शिक्षाशास्त्र

समूह का अर्थ | समूह की परिभाषा | समूह की विशेषताएँ | समूह व्यवहार तथा व्यक्तिगत व्यवहार

समूह का अर्थ | समूह की परिभाषा | समूह की विशेषताएँ | समूह व्यवहार तथा व्यक्तिगत व्यवहार

शिक्षालय में विद्यार्थियों एवं अध्यापकों का समूह होता है और दोनों समूह मिलकर शिक्षा का कार्य पूरा करते हैं इसलिए तो शिक्षा की प्रक्रिया को सामूहिक एवं सामाजिक कहा जाता है ? “किसी अनुदेशीय क्रियाविधि में विद्यार्थियों की संख्या का प्रश्न हमेशा महत्वपूर्ण रहा है। यदि सभी जरूरी अधिगम अपने-आप केवल देखने और सुनने के परिणामस्वरूप हो जाता तो सभी शैक्षिक प्रयोजनों के लिये श्रोता की स्थिति सन्तोषजनक हो गई होती। लेकिन अधिगम देखने और सुनने से कहीं अधिक होता है। जैसा हमने देखा है, इसमें अध्यापक के निर्देशन में व्यक्ति की अनुक्रियाओं में प्रतिक्रिया करना और सुधार करना भी शामिल होता है। वास्तव में चूँकि व्यक्ति एवं उनकी अनुक्रियाएँ इतनी भिन्न होती हैं जिससे कि रटने की विधि से सैद्धान्तिक अनुदेश करना व्यक्तिगत रूप में अनुकूलित किया जा सकता है। परन्तु यह अधिक खर्चीला होता है, और भी, सामाजिक अनुक्रियाओं को सीखने और संपरिवर्तित करने के लिए यह अवसर नहीं प्रदान करता। इसलिए हम मध्यम-आकार की कक्षाओं पर सहमत होते हैं और विभिन्न बड़े-छोटे समूहों में भिन्न प्रकार की क्रियाओं को प्रदान करते हैं जहाँ प्रत्येक छात्र के लिये यथासम्भव ध्यान देते हैं।”

प्रो० ट्रो के इन शब्दों से ज्ञात होता है कि सामाजिक प्रक्रिया को सफलतापूर्वक चलाने के लिये हम “समूह” बनाते हैं और इसकी क्रियाओं को हरके छात्र से पूरा करने का प्रयत्न करते हैं। शिक्षा के लिये ऐसे समूहों की अत्यन्त आवश्यकता हमेशा से प्रकट की गई है।

समूह का अर्थ

समूह शब्द में सम् और ऊह दो शब्द मिले हुये हैं। सम् का अर्थ अच्छी तरह होता है और ऊह का अर्थ जुड़ना होता है। इस प्रकार समूह शब्द में हरेक व्यक्ति दूसरे से अच्छी तरह सम्बन्धित होता है, मिला-जुला होता है या मिल-जुल कर क्रिया-व्यवहार करता है। यह एक प्रकार का व्यक्तियों का संगठन होता है जिसकी संरचना अच्छी तरह मिल-जुल कर की जाती है। परन्तु वस्तुतः समूह व्यक्ति का झुण्ड होता है जो सप्रयोजन अथवा निष्प्रयोजन और अचेतन भी होता है।

अंग्रेजी में समूह के लिये गुप (Group) शब्द प्रयोग किया जाता है। फ्रांसीसी और इटैलियन भाषा में इसकी मूल पाई जाती है। फ्रांसीसी शब्द (Groupc) है और इटैलियन शब्द (Groppo) है जिसका अर्थ ‘गुच्छा’ (Bunch) होता है। इस प्रकार से अंग्रेजी शब्द ग्रूप का अर्थ हुआ बहुत से व्यक्तियों या वस्तुओं का एक साथ एक दूसरे से इस प्रकार सम्बन्धित रहना कि दूसरों से निश्चित रूप में भिन्न रहें। इससे स्पष्ट हो जाता है कि जब बहुत से लोग मिलते हैं तो वह झुण्ड या समूह या Group कहलाता है। उदाहरण के लिये ‘कक्षा’ एक समूह है जहाँ पढ़ने के लिये क्षात्र एकत्र होते हैं। खेल के लिये एकत्र खेल- समूह या खिलाड़ी-समूह है। इसी प्रकार से विद्यार्थी समूह (Pupil Group) और अध्यापक समूह (Teacher Group) होता है। ये दोनों एक दूसरे से अलग-अलग होता है। इसी प्रकार काम करने वालों या काम कराने वालों का समूह होता है। समूह का अर्थ हमेशा मनुष्य के समूह से लिया जाता है जहाँ शिक्षा की क्रिया का सम्बन्ध बताया जाता है।

समूह की परिभाषा

समूह की परिभाषा कुछ मनोविज्ञानियों एवं समाजशास्त्रियों के द्वारा की गई है जिन्हें यहाँ उद्धृत किया जा रहा है-

(1) प्रो० शेरिफ- एक समूह एक सामाजिक इकाई है जिसमें बहुत से व्यक्ति शामिल होते हैं जो (कम या ज्यादा) एक निश्चित स्थिति और एक दूसरे के साथ भूमिका सम्बन्ध रखते हैं जो कम से कम समूह के परिणाम की बातों के सम्बन्ध में व्यक्तिगत सदस्यों को नियमित करने के लिये अपने निजी मूल्यों एवं मानकों का निश्चित रूप धारण किये रहते हैं।

(2) प्रो० ड्रेवर- समूह एक एकत्रित इकाई के रूप में माना गया बहुत सी वस्तुओं एवं व्यक्तियों का साथ होना या अपनी निजी एकता रखना है।

(3) प्रो० अज्ञात- समूह व्यक्तियों के उस संकलन को कहते हैं जिससे वे एक दूसरे से विशेष सामाजिक सम्बन्धों से जुड़े होते हैं।

(4) प्रो० केली और थाइबाट-प्रविधिक तौर पर सूमह दो या अधिक लोगों का संकलन होता है जो एक सामान्य कार्य स्वीकार करते हैं, उसके पूरा करने में अन्तराश्रित होते हैं और उसके निष्पादन को बढ़ाने में एक दूसरे के साथ अन्तःक्रिया करते हैं।

(5) प्रो० कैटल- समूह लोगों का एक संगठन है जो लोगों के इस संगठन के अस्तित्व एवं साधन के द्वारा चेतन और अचेतन ढंग से अपनी आवश्यकताओं को संतुष्ट करते हैं।

समूह की विशेषताएँ

ऊपर दी गई परिभाषाओं के आधार पर हम समूह की विशेषताओं पर विचार कर सकते हैं। समूह की निम्नलिखित विशेषताएँ होती हैं-

(1) समूह में चेतन और अचेतन दोनों तरह से लोगों का संगठन या संकलन होता है।

(2) समूह का एक समान उद्देश्य होता है जो स्थायी या अस्थायी होता है।

(3) समूह के लोग परस्पर अन्ताश्रित होते हैं और अन्तक्रिया करते हैं।

(4) समूह का अपना एक व्यवहार होता है जिसे ‘समूह-व्यवहार’ कहते हैं और जिसमें व्यक्तिगत रूप से कार्य नहीं किया जाता।

(5) समूह की सदस्यता अनिवार्य होती है, सभी को सदस्य बनाना जरूरी है।

(6) सदस्यों में एकता की भावना पाई जाती है, पूरे समूह की हित की बात होती है और सब मिल-जुलकर कार्य को पूरा करते हैं।

(7) सामाजिक मेल-जोल, विचारों का आदान-प्रदान, सम्बन्धों का दृढ़ होना समूह में पाया जाता है।

(8) समूह में एक सम्बद्धता पाई जाती है जिसमें नेतृत्व और अनुगमन होता है। इसमें सफलता विफलता के सभी भागीदार होते हैं।

(9) परस्पर आचरण के नियम, मूल्य एवं मानक होते हैं।

(10) भूमिका निर्वाह से सभी सदस्य स्वतन्त्रतापूर्वक अपनी विभिन्न भूमिका पूरी करने का अभ्यास करते हैं जिससे समूह की नैतिकता एवं आदर्शवादिता सुदृढ़ होती है।

समूह व्यवहार तथा व्यक्तिगत व्यवहार

प्रत्येक मनुष्य को जन्म से कुछ सामान्य प्रवृत्तियाँ प्राप्त होती हैं। ये सामान्य प्रवृत्तियाँउसे समूह निर्माण में लगाती हैं और जब यह कुछ अन्य मनुष्यों का सम्पर्क प्राप्त करता है तो निश्चय ही वह उनके कार्य, भाव, विचार का अनुसरण करता है या उन्हें अपने कार्य, भाव, विचार के अनुसरण के लिए प्रभावित करता है। ऐसी स्थिति में सामूहिक व्यवहार होता है अर्थात् सभी लोग एक समान आचरण करते हैं जो अकेले आचरण से भिन्न भी होता है। एक बड़े समूह में व्यक्ति उसी तरह व्यवहार नहीं करता है जैसे कि वह एक छोटे समूह में या अकेले व्यवहार करता है। इसका कारण यह है कि अधिक लोगों के कारण अपनी निजी व्यवहारशीलता को छोड़कर सबकी मिली-जुली व्यवहारशीलता स्वीकार करता है, ऐसी स्थिति में निजी विशेषताएँ देर होती जाती है और सामूहिक विशेषता सक्रिय हो उठती हैं। उदाहरण के लिये आपात स्थिति जब भारत में लागू हो गई थी तो सभी समूह, राजनैतिक बल एवं अन्य भी डर गये थे कि वे MISA या सुरक्षा अधिनियम के अन्तर्गत जेल में बन्द न किये जायें। भारत की जनता ‘इन्कलाब जिन्दाबाद’ के नारे भूल गई थी। इक्के-दुक्के को छोड़कर सभी लोग सामूहिक व्यवहार के प्रभाव से चुप बैठ गये थे। भीड़ में सभी भागने लगते हैं। साहसी और डरपोक के व्यवहार सामूहिक हो जाते हैं। अतएव सामूहिक व्यवहार सामान्य उद्देश्य से अभिप्रेरित होती है। चेतन और अचेतन दोनों स्तर पर बहुमत ही मान्य होता है और निजी संकल्प, चिन्तन, निर्णय आदि लुप्त हो जाते हैं।

सामूहिक व्यवहार में पूरे संगठन का निर्देशन होता है। व्यक्तिगत व्यवहार में केवल निजी निर्देशन पाया जाता है। सामूहिक व्यवहार में संगठन के नेता के व्यक्तित्व द्वारा व्यक्तिगत व्यवहार संचालित होता है। उसका व्यक्तित्व प्रत्येक सदस्य की बुद्धि, नैतिक मानक, किया की प्रकृति को निश्चित करता है। सामूहिक व्यवहार में व्यक्ति अपने निजी स्वार्थ को छोड़ देता है और निजी हित सार्वजनिक हित में लय हो जाता है। सूमह मत को मान्यता देकर उसे निःसंकोच अपनाया जाता है। व्यक्तिगत व्यवहार इस प्रकार स्वार्थपूर्व होता है; संकुचित होता है और अहंभाव उत्पन्न करने वाला होता है जबकि सामूहिक व्यवहार दूसरों के हित के लिये होता है, व्यापक होता है, सामूहिक उद्देश्य की प्राप्ति के लिये होता है और अहंभाव के स्थान पर समभाव (We-feeling) का विकास करने वाला होता है। महान् कार्यों के निष्पादन में सामूहिक व्यवहार अधिक उपयोगी माना जाता है। सामूहिक व्यवहार में कर्म-कभी व्यक्ति का निजत्व समाप्त हो जाता है और स्वोपक्रम (Initiative) जाता है। इसलिये सामाजिक व्यवहार निजी व्यवहार का निलय कर लेता है। अतएव यह ध्यान रहे कि ऐसी स्थिति न आने पावे जबकि व्यक्तिगत बिल्कुल न हो सके। सामूहिक व्यवहार एवं व्यक्तिगत व्यवहार में पूर्ण समन्वय एवं सामन्जस्य होना जरूरी है।

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Pankaja Singh

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