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नयी समीक्षा | नई समीक्षा की आधारभूत मान्यताएं | नई समीक्षा के प्रकार

नयी समीक्षा | नई समीक्षा की आधारभूत मान्यताएं | नई समीक्षा के प्रकार

नयी समीक्षा

ब्रिटेन निवासी प्रसिद्ध आलोचक रिचर्डस एवं ईलियट नई समीक्षा के प्रवर्तक माने जाते हैं। भावुकता का विरोध करने के साथ ही ईलियट ने स्वच्छन्दता की आत्मपरता पर बल दिया। समीक्षा कवि और उसकी रचना पर केन्द्रित हो गई, पाठक और कृति का सीधा और तटस्थ सम्बन्ध रखा गया। इलियट और रिचर्ड्स के अनुवर्ती समीक्षकों ने भी वाह्यारोपित अनुशासनों और मूल्यों की साहित्य समीक्षा को निरर्थक माना। क्लीश ब्रुक्श ने ऐतिहासिक पद्धति पर चोट किया, रैसम ने नैतिक मूल्यवादी समीक्षा पद्धति को सारहीन बताया। ब्लैक मूलर ने मार्क्सवादी समीक्षा पद्धति का निराकरण किया। नयी समीक्षा पद्धति को ही केन्द्र मानकर चलती हैं। कृति पर आधारित नयी समीक्षा पद्धति मुख्यतः दो रूप हैं-

  1. शैली तात्त्विक समीक्षा पद्धति
  2. अर्थतात्विक समीक्षा पद्धति

1. शैलीतात्विक पद्धति

आत्मपरक और वस्तुपरक दोनों दृष्टियों से शैली पर विचार किया जा सकता है। आत्मपरक दृष्टि प्रयोक्ता की मनःस्थिति पर केन्द्रित रहती है।

वस्तुपरक दृष्टि कृति पर आधुनिक शैली तत्त्व दूसरी दृष्टि को लेकर चलता है। शैली का अध्ययन कृति में प्रयुक्त भाषा रूपों, भाषा पर आरोपित अन्य व्यवस्थाओं और पारस्परिक सम्बन्धों का विश्लेषण है। विस्तृत अर्थ में शैली तत्त्व साहित्य के सरंचनात्मक सौन्दर्य के सभी पक्षों को अपने में समेट लेता है।

स्थिर और परिवर्तनशील प्रत्येक भाषा के दो तत्त्व होते हैं शैली तत्त्व परिवर्तनशील तत्त्वों को अधिक महत्व देता है। ये प्रयोक्ता की चुनाव प्रक्रिया से सम्बद्ध होते हैं। यही विचलनों की स्थिति होती है। विचलन भी दो प्रकार के होते हैं-परिस्थितिजन्य और व्यक्तिपरक। शैली में व्यक्तिपरक बिचलन अधिक महत्त्वपूर्ण होते हैं।

शैली निरूपण में वैयक्तिक विशेषताओं का अध्ययन भी रहता है। प्रेरक भाषागत चुनाव की प्रक्रिया को प्रभावित करता है, अनुप्राणित करता है और उसे दिशा भी देता है। प्रेरक जितना प्रखर होगा, उतना ही प्रबल शैली तत्त्व होता है। जब एक ही साथ अनेक प्रेरक तत्त्व आ जाते हैं तब चुनाव वैविध्यपूर्ण हो जाता है। इन क्षणों की शैली संरचना जटिल और मिश्रित होती है। सामान्य मनःस्थिति में जाने-पहचाने साधारण शब्दों का प्रयोग होता है। उत्तेजक प्रेरक स्थितियों में सघनता  आ जाती है। इन क्षणों में नवीन और मौलिक प्रयोग होते हैं। शैली का सम्बन्ध व्यक्तित्व से भी जोड़ा जाता है। शैली का अर्थ ही है सामान्य भाषा के बीच वैयक्तिक भाषा प्रयोग की स्थिति। सामान्य भाषा रूप में से वह निजी भाषा का रूप चुनता है। कृषि और सामान्य भाषा के अन्तर की स्थापना के लिए सांख्यिकी का भी प्रयोग होता है।

  1. अर्थतात्त्विक समीक्षा पद्धति-

रिचर्ड्स ने शब्दार्थ विज्ञान को सैद्धान्तिक रूप प्रदान किया इसके अनुसार वैज्ञानिक और आलंकारिक शब्द प्रयोग परस्पर भित्र होते हैं। रिचर्ड्स ने अर्थ का दो स्तर माना, शास्त्रीय अर्थ और भाव अर्थ रिचर्ड्स ने अर्थ के बौद्धिक पक्ष के महत्त्व को स्वीकार किया है। यदि भाषा में अर्थ परिवर्तन न हो तो उसकी सजीवता समाप्त हो जाती है। साहित्य सृजन का मुख्य आधार सजीवता से पूर्ण शब्द ही होते हैं।

अर्थ सिद्धान्त में सन्दर्भ तत्त्व भी सन्निहित हैं। एक शब्द अपने सहवर्ती शब्द से जीवन प्राप्त करता है। पूर्व सन्दर्भ से भी शब्द को शक्ति मिलती है। अर्थ शब्द इकाई से नहीं अपितु समस्त सन्दर्भों से प्राप्त होता है। पाठक सन्दर्भ से कवि के अर्थ में खो जाता है। परस्पर संक्रमित सन्दर्भों से एक नवीन अर्थ उत्पन्न होता है। अलंकार की प्रक्रिया का भी सन्दर्भ में बड़ा महत्व है। अलंकार भाषा का विधायक तत्त्व है। सन्दर्भ सिद्धान्त में अलंकार का विशेष महत्त्व है।

रिचर्डस ने अर्थतत्व का विस्तार इस प्रकार किया है कि लय भी उसके अन्तर्गत आ जाती है। लय और अर्थ एक-दूसरे से प्रभावित होते हैं। ध्वनि और लय शब्द को एक अतिरिक्त अर्थ देते हैं। अस्पष्टता को सैद्धान्तिक रूप सबसे पहले एम्पसन ने दिया। संदिग्ध अर्थ भाषा-प्रयोग की दुर्बलता का द्योतक है। एम्पसन ने दुरुहता के सात स्तर माने हैं। दुरूहता से कवि कौशल में निर्बलता आती है।

नई समीक्षा की आधारभूत मान्यताएं

हिन्दी में नई समीक्षा का स्वर ‘नई कविता’ पत्रिका (1954 ई0) के साथ ही मुखरित हुआ। विजयदेव नारायण साही ने 1953 ई० में ही नई कविता को कुत्सित समाजशास्त्रीय व्याख्या से मुक्त करने और नये लेखकों को एक ऐसी भाव-भूमि पर लाने का आह्वान कर चुके थे जहाँ लेखक अपनी वैयक्तिकता को सुरक्षित रखते हुए सामाजिकता को आत्मसात् कर सकते थे। स्पष्ट है कि इस समय तक हिन्दी कविता की दो धाराएँ हो गयी थीं-एक धारा आधुनिकतावादियों की थी और दूसरी उन यथार्थवादियों की जो मार्क्सवाद को केन्द्र में रखकर दलितों-शोषितों को सभी प्रकार के शोषणों से मुक्ति दिलाने में ही साहित्य कर्म की सार्थकता मानते थे। कविता की इन दो धाराओं के अनुसार हिन्दी समीक्षा की भी दो धाराएं स्पष्टरूप से प्रचलित हुई-एक आधुनिकतावादी धारा- जिसे नई समीक्षा जिसकी परंपरा पहले से ही चली आ रही थी। इस समय की नई समीक्षा के केन्द्र में थे-अज्ञेय और मार्क्सवादी समीक्षा के केन्द्र में मुक्तिबोध।

यहाँ पर आंग्ल-अमरीकी ‘नई समीक्षा का वेग समझ लेना जरूरी है। टी० एस० इलियट, आई० ए० रिचर्ड्स, जॉन को रेनाम, एलेन टेट, राबर्ट पेन वारेन आदि ने ‘नई समीक्षा’ का जो शास्त्र और दर्शन तैयार किया उसकी मुख्य बातें इस प्रकार हैं-

  1. रचना का मूल्यांकन रचना के रूप में ही करना अभीष्ट है।
  2. रचना की आन्तरिक संगति और संश्लिष्ट विधान के विवेचन-विश्लेषण के लिए उसका गहन पाठ आवश्यक है।
  3. रचना एक पूर्ण एवं स्वायत्त भाषिक संरचना है। इसलिए भाषा के सर्जनात्मक तत्त्वों का विश्लेषण ही नई समीक्षा का मुख्य कार्य है।
  4. ऐतिहासिक, समाजशास्त्रीय, दार्शनिक एवं विश्लेषणवादी समीक्षाएँ अनावश्यक एवं अप्रसांगिक हैं। क्योंकि ये साहित्येतर प्रतिमान हैं।

उपर्युक्त तथ्यों का हिन्दी साहित्य के नये समीक्षकों पर भी प्रभाव पड़ा। फलस्वरूप हिन्दी में ‘नई समीक्षा’ का प्रभाव पड़ा और इसका प्रसार हुआ। आधुनिक भावबोध को केन्द्र में रखकर समीक्षाकर्म में प्रवत्त होने वाले समीक्षकों में अज्ञेय, गिरिजाकमार माथुर, रघुवंश, लक्ष्मीकांत वर्मा, विजयदेव नारायण साही, जगदीश गुप्त, मलयज, रामस्वरूप चतुर्वेदी, अशोक वाजपेयी, रमेशचन्द्र शाह आदि के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं। इन नये समीक्षकों ने तत्त्युगीन परिवेश में व्याप्त ‘विसंगति’, विडम्बना, असहयता, एकाकीपन, अजनवीपन, ऊब, संत्रास, कुंठा आदि का विश्लेषण करते हुए ‘अनुभूति की प्रामाणिकता और व्यक्तित्व की अद्वितीयता को रेखांकित किया और ‘अस्मिता के संकट से गुजरते हुए मनुष्य की मुक्ति की आवश्यकता पर बल दिया। इसके साथ ही रचना को भाषिक सर्जना मानकर काव्यभाषा के विश्लेषण को नई समीक्षा का मुख्य विषय बनाया। नई समीक्षा की विशेषताओं को उद्घाटित एवं स्थापित करने वाली तथा इस दृष्टि से नई कविता और कवियों की समीक्षा करने वाली रचनाओं में अद्यतन (अज्ञेय) नई कविता के प्रतिमान (लक्ष्मीकान्त वर्मा) हिन्दी नव लेखन, काव्यधारा के तीन निबन्ध, भाषा और संवेदना (रामस्वरूप चतुर्वेदी) मानव मूल्य और साहित्य (धर्मबीर भारती) साहित्य का नया परिप्रेक्ष्य (रघुवंश) नयी कविता, सीमाएँ और सम्भावनाएँ (गिरिजा कुमार माथुर) आदि उल्लेखनीय हैं।

विशेष रूप से नई समीक्षा का सम्बन्ध कविता से ही रहा है। कहना चाहिए कि यह कविता केन्द्रित ऐसी आलोचना पद्धति भी जिसने कविता की स्वायत्तता और सर्जनात्मकता पर अधिक बल दिया। उपन्यास, कहानी, नाटक आदि गद्य विधाओं के मूल्यांकन के लिए इस पद्धति का उपयोग बहुत कम हुआ।

संरचना केन्द्रित नई समीक्षा की आलोचना दृष्टि को और अधिक सूक्ष्म और सघन करने वाली एक और समीक्षा पद्धति का विकास हुआ जिसे शैली विज्ञान कहा गया। यह भाषिक विश्लेषण की वह वैज्ञानिक पद्धति है जिसमें भाषा के सभी उपादानों-शब्द, पद, वाक्य, ध्वनि, छंद को अध्ययन का विषय बनाया जाता है। हिन्दी में इस समीक्षा पद्धति के पुरस्कर्ता हैं- रविन्द्रनाथ श्रीवास्तव, जिन्होंने शैली विज्ञान का सिद्धान्त भी तैयार किया और वैज्ञानिक समीक्षा भी लिखी।

हिन्दी में ‘नई समीक्षा शैली विज्ञान’ और ‘संरचनावाद’ के साथ ही सर्जनात्मक आलोचना की भी काफी चर्चा हुई है। मुक्तिबोध ने लिखा है- ‘आलोचक या समीक्षक का कार्य, वस्तुतः कलाकार या लेखक से भी अधिक तन्मयतापूर्ण और सृजनशील होता है, उसे एक साथ जीवन के वास्तविक अनुभवों के समुद्र में डूबना पड़ता है और उससे उबरना भी पड़ता है कि जिससे लहरों का पानी उसकी आँखों में न घुस पड़े।’

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Pankaja Singh

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