शिक्षाशास्त्र

नेतृत्व | नेतृत्व का तात्पर्य | नेतृत्व के प्रकार | नेतृत्व का प्रशिक्षण | समूह में नेतृत्व की भूमिका | समूह गति विज्ञान और अधिगम

नेतृत्व | नेतृत्व का तात्पर्य | नेतृत्व के प्रकार | नेतृत्व का प्रशिक्षण | समूह में नेतृत्व की भूमिका | समूह गति विज्ञान और अधिगम

नेतृत्व

समूह, चाहे वह कक्षा हो या और कोई, में प्रत्येक सदस्य जब एक दूसरे के साथ अन्तर्क्रिया करता है तो निश्चय ही अपनी भूमिका का निर्वाह करता है। कक्षा या अन्य समूह में भी सदस्यों के बीच एक सम्बन्ध बन जाता है और इसी के अनुसार समूह का एक महत्वपूर्ण कार्य निर्णय लेने का है। कौन निर्णय लेगा और किस प्रकार से लेगा यह सदस्यों के परस्पर सम्बन्ध निश्चित करते हैं। वास्तव में सभी सदस्य किसी एक को अपना नेता या नायक बना लेते हैं। इस प्रकार प्रत्येक समूह में एक नेता होता है और दूसरे अनुगामी होते हैं।

नेता समूह का मुख्य सदस्य होता है जिसकी बात सभी सदस्य मानते हैं और जो उन सभी के हित के लिये सभी के साथ मिल-जुल कर कार्य करता है। ऐसा नेता जनतांत्रिक होता है और इसके विपरीत जहाँ नेता अपने आप सभी निर्णय लेता है, सभी काम बिना सदस्यों की सलाह के करता है वहाँ वह प्राधिकारवादी होता है। आज के युग में जनतांत्रिक नेता की माँग की जाती है, यद्यपि भारत में प्राधिकारवादी नेता ही सम्मानित हो रहे हैं जैसा कि आज की आपात स्थिति बता रही है। कुछ भी स्वरूप नेता का हो शिक्षा समूह में जनतांत्रिक नेता की आवश्यकता होती है। जनतांत्रिक नेता के गुणों पर विचार करते हुये प्रो० दुगाल ने कहा है कि एक जनतांत्रिक नेता में नीचे लिखे गुण अपेक्षित हैं-

(1) स्वाग्रह और नम्रता का स्वस्थ मेल

(2) सामान्य के ऊपर बुद्धि

(3) प्रतिष्ठा .

(4) क्रियाशीलता

(5) समूह मनोविज्ञान का ज्ञान

(6) अभिव्यक्ति की क्षमता

(7) अध्यवसाय

(8) संवेगात्मक नियन्त्रण

(9) संकल्प शक्ति

(10) संगठन क्षमता

प्रो० रुश द्वारा दी गई विशेषताएँ नीचे दी जा रही हैं-

(1) सूचना से पूर्ण होना

(2) समूह अभिवृत्तियों की ओर सजगता.

(3) लोकप्रिय होना

(4) दूसरों के भावों और जरूरतों को समझना

(5) सूक्ष्म चिन्तन की योग्यता रखना

(6) अच्छा संवेगात्मक समायोजन करना

(7) आत्म सम्मान की भावना का अधिक होना, अपने को बड़ा मानना

(8) नेतृत्व एवं अनुगमन में सन्तुलन रखना

(9) परिस्थिति को अनुकूल बनाने की क्षमता रखना

(10) नेतृत्व का प्रशिक्षण प्राप्त करना।

नेतृत्व का तात्पर्य

(Meaning of Leadership)-

नेताओं के गुण की उपर्युक्त सूची से हम मेतृत्व का तात्पर्य जान सकते हैं। नेतृत्व मेता की क्रियाशीलता (Leadership is the activity role of the leader) | इसका तात्पर्य यह है कि जो व्यक्ति दूसरे का नायक और अगुजा बनता है वह पूरारों को परिस्थिति के अनुफूल कहाँ तक ले जाने की सामर्थ्य का प्रयोग कर सकता है। प्राचीन समय में नेतृत्व विभिन्न जन्मजात गुणों के आधार पर दूसरों को आगे बढ़ाने में पाई जाती थी परन्तु अब नेतृत्व जन्मजात न होकर परिस्थितिवश उत्पन्न और विकसित होने वाली क्षमता और क्रियाशीलता है। नेतृत्व एक सामाजिक क्रियाशीलता के रूप में समझा जाना चाहिए जिसमें व्यक्ति अपनी शारीरिक, मानसिक और सामाजिक प्रभुता को प्रकट करता है। साथ ही वह समूह की चिन्ता भी रखता है।

प्रो० ट्रो ने लिखा है कि “नेतृत्व नेता की मानी हुई विशेषताएँ हैं। किसी समूह पर रखा गया या चुना गया नेता का सम्बन्ध है। कुछ निश्चित लक्ष्यों की दिशा में समूह को प्रभावित करने की प्रक्रिया है।”

इस कथन से हम यह तात्पर्य निकालते हैं कि नेतृत्व के गुणों द्वारा समूह के अन्य लोगों को कुछ निश्चित लक्ष्य की ओर ले जाने की क्रिया होती है।

प्रो० उदय पारीख ने इस सम्बन्ध में अपने विचार नीचे लिखे शब्दों में दिया है जिससे हम इसका तात्पर्य समझ सकते हैं-

“नेतृत्व की परिभाषा साररूप में देना कठिन है। एक अनुदेशिक समूह के लिये नेतृत्व के उस व्यवहार के रूप में समझा जा सकता है जो समूह के कार्य-लक्ष्य में, लक्ष्य की प्राप्ति की ओर बढ़ने में अत्यधिक प्रभावकारी होता है। इस तरह से, नेतृत्व नियुक्त या चुने गये नेताओं के विरोधी से मुक्त किया जा सकता है। यह सम्प्रदाय नेतृत्व की क्रियात्मक प्रकृति को समझने में सहायता देता है।”

शिक्षा और अनुदेश समानार्थी माने गये हैं अतएव शिक्षा की दृष्टि से नेतृत्व की परिभाषा हम एक सामाजिक प्रक्रिया (Social process) के रूप में कह सकते हैं जिसमें व्यक्तित्व का प्रभाव समूह पर पड़ता है। इस विचार से “नेतृत्व एक प्रभावकारी व्यक्तित्व के समूह में दूसरों पर अपने शारीरिक, मानसिक या सामाजिक प्रभुत्व के कारण विकास और प्रगति हेतु प्रभाव डालने की सामाजिक प्रक्रिया है।”

नेतृत्व के प्रकार

(Types of Leadership)-

प्रो० लिथिट और  ह्वाइट के विचारानुसार नेतृत्व के तीन प्रकार होते हैं-

(1) प्राधिकारवादी (Authoritarian) जब कार्य निष्पादन का निर्णय अकेले नेता के द्वारा ही होता है।

(2) जनतांत्रिक (Democratic) जब नेता और समूह के सभी सदस्य निर्णय लेते हैं।

(3) व्यक्तिवादी (Laissez faire) जब समूह का प्रत्येक सदस्य स्वतन्त्र रूप से अपने- अपने निर्णय लेता है कि उसे अपने लिए क्या करना है।

प्राधिकारवादी नेतृतव एक प्रकार से फासिस्टवादी ढंग का होता है जिसमें नेता के हाथ में सारी शक्तियाँ होती हैं और वह जैसा चाहे वैसा ही करता है।

व्यक्तिवादी नेतृत्व में भी प्राधिकारवादी भावना पाई जाती है परन्तु इसमें कोई एक नेता न होकर हरेक व्यक्ति अपना-अपना नेता बन जाता है।

जनतन्त्रवादी नेतृत्व सहयोगी ढंग का होता है। इसमें एक व्यक्ति नेता तो अवश्य होता है परन्तु वह अपने मन से कुछ नहीं करता है, उसे सभी सदस्य सलाह देते है और उनकी राय का नेता स्वागत करता है, स्वीकार भी करता है। इसमें एक मध्यम मार्ग का अनुगमन होता है। जनतन्त्र में सभी व्यक्ति स्वतन्त्र अवश्य होते हैं परन्तु उनका दृष्टिकोण सूमहवादी होता है और समूह के सभी सदस्य अपना प्रकाशन करते हैं न कि नेता की बात अनसुनी करते हैं। अतएव इस प्रकार का नेतृत्व अच्छा माना जाता है।

नेतृत्व के दो प्रकार और हैं-

(1) अध्यापक द्वारा नेतृत्व (Teacher Leadership)–  जहाँ अध्यापक का प्रमुख उत्तरदायित्व समूह की लक्ष्यप्राप्ति की दिशा में ले जाना होता है। उसे निश्चय करना पड़ता है कि किसी तरीके से वह कार्य करे और कार्य करावे कि लक्ष्य प्राप्त हो जावे। अध्यापक इसके लिए समूह की आवश्यकताओं का अध्ययन करता है और समूह के सदस्यों में उत्साह, प्रतियोगिता, प्रतिस्पर्धा आदि जाग्रत रखता है ताकि व्यक्तिगत सदस्य लक्ष्य की ओर बढ़ने की क्रिया में भाग लेते रहे हैं। इसके लिए वह अपने लगाव एवं कौशल से उत्तम वातावरण का निर्माण कर लेता है। जिससे समूह के सदस्यों में समस्या की चुनौती का सामना करने की भावना पाई जाती है।

(2) छात्र द्वारा नेतृत्व (Student Leadership)- जहाँ छात्र स्वयं आगे बढ़ने का प्रयत्न करते हैं और अध्यापक की सहायता से अपने कौशलों की वृद्धि करते हैं और व्यवहार का परिमार्जन करते हैं। अध्यापक कुछ छात्र को समूह का नायक बना देते हैं और ऐसे छात्र-नायक को समूह के निर्णयों के साथ व्यवहार करना आवश्यक होता है जैसा कि हम विद्यार्थी परिषद् एवं छात्र संघ में पाते हैं। कुछ छात्र अपनी विशेषताओं के कारण अपने समवयस्क समूह (Peer group) में नायक बन जाते हैं दृढ़ चरित्र एवं संकल्प वाले छात्र अपना गुट (Gang) भी तैयार कर लेते हैं जिनका अलग-अलग लक्ष्य हो जाता है। बुरे प्रयोजनों के साथ जो गुट बनता है उसे क्लिकव द्वेषात्मक समूह कहते हैं। इनके मानक एवं मूल्य भी भिन्न होते हैं। छात्र नेतृत्व के प्रभावस्वरूप आस स्वीकृति, महत्व, सृजनात्मकता, उत्तरदायित्व, कार्य-कुशलता आदि का विकास भी होता है। इसके लिये अभ्यास एवं कार्यों में भाग लेना आवश्यक होता है।

व्यावसायिक कुशलता और प्राविधिक योग्यता के आधार पर नेतृत्व के बहुत से प्रकार हो सकते हैं। उदाहरण के लिये विभिन्न शैक्षिक क्षेत्रों का नेतृत्व (Academic Leadership) जैसे विज्ञान, कला, संगीत, हस्तकौशल का नेतृत्व । इसके अलावा चिकित्सा, अभियांत्रिकी, अध्यापक, कार्यालय कर्म, निर्माण-रचना कार्य से सम्बन्धित क्षेत्रों में नेतृत्व (Leadership in the fields of Law, Medicine, Engineering, Teaching, Office work, Construction-Creation work)। आधुनिक समय में वाणिज्य-व्यापार और राजनीति शासन में भी नेतृत्व का महत्व दिया जा रहा है, अस्तु इस दिशा में भी नेतृत्व के प्रकार मिलते हैं। अब स्पष्ट है कि नेतृत्व के बहुत से प्रकार हैं।

नेतृत्व शैक्षिक और शिक्षा से अलग प्रकार का होता है। शिक्षा से अलग जो क्रियाएँ होती हैं जैसे खेलकूद, छात्रसंघ, राष्ट्रीय सेवा योजना, राष्ट्रीय कैडेट कोर आदि। इसके अलावा विद्यालय में छात्रों में गुटबन्दी कराने वाले नेता भी होते हैं।

नेतृत्व का प्रशिक्षण

(Training of Leadership)–

विद्यालय में आज केवल विषयों की शिक्षा देकर ही काम पूरा नहीं हो पाता है बल्कि नेताओं को उत्पन्न करना भी विद्यालय का काम माना जाता है। इस कार्य के लिये विद्यालय में जो भी अध्यापक हों उन्हें कुछ विशेष कार्य करने चाहिए और इस प्रकार वे छात्रों को नेतृत्व की शिक्षा देने में समर्थ होंगे। नीचे लिखे ढंग से उन्हें कार्य करना चाहिए-

(1) अध्यापक उन छात्रों का पता लगायें जिनमें स्वाग्रह (Self Assertion) और सामान्य से अधिक बुद्धि एवं कार्य-निपुणता हो। ऐसे व्यक्ति ही नेतृत्व करने में सफल होते हैं। इन्हें ढूँढ कर इन्हें नेता का काम करने की प्रेरणा भी दी जाये, इनसे काम भी कराया जावे।

(2) अध्यापक कक्षा नायक-प्रणाली, स्काउटिंग, खेल-कूद-व्यायाम, साहित्यिक समिति, अभिनय समिति व गोष्ठी, कौशल कार्यक्रम आदि के द्वारा छात्र नायकों की स्वाग्रह प्रवृत्ति को ऊँचा उठावे । छात्र-नायकों में आत्म-सम्मान का स्थायी भाव जाग्रत किया जावे।

(3) अध्यापक छात्र को उनकी आंतरिक क्षमताओं, योग्यताओं एवं शक्तियों का बोध करावें और इनके प्रति वे चेतन अनुभूति भी करें। इससे आत्मसम्मान, आत्मविश्वास, आत्मचेतना का विकास होता है।

(4) नेतृत्व के प्रशिक्षण में छात्र में संकल्प का विकास किया जावे। इसके लिये उसे कठिन एवं उत्तरदायित्वपूर्ण कार्य सौंपा जावे और पूरा कराया जाये। दूसरों के साथ छात्र काम करना और दूसरों में काम कराने का गुण अपनावे तभी वह नेता बनता है।

(5) नेतृत्व के प्रशिक्षण के लिये शिक्षक को स्वयं नेतृत्व की क्षमता रखनी चाहिए। उसके व्यवहार ऐसे हों जो दूसरों को अपना अनुगामी बना सकें। शिक्षक में अद्भुत कार्य क्षमता, अन्तर्दृष्टि, आगम दृष्टि आदि होनी चाहिये, इसकी छाप छात्रों पर स्वाभाविक रूप से डालनी चाहिए

(6) नेतृत्व के प्रशिक्षण के लिये भावी नेताओं को महापुरुषों की जीवनियाँ पढ़नी चाहिए और उनके आदेशों को स्वीकार करना चाहिये। इन जीवन चरित्रों से स्वयं उत्साहित होकर तदनुरूप कार्य करना चाहिये।

(7) नेतृत्व के प्रशिक्षण के विचार से छात्रों को स्वशासन की क्रियाओं का भार एवं अवसर अधिक मात्रा में देना जरूरी है परन्तु यह ध्यान रखा जावे कि उसका दुरुपयोग न करें।

(8) नेतृत्व प्रशिक्षण के विचार से एक समूह अवश्य हो क्योंकि नेतृत्व एकान्त में विकसित नहीं किया जा सकता है और न तो उसका प्रशिक्षण सम्भव होता है। नेता और अन्य सदस्यों के बीच चेतन रूप में क्रिया और प्रतिक्रिया होनी चाहिये। नेता और अनुगामी में परस्पर अच्छे सम्बन्ध बनाने की कोशिश होनी चाहिए।

(9) नेतृत्व के प्रशिक्षण के विचार से समूह के सदस्यों के कामों का विशिीकरण किया जाये । इसका अर्थ यह है कि विशेष कार्य करने के लिये विशेष लोगों को चुन लिया जावे।

(10) नेतृत्व का प्रशिक्षण विभिन्न अवस्थाओं किया जावे। इसका एक उदाहरण हमें रूप में मिलता है जहाँ शैशवावस्था से लेकर प्रौढ़ावस्था तक नेतृत्व का विकास करते हैं, और साथ ही साथ विभिन्न क्षेत्रों में नेतृत्व का प्रशिक्षण विभिन्न अवस्थाओं से सम्बद्ध करते हैं। ऐसा करने में व्यक्ति की आयु, स्वस्थता, योग्यता आदि पर ध्यान रखा जावे । विभिन्न संस्थाओं एवं अभिकरणों का प्रयोग करना भी जरूरी है।

समूह में नेतृत्व की भूमिका-

समूह में नेता एवं उसकी क्रियाशीलता की महत्वपूर्ण भूमिका पायी जाती है। सही नेतृत्व से समूह अपने लक्ष्य की प्राप्ति करता है, सही दिशा में आगे बढ़ता है, सफल होता है। समूह के सदस्यों को प्रेरणा मिलती है और सभी लोगों को मिल-जुल कर कार्य पूरा करना पड़ता है इस प्रकार सहयोग की भावना बढ़ती है। बुरे नेतृत्व से समूह नीचे गिरता है और असफलता मिलती है।

समूह गति विज्ञान और अधिगम

(Group Dynamics and Learning)

समूह गतिविज्ञान व्यक्तियों द्वारा बनाए समूहों की क्रियाओं का वैज्ञानिक अध्ययन करता है। समूह गतिविज्ञान का सम्बन्ध उन पारस्परिक क्रियाओं से है जो व्यक्तिगत और सामूहिक प्रगति के विचार से की जाती हैं। अधिगम भी इसी प्रकार की एक क्रिया है जिसे विद्यार्थी और शिक्षक दोनों मिलकर करते हैं और जिसका लक्ष्य विद्यार्थी की उन्नति करना है और ऐसी उन्नति समाज के सन्दर्भ में ही होती है। अधिगम विद्यालय और कक्षा में होने वाली क्रिया है। विद्यालय और कक्षा समूह कहे जाते हैं और इन समूहों के सदस्य आपस में जो क्रिया करते हैं उसका परिणाम अधिगम होता है। इस स्थिति में समूह गतिविज्ञान अधिगम का भी वैज्ञानिक अध्ययन करता है। इस सम्बन्ध में प्रो० ट्रो ने लिखा है कि “अधिगम की प्रभावकारिता समूह की संरचना और गतिविज्ञान का कार्य है।’’

विद्यालय और कक्षा में अधिगम के लिये भूमिका निर्वाह’ (Role playing) एक आवश्यक क्रिया है। भूमिका का तात्पर्य सामाजिक व्यवहार का एक प्रतिदर्श या प्रकार है जो किसी व्यक्ति के लिये उसके समूह में लोगों की माँगों और आशाओं की दृष्टि से परिस्थिति के उपयुक्त मालूम होते हैं।

सामाजिक व्यवहार कब और कैसे उपयुक्त बनाया जाये यह कार्य (function) अधिगम का कहा जाता है। इससे स्पष्ट है कि समूह गतिविज्ञान समूह की क्रियाशीलता का अध्ययन करता है और अधिगम समूह के सदस्यों की क्रिया है। इस प्रकार दोनों का घनिष्ठ सम्बन्ध होता है।

प्रो० बने और शीयर्स ने बताया है कि “अभी-अभी बहुत सी भूमिकाओं का वर्णन किया गया है जो किसी भी व्यक्ति के द्वारा पहचाने जा सकते हैं जिन्हें समिति या परिषद् सदस्य के रूप में अनुभव मिला होता है। अध्यापकों के लिये श्रेणियाँ इस तथ्य के ऊपर बल देती हैं कि यद्यपि भूमिकाओं का निर्वाह भिन्नताओं के साथ होता है और किसी एक समूह में व्यक्ति एक भूमिका से दूसरी की ओर खिसकते हैं, यह परवाह नहीं रहती कि व्यक्ति कौन हैं-पुरुष या स्त्री, प्रौढ़, किशोर या बालक-भिन्न समूह के सदस्यों से एक ही प्रकार के व्यवहार की आशा की जाती है।

इस कथन से यह ज्ञात होता है कि अधिगम में लगे सभी व्यक्ति को बहुत सी भूमिकाएँ अदा करनी पड़ती हैं और अध्यापक तथा विद्यार्थी सभी से एक ही प्रकार के व्यवहार की आशा की जाती है। इन सब भूमिकाओं का अध्ययन समूह गतिविज्ञान करता है। इस दृष्टि से अधिगम का सम्बन्ध गतिविज्ञान से गहरा होता है।

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Pankaja Singh

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