शिक्षाशास्त्र

मूल्यांकन की विधियाँ | मूल्यांकन में अध्यापकों को किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?

मूल्यांकन की विधियाँ | मूल्यांकन में अध्यापकों को किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए? | Methods of Evaluation in Hindi | What are the things teachers should keep in mind in evaluation in Hindi

मूल्यांकन की विधियाँ

प्रत्येक अध्यापक चाहता है कि वह विद्यार्थी को अधिक से अधिक सन्तोष प्रदान कर सके। इसलिए वह तरह तरह के उपाय करता है और प्रयत्न करता है कि उसका परिणाम सबसे अच्छा रहे। प्रश्न यह है कि वह अपनी सफलता को कैसे जान सकता है?

इस समस्या को हल करने के लिए ही मूल्यांकन विधियों का विकास हुआ है। इन विधियों के द्वारा हम विद्यार्थियों में आये हुए परिवर्तन को माप सकते हैं। मूल्यांकन के दो उद्देश्य मुख्य है। ये उद्देश्य निम्नलिखित है-

(1) सीखने के अनुभव जो विद्यार्थी को कक्षा में दिये गये थे, कितने सफल रहे, इसकी जहै- करना।

(2) शिक्षा के उद्देश्य किस सोमा तक प्राप्त किये गये है, इसका पता लगाना और

(3) इन उद्देश्यों को थोड़ा और विकसित करके बताना नितान्त आवश्यक है।

मूल्यांकन का पहला उद्देश्य शैक्षिक उद्देश्यों की प्राप्ति की सीमा को जानना है। किसी चीज का मूल्यांकन करने में हम उस वस्तु को परीक्षा लेते हैं। परीक्षा लेते समय सभी उद्देश्यों को ध्यान में रखना पड़ता है। ज्ञान परीक्षाओं से हम यह माप सकते हैं कि विद्यार्थियों के ज्ञान, कौशल तथा रुत्रि में क्या वृद्धि हुई है और उनके स्वभाव तथा चिन्तन में क्या परिवर्तन हुए हैं? परीक्षा लेने के बाद हम प्रत्येक विद्यार्थों के बारे में बता सकते हैं कि अमुक विद्यार्थी ने पृथक्-पृथक् उद्देश्यों को किस मोमा तक प्राप्त किया है। उदाहरण के तौर पर दो छात्रों ने अग्रांकित प्रकार से अंक पाते हैं –

क्रम संख्या

ज्ञान की वृद्धि

‘अ’ विद्यार्थी

‘ब’ विद्यार्थी

1-

ज्ञान की वृद्धि

10

12

2-

कुशलता की वृद्धि

12

10

3-

रुचि की वृद्धि

10

8

4-

चिन्तन की वृद्धि

8

10

5-

स्वभाव में परिवर्तन

6

5

उपर्युक्त तालिका से हम आसानी से जान सकते हैं कि ‘अ’ विद्यार्थी ने कुशलता व रुचि में वृद्धि की है और स्वभाव के परिवर्तन में ‘ब’ विद्यार्थी से अधिक अंक प्राप्त किये हैं और दूसरी ओर ज्ञान की वृद्धि और चिन्तन में ‘ब’ विद्यार्थी ने अधिक अंक प्राप्त किये हैं। दूसरे शब्दों में हम‌ यह कह सकते हैं कि ‘अ’ विद्यार्थी के सीखने के अनुभव जो उसे कुशलता और रुचि की वृद्धि तथा स्वभाव में परिवर्तन के लिए दिये गये थे, ‘ब’ विद्यार्थी की अपेक्षा अधिक सफल हुए हैं और उसी विद्यार्थी के ज्ञान की वृद्धि और चिन्तन के लिए जो अनुभव दिये गये थे ‘ब’ विद्यार्थी की अपेक्षा कम सफल रहे है।

मूल्यांकन की विधियों का विस्तृत उल्लेख यहाँ पर सम्भव नहीं होगा, इसके कई कारण हैं। प्रथम यह है कि आज के युग में मूल्यांकन की विधियों की संख्या अधिक है कि उनका समावेश कर सकना सम्भव नहीं है। जैसे- जैसे छात्रों की क्रियाएँ बढ़ती जाती हैं, वैसे ही मूल्यांकन की विधियों की संख्या भी बढ़ जाती है। दूसरा, यह है कि कहीं-कहाँ मूल्यांकन की एक ही प्रकार की इतनी विधियाँ हैं कि उनमें अन्तर का पता करना बहुत ही कठिन कार्य है और अन्त में इनमें से कुछ विधियों का प्रयोग आगे के पाठों में विस्तृत रूप से किया गया है।

उपरोक्त कारणों को वजह से हम यहाँ केवल मूल्यांकन की विधियों का संक्षिप्त परिचय ही देना उचित समझते हैं।

(1) व्यक्तिगत परीक्षायें (Individual Tests)— वे परीक्षायें जो एक बार में केवल एक व्यक्ति को ही परीक्षा कर सकती हैं, व्यक्तिगत परीक्षाएं कहलाती हैं। उन्हें दो प्रमुख भागों में बाँटा जा सकता है।

(अ) मौखिक परीक्षाएं (Verbal Tests) – साक्षात्कार इसका रूप है, इसमें कुछ कमियाँ पाई गयीं जो निम्नलिखित हैं-

(1) पक्षपात की सम्भावना अधिक है।

(2) सभी को समान प्रश्न तथा समय नहीं दिया जाता। कोई तो 20 से 25 मिनट तक पा जाता है, कोई 1 या 2 मिनट में ही बाहर आ जाता है।

(3) मौखिक परीक्षाओं में भाषा की कुशलता का प्रभाव पड़ता है।

(4) इनसे गूंगे तथा बहरे लोगों को परीक्षा नहीं ली जा सकती।

(5) इसमें ममय तथा विशेषज्ञों की अधिक आवश्यकता है।

(6)  अन्तर्राष्ट्रीय स्तर को बनाने के लिए देश को विभिन्न भाषाओं में इसका अनुवाद आवश्यक है।

(ब) इन कमियों को ध्यान में रखकर मनोवैज्ञानिकों ने क्रियात्मक परीक्षाओं (Performance Tests) का निर्माण किया।

क्रियात्मक परीक्षाओं में व्यक्ति को कुछ नमूने (Designs) देखकर लकड़ी के रंग-बिरंगे गुटकों से वहां नमूना निश्चित समय में तैयार करना पड़ता है।

इन परीक्षओं के निर्माण से व्यक्तिगत परीक्षण के लगभग सभी दोष दूर हो गये, केवल समय की अधिकता और आर्थिकता दो ही कमी रह गयी।

(2) सामूहिक परीक्षाएं (Group Tests)- जो परीक्षाएं एक साथ एक समूह की ली जा सकती हैं, सामूहिक परीक्षाएं कहलाती हैं. बोर्ड के द्वारा निर्धारित परीक्षाएं भी इसके अन्तर्गत आती हैं।

अध्ययन की सुविधा के लिए सामूहिक परीक्षाओं को दो भागों में बाँटा गया है।

(अ) निबन्धात्मक परीक्षाएं (Essay Type Tests)

(ब) लक्ष्यगत परीक्षाएं (Objective Type Tests)

(3) बुद्धि परीक्षाएं (Intelligence Tests)- बुद्धि परीक्षाओं के निर्माण का श्रेय प्रमुख फ्रांसीसी मनोवैज्ञानिक अल्फ्रेड बिनेट (Alfred Binet) को है। 1911 में सबसे पहली संशोधित परीक्षा तैयार हुई थी। आजकल बुद्धि को बहुत सी परीक्षाएं उपलब्ध है। बुद्धि परीक्षा, मौखिक, क्रियात्मक तथा सामूहिक रूप से बनायी गयी है। इससे किसी भी व्यक्ति की किसी अवस्था में परीक्षा लो जा सकती है।

(4) सामर्थ्य परीक्षाएं (Achievement Tests) — इसके अन्तर्गत शारीरिक कुशलता, शक्ति (Strength) विषयगत परीक्षाएं तथा निदानात्मक परीक्षाओं (Diagnostic Tests) का प्रयोग किया जाता है।

(5) व्यक्तित्व परीक्षण (Personality Assessment) — व्यक्तित्व में व्यक्ति के सभी स्थायी गुणों का उल्लेख किया जाता है। इसलिए व्यक्तित्व परीक्षण के अन्तर्गत निम्न परीक्षाएं आती हैं-

(1) प्रश्नावली विधि (Questionnaire Method).

(2) रुचि परीक्षण (Interest Inventories) व्यावसायिक तथा शैक्षणिक

(3) व्यवहार की परीक्षाएं (Behavioural Tests)

इसमें ईमानदारी, नकल करना, झूठ बोलना, धोखा देना आदि की परीक्षाएं सम्मिलित की जा सकती हैं।

(4) व्यवस्थापन की परीक्षा (Adjustment Inventory)

(5) स्वभाव की परीक्षा (Temperament Schedule)

(6) संवेगात्मक स्थिरता की माप (Measurement of Emotional Stability)

(7) चित्तन, तर्क तथा निर्णय की परीक्षाएं (Tests of Thinking. Poisoning and Judgement)।

(6) सामाजिकता की माप (Measurement of Sociability)

(7) प्रश्लेषण विधियाँ (Practice Techniques) – इनके द्वारा व्यक्तित्व के उन भागों  का पता लगाया जाता है जिनके बारे में प्रत्यक्ष रूप से कोई परीक्षा नहीं ली जा सकती। इनका उद्देश्य छात्रों को पहले से नहीं बताया जाता है। इसमें निम्नलिखित परीक्षाओं का प्रयोग किया जाता है-

(i) चित्र प्रसंग परीक्षा (Thematic Apperception Test (T.A.T.) – इसमें चित्रों को दिखाकर उनके बारे में पूछा जाता है।

(ii) रोशार्ख की स्याही के धब्बे को परीक्षा (Rorschach Ink Blo Tests)

(iii) वाक्य परक तथा कहानी पुरक परीक्षाएं (Sentence and story completion Tests)।

(8) मनोविश्लेषण विधियाँ- इनका प्रयोग सर्वप्रथम फ्रायड (Freid) महोदय ने अचैतन मन को जानने के लिए किया था। इसके अन्दर शब्द साहचर्य (Word Association) स्वतन्त्र साहचर्य (Free Association). सम्मोहन (Hypnotism), स्वप्न विश्लेषण (Dream analysis), व्यक्ति इतिहास पद्धति (Case History Method) आदि का प्रयोग होता है।

(9) अध्यापक की डायरी, प्रगति सूचक पत्र (Progressive Cards)– सामूहिक आलेख पत्र आदि।

मूल्यांकन की विधियों का जुनाव करते समय अध्यापक को निम्न बातें ध्यान में रखनी चाहिए-

(1) कोई भी एक विधि ऐसी नहीं है जो विद्यार्थी के सम्पूर्ण विकास के बारे में आवश्यक सभी गुणों की परीक्षा कर सके।

(2) विधि वैध होनी चाहिए अर्थात् इससे वही वस्तु मापनो चाहिए जो कि हमारा मापने का उद्देश्य हो ।

(3)  ऐसी विधि चुने जिसे प्राप्त करने, प्रशासन तथा अंक प्रदान करने में विशेषज्ञों की आवश्यकता न पड़े।

अतः स्पष्ट है कि मूल्यांकन द्वारा विद्यार्थियों के उद्देश्यों की प्राप्ति और सीखने के अनुभवों  की सफलता दोनों ही जान सकते हैं।

अध्यापक और मूल्यांकन

अध्यापक मूल्यांकन की प्रक्रिया का केन्द्र बिन्दु माना जाता है। क्योंकि कक्षा का अध्यापक ही सबसे अच्छी परीक्षा तैयार करने में सहायता कर सकता है। परीक्षा में संशोधन के साथ अपनी पाठन-कला और पाठ्यक्रम में उन्नति करना भी हमारा ध्येय है।

इस कार्यक्रम के विकास में सहायता करने के लिए अध्यापक को निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना आवश्यक है-

(1) अपनी कक्षा में अध्यापन और मूल्यांकन की कुछ नई पद्धतियों का प्रयोग करना।

(2) आन्तरिक परीक्षा में मूल्यांकन की प्रक्रिया को प्रारम्भ करना।

(3) परीक्षा में सुधार के कार्यक्रम के बारे में अधिक से अधिक जानने के लिए तत्पर रहना।

(4) अपने अनुभवों द्वारा विद्यालयों के साथियों को प्रभावित करना और उनकी रुचि को जागृत करना ।

(5) बुलाये जाने पर स्वच्छा से मूल्यांकन के कार्यक्रमों में भाग लेना।

(6) पत्रिकाओं में समय-समय पर छपे हुए लेखों को पढ़ना तथा अपने अनुभवों को उनमें छपवाकर दूसरा का भी उनसे अवगत कराना।

(7‍) अपने विद्यालय में मूल्यांकन का एक उपयुक्त पुस्तकालय स्थापित करने में सहायता करना।

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Pankaja Singh

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