अर्थशास्त्र

समष्टि तथा व्यष्टि अर्थशास्त्र का परस्पर संबंध | The relation between macro and micro economics in Hindi

समष्टि तथा व्यष्टि अर्थशास्त्र का परस्पर संबंध | The relation between macro and micro economics in Hindi

समष्टि तथा व्यष्टि अर्थशास्त्र का परस्पर संबंध

वास्तव में व्यष्टि तथा समष्टि अर्थशास्त्र परस्पर निर्भर है। कुछ समझती परक आर्थिक समूह (सब नहीं) के व्यवहार संबंधी कुछ सिद्धांत व्यक्तिगत व्यवहार के सिद्धांतों से निकलते तथा व्युत्पादित (derive) किए जाते हैं। उदाहरण के लिए निवेश का सिद्धांत जो कि समष्टिपरक आर्थिक सिद्धांत का महत्वपूर्ण सिद्धांत है, व्यक्तिगत उद्गम करता के व्यवहार से जो कि व्युत्पादितयकीन किया जाता है। इस सिद्धांत के अनुसार एक व्यक्तिगत उद्गम करता अपनी निवेश संबंधी क्रियाओं में, यह कोर प्रत्याशित लाभ की दर और दूसरी ओर, ब्याज की दर से प्रभावित होता है। यही बात समझते निवेश फलन (aggregate investment function) के बारे में सत्य है। इसी प्रकार, समस्त उपभोग फलन (aggregate consumption function) व्यक्तिगत उपभोक्ताओं के व्यवहार-कला पर आधारित है। यहां इस बात पर ध्यान देना आवश्यक है कि समस्त निवेश फलन तथा उपभोग फलन, व्यक्तिगत इकाइयों की क्रियाओं का योगी कारण है क्योंकि इस संदर्भ में व्यक्तिगत इकाइयों का व्यवहार-कलापसमूह के व्यवहार से भिन्न नहीं है। इसके अतिरिक्त हम इन समूहों के व्यवहार को तभी व्युत्पन्न कर सकते हैं जबकि या तो समूहों का गठन स्थिर हो या गठन में किसी नियमित रूप से परिवर्तन हो जब समूह के आकार में परिवर्तन होता है। इससे यह नहीं समझना चाहिए कि समस्त समष्टिपरक आर्थिक संबंधों की व्यवहार विधि उनका गठन करने वाली इकाइयों के व्यवहार कलापो के अनुरूप होती है। जैसा कि हमने ऊपर रेखा की एक अर्थव्यवस्था में बचत-निवेश संबंधित तथा मजदूरी-रोजगार संबंधी उनके अनुरूप व्यक्तित् भागों में संबंधित से भिन्न होते हैं।

व्यष्टि परक आर्थिक सिद्धांत समष्टि परक आर्थिक सिद्धांत को एक और प्रकार से भी सहायता प्रदान करता है। केंज ने भी देश में मुद्रा-पूर्ति में वृद्धि के परिणाम स्वरुप मुद्रा स्फीति कोई स्पष्ट करने के लिए सामान्य कीमत-स्तर के निर्धारण की व्याख्या के लिए सापेक्ष कीमतों (relative prices) के व्यष्टि परक सिद्धांत का अपने समष्टि परक आर्थिक सिद्धांत प्रतिपादित करने में सहारा लिया। केंज के अनुसार जब मुद्रा-पूर्ति और तदनुरूप समस्त मांग में वृद्धि के परिणाम स्वरूर अधिक उत्पादन किया जाता है तो उत्पादन लागत में वृद्धि हो जाती है। उत्पादन लागत  2)में वृद्धि के कारण कीमत बढ़ जाती है। केंज के अनुसार, उत्पादन, लागत दो कारणों से बढ़ती है-(1) हास्यमान प्रतिफल के नियम (Law of Diminishing Returnee) के लागू होने के कारण तथा (2) अर्थव्यवस्था के पूर्णरोजगार स्तर के निकट पहुंचने के कारण कच्चे माल की कीमतें तथा मजबूरियां बढ़ जाने के कारण। उत्पादन लागत, हास्य मान प्रतिफल आदि का कीमत निर्धारण पर प्रभाव व्यष्टि-अर्थशास्त्र का ही भाग है।

केवल समष्टि-अर्थशास्त्र ही व्यष्टि-अर्थशास्त्र पर निर्भर नहीं करता बल्कि व्यष्टि-अर्थशास्त्र भी कुछ सीमा तक, समष्टि-अर्थशास्त्र पर निर्भर करता है। लाभ की दर तथा ब्याज की दर का निर्धारण व्यष्टि-अर्थशास्त्र के सुप्रसिद्ध विषय है, परंतु समष्टि परक समूहों पर इनकी निर्भरता अत्यधिक है। व्यष्टि परक आर्थिक सिद्धांत में लाभों को अनिश्चितता वहन करने का पारितोषिक माना जाता है, परंतु व्यष्टि परक आर्थिक सिद्धांत यह स्पष्ट नहीं कर पाता कि उद्धव करता को प्राप्त होने वाले लाभों के आकार को कौन सी आर्थिक शक्तियां निर्धारित करती है और उनमें उच्चावचन क्यों होते हैं। लाभों का आकार अर्थव्यवस्था में समस्त मांग के स्तर, राष्ट्रीय आय और सामान्य कीमत- स्तर पर निर्भर करता है। हम जानते हैं कि मंदी काल में जब की समस्त मांग,राष्ट्रीय आय और सामान्य कीमत- स्तर निम्न होते हैं तो अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में उ बुद्मकर्ताओं का हानि होती है। दूसरी ओर, जब समस्त मांग, राष्ट्रीय आय तथा सामान्य कीमत- स्तर मेंजिद्दी होती है और तेजी की दशाएं प्रचलित होती हैं तो उपक्रमियों को अत्यधिक लाभ होते हैं।

अब ब्याज की दर का उदाहरण लीजिए। वास्तव में ब्याज की दर का सिद्धांत अब समष्टि परक आर्थिक सिद्धांत का ही विषय बन गया है। ब्याज का आंशिक संतुलन सिद्धांत (Partial  equilibrium theory ) उन सब शक्तियों का वर्णन नहीं करता जो ब्याज की दर का निर्धारण करती है। केंज ने स्पष्ट किया कि ब्याज की दर अर्थव्यवस्था में नकदी अधिमान फलन (liquidity preference function) तथा मुद्रा के भंडार (पूर्ति) से निर्धारित होती है। अर्थव्यवस्था मैं नकद अधिमान फलन तथा मुद्रा का भंडार (stock) समष्टि परक आर्थिक धारणाएं हैं। निस्संदेह इस संबंध में केंज के सिद्धांत को अनिर्दिष्ट(indeterminate ) बताया गया है परंतु ब्याज के आधुनिक सिद्धांत में नकदी अधिमान तथा मुद्रा-पूर्ति की सामूहिक धारणाएं ब्याज के निर्धारण की व्याख्या में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। इसके अतिरिक्त, ब्याज के आधुनिक सिद्धांत (अर्थात LM तथा   IS वक्रों ब्याज का निर्धारण) मैं नकदी अधिमान लता मुद्रा की पूर्ति के साथ साथ दो अन्य शक्तियां, जो कि ब्याज का निर्धारण करती हैं, वे बचत व निवेश फलन हैं जिनका वर्णन भी सामूहिक अथवा समष्टि परक चारों में किया जाता है।

इस प्रकार उपरोक्त वर्णन से स्पष्ट है कि समष्टि अर्थशास्त्र के उपकरणों तथा धारणाओं के बिना लाभों वह ब्याज की दरों के निर्धारण को स्पष्ट नहीं किया जा सकता है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि यद्यपि व्यष्टि अर्थशास्त्र तथा समष्टि अर्थशास्त्र विभिन्न विषयों का अध्ययन करते हैं, परंतु इन दोनों में गहन परस्पर निर्भरता है। विभिन्न आर्थिक तथ्यों की व्याख्या में समष्टि व व्यष्टिअच्छे शास्त्रों के उपकरणों तथा धारणाओं का प्रयोग करना होता है। परस्पर निर्भरता के संबंध में प्रोफेसर ऐकले(Ackeley) का कथन महत्वपूर्ण है। उनके अनुसार,

“समष्टि अर्थशास्त्र तथा व्यक्तिगत व्यवहार के सिद्धांत के संबंध में दो और यातायात (two-way traffic) है। एक और व्यष्टि परक आर्थिक सिद्धांत हमारे सामूहिक सिद्धांतों के लिए निर्माण ब्लॉक प्रदान करता है। दूसरी ओर समष्टि-अर्थशास्त्र व्यष्टि-अर्थशास्त्र को समझने में सहायक है।

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Pankaja Singh

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