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सृजनात्मकता का अर्थ | सृजनात्मकता की परिभाषा | सृजनात्मक व्यक्ति की विशेषताएँ | सृजनात्मकता के क्षेत्र

सृजनात्मकता का अर्थ | सृजनात्मकता की परिभाषा | सृजनात्मक व्यक्ति की विशेषताएँ | सृजनात्मकता के क्षेत्र

सृजनात्मकता का अर्थ

सृजनात्मकता का अर्थ लोग के सम्बन्ध में ही लगाते हैं परन्तु यह साधारण दृष्टिकोण से नहीं है। मनोविज्ञान में यह अर्थ काम नहीं देता है। इसका अर्थ बताते हुए प्रो० रुश ने लिखा है कि सृजनात्मकता हरेक क्रिया में घटित होती है। यह एक प्रकार की मौलिकता है। यह परिस्थितियों में पाये जाने वाले तत्वों को एक सम्पूर्ण में बाँधने की योग्यता है। सृजनात्मकता में जनन् धातु होता है जिसका अर्थ पैदा करना या उत्पादन करना होता है। अतएव सृजन शब्द मनुष्य की रचना सम्बन्धी योग्यता है। यह रचना किसी भी क्षेत्र से सम्बन्ध रख सकती है। इसीलिये मनोविज्ञान में सृजनात्मकता का अर्थ मनुष्य के द्वारा सभी क्षेत्रों में रचना की योग्यता एवं रचना दोनों होता है। इसी व्यापक अर्थ में इसे समझना भी चाहिए। केवल कलाओं के क्षेत्र में रचना इसका संकीर्ण अर्थ होगा। सृजनात्मकता केवल मनुष्य की ही क्षमता होती है। पशु में यह क्षमता नहीं पाई जाती है।

अंग्रेजी शब्द का अर्थ है अपनी शक्ति से रचना करना या रचने की क्रिया जिससे मनुष्य की इच्छापूर्ति होती है। इस अंग्रेजी शब्द को मूल लैटिन और ग्रीक भाषा के शब्दों में पाई जाती है। लैटिन शब्द (Creatum) तथा ग्रीक शब्द (Kraincin) है। इसका अर्थ इच्छा पूरी करना होता है। अब इस मूल शब्द से हम अंग्रेजी शब्द Creativity का अर्थ निकाल सकते हैं। Creativity का अर्थ होगा वह क्रिया जिससे रचना होती है और उस रचना से मनुष्य की आन्तरिक इच्छा सन्तुष्ट होती है। सम्भवतः इस इच्छा सन्तुष्टि के कारण ही सृजनात्मकता का सम्बन्ध केवल कला-कौशल से ही हो गया परन्तु अब मनोविज्ञान ने इसे हरेक क्षेत्र से सम्बन्धित कर दिया और इसे मनुष्य की रचना योग्यता माना है। इसी रचना योग्यता के अर्थ में हम इसे समझने-समझाने का प्रयत्न करेंगे।

सृजनात्मकता की परिभाषा

विभिन्न मनोविज्ञानियों ने इस सम्बन्ध में विचार दिए हैं। इन्हें समझ कर हम सृजनात्मकता के सम्बन्ध में ठीक से ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं-

(क) प्रो० रुश- सृजनात्मकता मौलिकता है जो वास्तव में प्रत्येक प्रकार की क्रिया में घटित हो सकती है।

(ख) प्रो० ड्रेवर-‌ सृजनात्मकता तात्विक रूप से नए उत्पादन में होती है।

(ग) प्रो० मोर्स और विंगो- सृजनात्मकता की परिभाषा नए सम्बन्धों को देखने या प्रकट करने से दी जाती है।

(घ) प्रो० क्रो एवं क्रो- मौलिक उत्पाघों को अभिव्यक्त करने की मानसिक प्रक्रिया सृजनात्मकता है।

(ङ) प्रो० कोल एवं ब्रूस- सृजनात्मकता एक मौलिक उत्पादन के रूप में मनुष्य के मन की ग्रहण करने, अभिव्यक्त करने और गुणांकन करने की योग्यता एवं क्रिया है।

(च) प्रो० टोरेन्स- समस्या को सुलझाने में कोई नवीन निराकरण विधि को ढूंढ निकालना ही सृजनात्मकता कहलाता है।

सृजनात्मक व्यक्ति की विशेषताएँ

मनोविज्ञानी लोग आज सृजनात्मकता व्यक्तित्व की विशेषताओं का अध्ययन करने में लगे हुए हैं और यह मालूम करने की कोशिश में हैं कि सृजनात्मकता के साथ कौन सी विशेषताओं को सम्बन्धित किया जाये। निम्नलिखित विशेषताएँ सृजनात्मकता व्यक्ति में पाई जाती है-

(क) अच्छी उपलब्धि

(ख) उच्च बुद्धि-लब्धि

(ग) व्यंग की भावना

(घ) पाठ्य विषयों में अधिक रुचि

(ङ) सामाजिकता की अधिकता

(च) सौन्दर्य मूल्यों की उच्चता

(छ) कल्पना एवं चिन्तन की मौलिकता

(ज) अन्तर्दृष्टि एवं स्वोपक्रम

(झ) क्रियाशीलता की अधिकता

(ञ) अधिक अभिव्यक्ति क्षमता

(ट) सहनशीलता और समायोजनशीलता

(ठ) मानसिक स्वस्थता

(ड) अधिक सूचना रखने वाला

(ढ) बोधगम्यता की अधिकता

सृजनात्मकता के क्षेत्र

इस सम्बन्ध में हमें प्रो० कोल एवं ब्रूस के शब्दों पर ध्यान देना चाहिए, “हमारी शिक्षा का लक्ष्य आधुनिक अमरीका में व्यक्ति को रहने के योग्य बनाना होना चाहिए। “बीसवीं शताब्दी के मध्य में अच्छी तरह रहने के लिए आधुनिक मनुष्य को एक में निहित कई व्यक्ति होना चाहिए। उसे एक तकनीकी मनुष्य अपने कार्य या व्यवसाय का ठेठ पंडित, एक कुशल कारीगर, वैज्ञानिक भावना से भरा हुआ, औद्योगिक समाज की कठिनता समस्याओं को हल करने में अभ्यस्त होना चाहिये। उसे एक जनतांत्रिक मनुष्य होना चाहिये-आधुनिक जीवन को समझने वाला, विचार एवं विवेचन की स्वतन्त्रता में निष्ठावान, शसितों की स्वीकृति द्वारा शासन के सिद्धान्त को मानने वाला होना चाहिये। इसके अलावा उसे कलाकार के रूप में मनुष्य, बनाने के लिये प्रयल करने वाला, जो कुछ वह है उसे कहने वाला होना चाहिये। प्रत्येक निष्ठा वाले व्यक्ति के साथ सम्पर्क को स्वागत करने का इच्छुक वह अपने आत्म और अपने कथन की एकनिष्ठता पर साहसपूर्ण बल देने वाला हो। इस प्रकार अमरीका में अच्छी तरह रहने के लिये परिपक्व मनुष्य को कई व्यक्ति होना चाहिए।” यह कथन केवल अमरीका के लिये ही नहीं समझा जाना चाहिये । इस आधार पर हम सृजनात्मकता के क्षेत्र पर विचार कर सकते हैं।

सृजनात्मकता के क्षेत्र में मनुष्य का सारा जीवन आ जाता है-व्यक्तिगत एवं सामाजिक जीवन । अपने निजी एवं सामूहिक कार्य-कलापों में जब मनुष्य अपनी मौलिक शक्तियों, योग्यताओं एवं क्षमताओं का प्रयोग करता है तो निश्चय ही वह कुछ नये रूप में अभिव्यक्ति करता है। यहीं हम उसकी सृजनात्मकता पाते हैं। परन्तु विशेष रूप से कुछ क्षेत्र हैं जिनका सम्बन्ध हम सृजनात्मकता से करते हैं। मनोविज्ञानियों के विचारानुसार ये क्षेत्र (1) ज्ञान कौशल की उपलब्धि से सम्बन्धित होता है। अतः ज्ञान कौशल के अन्तर्गत जितने भी विषय होते हैं वे सब सृजनात्मकता के लिये महत्वपूर्ण माने गये हैं। इसके अन्तर्गत हम निम्न क्षेत्र को अधिक महत्व देते हैं-

(1) कला जैसे चित्रकला, संगीतकला, नृत्यकला, स्थापत्यकला आदि के क्षेत्र ।

(2) कौशल जैसे धातु, काष्ठ, चर्म, कागज-दफ्ती के कार्य के क्षेत्र ।

(3) यांत्रिकी जैसे मशीन, यंत्र, औजार आदि बनाना। इसमें तकनीकी क्षेत्र आता है।

(4) विज्ञान (भौतिक, रसायन, औषधि निर्माण, आदि) से सम्बन्धित क्षेत्र जहाँ अनुसंधान एवं आविष्कार किये जाते हैं। गणित को भी विज्ञान मानकर इसी क्षेत्र में रख सकते हैं।

(6) भाषा, साहित्य (काव्य, नाटक, कहानी, उपन्यास रचना) के क्षेत्र इसमें वाक्कला, भाषण कला, लेखनी कला आदि भी शामिल किये जाते हैं।

(7) ज्ञानात्मक, चिन्तन, भावाभिव्यक्ति, समस्या समाधान तथा तर्कना की प्रक्रियाएँ।

(8) व्यवसाय, उद्योग एवं कार्य के क्षेत्र जिसमें जो व्यक्ति लगा रहता है। आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक, प्रशासनिक सभी प्रकार के कार्य के क्षेत्र में सृजनात्मकता होती है।

(9) सामूहिक कार्य-योजना के क्षेत्र जहाँ कई व्यक्ति मिलकर समाज की समस्या को हल करने की कोशिश करते हैं। विभिन्न सांस्कृतिक, धार्मिक क्रियाओं के क्षेत्र ऐसी ही हैं जहाँ सृजनात्मकता के लिए अवसर मिलता है। ऊपर के विवरण से स्पष्ट है कि सृजनात्मकता का क्षेत्र व्यापक होता है और सम्पूर्ण जीवन से संबंध रखता है।

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Pankaja Singh

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