानकाल में आलोचना का क्षेत्र बढ़ता ही चला जा रहा है। ठीक इसी तरह नूतन आलोचकों की सूची भी नई कविता की रचनाकारों की तरह लम्बवत बढ़ती ही जा रही है। इन नये आलोचकों में कुछ शुद्ध आलोचक हैं तो कुछ कवि आलोचक भी हैं और इन सबने सम्मिलित रूप से हिन्दी आलोचना को एक नया आयाम दिया है और बराबर अभी भी इस ओर लगे हुए हैं। ऐसे आलोचकों में गिरिजाकुमार माथुर, शमशेर बहादुर सिंह, धर्मवीर भारती, रघुवीर सहाय,  विपिन अग्रवाल, देवीशंकर अवस्थी, जगदीश गुप्त, श्रीकान्त वर्मा, अजित कुमार, अशोक बाजपेयी तथा रमेशचन्द्र शाह, डॉ० मोहन अवस्थी, डॉ० सत्य प्रकाश मिश्रा तथा डॉ० राम कमल राय के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं।

आधुनिक हिन्दी आलोचना को जिन से एक नई जीवन शक्ति और प्राणवत्ता प्राप्त हुई है, हिन्दी आलोचना के विकास की उन दो अन्य धाराओं का यहां उल्लेख करना प्रासंगिक है। इनमें से एक धारा नाट्यालोचना की है तो दूसरी कथा-समीक्षा की। नाट्यालोचना के क्षेत्र में सबसे महत्त्वपूर्ण आलोचक श्री नेमिचन्द्र जैन हैं जिन्होंने स्वातंत्र्योत्तर काल में सबसे अधिक नाटक-चर्चा में अपनी भागीदारी दिखाई है तथा नाटकों का विधिवत् अध्ययन प्रस्तुत किया है। नाटक सम्बन्धी गतिविधि का केन्द्र राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के साथ घनिष्ट रूप से जुड़े होने के कारण भी उन्होंने नाटक तथा रंगमंच में अपनी विशेष रुचि दिखाई है और तत्सम्बन्धी गम्भीर अध्ययन भी किया है। नाटक की एकमात्र स्तरीय पत्रिका ‘नटरंग’ का सम्पादन व लगातार कई वर्षों से सिर्फ अपने बलबूते पर ही करते जा रहे हैं और आज भी नाटक तथा रंगकार्य से किसी-न-किसी रूप में सक्रिय रूप से जुड़े हुए है! नाट्यालोचना सम्बन्धी इनके ग्रन्थों में ‘रंगदर्शन’ और ‘आधुनिक हिन्दी नाटक और रंगमंच विशेष उल्लेखनीय हैं जिनमें नाट्य-लेखन तथा मंचन से सम्बन्धित विभिन्न समस्याओं पर विस्तार के साथ विचार किया गया है। हिन्दी में नाट्यालोचना की यह परम्परा भारतेन्दु के ‘नाटक’ निबन्ध से प्रारम्भ हुई थी और आगे श्यामसुन्दर दास के रूपक रहस्य, जगन्नाथ प्रसाद शर्मा के ‘प्रसाद के नाटकों का शास्त्रीय अध्ययन तथा प्रसाद के नाटय-सम्बन्धी विवेचनों से होती हुई नेमिचन्द्र जैन तक पहुंची है। नाट्य समीक्षा की इस धारा को जैन के अतिरिक्त डॉ० लक्ष्मीनारायण लाल, डॉ० सिद्धनाथ कुमार, श्री विष्णु कान्त शास्त्री, गोविन्द चातक तथा बिपिन अग्रवाल आदि ने पूर्व की अपेक्षा अधिक समृद्ध किया है।

हिन्दी आलोचना साहित्य को सम्पूर्णता प्रदान करने के लिए एक सशक्त पीढ़ी कथा- आलोचकों की सामने आई है जिसने कथा-साहित्य के माध्यम से साहित्य मात्र के महत्त्वपूर्ण प्रश्नों को उठाया है और उनकी युगीन व्याख्या प्रस्तुत की है। निश्चित रूप से कथाकारों की इस आलोचना से हिन्दी आलोचना के क्षेत्र में विस्तार आया है और उसके मूल्य-सम्बन्धी विवेचनों में भी महत्त्वपूर्ण अभिवृद्धि हुई है। वैसे अभी तक कथा-साहित्य को काव्य-साहित्य के मुकाबले में कम करके ही आका जाता रहा है। इसीलिए काव्य-साहित्य को केन्द्र में रखकर ही आलोचना के सिद्धान्त गढ़े गये हैं। किन्तु अब समय आ गया है जब हमें कथा-साहित्य के साथ-ही-साथ कथा आलोचना के मूल्य को भी समझना है और उसे भी हिन्दी आलोचना की बहस के केन्द्र में लाना है; क्योंकि तभी हम हिन्दी आलोचना की सम्पूर्णता में विकसित कर सकेंगे, उसे समृद्ध बना सकेंगे और उसे प्रासंगिक बनाये रख सकेंगे। हिन्दी साहित्य के आधुनिक आलोचकों में इस चेतना का प्रादुर्भाव हो चुका है।

हिन्दी साहित्य के समीक्षाकारों ने कथा-आलोचना के इस क्षेत्र को सराहनीय विस्तार दिया है। न सिर्फ आलोचकों ने साथ ही लगभग सभी प्रसिद्ध कथाकारों ने भी इसके विकास में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। इस दृष्टि से प्रेमचन्द से लेकर ज्ञानरंजन तक एक लम्बी सूची ऐसे कथाकारों की बनाई जा सकती है जिन्होंने इस कथा-चर्चा में भाग लिया है और अपनी दृष्टि का विस्तार करने के साथ-ही-साथ हिन्दी आलोचना संसार को भी समृद्ध किया है। यशपाल, जैनेन्द्रकुमार, इलाचन्द्र जोशी, मोहन राकेश, शिवप्रसाद सिंह, मार्कण्डेय, राजेन्द्र यादव, कमलेश्वर, निर्मल वर्मा, अमरकांत, भैरव प्रसाद गुप्त आदि कथाकारों के विशिष्ट कथा- चिंतन और विचार इस दृष्टि से विशेष उल्लेखनीय है, जिनसे हिंदी आलोचना को एक ठोस आधार प्राप्त हुआ है। हिंदी आलोचना की यह सृजनात्मक प्रवाहमान धारा निरंतर अग्रसर है।

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Pankaja Singh

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