उद्यमिता और लघु व्यवसाय

पर्यावरण से अभिप्राय | पर्यावरण का महत्व | Meaning of Environment in Hindi | importance of environment in Hindi

पर्यावरण से अभिप्राय | पर्यावरण का महत्व | Meaning of Environment in Hindi | importance of environment in Hindi

पर्यावरण से अभिप्राय

(Meaning of Environment)

पर्यावरण में उन समस्त तत्वों का समावेश किया जाता है जो व्यवसाय संचालन को प्रभावित करते हैं, जिस प्रकार एक व्यक्ति की सफलता उसकी आन्तरिक क्षमताओं पर निर्भर करती है, उसी प्रकार एक व्यवसाय की सफलता भी उसकी आन्तरिक शक्तियों-संसाधनों व वातावरण पर निर्भर करती है। प्रत्येक व्यावसायिक संगठन में अनेक संसाधन-भौतिक, वित्तीय, मानवीय आदि विद्यमान होते हैं। पर्यावरण के अनुरूप इन संसाधनों का प्रयोग समुचित रूप में किया जाता है। पर्यावरण से आशय आस-पास की परिस्थितियों या निकटवर्ती दशाओं से है; जो मानव जीवन को‌ भौगोलिक एवं प्राकृतिक दशाओं तथा सामाजिक रीति-नीति एवं प्रथाओं के रूप में घेरे रहती है।

हर्सकेविट्ज के अनुसार, “पर्यावरण उन समस्त बाह्य दशाओं तथा प्रभावों का योग है, जो प्रणाली के जीवन और विकास पर प्रभाव डालते हैं।”

गिलबर्ट के अनुसार, “वातावरण उस समग्रता का नाम है, जो किसी वस्तु को घेरे रहती है तथा उसे प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती है।”

वेवस्टर शब्द कोष के अनुसार, “पर्यावरण से आशय उन घेरे में रहने वाली दशाओं, प्रभावों तथा परिस्थिति से है, जो सभी व्यक्तियों तथा जीवित रचनाओं के जीवन को प्रभावित करती है।”

उचित परिभाषा- “पर्यावरण वह परिवृत्ति (Set of Surroundings) है जो मनुष्य को प्रत्येक ओर से घेरे हुये है और उसके जीवन तथा क्रियाओं पर प्रभाव डालती है।”

पर्यावरण का महत्व

(Significance of Environment)

व्यावसायिक पर्यावरण के महत्व को निम्न शीर्षकों के मध्यम से भली-भांति समझा जा सकता है-

(1) व्यवसाय का विकास एवं विस्तार (Development and Expansion of Business)- व्यावसायिक पर्यावरण संगठन के विस्तार, विविधीकरण, परिवर्तन व प्रगति के अवसर उत्पन्न करता है। परिवर्तन के साथ-साथ फलने-फूलने के लिये संस्था को परिवर्तित परिवेश के साथ जीना आवश्यक होता है। जो संगठन परिवर्तित परिवेश के साथ चलने में सक्षम नहीं हो पाते अर्थात् समय की गति को नहीं पहचानते वह पिछड़ जाते हैं। संगठनात्मक प्रगति का आधार पर्यावरणीय प्रभावों के प्रति सजगता है।

(2) गतिशीलता (Dynamism)- व्यावसायिक संस्था को गतिशील बनाये रखने के लिये यह आवश्यक है कि वह आन्तरिक और बाह्य पर्यावरण के प्रति स्वयं को जागरूक बनाये रखे। पर्यावरण के प्रति जागरूकता घटने पर संगठन की गतिशीलता पर भी तदानुरूप प्रभाव पड़ता है।

(3) व्यूह रचना (Formulation of Strategy)- व्यावसायिक संस्था को पर्यावरण के हिसाब से चुस्त व दुरुस्त रखना ही व्यूह रचना को प्रभावित करना है। संस्था के आन्तरिक और बाह्य पर्यावरण की स्थितियों के अनुरूप ही संस्था की व्यूह रचना की जाती है ताकि भावी चुनौतियों का सामना किया जा सके तथा उपलब्ध अवसर का लाभ उठाया जा सके।

(4) कार्य योजनाओं का निर्माण (Formulation of Action Plans)- व्यावसायिक पर्यावरण के समुचित आकलन के उपरान्त ही व्यावहारिक एवं कार्यात्मक योजनाओं का निर्माण किया जा सकता है। पर्यावरण के समुचित आकलन के बिना बनायी गयी कार्य योजना केवल योजना बनकर ही रह जाती है। उसका सफल क्रियान्वयन नहीं हो पाता है।

(5) व्यावसायिक चुनौतियों का सामना (Face the Threats of Business) – आज का युग प्रतिस्पर्धा का युग है। केवल वही संस्था जीवित रह सकती है जो प्रतिस्पर्धी वातावरण में चुनौतियों का सामना कर सके। पर्यावरण के प्रति जागरूक रहने वाली संस्था ही सामाजिक चुनौतियों का दृढ़ता से सामना कर सकती है तथा प्रगति के मार्ग की ओर अग्रसर हो सकती है।

(6) उपलब्ध अवसरों का लाभ उठाना (Avail the Benefit of Business Opportunities) – प्रायः प्रगति के अवसर सदैव विद्यमान रहते हैं। आवश्यकता केवल इस बात की है कि उपलब्ध अवसरों को पहचाना जाये और उसके अनुरूप कार्य योजना का गठन कर अवसर का लाभ उठाया जाये। अवसर किसी का दरवाजा स्वयं नहीं खटखटाते वरन् अपना दरवाजा खुला रख कर ही अवसर को आने का निमन्त्रण दिया जाता है।

(7) निर्णयन का आधार (Basis of Decision)- व्यावसायिक निर्णयन का दृढ़ आधार पर्यावरणीय वास्तविकताओं का समुचित अध्ययन है। पर्यावरण में होने वाले सतत् परिवर्तनों की उपेक्षा करके ठोस निर्णय नहीं लिये जा सकते हैं। सही समय और सही स्थितियों में ही सही निर्णय हुआ करते हैं।

(8) लक्ष्यों की प्राप्ति (Achievement of the Global)- पर्यावरण के प्रति सजग रहकर ही निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति हो सकती है। वास्तवकिता तो यह है कि लक्ष्यों अथवा उद्देश्यों का निर्धारण भी व्यावसायिक पर्यावरण के अनुरूप किया जाना चाहिये तभी उनकी प्राप्ति सम्भव हो सकती है। पर्यावरण के विपरीत निर्धारित किये गये लक्ष्यों की प्राप्ति सदैव संदिग्ध बनी रहती है।

(9) वैश्विक परिवर्तनों के प्रति सजग (Counters towards Global Changes)- विश्व स्तर पर होने वाले परिवर्तनों के प्रति व्यावसायिक संगठनों की सजगता आवश्यक है। आयात- निर्यात नीति, तेल के मूल्यों में परिवर्तन आदि अनेकों ऐसे तत्व हैं जो संगठन के क्रिया-कलापों को काफी सीमा तक प्रभावित कर सकते हैं। इन परिवर्तनों के प्रति सजग न रहने वाली संस्था हानि उठा सकती है।

(10) अन्य महत्व (Other Importance) – व्यावसायिक पर्यावरण के प्रति सजगता निम्न अन्य कारणों से भी महत्वपूर्ण हो जाती है-

(i) माँग व पूर्ति के मध्य उचित साम्य की स्थापना की जा सकती है,

(ii) उपलब्ध संसाधनों का समुचित उपयोग किया जा सकता है,

(iii) उपभोक्ताओं को अधिकतम सन्तुष्टि दी जा सकती है,

(iv) स्वामियों को अधिकतम लाभ उपलब्ध कराया जा सकता है,

(v) सामाजिक व पर्यावरणीय सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है, तथा

(vi) स्वयं के अस्तित्व की रक्षा सुनिश्चित की जा सकती है।

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