उद्यमिता और लघु व्यवसाय

परियोजना प्रतिवेदन का निर्माण | परियोजना प्रतिवेदन के निर्माण करने की प्रक्रिया | Preparation of Project Report in Hindi

परियोजना प्रतिवेदन का निर्माण | परियोजना प्रतिवेदन के निर्माण करने की प्रक्रिया | Preparation of Project Report in Hindi

परियोजना प्रतिवेदन का निर्माण

(Preparation of Project Report)

परियोजना प्रतिवेदन का निर्माण एक महत्वपूर्ण कार्य है। प्रस्तावित परियोजना के विभिन्न पहलुओं-विनियोग अवसरों के अभिज्ञान, प्रारम्भिक विश्लेषाण, व्यवहार्यता, मूल्यांकन, नियोजना आदि पर गहन विचार करने के बाद परियोजना प्रतिवेदन तैयार किया जाता है। इसमें योजना की विभिन्न क्रियाओं व संसाधनों का उल्लेख किया जाता है। छोटी परियोजना का प्रतिवेदन उद्यमी स्वयं तैयार कर सकता है। किन्तु वृहद्, जटिल एवं तकनीकी परियोजना के प्रतिवेदन के निर्माण में विभिन्न विशेषज्ञों व संस्थाओं की सेवायें व परामर्श प्राप्त किया जा सकता है।

क्षेत्र व विषय-सामग्री (Field & Contents)-

प्रत्येक परियोजना की प्रकृति भिन्न होती है। अतः उसके प्रतिवेदन में सम्मिलित की जाने वाली बातें व सूचनायें भी अलग-अलग ही होती हैं। फिर भी, सामान्यतः एक परियोजना प्रतिवेदन में शामिल की जाने वाली सूचनाओं का निम्न शीर्षकों के अन्तर्गत् अध्ययन किया जा सकता है–

(1) सामान्य सूचनायें (General Information’s)-

सर्वप्रथम परियोजना प्रतिवेदन में कुछ सामान्य सूचनाओं का उल्लेख किया जाता है। ये निम्नलिखित से सम्बन्धित होती हैं-

(i) उद्यमी का नाम एवं पता।

(ii) उद्यमी की शैक्षिणक योग्यता, क्षमता एवं अनुभव।

(iii) परियोजना से सम्बन्धित उद्योग-विगत निष्पादन, वर्तमान स्तर समस्यायें आदि।

(iv) उपक्रम का वैधानिक एवं संगठनात्मक ढाँचा

(v) साझेदारी फर्म की स्थिति में इसके पंजीयन का वितरण।

(vi) प्रस्तावित उत्पाद की उपयोगिता एवं विस्तार

(2) परियोजना विवरण (Project Description)-

परियोजना प्रतिवेदन में निम्नलिखित पहलुओं के बारे में संक्षिप्त विवरण दिया जाना चाहिये-

(i) स्थल (Site)- परियोजना का स्थान स्वयं का है अथवा लीज पर लिया गया है? क्या परियोजना स्थल अनुमोदित औद्योगिक क्षेत्र में है? क्या यह प्रस्तावित परियोजना के लिये उपयुक्त है?

(ii) कच्चा माल (Raw Materials)- क्या कच्चा माल विदेश से आयात करना होगा? यदि हाँ तो क्या इसके लिये लाइसेन्स प्राप्त कर लिया गया है? कच्चे माल की प्राप्ति के स्रोत क्या हैं? क्या इसे उचित मूल्यों पर नियमित रूप से प्राप्त किया जा सकेगा ?

(iii) कुशल श्रम (Skilled Labour)- क्या उस क्षेत्र में कुशल श्रम उपलब्ध है? यदि नही तो श्रम को प्रशिक्षित करने के लिये क्या व्यवस्था की गई है?

(iv) शक्ति (Power) – शक्ति की आवश्यकता की मात्रा, स्वीकृत शक्तिभार, शक्ति की पूर्ति में स्थायित्व, विभिन्न उपयोग स्तरों का मूल्य आदि।

(v) ईंधन (Fuel)- क्या अन्य ईंधन, जैसे- कोयला, तेल, गैस आदि की आवश्यकता होगी। उनकी उपलब्धता की स्थिति क्या है?

(vi) जल (Water)- मद्य व पेय पदार्थों के निर्माण में पानी एक महत्वपूर्ण घटक है। अतः पानी की किस्त व स्रोत का उल्लेख होना चाहिये।

(vii) अपशिष्ट का निपटारा (Waste Disposal)- परियोजना में अवशिष्ट एवं फालतू पदार्थों के निपटारें व निकासी क्या व्यवस्था की गई है?

(viii) संचार प्रणाली (Communication System)- संचार के साधनों, जैसे- टेलीफोन, टेलेक्स आदि का उल्लेख कीजिये।

(ix) परिवहन सुविधायें (Transport Facilities)-परिवहन के उपलब्ध एवं सम्भावित साधनों का उल्लेख कीजिये।

(x) अन्य सामान्य सुविधायें (Other Common Facilities) – सामान्य सुविधाओं जैसे- यन्त्र कार्यशाला, ढलाई, मरम्मत व इंजीनियरिंग शॉपर आदि की क्या व्यवस्था है?

(xi) यन्त्र एवं उपकरण (Machinery & Equipments) – यन्त्र व उपकरणों के प्रकार, आकार तथा पूँजीगत यन्त्रों की पूर्ति के स्रोत व निर्माण सेवायें आदि।

(xii) संयन्त्र क्षमता (Plant Capacity) – संयन्त्र की स्थापित एवं अनुज्ञापित (Ii- censed) क्षमता व पालियों (Shifts) की संख्या।

(xiii) प्रौद्योगिकी (Technology)- क्या चयनित औद्योगिकी नवीनतम व उपयुक्त है? इस प्रौद्योगिकी का अन्य कौन-सी इकाइयों में प्रयोग किया जा रहा है तथा उनके परिणाम क्या हैं? अन्य किस कौशल (Know how) की आवश्यकता होगी?

(xiv) निर्माण प्रक्रिया (Manufacturing Processs)- उत्पादन की अवस्थायें व प्रक्रियायें। कच्चे माल को तैयार माल में रूपान्तरित करने में लगने वाले समय ।

(xv) संयन्त्र संन्तुलन (Balancing of Plant)- क्या उत्पादन की विभिन्न अवस्थाओं में विभिन्न संयन्त्रों की क्षमता एक समान होगी?

(xvi) किस्म नियन्त्रण (Quality Control) – किस्म नियन्त्रण के लिये किस प्रणाली का उपयोग किया जायेगा? किस्म स्तर-चिन्ह, जैसे- ‘ISI’, ‘Q’, ‘Agmark’ आदि प्राप्त करने के लिये क्या कोई प्रयास किये जायेंगे?

(xvii) अनुसंधान एवं विकास (Research and Development) – किस्म, लागत, उत्पादन, प्रक्रिया, प्रबन्ध आदि के सम्बन्ध में अनुसन्धान किये जाने के लिये क्या कोई प्रकोष्ठ (cell) स्थापित किया जायेगा?

उपर्युक्त सभी सूचनायें परियोजना के भौतिक आधारभूत ढाँचे के लिये आवश्यक है। अतः प्रतिवेदन में इनका सामान्य विवरण दिया जाना चाहिये-

(3) बाजार सम्भाव्यता (Market Potential)-

परियोजना प्रतिवेदन में बाजार सम्भाव्यता के सम्बन्ध में निम्न पहलुओं का समावेश होना चाहिये-

(i) वस्तु की कुल एवं पूर्ति (Total Demand and Supply of the Product)- बाजार में प्रस्तावित वस्तु की कुल माँग का अनुमान क्या है तथा उत्पादन का वर्तमान स्तर कितना है? प्रस्तावित परियोजना में इस अन्तर को किस सीमा तक पूरा किया जा सकेगा?

(ii) लागत एवं कीमत के अनुमान (Estimates of Cost & Price)- लाभ की सीमा का निर्धारण करने के लिये उत्पादन एवं प्रशासनिक व्ययों के साथ-साथ सम्भावित मूल्यों द्वारा आय  का उल्लेख भी किया जाना चाहिये।

(iii) विपणन व्यूह रचना (Marketing Strategies)- उत्पादों के विक्रय हेतु अपनाई जाने वाली व्यूह रचना, वितरकों एवं मध्यस्थों के साथ की जाने वाली व्यवस्था, विज्ञापन एवं विक्रय संवद्ध की प्रस्तावित विधियों आदि का उल्लेख किया जाना चाहिये।

(iv) विक्रयोपरान्त सेवायें (After Sales Services)- कुछ उत्पादों के सम्बन्ध में विक्रय के पश्चात् सेवायें प्रदान करना आवश्यक होता है। इन सेवाओं पर खर्च किया गया धन दीर्घकाल में उपक्रम के लाभों में वृद्धि करता है। अतः प्रतिवेदन में विक्रय पश्चात् सेवाओं की मात्रा एवं प्रकार का उल्लेख किया जाना चाहिये।

(v) मौसमी माँग (Seasonal Demand)- क्या वस्तु का बाजार मौसमी है? माँग को पूरे वर्ष बनाये रखने के लिये क्या व्यवस्था की गई है? माल गोदामों तथा गैर-मौसम (Off season) में माल की माँग को उत्प्रेरित करने के उपायों व स्टॉक व्यवस्था आदि के बारे में उल्लेख किया जाना चाहिये।

(vi) माल का यातायात (Transportation of Goods) – क्या फर्म माल के यातायात के लिये लॉक वाहनों पर निर्भर करेगी अथवा अपने स्वयं के साधन रखेगी, इस बात का उल्लेख किया जाना चाहिये। स्वयं की गाड़ियाँ रखने पर इनकी अनुमानित लागत क्या होगी तथा वित्तीय सहायता की कितनी मात्रा आवश्यक होगी?

(4) पूँजी लागतें तथा वित्त के स्रोत (Capital Costs and Sources of Finance)-

परियोजना प्रतिवेदन में पूँजीगत लागतों की विभिन्न मदों का उल्लेख किया जाना चाहिये। ये निम्न सम्बन्ध में हो सकती हैं-

(i) भूमि एवं भवन,

(ii) संयन्त्र एवं मशीनें,

(iii) अन्य विभिन्न परिसम्पत्तियाँ

(iv) प्रारम्भिक व्यय,

(v) मूल्य वृद्धि के विरुद्ध आकस्मिक कोष,

(vi) कार्यशील पूंजी के लिये मार्पिन।

इन लागत घटकों के साथ-साथ वित्त प्राप्ति के वर्तमान एवं सम्भावित स्रोतों का भी उल्लेख किया जाना चाहिये। जब तक पूँजीगत लागतों को पूरा किया जाने के लिये आवश्यक वित्त की मात्रा उपलब्ध नहीं होगी, तब तक परियोजना को क्रियान्वित करना एंक कल्पना मात्र होगी। वित्तीय संसाधनों में उद्यमी के निजी कोषों, वित्तीय संस्थाओं से प्राप्त ऋणों के अतिरिक्त सार्वजनिक निपेक्षों को भी सम्मिलित किया जा सकता है। विभिन्न लागतों के लिये किये जाने वाले कोषों के अनुमान सही एवं वास्तविक होने चाहिये। कोषों की आवश्यकताओं का सही अनुमान न कर पाने के कारण ही कई औद्योगिक इकाइयों को प्रारम्भिक अवस्था अथवा परिचालन की अवस्था में वित्तीय समस्याओं का समाना करना पड़ सकता है। अतः वित्तीय लागतों व कोषों के अनुमान सही होने चाहिये तथा मितव्ययी वित्त-स्रोतों का उल्लेख किया जाना चाहिये।

(5) कार्यशील पूँजी आवश्यकताओं का अनुमान (Assessment of Working Capital Requirements) –

कार्यशील पूंजी का नियोजन एवं प्रबन्ध उद्यमी के लिये एक महत्वपूर्ण निर्णय होता है। पूँजी लागतों का अनुमान करते समय भी उद्यमी को कार्यशील पूंजी के मार्जिन पर विचार करना पड़ता है, क्योंकि पर्याप्त कार्यशील पूँजी कोषों के अभाव में परियोजना के संचालन में अनेक बाधायें उपस्थित हो जाती है। अतः परियोजना की प्रारम्भिक अवस्था में ही परियोजना की सम्पूर्ण लागत के साथ कार्यशील पूँजी की आवश्यकताओं का सही अनुमान लगा लिया जाना चाहिये।

परिचालन चक्र का अनुमान (Assessment of Operating Cycle)- कार्यशील पूँजी की मात्रा उपक्रम की क्रियाओं के लिये पर्याप्त होनी चाहिये। कार्यशील पूँजी की आवश्यकता बहुत कुछ सीमा तक व्यवसाय के परिचालन चक्र पर निर्भर करती है। किसी भी औद्योगिक क्रिया का परिचालन चक्र निम्नलिखित क्रमागत अवधियों एवं प्रक्रियाओं से मिलकर निर्मित होता है-(i) कच्चे माल की प्राप्ति एवं संग्रहण (लेनेदारों द्वारा दी गई साख अवधि को कम करने के पश्चात्) । (ii) उत्पादन चक्र-कच्चे माल को तैयार माल में बदलने की अवधि एवं प्रक्रिया। (iii) विक्रय हेतु उपलब्ध कराने के पूर्व तैयार माल का संग्रहण। (iv) देनदारों को स्वीकृति साख अवधि।

इस प्रकार परिचालन चक्र रोकड़ को कच्चे माल में विनियोजित करने, कच्चे माल को तैयार माल तथा फिर विक्रय द्वारा प्राप्तों में रूपान्तरित करने तथा प्राप्यों को संग्रहण द्वारा रोकड़ में बदलने की प्रक्रिया है।

अतः उद्यमी को अपनी परियोजना के परिचालन चक्र के पूर्ण होने के अवधि (समय) का अनुमान करके कार्यशील पूँजी आवश्यकताओं का अनुमान करना चाहिये। परियोजना प्रतिवेदन में परिचालन चक्र की अनुमानित अवधि का उल्लेख किया जा सकता है।

नई इकाइयों के परियोजना प्रतिवेदन में कार्यशील पूँजी की आवश्यकताओं के मूल्यांकन हेतु निम्न के बारे में अगले वर्ष के अनुमान प्रस्तुत करने चाहिये-

(i) कुल ब्रिकी,

(ii) आवश्यक कच्चा माल

(iii) उत्पादन एव प्रशासन व्यय,

(iv) शुद्ध लाभ,

(v) परिचालन चक्र की विभिन्न अवस्थाओं की अवधि,

(vi) रोकड़ एवं उधार बिक्री का अनुपात,

(vii) उपलब्ध तरल आधिक्य।

(6) अन्य वित्तीय पहलू (Other Financial Aspects)-

एक अच्छे परियोजना प्रतिबेदन में विभिन्न वित्तीय पहलुओं के बारे में भी जानकारी दी जाती है, ताकि वित्तीय संस्थाओं को परियोजना की सुदृढ़ता का ज्ञान हो सके। कुछ प्रमुख वित्तीय पहलू निम्नलिखित हैं-

(i) वित्तीय प्रकृति (Financial Character) – इसमें फर्म के विगत व्यवहारों की प्रकृति के सम्बन्ध में सूचनायें दी जा सकती हैं।

(ii) पूँजी पर प्रत्यय की दर (Rate of Return of Capital)- उद्यमी द्वारा विनियोजित पूँजी पर प्रत्याय की शुद्ध दर उचित एवं पूंजी बाजार में उपलब्ध ब्याज दर से ऊंची होनी चाहिये ताकि उद्यमी को उसके प्रयासों एवं जोखिम उठाने के लिये पर्याप्त पुरस्कार प्राप्त हो सके। चूँकि बाजार में ब्याज की दर 10 से 25% अवश्य होनी चाहिये।

(iii) विक्रय पर शुद्ध लाभ (Net Profit to Sales) – विक्रय पर ब्याज होने वाले लाभ की मात्रा भी उचित होनी चाहिये। यदि वह अनुपात अत्यधिक कम है, तो उपक्रम की प्रतिस्पर्द्धात्मक शक्ति अत्यन्त कम हो जायेगी तथा लागत वृद्धि अथवा कीमत में कमी के विरुद्ध उपक्रम की प्रतिरोध शक्ति भी घट जायेगी।

(iv) ऋण-स्वामी पूँजी अनुपात (Debt-Equity Ratio)- एक सुदृढ़ परियोजना में दीर्घकालीन ऋणों की मात्रा अपने निजी संसाधनों के तीन गुने से अधिक नहीं होनी चाहिये। यदि उपक्रम सम्पत्तियों के अर्थ-प्रबन्ध हेतु ऋण की तुलना में स्वामियों द्वारा विनियोजित धन पर अधिक निर्भर करता है तो बाह्य लेनदारों का हित सुरक्षित होता है और उपक्रम के समक्ष उनके भुगतान की कोई समस्या नहीं होती है। यह अनुपात उपक्रम की दीर्घकालीन स्थिति का विश्लेषण करता है। परियोजना प्रतिवेदन में इसका उल्लेख किया जाना चाहिये।

(v) सम-विच्छेद बिन्दु (Breakeven Point)- सम-विच्छेद बिन्दु की अभिव्यक्ति संयन्त्र क्षमता के सन्दर्भ में की जानी चाहिये। इसके आधार पर लाभ को अधिकतम करने के उद्देश्य की प्राप्ति हेतु स्थायी लागतों अथवा परिवर्तनशील लागतों में कमी की योजना बनाई जा सकती है। लघु उद्योग परियोजना के लिये आदेश स्थिति 30 से 50 प्रतिशत के मध्य होती है। अत्यधिक ऊंचा सम-विच्छेद बिन्दु सुरक्षा सीमा (Safety Margin) को कम कर देता है तथा उत्पादन व विक्रय स्तरों में होने वाले परिवर्तनों से उपक्रम प्रभावित होता है।

(vi) प्रक्षेपित वित्तीय विवरण पत्र (Projected Financial Statements)- परियोजना की वित्तीय जीव्यता का मूल्यांकन करने के लिये वित्तीय स्थिति एवं वित्तीय प्रवाहों के पूर्वानुमानों पर विचार करना आवश्यक होता है। इसके लिये प्रतिवेदन में इन अनुमानित वित्तीय विवरण-पत्रों का उल्लेख किया जाना है-

(अ) प्रक्षेपित चिट्ठा (Projected Balance Sheet),

(ब) प्रेक्षेपित कोष स्रोत व उपयोग विवरण-पत्र,

(स) प्रक्षेपित रोकड़ प्रवाह विवरण-पत्र

ये प्रक्षेपित अथवा प्रतिरूप वित्तीय विवरण भावी प्रभावों को व्यक्त करने के लिये बनाये जाते हैं तथा वित्तीय पूर्वानुमान एवं नियोजन के महत्वपूर्ण आधार है। प्रक्षेपित आय विवरण-पत्र उद्देश्य सम्भावित आय, लागतों, लाभों, करों, लाभांशों व अन्य वित्तीय हितों का उचित भुगतान लगाना होता है। प्रक्षेपित चिट्टा कोषों के प्रवाहों का पूर्वनुमान है।

(7) आर्थिक एवं सामाजिक तत्व (Economic and Social Variables) –

उद्यम सामाजिक प्रणाली का एक महत्वपूर्ण अंग है। समाज के संसाधनों का समाज के हित के लिए उपयोग करने का दायित्व व्यवसाय का एक महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व है। उपक्रम एक आर्थिक संगठन होने के साथ-साथ एक सामाजिक प्रक्रिया भी है। अतः किसी भी नये उद्यम का विकास सामाजिक लागतों को कम करने तथा मानवीय समस्याओं को हल करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होना चाहिये।

परियोजना प्रतिवेदन में उद्यम की उपशमन लागतों (Abatement Costs) का उल्लेख किया जाना चाहिये। जापशमन लागतों से आशय वातावरण के ह्रास अथवा क्षय पर नियन्त्रण करने की लागतों (Costs for Controlling Environmental Damage, e.g. Pollution) से है, उद्यम को प्रदूषण पर नियन्त्रण करने, गन्दे पदार्थों के निकास, अवशिष्ट पदार्थों को ठिकाने लगाने आदि के लिये विभिन्न अभियांत्रिक एवं प्रौद्योगिकीय तकनीकों को अपनाना पड़ता है। इससे व्यवसाय की अपशमन लागतों में वृद्धि होती है। प्रतिवेदन में इन लागतों का अनुमानित मूल्य व उपायों का उल्लेख होना चाहिये। इसके अतिरिक्त, नयी परियोजना के अन्य सामाजिक लाभों का विवरण भी दिया जा सकता है। ये लाभ निम्न हो सकते हैं-

(i) रोजगार में वृद्धि (Promoting Employment)- उस क्षेत्र में रोजगार की स्थिति व उन व्यक्तियों की संख्या जिन्हें रोजगार उपलब्ध करवाया जाना है, का उल्लेख किया जा सकता है।

(ii) आयात प्रतिस्थापना (Import Substitution)- आयात प्रतिस्थापन के उपायों एवं सम्भावित लाभों का उल्लेख किया जा सकता है।

(iii) सहायक उद्योगों का विकास (Promoting Ancillaries) – क्या नयी परियोजना से सहायक उद्योगों का विकास सम्भव होगा? इस हेतु किये गये उप-अनुबन्धों का विवरण दिया जाना चाहिये।

(iv) क्षेत्रीय विकास (Regional Development)- नई इकाई की स्थापना से सम्बन्धित क्षेत्र के विकास की सम्भावनायें क्या हैं? सामाजिक उत्तरदायित्वों के निर्वाह के कुछ पहलुओं का वर्णन दिया जा सकता है।

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