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भारत में सामाजिक आन्दोलन | भारत में सामाजिक आन्दोलन के परिणामस्वरूप सामाजिक परिवर्तन | सामाजिक परिवर्तन के एक महत्वपूर्ण कारक के रूप में सामाजिक आन्दोलन

भारत में सामाजिक आन्दोलन | भारत में सामाजिक आन्दोलन के परिणामस्वरूप सामाजिक परिवर्तन | सामाजिक परिवर्तन के एक महत्वपूर्ण कारक के रूप में सामाजिक आन्दोलन

भारत में सामाजिक आन्दोलन

एक कल्याणकारी राज्य (Welfare State) वह है जो अपने समस्त नागरिकों को सर्वागीण विकास का अपना लक्ष्य मानते हुए समानता के आधार पर उनके उचित एवं न्यूनतम जीवन स्तर को बनाये रखने में सफल हो। पर यह सफलता तभी मिल सकती है जबकि सामाजिक जीवन को जर्जरित करने वाली सामाजिक कुप्रथाओं, धार्मिक अन्धविश्वासों, सामाजिक सांस्कृतिक भेद-भाव से समाज को विमुक्त किया जाए। यह काम सामाजिक सुधार कार्यों (Social Welfare Work) के माध्यम से ही सम्भव है। भारतीय उदाहरणों द्वारा इस बात को और भी स्पष्ट किया जा सकता है। भारत में आज भी कभी-कभी सती होने का समाचार मिलता है, विधवा-पुनर्विवाह का आज भी लोग स्वागत नहीं करते हैं, बाल विवाह खूब होता है, जातिवाद का डंका भी बज रहा है, पर्दा-प्रथा का प्रचलन आज भी है, दहेज लेना प्रतिष्ठा का एक विषय बना हुआ है, अस्पृश्यता को केवल बनाकर दूर करने मे हम असफल रहें है, नशाखोरी आज भी चालू है और धार्मिक अन्धविश्वासों से हम आज भी मुक्त नहीं हो पाये हैं। ये सभी परिस्थितियाँ हमारी प्रगति को निरन्तर पीछे की ओर खींच रही हैं और राष्ट्रीय पुनर्निर्माण (Social Reconstruction) के कार्यो में बाधा की सृष्टि कर रही है। अतः व्यक्ति राष्ट्र समाज के हित में आज हम सामाजिक आन्दोलनों द्वरा इन बाधाओं को दूर करने की आवश्यकता अनुभव करते हैं और इन बाधाओं को दूर किये बिना न तो राष्ट्रीय पुनर्निर्माण सम्भव है और न ही कल्याणकारी समाज की स्थापना। अतः सामाजिक आन्दोलनों का महत्व व आवश्यकता दोनो ही अत्यधिक हैं।

समाजिक परिवर्तन लाने में सामाजिक आन्दोलन का निम्नलिखित महत्व हैं-

सामाजिक परिवर्तन लाने में सामाजिक आन्दोलन का एक महत्व यह है कि इसके द्वारा विधवा पुनर्विवाह (Widow Remarriage) के अनुकूल जनमत को विकसित किया जा सकता है। ऐसा हो जाने से भारत में पायी जाने वाली करोड़ों विधवाओं का पुनरुद्वार होगा और वे भी निश्चित होकर राष्ट्रीय पुनर्निर्माण कार्य मे योगदान कर सकेगी।

(1) समाज सुधार आन्दोलन द्वारा बाल-विवाह प्रथा (Child Marriage System) को रोका जा सकता है। इस देश में काफी कम आयु में विवाह करते हैं। ऐसे विवाहो को सामाजिक आन्दोलन द्वरा रोकने से एक ओर लड़कियों के व्यक्तित्व का उचित विकास सम्भव होगा और दूसरी ओर , जनसंख्या की समस्या, जो कि बहुत ही महत्वपूर्ण है और जो समस्त राष्ट्र को आज अत्यधिक पीड़ित कर रही का भी हल हो सकेगा।

(2) सुधार आन्दोलनों के द्वारा ही दहेज (Dowry) के दुष्परिणामों के सम्बन्ध में लड़को के माता-पिता को जागरूक किया जा सकेगा।

(3) तथाकथित अस्पृश्य जातियों (Untouchable Caste) की दयनीय स्थिति से प्रत्येक भारतवासी परिचित है। महात्मा गाँधी द्वारा चलाये गये अस्पश्यता निवारण सम्बन्धी आन्दोलन के ही परिणामस्वरूप आज उनकी अवस्था में काफी सुधार हुआ है। भविष्य में भी इस दिशा में हमें जो कुछ सफलता प्राप्त होगी उसमें भी सामाजिक आन्दोलनों का महत्व प्रमाणित होगा।

भारत में सामाजिक आन्दोलन के परिणामस्वरूप सामाजिक परिवर्तन

(Social Change in India Others Social Movements)

भारत में विभिन्न सामाजिक आन्दोलनों के परिणामस्वरूप अनेक सामाजिक परिवर्तन हुए हैं। जिनमें से प्रमुख परिवर्तन निम्नलिखित हैं। भारत में सामाजिक आन्दोलन के परिणामस्वरूप अग्रलिखित सामाजिक परिवर्तन हुए हैं-

(1) सती प्रथा की समाप्ति (Aboition of Sati Pratha) सती प्रथा जैसी प्रथा की  समाप्ति राजा राम मोहन राय, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर जैसे समाज सुधारकों द्वारा चलाये गये आन्दोलनों का ही परिणाम है। इन आन्दोलनों के कारण ही सती प्रथा आज समाप्त प्रायः है। पहले यह प्रथा इस देश में अत्यधिक उग्र थी, पर अब यह प्रायः समाप्त हो गयी है। फिर भी समाचार पत्रों में सती होने के समाचार कभी-कभी पढ़ने को मिलते हैं। यह एक अत्यन्त पाश्विक प्रथा है जिसके अन्तर्गत विधवाओं की एक अर्थ में जीवित हत्या ही की जाती है। यह किसी भी समाज के माथे पर कलंक है कि वह नारी हत्या को मान्य ठहराये। इस कारण इस सम्बन्ध में और व्यापक आन्दोलन की आवश्यकता है जिससे सती प्रथा बिल्कुल ही खत्म हो जाये।

(2) विधवा पुनर्विवाह (Widow Remarriage)-  विधवाओं के लिए फिर से विवाह करना हीन्दू समाज में निषेध है। हिन्दू परिवार में आज भी विधवाओं की दुर्दशा है, उसे वे लोग ही समझ सकते हैं जो ऐसे कुछ परिवारों को जानते हैं जिसमें विधवाएँ पलती है, परिवार में उनकी स्थिति एख दासी के सदृश्य होती है और साथ ही समस्त सामाजिक प्रतिबन्ध उन्हीं पर लादा जाता है। दूसरों की सेवा करना उनका धर्म है, दूसरो की देखरेख करना उनका कर्तव्य है और अपने समस्त सुख, आशा, आकांक्षा, अपने व्यक्तित्व का विकास करने की इच्छा अपना एक घर बनाने की अभिलाषा, आदि सबको त्याग देना ही उनका आदर्श है। इन सबका परिणाम यह होता है कि विधवाओं के व्यक्तित्व का विकास नहीं हो पाता है और वे समाज पर एक बोझ बनकर अपना जीवन व्यतीत करती है।

(3) बाल विवाह कम होना (Reducing Child Marriage)- आज भी बाल- विवाह प्रथा का प्रचलन भारत में विशेषकर भारतीय गाँवो में अत्यधिक है। इससे बाल-दम्पत्ति के स्वास्थ्य पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है, दुर्बल सन्ताने उत्पन्न होती है, पति-पत्नी के, विशेषकर पत्नी के व्यक्तित्व का विकास नहीं हो पाता है। बच्चे का जन्म देते समय कम आयु की माताओं की मृत्यु अधिक होती है, कम आयु से बच्चा उत्पन्न होना शुरू हो जाने से जनसंख्या बढ़ती है, योग्य जीवन साथी का चुनाव नहीं हो पाता है तथा बाल विधवाओं की समस्या भी बढ़ती है। इस सब कारणों को देखते हुए ब्रह्म समाज, आर्य, समाज आदि ने बाल विवाहों को रोकने के लिए आन्दोलन चलाया और परिवर्तन लाने में कुछ सफल हुए।

(4) पर्दा के प्रति मनोभाव में परिवर्तन (Change in the Attitude Towards Parda System)-  यह प्रथा भारतीय समाज की एक और कुप्रथा है और रोचक बात यह है कि इस प्रथा को सामाजिक प्रतिष्ठा (Social Prestige) के प्रतीक के रूप में सुप्रतिष्ठित कर दिया गया है। यही कारण है कि इसका प्रचलन भारत की उच्च जातियों में अधिकतर देखने को मिलता है। इस प्रथा का विशेष प्रचलन मुसलमानों के भारत आने के बाद हुआ है और मुस्लिम स्त्रियों ने इसे ग्रहण किया है। इस प्रथा की उपयोगिता उस जमाने में शायद कुछ रही हो, परन्तु आज की दुनिया में तो यह बिल्कुल ही व्यर्थ है। पर्दा-प्रथा का तात्पर्य है स्त्रियों की गतिशीलता को रोकना एवं उन्हें परिवार की चहरादीवारियों के बीच रहने को मजबूर करना। इसमें स्त्रियों की शिक्षा बिल्कुल रुक जाती है और थोथी मर्यादा के लिए स्त्रियों के व्यक्तित्व का विकास नहीं हो पाता है। इस कारण सामाजिक आन्दोलनों के माध्यम से इस बात की चेष्टा की गयी है कि इस कुप्रथा का सुधारने के लिए सक्रिय कदम उठाये जाए तथा स्वस्थ जनमत का निर्माण किया जाए। फलतः पर्दा प्रथा के प्रति लोगों का दृष्टिकोण परिवर्तित हुआ है।

सामाजिक परिवर्तन के एक महत्वपूर्ण कारक के रूप में सामाजिक आन्दोलन

सामाजिक परिवर्तन के एक प्रमुख कारक ‘सामाजिक आन्दोलन’ को माना जाता है। सामाजिक परिवर्तन के इस सामाजिक आन्दोलन सिद्धान्त की विस्तृत व्याख्या हर्बर्ट ब्लूमर ने अपनी पुस्तक के सामाजिक व्यवहार शीर्षक वाले अध्ययन में की है। इस सिद्धान्त के अनुसार सामाजिक परिवर्तन केवल सामाजिक आन्दोलन के प्रतिफल होते हैं। ब्लूमर के अनुसार, किसी सामाजिक लक्ष्य की प्राप्ति के हेतु बहुसंख्यक व्यक्तियों द्वारा निर्मित अनौपचारिक संगठन को सामाजिक आन्दोलन कहा जाता है सामाजिक आन्दोलन के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन की निम्न प्रकार की जा सकती है।

सामाजिक संरचना में उत्पन्न किन्हीं दोषों के कारण अनेक व्यक्ति समान अनुभव करते हैं कि उन्हें विशेष प्रकार की उचित सन्तुष्टि प्राप्त नहीं हो रही है। इस असन्तुष्टि की भावना के कारण वह व्याकुल हो उठते हैं। परस्पर एक दूसरे से बातचीत करके, इनसे से कुछ व्यक्ति यह समझ लेते हैं कि इस प्रकार की भावना ने केवल अन्य व्यक्तियों में भी समान रूप से विद्यमान है, वरन् उन व्यक्तियों में भी पाई जाती है जिन्हें इस प्रकार की समस्या की चेतना रूप में से अभी तक अनुभूति नहीं हुई है। पारस्परिक की गई बातचीत से ये व्यक्ति, सही या गलत सामान्य रूप से इस निष्कर्ष पर पहुँच जाते हैं कि सामाजिक संरचना में कुछ परिवर्तन लाकर अपनी उचित सन्तुष्टि को प्राप्त किया जा सकता है, अथवा कुछ दूसरी ठोस रीतियाँ इसके लिए अपनाई जा सकती हैं। इस अनुभूति के परिणामस्वरूप जनमत निर्माण की प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाती है। इसमें अधिकारिक व्यक्ति यह अनुभव करने लगते हैं कि उचित सन्तुष्टि को केवल सामाजिक संरचना में कुछ परिवर्तन लाकर ही प्राप्त किया जा सकता है।

इस विश्वास एवं रुचि की तीव्रता में भी कालान्तर में वृद्धि होती है। सभी यह विचारने लगते है कि इस समस्या का निराकरण करनेके लिये कुछ न कुछ तो किया जाना चाहिए। फलस्वरूप एक अनौपचारिक सामाजिक आन्दोलन (Informal Social Movement) विकसित होने लगता है। प्रारम्भ में यह आदोलन लगभग अव्यवस्थि ही होता है। आगे चलकर यह संगठित रूप धारण कर लेता है, परम्पराओं, श्रम-विभाजन, परिनियमों एवं सामाजिक मूल्यों में विशेष संस्तरण के रूप में संगठित हो जाता है। विकसित हो जाने पर सामाजिक आन्दोलन का स्वरूप एक समाज के सदृश्य होता है। इसका एक संगठन एवं स्वरूप ढल जाता है। जिसमें कुछ प्रथाएं एवं परम्पराएं भी सम्मिलित होती है, स्पष्ट नेतृत्व, स्थिर रहने वाला श्रम-विभाजन एवं सामाजिक नियम तथा मूल्य- संक्षेप में, इसमें एक संस्कृति, एक सामाजिक संगठन तथा जीवन की एक नई अभियोजना के दर्शन किये जा सकते हैं। सामाजिक आन्दोलनों द्वारा जो परिवर्तन लाये जाते हैं वे प्रायः अन्वेषण, अर्थात् किसी आविष्कार या आविष्कारों की श्रृंखला के रूप में होते हैं। इस प्रकार के अन्वेषण समाज की अभौतिक संस्कृति के क्षेत्र में ही होते हैं। भौतिक संस्कृति के क्षेत्र में नहीं।

इस प्रकार भारत में औद्योगिक संस्थानों में प्रबन्ध में श्रमिकों की भागीदारी, सामाजिक सुरक्षा अधिनियम , असहयोग आन्दोलन, विधवा पुनर्विवाह अधिनियम, आर्य समाज, इत्यादि सामाजिक अन्वेषणों (Social Researches) प्रकार के आन्दोलन कहे जा सकते हैं। सामाजिक आन्दोलनों का स्वरूप विभिन्न प्रकार का पाय जा सकता है। उदाहरण के लिये जहाँ तानाशाही शासन होता है। वहाँ परिवर्तन लाने की तीव्र भावना से प्रेरित व्यक्ति राजकीय अधिकारियों की सहानुभूति प्राप्त लाने का प्रयास करते हैं। यदि उन्हें इसमें सफलता प्राप्त नहीं होती है, और उनमें परिवर्तन लाने की अभिलाषा अत्यन्त तीव्र हो जाती है, तो ऐसे व्यक्ति क्रान्तिकारी नेता (Revolutionary Leader) बन जाते हैं। किन्तु जहाँ लोकतांत्रिक शासन होता है वहाँ उस समय तक क्रान्ति के अंकुर उत्पत्र नहीं होते जब तक की परिवर्तन लाने वालों को यह विश्वास नहीं हो जाता है कि परिवर्तन की वांछनीय के विषय में बहुसंख्यकों को विश्वास दिलाना असम्भव है।

सामान्यतः लोकतान्त्रिक ढांचे में शान्तिप्रिय रीतियों से ही परिवर्तन लाने का प्रयत्न किया जाता है। उदाहरण के लिए भारत में महात्मा गांधी ने भारत में राजनीतिक व्यवस्था में परिवर्तन लाने के लिए सत्याग्रह (Satyagrah) मार्ग का प्रतिपादन एवं अनुसरण किया। इसी प्रकार अन्य प्रकार की राजनीतिक व्यवस्था में भी सामाजिक आन्दोलनों के स्वरूप पर विचार किया जा सकता हैं।

किसी भी समाज में सामजिक आन्दोलनों का स्वरूप अनेक तत्वों (Factor) पर आधारित होता है। केवल राजनीतिक व्यवस्था (Social Sysem) ही इसको निश्चित्त नहीं करती है। इन तत्वों में हम उस समाज के सामाजिक सांस्कृतिक इतिहास, सामाजिक प्रथाओं एवं परम्पराओं, सामाजिक संस्थाओं की वर्तमान उपयोगिता, सामाजिक नेताओं का चरित्र सामाजिक संघर्षों की प्रकृति, सामाजिक सुख-दुःख की सीमा, सामाजिक विघटन की प्रकृति, विद्यमान शासन की सामाजिक समस्याओं का निराकरण करने की क्षमता इत्यादि।

किसी सामाजिक आन्दोलन की परिभाषा, इस प्रकार ऐसी सामूहिक क्रियाओं के रूप में की जा सकती है जो विद्यमान सामाजिक व्यवस्था में परिवर्तन लाने या उसे प्रभावित करने के लिए किसी विशेष समूह द्वारा की जाती है जिसका निर्माण केवल इसी प्रयोजन से किया गया होता है। कोई भी सामाजिक आन्दोलन सामूहिक रूप से अनुभव की जाने वाली किसी समस्या या किन्हीं समस्याओं को लेकर उत्पन्न होता है, जिनका प्रायः कोई स्पष्ट समाधान सामान्य दिखाई नहीं पड़ता अथवा जिनका समाधान घटनाचक्र में होने सम्भव नहीं जान पड़ता है। सामाजिक आन्दोलनों के तत्वों को समझने के लिय इनकी तुलना उत्तेजित भीड़ तथा उपद्रव व्यवहार से करनी होगी। उत्तेजित भीड़ सामूहिक रूप से अनुभव की जाने वाली किसी समस्या को लेकर उत्पन्न हो जाती है। लेकिन इसका उद्देश्य भी लघुकालीन होता है और इसका जीवन काल भी थोडा ही होता है। इसमें किन्हीं आधारभूत व्यवहार प्रतिमानों में परिवर्तन लाने की अपेक्षा किसी विशेष उद्देश्य को प्राप्त करने का लक्ष्य सामने होता है इसमें विद्यमान सामाजिक संरचना में किसी प्रकार का परिवर्तन लाने का उद्देश्य नहीं होता है।

चूंकि इस प्रकार के अस्थायी संगङ्गन में कोई वैचारिकता (Ideology) नहीं होती अत: एक लम्बी अवधि तक इसके सदस्यों को एक सूत्र में बांधे रखना सम्भव नहीं होता। इसके अलावा उपद्रव व्यवहार में विभिन्न प्रकार के समूह भाग लेते हैं। इन्हें आपस में संगठित करने वाली कोई कड़ी नहीं होती। इसकी अपेक्षा उत्तेजित भीड़ कुछ समय के लिए तो संगठित होती ही है। उपद्रव व्यवहार के समान उत्तेजित भीड़ भी नये जीवन की कोई स्वीकृत रूप रेखा सामने नहीं होता, जिसको पुरानी व्यवस्था के स्थान पर लाने का प्रयास किया जाता हो। इस प्रकार सामाजिक आन्दोलनों की प्रकृति को आसानी से समझा जा सकता है कि इनमें एक प्रतिमान स्थापित वैचारिकता (Ideology) होती है जिसके आधार या प्रकार का संगठित संगठन (Movement Organisation) पुराने सामाजिक जीवन को प्रदान किया जाता है। प्रतिमानों को नष्ट करके एवं नया जीवन बनाकर।

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Pankaja Singh

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