उद्यमिता और लघु व्यवसाय

उद्यमिता विकास कार्यक्रम की अवस्थाएँ | उद्यमिता विकास कार्यक्रम में सरकार की भूमिका

उद्यमिता विकास कार्यक्रम की अवस्थाएँ | उद्यमिता विकास कार्यक्रम में सरकार की भूमिका | Stages of Entrepreneurship Development Programme in Hindi | Role of Government in Entrepreneurship Development Program in Hindi

उद्यमिता विकास कार्यक्रम की अवस्थाएँ

(Stages of EDPs)

उद्यमिता विकास कार्यक्रम की निम्नलिखित तीन अवस्थायें होती हैं-

(1) प्रशिक्षण से पूर्व की अवस्था (Pre-training Phase) – इस अवस्था में प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू करने से सम्बन्धित क्रियाएँ तथा तैयारियाँ आती हैं। इस प्रकार इस अवस्था में निम्नलिखित वस्तुएँ सम्मिलित होती हैं-

(i) उद्यमियों का चयन

(ii) निश्चित वातावरण परिस्थितियों में उपलब्ध अवसरों का सर्वेक्षण करना,

(iii) आवेदन पत्र का विकास,

(iv) प्रशिक्षुओं का चयन करने के लिये चयन समिति का गठन,

(v) कार्यक्रम के उद्घाटन की व्यवस्था,

(vi) प्रशिक्षण पाठ्यक्रम सारांश को अन्तिम रूप देना,

(vii) कार्यक्रम के लिये जन-प्रचार माध्यम की व्यवस्था,

(viii) उपयुक्त उद्यमियों का चयन करने के लिये आवश्यक उपकरण तकनीकी का चयन,

(ix) आधारभूत संरचना (Infrastructure) की व्यवस्था ।

(2) प्रशिक्षण अवस्था (Training Phase)- इस अवस्था का प्रमुख उद्देश्य प्रशिक्षु के व्यवहार में एक निश्चित बदलाव लाना है। इसमें निम्नलिखित व्यवहार परिवर्तनों पर ध्यान दिया जाता है-

(i) क्या वह प्रस्तावित परियोजना विचार के लिये अच्छी तरह तैयार है?

(ii) क्या प्रशिक्षु सजीव परियोजनाओं का चयन करने तथा संसाधनों को सही समय पर संचालित करने के लिये आवश्यक कौशल रखता है?

(iii) प्रशिक्षु के अन्दर सर्वाधिक किस प्रकार उद्यमीय गुण की भी है ?

(iv) क्या उसके उद्यमीय उद्देश्य, दृष्टिकोण, कौशल, भूमिका आदि में कोई परिवर्तन दृष्टिगोचर हुआ है?

(v) क्या प्रशिक्षु के पास आवश्यक तकनीकी ज्ञान, संसाधन तथा अन्य ज्ञान है?

(vi) वह उद्यमीय जैसा व्यवहार कैसे करेगा?

(vii) क्या प्रशिक्षु उद्यमीय वृत्ति अपनाने और उनमें निहित जोखिमों को वहन करने के लिये प्रेरित हैं?

(3) प्रशिक्षण के बाद की अवस्था (Post Training Phase)- उद्यमिता विकास कार्यक्रम का अन्तिम उद्देश्य प्रतिभागियों को अपना उद्यम शुरू करने के लिये तैयार करना है। इसलिये यह अवस्था इस बात का निर्धारण करती है कि कार्यक्रम के उद्देश्यों को कहाँ तक प्राप्त किया गया है। इसे अनुसरण करना (Follow up) कहा जाता है। यह हमारी पूर्व समय के कार्य निष्पादन, कमियों (यदि पूर्व कार्यों में कोई हो) इत्यादि को प्रदर्शित करता है तथा हमारे निष्पादन में सुधार लाने के लिये भविष्य की नीतियों का निर्माण करने के लिये दिशा निर्देश देता है।

उद्यमिता विकास कार्यक्रम में सरकार की भूमिका

(Role of Government in EDPs)

उद्यमिता विकास कार्यक्रम में सरकार की भूमिका निम्नलिखित है:

(1) विकासशील देशों में मानव संसाधनों को तैयार करने का कार्य मुख्य कार्यों में से एक है। यह माना जाने लगा है कि मानव संसाधनों का तीव्र गति से सृजन करना उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि भौतिक एवं वित्तीय संसाधनों की रचना। यहाँ मानव संसाधनों का तात्पर्य उद्यमी से है। भारत की अर्थव्यवस्था तथा औद्योगिक विकास में उद्यमियों के महत्व को देखते हुये उनके विकास के लिये विशेष प्रयत्नों की आवश्यकता महसूस की गई तथा यह लगने लगा कि वर्तमान समय के परिवेश में सबसे अधिक आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने युवाओं की आन्तरिक उद्यमीय शक्ति को जाग्रत करें, जिससे सामान्य तथा साधारण युवक भी उद्यम स्थापना की दिशा में अग्रसर हो सकें और स्वयं को योग्य बनाकर सफलतापूर्वक अपने उद्यम का संचालन कर सकें। इस सन्दर्भ में सरकार द्वारा उद्यमियों का उद्योग स्थापना में सहायता तथा पंजीकरण आदि के उद्देश्य से जिला स्तर पर उद्योग केन्द्रों को स्थापित किया गया। उद्यम स्थापना के प्रति सामान्य जनता में रुचि उत्पन्न करने तथा प्रेरित करने के उद्देश्य से उद्यमिता संस्कृति के प्रसार पर जोर दिया गया तथा उद्यमिता विकास संस्थानों, लघु उद्योग सेवा संस्थान, लघु उद्योग विकास संगठन तथा विभिन्न औद्योगिक संस्थानों को स्थापित किया गया। इन अलग-अलग संस्थानों के माध्यम से सरकार प्रतिवर्ष हजारों व्यक्तियों को विभिन्न कार्यक्रम द्वारा प्रशिक्षण तथा वित्त निगमों द्वारा आर्थिक सहायता देती है।

(2) उद्यमिता विकास संस्थान द्वारा देश के अलग-अलग राज्यों में उद्यमिता विकास कार्यक्रम आदि भिन्न-भिन्न विभागों के सहयोग से आयोजित किये जाते हैं। संस्थान द्वारा आयोजित उद्यमिता विकास कार्यक्रम मुख्य रूप से दो साप्ताहिक, चार साप्ताहिक तथा छः साप्ताहिक अवधि के होते हैं।

(3) सरकार यह प्रयत्न करती है कि इन कार्यक्रमों के माध्यम से प्रशिक्षित उद्यमी स्थानीय संसाधनों का उपयोग करते हुये क्षेत्र विशेष में ही अपने उद्यम की स्थापना करें। प्रशिक्षण कार्यक्रमों में मनोवैज्ञानिक अभ्यासों के माध्यम से प्रशिक्षार्थियों को उत्प्रेरित करना, सम्बन्धित समस्याओं से अवगत कराना तथा उद्यम प्रबन्ध की जानकारी देने के साथ ही सरकार संस्थानों के माध्यम से पथमियों को ऐसा साहित्य भी प्रदान करती है जिससे उन्हें उद्यम संचालन में मार्ग दर्शन मिलता रहे। इस प्रकार भारत सरकार द्वारा राज्य सरकारों, विभिन्न बैंकों, निगमों तथा अन्य संस्थानों के द्वारा युवकों में स्वरोजगार के प्रति रुचि तथा उद्यमिता के गुणों का विकास करने के लिये विभिन्न प्रकार के उद्यमिता विकास कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है जो कि जिला उद्योग केन्द्रों तथा विभिन्न संस्थानों के माध्यम से चलाया जा रहा है।

(4) यदि उद्यमिता विकास कार्यक्रम के ऐतिहासिक दृष्टिकोण पर प्रकाश डाला जाये तो यह ज्ञात होता है कि सन् 1960 में उद्यमिता प्रशिक्षण के साथ भारत सरकार के स्वरोजगार कार्यक्रम को भी उद्यमिता विकास उद्देश्यों में शामिल किया गया है। सरकार द्वारा उद्यमीय संचेतना, उद्यमिता प्रशिक्षण शोध, परामर्श तथा अनुश्रवण के माध्यम से व्यक्तियों को स्वरोजगार के लिये प्रेरित तथा प्रशिक्षित किया जाता रहा है। इस मानव शक्ति का उचित नियोजन करने तथा राष्ट्रीय संसाधनों का उत्पादक उपयोग करने के उद्देश्य से स्वरोजगार को बढ़ावा देने के लिए भारत सरकार ने अनेक महत्वपूर्ण योजनायें बनायी हैं।

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