समाज शास्‍त्र

भारतीय समाज में पश्चिमीकरण की भूमिका | सामाजिक जीवन एवं संस्थाओं में परिवर्तन | धार्मिक जीवन में परिवर्तन | राजनीतिक जीवन में परिवर्तन | आर्थिक जीवन में परिवर्तन | साहित्य के क्षेत्र में परिवर्तन | ललित कलाओं में परिवर्तन | शिक्षा के क्षेत्र में परिवर्तन

भारतीय समाज में पश्चिमीकरण की भूमिका | सामाजिक जीवन एवं संस्थाओं में परिवर्तन | धार्मिक जीवन में परिवर्तन | राजनीतिक जीवन में परिवर्तन | आर्थिक जीवन में परिवर्तन | साहित्य के क्षेत्र में परिवर्तन | ललित कलाओं में परिवर्तन | शिक्षा के क्षेत्र में परिवर्तन

भारतीय समाज में पश्चिमीकरण की भूमिका

पश्चिमीकरण के परिणामस्वरूप भारतीय सामाजिक व सांस्कृतिक जीवन में अनेक क्रान्तिकारी परिवर्तन हुए हैं। कार्ल मार्क्स के अनुसार अंग्रेजों को भारत में दो प्रकार की सेवा करनी थी – प्रथम विघटनात्मक (Destructive) तथा द्वितीय रचनात्मक (Constructive) मार्क्स के अनुसार, “विजेताओं में अंग्रेज प्रथम थे जिन्होंने हिन्दू संस्कृति……को नष्ट कर दिया तथा यहाँ के उद्योग-धन्धों की जड़ें काट दी और भारतीय समाज में जिन वस्तुओं को आदर और उच्चता प्राप्त थी उनके उत्कर्ष को छीन लिया।…….नष्टता की पराकाष्ठा में निर्माण की नींव कुछ कठिनाई से ही पड़ती किन्तु इसका प्रारम्भ हो चुका है।” यदि हम पश्चिमीकरण के परिणामस्वरूप भारतीय समाज एवं संस्थाओं में होने वाले परिवर्तनों पर निष्पक्ष रूप से विचार करें तो हमें अच्छे-बुरे दोनों प्रकार के परिवर्तन देखने को मिलते हैं। इन परिवर्तनों को हम निम्नलिखित सात शीर्षकों में प्रस्तुत कर सकते हैं-

(1) सामाजिक जीवन एवं संस्थाओं में परिवर्तन

(2) धार्मिक जीवन में परिवर्तन

(3) राजनीतिक जीवन में परिवर्तन

(4) आर्थिक जीवन में परिवर्तन

(5) साहित्य के क्षेत्र में परिवर्तन

(6) ललित कलाओं में परिवर्तन

(7) शिक्षा के क्षेत्र में परिवर्तन

(1) सामाजिक जीवन एवं संस्थाओं में परिवर्तन

अस्पृश्यता (Untouchability) – पाश्चात्य शिक्षा एवं मूल्यों ने समानता के सिद्धान्त को भारत के सामाजिक वातावरण में उत्पन्न किया। नगरों में इस प्रकार के पर्यावरण की सृष्टि हुई कि छुआछूत के नियमों का पालन न हो सका। दूसरी ओर यातायात के साधनों में उन्नति एवं नगरों की उन्नत सामाजिक परिस्थितियों ने अछूतों को उनके अधिकार के सम्बन्ध में सचेत किया। इस जागरूकता को आर्य समाज, ब्रह्म समाज, रामकृष्ण मिशन और महात्मा गाँधी ने सक्रिय किया। इन सबके ऊपर पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव स्पष्ट था।

विवाह (Marriage)-  सह-शिक्षा, स्त्री-पुरूषों का एक साथ काम करने का अवसर, राजनैतिक एवं सामाजिक जीवन में स्त्री-पुरूषों का बढ़ता हुआ सम्पर्क पाश्चात्य आदर्शों एवं मूल्यों के प्रभाव के कारण जाति-प्रथा का अन्तर्विवाह (Endogamy) का नियम दिन-प्रतिदिन निर्बल होता गया और देर से विवाह, प्रेम विवाह और अन्तर्जातीय विवाह के अनुकूल वातावरण की सृष्टि होने लगी। साथ ही , बहुपत्नी-विवाह, बाल-विवाह आदि की बुराइयों के प्रति जागरूकता बढ़ती गयी। उसी प्रकार विधवा पुनर्विवाह के सम्बन्ध में किये गये प्रयत्न भी पाश्चात्य मूल्यों एवं आदर्शों द्वारा प्रेरित हुए थे।

धार्मिक जीवन में परिवर्तन (Changes in Religious Life) –

पाश्चात्य संस्कृति के विस्तार के पूर्व भारतवासियों के जीवन में धर्म का अत्यधिक महत्व था। धर्म से सम्बन्धित असंख्य अन्धविश्वास एवं कुसंस्कार उनको चारों तरफ से घेरे हुए थे। इसी कारण जाति-पाति के भेद-भाव, सती प्रथा, पर्दा प्रथा, बाल-विवाह, विधवा पुनर्विवाह पर प्रतिबन्ध आदि सभी कुप्रथाओं को एक धार्मिक आवरण देकर उचित ठहराया जाता था। पाश्चात्य शिक्षा, धर्म तथा आदर्शों ने इस धार्मिक आवरण को निकाल फेंकने में भारतीय समाज-सुधारकों को काफी मदद की। डॉ. यादव के अनुसार तर्कपूर्ण एवं आलोचनात्मक दृष्टिकोण के विकसित होने के कारण धार्मिक अन्धविश्वासों और रूढ़ियों का अन्त होने लगा। भौतिकवाद एवं बुद्धिवाद के प्रभाव के कारण धार्मिक विधियों तथा कर्मकांड का खंडन होने लगा और कुछ लोगों के प्रति श्रद्धा भी कम हो गयी।

राजनैतिक जीवन में परिवर्तन (Changes in Political Life) –

ब्रिटिश साम्राज्य स्थापित होने के उपरान्त शासन व्यवस्था में आमूल परिवर्तन किया गया। अंग्रेजों के आने से पूर्व भारतीय शासन-व्यवस्था की तीन मुख्य विशेषताएँ थीं, यथा- (1) गाँव पंचायतों की राजनैतिक इकाइयों के रूप में स्वतन्त्र सत्ता,(2) शासन व्यवस्था में धार्मिक सिद्धान्तों की मान्यता,और (3) विभिन्न प्रान्तों में विभिन्न शासकों द्वारा भिन्न-भिन्न शासन व्यवस्था। अंग्रेजों ने इन तीनों तत्वों को जड़ से उखाड़ फेंका, पंचायतों के अधिकारों को छीन लिया, शासन प्रबन्ध के क्षेत्र सेधर्म का बहिष्कार किया और सारे देश में समान शासन व्यवस्था स्थापित की। राजनैतिक मामलों में उनकी विभाजन एवं शोषण की नीति को अगर अलग निकालकर विवेचना की जाये तो सामान्य रूप से यह कहा जा सकता है कि भारत को एक समान शासन-सूत्र में बाँधकर शान्ति एवं सुरक्षा स्थापित करने का श्रेय अंग्रेजों को ही है। इस प्रकार ब्रिटिश शासन काल में देश का ‘राजनैतिक एकीकरण’ (Political Integration) हुआ। ब्रिटिश शासन काल में भारत का अन्य देशों के साथ राजनैतिक सम्बन्ध स्थापित हुआ। अंग्रेजी शासन काल में यातायात एवं संचार के साधनों में जो प्रगति हुई उसके परिणाम स्वरूप भारत के विभिन्न प्रान्त,जाति तथा धर्म के लोगों को एक-दूसरे के निकट सम्पर्क में आने में काफी सुविधा हुई और देश में राष्ट्रीय एकता पनपने लगी। पश्चिम की राष्ट्रीय चेतना की लहर यहाँ आने लगी। अग्रेजों के आर्थिक शोषण तथा राजनैतिक प्रभुता, कूटनीति व अत्याचार ने इस देश में राष्ट्रीयता की भावना को विकसित किया। ‘भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन’ (Indian National Movement) के जन्म और विकास में पाश्चात्य शिक्षा, संस्कृति,आदर्श,सामाजिक मूल्य,शासन व्यवस्था इत्यादि ने आदि से अन्त तक सहायता की।

आर्थिक जीवन में परिवर्तन (Changes in Economic Life)

अंग्रेजी राज्य की स्थापना के उपरान्त भारत में आर्थिक ढाँचे में भी क्रान्तिकारी परिवर्तन हुआ। अंग्रेजों के आ जाने के बाद एक ओर यातायात के साधनों में उन्नति हुई और दूसरी ओर औद्योगीकरण (Industrialization) बढ़ता गया। परिणामतः गाँव की आर्थिक आत्मनिर्भरता धीरे-धीरे समाप्त होने लगी और खेती का व्यापारीकरण प्रारम्भ हो गया अर्थात् अब खेती की उपज दूर-दूर बाजारों में बेची जाने लगी,गाँव के आर्थिक जीवन पर दूसरा प्रभाव ग्रामीण उद्योगों का क्रमशः विनाश था, क्योंकि गृह उद्योग, मशीन-उद्योग की प्रतियोगिता में न टिक सके। तीसरा प्रभाव गाँव में प्रचलित पुरानी प्रणाली को समाप्त कर दिया गया और जमींदारी प्रथा का विकास किया गया। जमींदार कृषकों पर हर तरह से अत्याचार करने लगे और कृषकों की अवस्था तेजी से गिरती गयी। शहर के आर्थिक जीवन में सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन, औद्योगिक विकास और पूंजीवादी व्यवस्था का श्रीगणेश था। बड़ी-बड़ी, मिलों और फैक्ट्रियों की स्थापना हुई,मशीनों का प्रयोग दिन-प्रतिदिन बढ़ता गया और उत्पादन बड़े पैमाने पर होने लगा। यातायात के साधनों में उन्नति होने के कारण अन्तर्घान्तीय व्यापार तथा अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में वृद्धि हुई। इससे देश में व्यापार एवं वाणिज्य में भी उन्नति हुई। उद्योग, व्यापार एवं वाणिज्य के क्षेत्र में प्रतियोगिता दिन-प्रतिदिन बढ़ती गयी। किन्तु औद्योगीकरण तथा नगरीकरण के साथ-साथ अनेक श्रमिक समस्यायें भी उत्पन्न हुई। उन समस्याओं में श्रमिकों के काम करने की दशाओं की समस्या,श्रम-आवास की समस्या, स्त्री तथा बाल-श्रमिकों की समस्या, मजदूरी की समस्या, श्रमिकों के स्वास्थ्य एवं कार्य-कुशलता की समस्या आदि प्रमुख हैं।

साहित्य के क्षेत्र में परिवर्तन

अंग्रेजी साहित्य विश्व के सब आधुनिक साहित्यों में पर्याप्त समृद्ध माना जाता है। इस अंग्रेजी साहित्य तथा यूरोप की अन्य भाषाओं के भी साहित्य को पढ़ने और समझने तथा उससे लाभ उठाने का अवसर भारतीय विद्वानों एवं लेखकों को अंग्रेजी भाषा ने प्रदान किया। इससे हिन्दी के साथ-साथ अन्य सभी प्रान्तीय भाषाओं के साहित्यमें पाश्चात्य साहित्यिक शैली, सामग्री तथा विचारों का समावेश होने लगा और उनका आधुनिकीकरण हुआ। अंग्रेजों का राज्य स्थापित होने के उपरान्त भी भारत में खड़ी बोली तथा बज्रभाषा का गद्य अपनी प्रारम्भिक दशा में था। खड़ी बोली इस समय काव्य भाषा थी किन्तुस्थान-स्थान पर इसका रूप भिन्न था। कलकत्ता (कोलकाता) में जब ‘फोर्ट विलियम कॉलेज’ (Fort William College) की स्थापना की गयी तब हिन्दी को भी बढ़ावा मिला और जॉन गिलक्राइस्ट ने कॉलेज में अलग से एक ‘हिन्दी विभाग (Hindi Department) की स्थापना की। इस प्रकार से हिन्दी भाषा और साहित्य पर पश्चिमी संस्कृति का प्रभाव पर्याप्त रूप से पड़ने लगा। इसी काल में ईसाई पादरियों की सहायता से बाइबिल एवं अन्य पुस्तकों का हिन्दी में अनुवाद किया गया। सन् 1829 में राजा राममोहन राय ने ‘बंगदूत’ नामक हिन्दी पत्रिका निकाली तथा सन् 1856 में पं. जुगलकिशोर ने हिन्दी समाचार-पत्र ‘उदण्ड मार्तण्ड’ निकाला। इन सब प्रयासों का फल यह हुआ कि गद्य साहित्य का विकास होने लगा।

ललित कलाओं में परिवर्तन (Changes in Fine Arts)

वर्तमान समय में भारतीयों को अपनी ललित कला के गौरव के सम्बन्ध में सचेत करने का श्रेय पाश्चात्य विद्वानों को ही है। सर्वश्री फर्ग्युसन, हैबेल, पर्सीबाउन, सिस्टर निवेदिता आदि ने भारतीय कला के प्रधान तत्वों का मूल्यांकन कर उन्हें विश्व के सामने रखा।

(1) स्थापत्य कला- जब अंग्रेज इस देश में आये तो उन लोगों ने यहाँ अनेक इमारतें, मुम्बई, चेन्नई एवं कोलकाता में बनवायीं जिसमें गॉथिक (Gothic), रोमन तथा इंग्लैण्ड के विक्टोरियन युग की स्थापत्य कला का अनुसरण किया जिसके फलस्वरूप यूरोपियन स्थापत्य कला का प्रचार हुआ। अंग्रेज शासकों ने एक ‘सार्वजनिक निर्माण विभाग’ (Pulic Works Department or P.W.D.) की स्थापना की। इस विभाग में अनेक अंग्रेजी स्थापत्य कला के विशेषज्ञ भी काम करते थे। इस कारण अंग्रेजी शासन में पाश्चात्य ढंग की भवन-निर्माण-कला को प्रोत्साहन मिला। कोलकता का विक्टोरिया मेमोरियल पाश्चात्य स्थापत्य-कला का एक जीता- जागता प्रतीक है।

(2) चित्रकला- 19वीं शताब्दी के मध्य के उपरान्त ब्रिटिश सरकार ने मुम्बई,चेत्रई तथा कोलकाता में कला-केन्द्रों की भी स्थापना की। इन केन्द्रों में पश्चिमी कला की परम्पराओं के अनुसार ड्राइंग, मॉडल तथा चित्र बनाने की शिक्षा दी जाती थी। इसका परिणाम यह हुआ कि भारतीय-चित्रकला पाश्चात्य-चित्रकला से प्रभावित होती रही।

(3) नृत्य तथा संगीत कला- सन् 1900 से पूर्व भारत में प्रोत्साहन के अभाव के कारण कुछ रियासतों तथा संगीत के कुछ घरानों को छोड़कर नृत्य एवं संगीत का अधिक प्रसार नहीं था। किन्तु सन् 1900 के उपरान्त पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव के कारण नृत्य एवं संगीत में एक जागृति आयी। इस नवोत्थान में बंगाल के टैगोर परिवार ने सबसे महत्वपूर्ण योगदान दिया। उदाहरण के लिये, कवि रविन्द्रनाथ टैगोर ने भाव-संगीत का विकास किया। उन्होंने नाटक तथा नृत्य को प्रस्तुत करने के नवीन ढंगों को जनता के सम्मुख रखा। टैगोर ने संगीत में इतनी प्रसिद्धि प्राप्त की कि इसको जनता रवीन्द्र संगीत की संज्ञा देने लगी। ‘रवीन्द्र संगीत’ ने भारतीय संगीत के प्रयोगात्मक एवं साहित्यिक पक्ष को उज्जवल किया।

शिक्षा के क्षेत्र में परिवर्तन (Chanes in the field of education)

इतने बड़े देश का शासन प्रबन्ध का काम चलाने के लिए अनेक व्यक्तियों की आवश्यकता थी जो नौकरशाही शासन व्यवस्था के अन्तर्गत कार्यालय आदि में काम कर सकें। अतः यहाँ के कुछ लोगों को शिक्षित करना आवश्यक था। इस शिक्षा-प्रसार का उद्देश्य अंग्रेजों के स्वार्थों की पूर्ति थी, न कि भारतीयों का कल्याण। यह शिक्षा किताबी शिक्षा मात्र थी जिसका कि कोई सम्बन्ध ‘तकनीकी शिक्षा’ (Technical education) से न था। शिक्षा के क्षेत्र में पाश्चात्य संस्कृति के प्रभावों को अस्वीकार नहीं किया जा सकता। डॉ. यादव ने लिखा है, ईसाई धर्म प्रवर्तकों ने इस देश में अंग्रेजी शिक्षा को प्रारम्भ किया। सन् 1835 में लॉर्ड विलियम बेन्टिक (Lord William Bentik) के शासन काल में लॉर्ड मैकाले (Lord Macaulay) ने स्कूलों में अंग्रेजी के माध्यम द्वारा शिक्षा देने का विधान किया। इससे शिक्षा के क्षेत्र में एक क्रान्तिकारी परिवर्तन हुआ। अंग्रेजी स्कूलों की संख्या भी बढ़ने लगी। सन् 1844 में लॉर्ड हार्डिंग ने सरकारी अंग्रेजी स्कूलों में शिक्षित व्यक्तियों को राजकीय नौकरी में प्राथमिकता देने की नीति की घोषणा की। इससे अंग्रेजी शिक्षा का प्रसार बढ़ने लगा। इसके दस वर्ष बाद कोलकाता, मुम्बई तथा चेन्नई में विश्वविद्यालयों की स्थापना हुई। 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में सरकार ने ‘स्त्री शिक्षा’ (Women Education) को भी प्रचुर प्रोत्साहन दिया। साथ ही मानना पड़ेगा कि अंग्रेजी शिक्षा प्रगतिशील शिक्षा थी क्योंकि प्रथम यह धर्मनिरपेक्ष और उदार थी तथा सब जातियों व धर्मों के व्यक्तियों के लिए समान थी, और द्वितीय यह शिक्षा तार्किक, वैज्ञानिक और प्रजातन्त्रवादी विचारधाराओं से ओत-प्रोत थी। इसका परिणाम यह हुआ कि अंग्रेजी शिक्षा के कारण भारतवासियों के विचारों, दृष्टिकोणों तथा रहन-सहन में अनेक परिवर्तन होने लगे। अंग्रेजी शशिक्ष के कारण जाति-पांति का भेद-भाव, अस्पृश्यता की भावना, धार्मिक कट्टरपन व अन्धविश्वास, सामाजिक कुरीतियाँ आदि कम होने लगीं।

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