अर्थशास्त्र

तकनीकी प्रगति | तकनीकी सुधार से आशय | उत्पादन फलन पर तकनीकी परिवर्तन का प्रभाव | तकनीकी प्रगति की पूँजी निर्माण से श्रेष्ठता | विकासशील देशों में तकनीकी सुधार के लाभ तथा हानियाँ

तकनीकी प्रगति | तकनीकी सुधार से आशय | उत्पादन फलन पर तकनीकी परिवर्तन का प्रभाव | तकनीकी प्रगति की पूँजी निर्माण से श्रेष्ठता | विकासशील देशों में तकनीकी सुधार के लाभ तथा हानियाँ | technological progress in Hindi | Meaning of technical improvement in Hindi | Effect of technological change on production function in Hindi | Superiority of technological progress over capital formation in Hindi | Advantages and Disadvantages of Technological Improvement in Developing Countries in Hindi

तकनीकी प्रगति

तकनीकी प्रगति एक अत्यन्त विस्तृत शब्द है जिसमें प्राविधिक ज्ञान के विकास के अलावा तकनीक परिवर्तन, नव-प्रवर्तन और उद्यमशीलता का भी समावेश होता है। प्रो. कुजनेट्स ने तकनीकी प्रगति के अन्तर्गत पाँच बातों का समावेश किया है- 1. वैज्ञानिक खोज (Scientific discovery) अर्थात् तकनीकी ज्ञान में वृद्धि करना, 2. आविष्कार (Inventions) अर्थात् विद्यमान ज्ञान का सर्वोत्तम ढंग से उपयोग करना, 3. नव-प्रवर्तन (Innovations) अर्थात आर्थिक उत्पादन/क्रियाओं में आविष्कारों को लागू करना, 4. सुधार (Improvements) अर्थात् आविष्कारों की उपादेयता में वृद्धि करना और 5. तकनीकी सामाजिक परिवर्तन (Techno- social changc) अर्थात् सांस्थानिक ढाँचे को तकनीकी प्रगति के लिए अनुकूल बनाना।

तकनीकी परिवर्तन से आशय उत्पावन फलन को इस प्रकार परिवर्तित करना है कि जिससे सभी ज्ञान तकनीकों का उसमें समावेश हो सके। किण्डलवर्जर का कहना है कि “तकनीक परिवर्तन किसी उद्यम के वास्तविक उत्पादन फलन को इस प्रकार बदल देता है कि उन्हीं साधनों से अधिक उत्पादन या फिर कम साधनों से उत्पादन की उतनी ही मात्रा प्राप्त करना सम्भव होता है। तकनीकी परिवर्तन का परिणाम उत्पादन की अधिक मात्रा के अलावा अधिक उपयोगिता वाली नयी वस्तुओं के उत्पादन के रूप में भी होता है। आर्थिक विकास के सम्बन्ध में तकनीकी परिवर्तन से आशय उत्पादन के तरीकों को बदलने से है और इस दृष्टि से उसे नव-प्रवर्तन का पर्यायवाची बाजाता है।”

आधुनिक अर्थशास्त्री तकनीकी परिवर्तन शब्द को विस्तृत अर्थ में प्रयोग करने के पक्ष में  हैं और इस अर्थ में इससे आशय केवल तकनीकी ज्ञान में सुधार न होकर, उन सामाजिक या संस्थानिक परिवर्तनों से भी है, जो तकनीकी परिवर्तन से पहले होते हैं और उसके लिए उपयुक्त पष्ठभूमि का निर्माण करते हैं।

हर्बर्ट फ्रेंकले के अनुसार, “तकनीकी परिवर्तन केवल तकनीकी ज्ञान में सुधार नहीं है, बलिक उससे अधिक है। तकनीकी परिवर्तन से पहले सामाजिक परिर्तन होने चाहिए और समुदाय में अपनी सामाजिक राजनीतिक और प्रशासनिक संस्थाओं का बदलने की तीव्र इच्छा एवं तत्परता होनी चाहिए जिससे कि इन संस्थाओं को नयी उत्पादन तकनीकों और आर्थिक क्रियाओं में तीव्र रफ्तार के अनुकूल बनाया जा सके।

तकनीकी सुधार से आशय

तकनीकी परिवर्तन आर्थिक विकास का प्रमुख प्रचालक है और तकनीक का स्तर आर्थिक प्रगति का प्रमुख निर्धारक है। शुम्पीटर ने तो नवप्रवर्तन या तकनीकी प्रगति को आर्थिक विकास का एकमात्र निर्धारक माना है। निःसन्देह तकनीकी परिवर्तन से अर्थव्यवस्था में गत्यात्मकता आती है और तकनीकी जड़ता के साथ अर्थव्यवस्था भी अवरुद्ध हो जाती है। किण्डलबर्जन का कहना है कि “विकसित देश में वास्तविक आय में होने वाली तीव्र वृद्धि दर अकेले पूँजी निर्माण का परिणाम नहीं है, बल्कि यह तो काफी हद तक उत्पादकता में वृद्धि का परिणाम है जो स्वयं तकनीकी प्रगति के फलस्वरूप होती है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण अमेरिकन अर्थव्यवस्था है जिसके विकास के लगभग 2/3 भाग का श्रेय तकनीकी प्रगति को प्राप्त है (रॉबर्ट सोलो), जबकि पश्चिमी जर्मनी के विकास का 100 प्रतिशत श्रेय तकनीकी परिवर्तन को ही जाता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि तकनीकी के उच्च स्तर द्वारा ही तीव्र विकास किया जा सकता है। गेलनर्सन लिबिन्स्टीन का भी कहना है कि “व्यापक पिछड़ेपन के परिवेश में तीव्र आर्थिक विकास मुख्य रूप से तब परिवर्तन और आधुनिक प्रविधि के लागू करने पर ही निर्भर करता है।”

ऑस्कर लेंज, रैगनर नर्कसे जैसे अर्थशास्त्री जहाँ पूँजी संचय को आर्थिक विकास की कुन्जी मानते हैं वहाँ कुजनेट्स, ड्यूहर्सट, राबर्ट सोलो, मायर एवं बाल्डविन, गेलनसन तथा लिबिन्स्टीन जैसे अर्थशास्त्री ने तकनीकी प्रगति को पूँजी निर्माण से भी अधिक महत्वपूर्ण माना है। पूँजी निर्माण केवल एक सीमा तक आर्थिक विकास के रूके हुए पहिए को विचलित तो कर सकता है, लेकिन उसे गति प्रदान नहीं कर सकता। यदि कोई देश तकनीकी दृष्टि से पिछड़ा हुआ है तो सम्भव है कि पर्याप्त पूँजी निर्माण के बावजूद उसकी आर्थिक प्रगति एक निश्चित समय अथवा बिन्दु पर जाकर रूक जाये। आर्थिक विकास पर तकनीकी प्रगति के प्रभाव को नीचे दो शीर्षकों के अन्तर्गत स्पष्ट किया गया है- (a) उत्पादन फलन पर प्रभाव के रूप में तथा (b) पूँजी निर्माण की अपेक्षा श्रेष्ठतम उपाय के रूप में।

(a) उत्पादन फलन पर तकनीकी परिवर्तन का प्रभाव-

उपर्युक्त तीनों चित्रों में R वक्र तकनीकी परिवर्तन से पूर्व के उत्पादन-फलन की स्थिति को दर्शाता है और R वक्र नव-प्रवर्तन लागू होने की बाद की स्थिति का प्रतीक है। प्रथम चित्र में नव-प्रवर्तन श्रम एवं पूँजी के सम्बन्ध के तटस्य हैं अर्थात् साधनों के उपयोग एवं उत्पादन की विद्यमान मात्रा की यह मूल स्थिति है। इस चित्र में नया उत्पादन R1 यह दिखलाता है कि नव-प्रवर्तन लागू है। दूसरे चित्र में नव- प्रवर्तन के कारण श्रम में होने वाली बचत को स्पष्ट किया गया है। इसमें R1 वक्र यह बताता है कि उत्पादन की उसी मात्रा को प्राप्त करने के लिए श्रम और पूँजी दोनों की कम आवश्यकता होती है, लेकिन पूँजी की अपेक्षा श्रम की बचत इसमें और भी अधिक है। तीसरे चित्र में नव- प्रवर्तन, श्रम के विपरीत पूँजी-बचत की व्याख्या करता है, आर्थात् R1 वक्र इस बात को स्पष्ट करता है कि उत्पादन की उसी मात्रा को बनाये रखने के लिए पूँजी व श्रम की कम आवश्यकता पड़ती है, लेकिन पूँजी की अपेक्षा श्रम की बचत इसमें और भी अधिक है। निष्कर्ष रूप से यह कहा जा सकता है कि नव-प्रवर्तनों से साधनों के उपयोग में बचत होती है, उत्पादन की मात्रा में वृद्धि होती है और विकास की दर तीव्र हो जाती है। इस प्रकार नव-प्रवर्तन अर्थात् तकनीकी प्रगति एवं आर्थिक विकास में एक उच्च स्तरीय धनात्मक सह सम्बन्ध है।

(b) तकनीकी प्रगति की पूँजी निर्माण से श्रेष्ठता-

जैसा कि ऊपर लिखा जा चुका है कि आधुनिक विकासवादी अर्थशास्त्री पूँजी निर्माण की अपेक्षा तकनीकी प्रगति को आर्थिक विकास को अपेक्षाकृत अधिक महत्वपूर्ण तत्व मानते हैं। इस बात को रेखाचित्र में स्पष्ट किया गया है। OR उत्पादन फलन की तटस्थ स्थिति है जो तकनीकी प्रगति होने के साथ-साथ बढ़कर क्रमशः OR1, OR2, OR3, हो जाती है। प्रारम्भिक उत्पादन फलन (OR) पर प्रति श्रमिक-पूँजीगत विनियोग को बढ़ाकर यदि 100 से 150 रु. कर दिया जाये तो इससे प्रति श्रमिक उत्पादन भी AM से बढ़कर A1M1 हो जाता है। इसी प्रकार यदि प्रति श्रमिक पूँजी-निवेश को क्रमशः बढ़ाते हुए 250 रु. तक

लाया जाये तो इस स्थिति में प्रति श्रमिक उत्पादन भी बढकर A3M3 हो जाता है।

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Pankaja Singh

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