अर्थशास्त्र

अल्पकाल में लागत | औसत लागत एवं सीमांत लागत में संबंध

अल्पकाल में लागत | औसत लागत एवं सीमांत लागत में संबंध

अल्पकाल में लागत

अल्पकाल में लागत – अल्प काल की समयावधि में कुल साधन परिवर्तनशील होते हैं तथा कुछ साधन स्थिर होते हैं। अतः अल्पकाल में कोई भी अपनी उत्पादन मात्रा या पूर्ति में पूर्णतःपरिवर्तन नहीं कर सकता। वह केवल परिवर्तनशील साधनों की सहायता से ही पूर्ति में थोड़ा ही सूक्ष्मपरिवर्तन कर सकता है। इसका कारण यह है कि अल्पकाल में उत्पादन के पास इतना समय नहीं होता कि वह उत्पादन के सभी साधनों में परिवर्तन कर सके क्योंकि कुछ साधन ऐसे होते हैं जो कि अल्पकाल में स्थिर होते हैं और उनकी मात्रा को अल्पकाल में परिवर्तित नहीं किया जा सकता है। ये साधन हैं- भूमि, मशीन, बिल्डिंग आदि। अल्पकाल में ही स्थित साधनों को किया गया भुगतान आही उत्पादन की स्थिर लागतें कहलाती है।

दूसरी ओर कुछ साधन जो की अल्प काल में परिवर्तनशील होते हैं, जैसे-श्रम, कच्चा माल, विद्युत आदि। इनकी मात्रा को अल्पकाल में भी परिवर्तित किया जा सकता है। इन साधनों को किया गया भुगतान अल्पकाल में परिवर्तनशील लागतें कहलाती हैं।

इस प्रकार अल्पकाल में उत्पादन की मात्रा में वृद्धि करने के लिए कुछ लागतेंस्थिर रहती हैं और कुछ परिवर्तनशील। अल्पकाल में लागत का अध्ययन निम्न शीर्षकों द्वारा किया जा सकता है- I कुल लागतें, II- औसत लागत या प्रति इकाई लागत, III-सीमांत लागत।

i. कुल लागतें-

किसी वस्तु का उत्पादन करने में जो कुछ भी व्यय आता है,उसे उत्पादन की कुल लागत कहा जाता है। कुल लागत में निम्न दो प्रकार की लागतें शामिल रहती हैं-। 1. स्थिर या पूरक लागत, 2. परिवर्तनशील लागत या प्रमुख लागत।

  1. स्थिर लागत या पूरक लागत

स्थिर लागतों से तात्पर्य उन लागतों से है जो कि स्थिर साधनों के ऊपर किए गए व्यय के फल स्वरुप उठाई जाती है। दूसरे शब्दों में, स्थिर लागतें वे लागतें हैं जो स्थिर साधनों के ऊपर उठाई जाती है और उत्पादन की प्रत्येक अवस्था में उत्पादकों को सहन करना आवश्यक हो जाता है चाहे उत्पादन कम हो या अधिक याबंद ही क्यों ना हो। यह लागत उत्पादन की मात्रा के साथ परिवर्तित नहीं होती है। प्रोफेसर बेन के अनुसार, “स्थिर लागत वह लागत है जिसकी कुल राशि अल्पकाल में उत्पादन की मात्रा में परिवर्तन होने पर पूर्णतः या अपरिवर्तित रहती है।”

उपर्युक्त चित्र में TFC रेखा कुली स्थिर लागत को दर्शाती है। TFC रेखा OX अक्ष के समांतर है जिसका अर्थ है कि उत्पादन की मात्रा चाहे जितनी ही हो, स्थिर लागत अपरिवर्तित रहती है।

  1. परिवर्तनशील या प्रमुख लागत

परिवर्तनशील लागतें वे लागतेंहोती हैं जो कि परिवर्तनशील साधनों को काम पर लगाने पर उठाई जाती हैऔर जिन्हें अल्पकाल में बदला जा सकता है। इसका तात्पर्य है कि कुल परिवर्तनशील लागतें अल्पकाल में उत्पादन में परिवर्तन के फल स्वरूप बदल जाती हैं अर्थात जब उत्पादन में वृद्धि होती है तो ये लागतें बढ़ जाती है और उत्पादन में कमी होती है तो ये लागतें भी बढ़ जाती है।

यदि किसी भी कारण से उत्पादन बंद भी हो जाता है तो परिवर्तनशील लागत शुन्य हो जाती है। प्रोफेसर बैन के अनुसार, “परिवर्तनशील लागत वे लागत हैं जिन की राशि उत्पादन की मात्रा में परिवर्तन होने पर परिवर्तित होती है।

उपरोक्त चित्र में TVC कुल परिवर्तनशील लागत वक्र है जोकि बाएं से दाएं ऊपर की ओर उठता हुआ है। इसकी इस प्रकार की आकृति का अर्थ यह है कि उत्पादन मात्रा के बढ़ने से कुल परिवर्तनशील लागत बढ़ती है किंतु इसकी बढ़ने की दर में परिवर्तन होता जाता है, अतः TVC वक्र लागत भी आकार का न होकर एक वक्र की आकृति का होता है।

इस प्रकार वस्तु के उत्पादन की कुल लागत (TC) उत्पादन की पुलिस फिर लागतों और कुल परिवर्तनशील लागतों का योग होती है।

अतः कुल लागत = कुल स्थिर लागत + कुल परिवर्तनशील लागत

TC = TFC + TVC

ध्यान देने योग्य बात यह है कि चूंकी कुल लागत का एक भाग अर्थात कुल परिवर्तनशील लागत उत्पादन में परिवर्तन के साथ बदलता है, अतः कुल लागत भी उत्पादन की मात्रा में परिवर्तन के साथ बदलेगी। इस प्रकार,उत्पादन की मात्रा बढ़ने पर कुल लागत बढ़ेगी और उत्पादन की मात्रा के घटने पर कुल लागत घटेगी। निम्न चित्र में कुल लागत वक्र को (TC) को TFC और TVC वक्रों के साथ दर्शाया गया है।

चित्र में TFC रेखा X अक्ष के प्रति समांतर है जिसका अभिप्रायहाय की उत्पादन का स्तर चाहे जो भी हो कोई स्थिर लागत स्थिर रहती है। चित्र को देखने से ही स्पष्ट होता है कि TFC रेखा Y- अक्ष की एक बिंदु से प्रारंभ होती है जिसका तात्पर्य है कि उत्पादन चाहे शून्य भी हो जाए फिर भी उत्पादन को TFC के बराबर लागत को सहन करना पड़ेगा।

इसके विपरीत, चित्र में देखने से ज्ञात होता है कि TVC वक्र मूल बिंदु से ऊपर की ओर बढ़ता जाता है जो कि इस बात को व्यक्त करता है कि जैसे-जैसे उत्पादन में वृद्धि की जाती है वैसे- वैसे कुल परिवर्तनशील लागत भी बढ़ती जाती है। TVC वक्र को मूल बिंदु से आरंभ होने का अर्थ यह है कि जब उत्पादन शून्य होता तो परिवर्तनशील लागत भी शून्य होगी।

चित्र में कुल लागत वक्र (TC) TFC वक्र की आरंभ बिंदु से प्रारंभ होता है। TC वक्र को TFC के ऊपर TVC को जोड़ने से प्राप्त किया जाता है क्योंकि कुल लागत, कुल स्थिर लागत और कुल परिवर्तनशील लागत का जोड़ होती है। चित्र को देखने में यह भी स्पष्ट होता है कि TVC और TC के बीच का अंतर उत्पादन के सभी स्तरों पर समान है। कारण यह है कि TVC वक्र और TC वक्र के बीच अंतर की मात्रा को व्यक्त करता है जो कि अल्पकाल में उत्पादन के बढ़ने पर स्थिर रहती है। चित्र से यह भी स्पष्ट है कि TC वक्र का आरंभ बिंदु Y अक्ष का वह बिंदु है जहां से TFC वक्र आरंभ होता है, जिसका अर्थ है कि उत्पादन शून्य होने पर कुल लागत, कुल परिवर्तनशील लागत की बराबर होगी क्योंकि उत्पादन स्तर शून्य होने पर परिवर्तनशील लागत पूर्णत: समाप्त हो जाती है। चित्र से यह भी स्पष्ट है कि TVC वक्र के बढ़ने की गति एवं TC वाटर के बढ़ने की गति एक समान है। इसका कारण यह है कि TC वक्र के अनुसार,उत्पादन के विभिन्न स्तरों पर परिवर्तित होती हुई कुल परिवर्तनशील लागत (TVC) अपने परिवर्तन के अनुपात में ही परिवर्तन करती है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि TVC उत्पादन की मात्रा का एक फलन होती है। अर्थात

TVC = f(Q)

इसी प्रकार TC भी उत्पादन की मात्रा का फलन है अर्थात

TC = f(Q)

ii. औसत लागत या प्रति इकाई लागत

औसत लागत किसी वस्तु के उत्पादन की प्रति का इलाज होती है। व्यवसाई तथा अर्थशास्त्री द्वारा उत्पादन की कुल लागतों की तुलना में अवसर लागतों का हीअधिक प्रयोग किया जाता है। अतः औसत लागतों तथा औसत वक्रों की व्याख्या करना आवश्यक है।

  1. औसत स्थिर लागत

कोली स्थिर लागत में उत्पादन की कुल उत्पत्ति इकाइयों से भाग देने पर औसत स्थिर लागत प्राप्त होती है अर्थात स्थिर लागत उत्पादन की प्रतीक आइ स्थिर लागत होती है। अतः सूत्रानुसार

औसत स्थिर लागत = औसत स्थिर लागत/उत्पादन मात्रा

AFC =TFC/Q

 औसत स्थिर लागत (TFC) व कृषि संबंधित कुछ मुख्य बातें हैं जो कि निम्न हैं-

(a)यह बाएं से दाएं नीचे की ओर गिरता हुआ होता है इसका कारण है कि कोली स्थिर लागत अपरिवर्तित होती है और जैसे-जैसे उत्पादन की मात्रा में वृद्धि होती है AFC कम होती है।

(b) AFC कभी भी शून्य नहीं हो सकती है।

(c) AFC बकरे अपनी प्रारंभिक अवस्था में तेजी से गिरता है और इसके बाद कम तेजी से।

(d) AFC वक्र कभी भी अक्षांशों को नहीं छूता न X- अक्ष को और न ही Y- अक्ष को । इसलिए AFC का आकार आयताकार अति परवलय के समान होता है।

  1. औसत परिवर्तनशील लागत

कुल परिवर्तनशील लागत में वस्तु की कुल उत्पादन मात्रा से भाग देने पर औसत परिवर्तनशील लागत प्राप्त होती है। अतः

औसत परिवर्तनशील लागत = कुल परिवर्तनशील लागत/कुल उत्पादन मात्रा

AVC =AVC/Q

जहां,

Q =उत्पादन की कुल मात्रा को व्यक्त करता है।

AVC =औसत परिवर्तनशील लागत

TVC =कुल परिवर्तनशील लागत

इस प्रकार का सकते हैं कि अवसर परिवर्तनशील लागत उत्पादन की प्रति इकाई परिवर्तनशील लागत है। AVCवक्र आरंभ में तो नीचे गिरता है और फिर निम्नतम बिंदु पर पहुंच कर ऊपर को चढ़ने लगता है।

AVC वक्र की प्रकृति परिवर्तनशील साधनों की आवश्यक उत्पादकता (AP) पर निर्भर करती है। परिवर्तनशील साधन की औसत उत्पादकता का वक्र (AP) उल्टे Uकी आकृति का होता है। क्योंकि अल्पकाल में परिवर्तनशील साधन की आवश्यक उत्पादकता घटती है। लागत एक उत्पादकता के बीच विपरीत संबंध पाया जाता है। अर्थात जब साधन की औसत उत्पादकता बढ़ती है तब अवसर परिवर्तनशील लागत घटती है तथा जब AP स्थिर रहती है तथा उच्चतम बिंदु पर पहुंच जाती है तब AVC अपने न्यूनतम बिंदु पर पहुंचकर स्थिर हो जाती है। और जब AP घटना प्रारंभ करती है तब AVC बढ़ने लगती है। इस प्रकार AVC वक्र लगभग U की आकृति का तथा AP वक्र उल्टे U की आकृति का होता है। इन्हें संलग्न रेखा चित्र में दर्शाया गया है।

  1. औसत कुल लागत (ATC)-

आवश्यक कुल लागत को साधारणतया औसत लागत ही कहते हैं जिसे कुल लागत TC मैं वस्तु की कुल उत्पादन मात्रा से भाग देने पर प्राप्त किया जाता है।

अतः, औसत कुल लागत = कुल लागत/कुल उत्पादन मात्रा

ATC = TCl/Q

 हम जानते हैं की कुल लागत को लिस्ट एक लागत आय और कुल परिवर्तनशील लागत का जोड़ होती है। इसलिए औसत कुल लागत,औषध परिवर्तनशील लागत और स्थिर लागत के जोड़ के बराबर होगी।

अल्पकाल में, TC = TFC+TVC

तथा ATC = TC/Q

अतः ATC = TFC +TVC/Q =FFC/Q +TVC/Q

AC =AFC +AVC

इस प्रकार अल्पकालीन औसत लागत,अवसर परिवर्तनशील लागत और औसत स्थिर लागत का योग होती है। और अल्पकालीन औसत लागत वक्र की आकृति अंग्रेजी अक्षर U के आकार की होती है। जिसे नेम चित्र में दर्शाया गया है। लेकिन प्रश्न यह उठता है कि अल्पकालीन औसत लागत वक्र U के आकार का क्यों होता है? इसका कारण यह है कि U की आकृति में घटने,स्थिर रहने तथा फिर बढ़ने की स्थितियां होती है। उसी प्रकार AC वाकरे भी पहले घटने, समान रहने तथा बढ़ने, इन तीनों स्थितियों का संगम है। यह पूर्णतः U आकृति में नहीं बनता वरन केवल U आकार का लगता है।

एक अन्य महत्वपूर्ण बात यह है कि AC वक्र के U आकार होने का एक महत्वपूर्ण कारण है-औसत परिवर्तनशील लागत वक्र तथा औसत स्थिर लागत वक्र के व्यवहार का होना। औसत लागत वक्र और स्थिर लागत (AFC) तथा औसत परिवर्तनशील लागत (AVV)का जोड़ है। आरंभ में औसत परिवर्तनशील लागत और औषधि स्थिर लागत वक्र नीचे को गिरते हैं, अतः औसत लागत वक्र भी  आरंभ में तेजी से नीचे गिरता है। जब औसत परिवर्तनशील लागत वक्र ऊपर को बढ़ाना शुरू करता है, किंतु आओ साथी स्टेट लागत वक्र तेजी से नीचे गिर रहा होता है तो औषध कुल लागत वक्र को गिरना जारी रखेगा क्योंकि इस अवस्था में औसत स्थिर लागत वक्र में गिरावट अवश्य परिवर्तनशील लागत वक्र में वृद्धि की तुलना में अधिक होती है किंतु जब उत्पादन में और वृद्धि की जाती है तो 68 परिवर्तनशील लागत अधिक तेजी से बढ़ती है और औसत स्थिर लागत में गिरावट की गति से अधिक हो जाती है तो अवसर कुल लागत वक्र ऊपर वह बढ़ना आरंभ कर देता है। इसलिए औसत लागत वक्र और परिवर्तनशील लागत की तरह आरंभ में नीचे को गिरता है और निम्नतम बिंदु पर पहुंचकर ऊपर को चढ़ना आरंभ कर देता है अतः औसत कुल वक्री आया औसत लागत वक्र लगभग U के आकार का होता है।

III- सीमांत लागत

उत्पादन की एक अतिरिक्त इकाई को उत्पादित करने में कुल लागत में वृद्धि होती है वह लागत में वृद्धि ही सीमांत लागत (MC) कहलाती है। दूसरे शब्दों में, वस्तु की एक अतिरिक्त इकाई की लागत है सीमांत लागत कहलाती है। अतः

जहां MCn

=n वीं इकाई की सीमांत लागत

= n इकाइयों की कुल लागत

= (n -1) इकाइयों की कुल लागत

माना कि वस्तु की 16 इकाइयों को उत्पादित करने की कुल लागत 550 रुपये आती है। यदि वस्तु का उत्पादन बढ़कर 17 इकाइयां कर दिया जाए तो कुल लागत 600 रुपये हो जाती है। तो उत्पादन की 17 वीं इकाई की जो अतिरिक्त लागत 600- 550 = 50 रुपये के बराबर होगी। यह अतिरिक्त लागत ही सीमांत लागत कहलाएगी।

सीमांत लागत स्थिर लागत से स्वतंत्र होती है अर्थात सीमांत स्थिर लागत पर निर्भर नहीं करती है। सीमांत लागत, सीमांत स्थिर लागत नहीं होती।इसका कारण यह है कि स्थिर लागत उत्पादन के बदलने के साथ नहीं बदलती है। अल्पकाल में उत्पादन की मात्रा में परिवर्तन न करने पर केवल परिवर्तनशील लागतों में ही परिवर्तन होता है। आता सीमांत लागतें केवल परिवर्तनशील लागतों में परिवर्तनशील लागत पर निर्भर करती है स्थिर लागत पर नहीं।

ध्यान देने योग्य बात है कि परिवर्तनशील साधन की सीमांत उत्पादकता एवं उत्पादन की सीमांत लागत के बीच व्युत्क्रम संबंध पाया जाता है जो कि संलग्न चित्र में प्रदर्शित किया गया है-

चित्र से स्पष्ट है कि MC वक्र की आकृति U आकार की है तथा MP वक्र की आकृति उल्टे Uके आकार की है। इन दोनों के मध्य व्युत्क्रम संबंध पाया जाता है। सीमांत उत्पादकता जब बढ़ती है तब सीमांत लागत गिरने लगती है जहां सीमांत उत्पादकता (MP) अधिक होती है उसके ठीक नीचे MC अपने न्यूनतम बिंदु पर पहुंच जाती है। और जब MP गिरने लगती है तब MCबढ़ने लगती है। इन दोनों के बीच इसी व्युत्क्रम संबंध के कारण सीमांत लागत वक्र की आकृति अंग्रेजी के अक्षर  U के समान होती है।

औसत लागत एवं सीमांत लागत में संबंध

सीमांत लागत तथा औसत लागत के बीच संबंध ठीक वैसा ही है जैसा कि केंद्रीय ने सीमांत और औसतमात्राओं के बीच पाया जाता है। सीमांत लागत एवं औसत लागत के बीच संबंधों का अध्ययन निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत किया जा सकता है-

  1. जब औसत लागत गिरती है तब सीमांत लागत इससे कम रहती है

जब सीमांत लागत औसत लागत से कम होती है तो अवसर लागत घटती है और जब सीमांत लागत औसत लागत से अधिक होती है तो औसत लागत बढ़ती है। अभिप्राय यह है कि जब तक MC वक्र AC वक्र के नीचे रहता है तब तक AC वाटर नीचे की ओर गिरता जाता है किंतु यह आवश्यक नहीं है कि जब तक MC गिरेगी तब तक AC भी गिरेगी। इसे संलग्न चित्र से दर्शाया गया है।

चित्र से स्पष्ट है कि जब तक सीमांत लागत वक्र (MC) औसत लागत वक्र (AC)के नीचे है तब तक औसत लागत वक्र नीचे की ओर गिर रहा है। जब सीमांत लागत वक्र MC  (AC वक्र) के ऊपर चला जाता है तो AC ऊपर की ओर चढ़ने लगता है। पूर्व पृष्ठांकित चित्र में बिंदु B वह बिंदु है जिस पर MC,AC के बराबर है, जहां यह औसत लागत ना तो नीचे गिर रही है, और ना ही ऊपर को बढ़ रही है, अर्थात B बिंदु पर AC नीचे की ओर गिरना या घटना बंद कर देती है किंतु अभी वह ऊपर की ओर बढ़ना प्रारंभ नहीं करती। इसका तात्पर्य है कि बिंदु B पर, जहां सीमांत लागत वक्र, औसत लागत वक्र को काटता है, वहां औसत लागत वक्र का निम्नतम बिंदु होगा। अतः सीमांत लागत वक्र औसत लागत वक्र को उसके निम्नतम बिंदु पर काटता है

पूर्व पृष्ठांकित चित्र से स्पष्ट है कि जब औसत लागत घट रही होती है तो यह नहींकह सकते कि सीमांत लागत भी कट रही होगी अर्थात हम औसत लागत में परिवर्तन के द्वारा सीमांत लागत के परिवर्तन की दशा को नहीं बता सकते। हां,जब औसत लागत घट रही होती है तो हम केवल इतना ही कह सकते हैं कि इसके नीचे होगी,लेकिन औसत लागत के नीचे रहने पर भी सीमांत लागत बढ़ भी सकती है और घट ही सकती है। इसी प्रकार जब अवसर लागत बढ़ रही होती है तो भी हम यह नहीं कह सकते कि सीमांत लागत भी अवश्य बढ़ेगीं। हां, औसत लागत के बढ़ने की दिशा में सीमांत लागत उसके ऊपर होगी,लेकिन ऊपर रहने पर भी सीमांत लागत बढ़ भी सकती है और घट भी सकती है। यह बात पूर्व पृष्ठांकित चित्र से स्पष्ट हो रही है जहां बिंदु G तक सीमांत लागत घट रही है तथा MC वक्र AC वक्र के नीचे है कौन विराम औसत लागत बिंदु E तक घटती है लेकिन बिंदु G के बाद और बिंदु F तक सीमांत लागत वक्र MC औसत लागत वक्र AC के नीचे है। जिससे कि औसत लागत वक्र नीचे की ओर गिर रहा है किंतु बिंदु F और G

के बीच जब सीमांत लागत बढ़ रही है तब औसत लागत घट रही है। इसका कारण यह है कि सीमांत लागत G और Fबिंदु के बीच बढ़ती रही है लेकिन यह औसत लागत से कम है। इस प्रकार कह सकते हैं कि जब औसत लागत घट रही होती है तब सीमांत लागत घट भी सकती है और बढ़ भी सकती है।

  1. जब औसत लागत स्थिर रहती है, तब सीमांत लागत भी उसके बराबर होती है

जब औसत लागत ही स्थिर होती है अर्थात अपने न्यूनतम बिंदु पर पहुंच जाती है तो उसी न्यूनतम बिंदु पर सीमांत लागत वक्र AC वर्कर को काटता है और इस बिंदु पर AC और MC बराबर होते हैं। पूर्व पृष्ठांकित चित्र में यह बिंदु F है जिस पर AC न्यूनतम है 88 स्थिर है और MC वक्र इस बिंदु F पर AC को काटता है अर्थात दोनों बराबर हैं।

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Pankaja Singh

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