अर्थशास्त्र

पैमाने के प्रतिफल नियमों की व्याख्या | हास्य मान प्रतिफल नियम

पैमाने के प्रतिफल नियमों की व्याख्या | हास्य मान प्रतिफल नियम

पैमाने के विचार से आशय

फर्म के पैमाने की स्थापना तब होती है जब कि स्थिर साधनों को जितना गुना बढ़ाया जाता है उतना ही गुना परिवर्तनशील साधनों को भी बढ़ा दिया जाता है। इस प्रकार पैमाने को बढ़ाने का अर्थ है सभी साधनों को यह कहीं अनुपात में बढ़ाना।

पैमाने के प्रतिफल’ की धारणा (पैमाने के प्रतिफल नियमों की व्याख्या) –

‘पैमाने के प्रतिफल’ का विचार इस बात का अध्ययन करता है कि यदि सब साधनों को बढ़ाया जाए किंतु उनके मिलने के अनुपात को वहीं रहने दिया जाए, तो उत्पादन में किस प्रकार से परिवर्तन होगा। इसी बात को यह भी कह सकते हैं कि यदि एक विशेष पैमाना मानकर रेखा पर साधनों की मात्राएं परिवर्तित की जाती है तो उत्पादन में परिवर्तन होगा। साधनों में इस प्रकार के परिवर्तनों के प्रत्युत्तर में उत्पादन की प्रतिक्रिया को ‘पैमाने का प्रतिफल’ कहां जाता है।

जब साधनों के अनुपात को यथावत रखते हुए उनकी मात्राएं बढ़ाई जाती है (और इस प्रकार उत्पादन का पैमाना बढ़ाया जाता है) तब प्राप्त उत्पादन मात्रा (अर्थात प्रतिफल निम्न तीन अवस्थाएं प्रस्तुत करती हैं,) यथा-

() पैमाने के बढ़ते हुए प्रतिफल की अवस्था

जब एक पैमाना रेखा पर चला जाता है अर्थात सभी साधनों को यह कहीं अनुपात में बढ़ाया जाता है और इस प्रकार उत्पादन में वृद्धि होकर उत्पादन में अधिक अनुपात में वृद्धि होती है,तो कहा जाएगा कि उत्पादन की रेखा पैमाने के बढ़ते प्रतिफल को व्यक्त कर रही है अथवा अब उत्पादन प्रक्रिया पैमाने का बढ़ता हुआ प्रतिफल प्रदान कर रही होती है। तब उत्पादन में उत्तर उत्तर समान वृद्धियां प्राप्त करने के लिए साधनों की मात्राओं में क्रमशः कम और कम वृद्धि की आवश्यकता पड़ती है।

साथ के चित्र में जो कि समोत्पाद मानचित्र है,OE पैमाना रेखा है। IP1, IP2, IP3, और IP4 क्रमशः 20, 40, 60 और 80 इकाइयों के बराबर उत्पादन को दर्शाती है, अर्थात उत्पादन में 20 इकाइयों के बराबर एक समान वृद्धि को सूचित करती है। ये पैमाना रेखा AB, BC और CD टुकड़ों में विभाजित कर देती है।प्रत्येक टुकड़ा दोनों साधनों की एक निश्चित मात्रा बताता है। प्रत्येक टुकड़े की लंबाई कम होती जाती है, यथा AB >BC >CD। इन घटते हुए टुकड़ों का अभिप्राय यह है कि साधनों की क्रमशः घटती हुई मात्राओं के प्रयोग से उत्पादन में एक समान वृद्धि हो रही है। यही पैमाने के बढ़ते हुए प्रतिफल की अवस्था है।

(ब) पैमाने का समान या स्थिर प्रतिफल की अवस्था-

जब एक पैमाना रेखा पर चला जाता है अर्थात साधनों को यह कहीं अनुपात में बढ़ाया जाता है, और इस प्रकार उत्पादन के पैमाने में वृद्धि होकर उत्पादन में भी यदि उसी अनुपात में वृद्धि होती है, तो कहा जाता है कि उत्पादन प्रक्रिया पैमाने के समान प्रतिफल प्रदान कर रही है। अथवा, जब उत्पादन प्रक्रिया पैमाने के समान प्रतिफल प्रदान कर रही है तब उत्पादन में क्रमशः समान वृद्धियांप्राप्त करने के लिए साधनों की मात्राओं में भी क्रमशः सामान वृद्धि की आवश्यकता पड़ती है.

चित्र IP1, IP2, IP3, और IP4 समोत्पाद रेखाएं, जो क्रमशः 10, 20, 30 और 40 इकाइयों के बराबर उत्पादन दिखलाती है अर्थात उत्पादन में एक समान =(10 इकाइयों के बराबर) वृद्धि सूचित करती है,OE पैमाना रेखा AB BC और CD तू करो मैं बांटती है जोकि बराबर है अर्थात AB = BC = CD। इन टुकड़ों के समान होने का अभिप्राय-

यह है की दो साधनों X और Y को क्रमशः बराबर मात्राओं के प्रयोग से उत्पादन में एक समान वृद्धि प्राप्त की जा रही है। यही ‘पैमाने के समान प्रतिफल’ की अवस्था है।

(स) पैमाने के घटते हुए प्रतिफल की अवस्था

जब उत्पादन के साधनों (पड़तों)की मात्रा में वृद्धि करने के उत्पादन में उससे कम अनुपात में वृद्धि होती है तो उसे ‘पैमाने का घटता हुआ प्रतिफल’ कहते हैं। जैसे उत्पादन की साधनों की मात्रा में 10 प्रतिशत वृद्धि करने पर उत्पादन की मात्रा में 10% कम वृद्धि हो।

जब उत्पादन के स्तर को सर्वोत्तम बिंदु से भी आगे बढ़ा दिया जाता है तो फर्म को बहुत-सी अमित- व्ययिताओं का सामान करना पड़ता है। उसे अब बड़े पैमाने के उत्पादन के लाभ प्राप्त नहीं होते और उत्पादन प्रति इकाई कम प्राप्त होता है।ये अमितव्ययिताएं वास्तव में बड़े पैमाने के उत्पादन की जटिलताओं व समस्याओं के कारण पैदा होती है। उदाहरणार्थ, श्रम साधन में वृद्धि से उनकी क्रियाओं में समन्वय एवं नियंत्रण के लिए अधिक प्रबंधकीय व्यक्तियों की आवश्यकता पड़ती है। प्रबंधकों को निर्णय लेने में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। विस्तार सील फर्म के विभिन्न भागों में सामंजस्य स्थापित करना अत्यधिक कठिन कार्य हो जाता है। लालफीताशाही बढ़ जाती है। यहां तक कि महत्वपूर्ण निर्णय भी तत्परता से नहीं लिए जा सकते हैं। कार्य-कुशलता में गिरावट आ जाती है।

इस प्रकार जब उत्पादन के स्तर को ‘सर्वोत्तम-बिंदु’ के बाद बढ़ाया जाता है तो आंतरिक बाहृया अमितव्ययिताओं के परिणाम स्वरूपटाइम आने की घटती हुई प्रतिफल अवस्था कार्यशील हो जाती है और प्रतीक आई उत्पादन में वृद्धि शुरू हो जाती है।

पैमाने के घटते प्रतिफल का उदाहरण द्वारा स्पष्टीकरण

पैमाने के प्रतिफल का स्पष्टीकरण निम्न सारणी की सहायता से भी किया जा सकता है-

सारणी: पैमाने का घटता प्रतिफल (रुपयों में)

स्थितियाँ

श्रम + पूजी

कुल उत्पत्ति

(इकाइयाँ)

कुल लागत

(TC)

औसत लागत

(AC)

सीमान्त लागत

(MC)

स्थिति 1

1 + 1

1

20

20.0

20.00

स्थिति 2

2 + 2

3

40

13.33

10.00

स्थिति 3

4 + 4

12

80

6.67

4.44

स्थिति 4

8 + 8

24

160

6.67

6.67

स्थिति 5

16 + 16

40

320

8.00

10.00

स्थिति 6

32 + 32

50

640

12.80

32.00

यहां भी श्रम और पूंजी का प्रति इकाई मूल्य 10 रुपये माना गया है। जिस बिंदु से पैमाने का घटता प्रतिफल प्रारंभ होता है, उस पर सीमांत लागत (MC) और औसत लागत (AC) बराबर होती है। उपर्युक्त सारणी में यह बिंदुओं से स्थान पर है जहां औसत लागत और सीमांत लागत 6.67 है। सीमांत लागत व औसत लागत के बढ़ने पर सीमांत लागत (MC) औसत लागत(AC) के ऊपर होती है। (जैसा की चित्र में दिखाया गया है) लागते बढ़ती हुई दर से बढ़ती है।

निम्न रेखा चित्र में पैमाने के घटते हुए वक्र को समुतपाद वक्र की सहायता से समझाने का प्रयत्न किया गया है।

इस रेखा चित्र में समुत्पाद रेखाएं IP1, IP2, IP3, कथा IP4 क्रमशः उत्पादन की 100,200,300 तथा 400 इकाइयों को दर्शाती है अर्थात प्रत्येक समुत्पाद वक्र पर उत्पादन की मात्रा में एक समान 100 इकाइयों की वृद्धि होती दिखाई गई है। यह विभिन्न समुत्पाद रेखाएं पैमाने की रेखा OR को विभिन्न टुकड़ों; जैसे- OA, AB, BC तथा CD मैं विभाजित करती है, प्रत्येक टुकड़े की लंबाई बढ़ती जाती है अर्थात OA < AB < BC < CD। इसका तात्पर्य हुआ के उत्पादन की तृतीय अतिरिक्त 100 इकाइयों का उत्पादन करने के लिए श्रम एवं पूजी की अधिकाधिक मात्राओं का प्रयोग किया जाता है। अतः इस अवस्था को पैमाने के घटते हुए प्रतिफल की अवस्था कहा जाता है।

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Pankaja Singh

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