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दुर्खीम के समाजशास्त्री योगदान | Durkheim’s Sociological Contributions in Hindi

दुर्खीम के समाजशास्त्री योगदान | Durkheim’s Sociological Contributions in Hindi

दुर्खीम के समाजशास्त्री योगदान

दुर्खीम एक मौलिक विचारक थे। वह अनेक दूसरे विद्वानों से प्रभावित अवश्य हुए, लेकिन उन्होंने सभी विचारों के एक नया रूप देकर समाजशास्त्र को वास्तविक अर्थों में एक वस्तुनिष्ठ विज्ञान बनाने का प्रयत्न किया। समाजशास्त्र की व्यावहारिकता को स्पष्ट करते हुए उन्होंने लिखा -“समाजशास्त्र का मूल्य तभी तक है, जब तक उसका उपयोग तात्कालिक समाज के सुधार में किया जा सकें।” आरम्भ में दर्शनशास्त्र के अध्येयता और शिक्षक के रूप में उनका दार्शनिक दृष्टिकोण भी बहुत व्यावहारिक था। इसी कारण दुर्शीम ने समाज को नैतिकता पर आधारित मानते हुए यह विचार व्यक्त किया कि नैतिक व्यवस्था के बिना किसी भी समाज में सामाजिक एकता में वृद्धि नहीं की जा सकती। दुर्थीम के शब्दों में- समाज कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जिसका नैतिकता पर गौण प्रभाव पड़ता हो। यदि सामाजिक जीवन ही समाप्त हो जायेगा। तो उद्देश्यो का अभाव हो जाने के कारण नैतिक जीवन अपने चिन्तन में दुर्थीम ने रहस्यवाद (Mysticism) अधि-प्राकृतिकवाद (Super-Naturalism) और परम्परावाद (Traditioinalism) का सदैव विरोध किया तथा सामूहिकता और सामाजिक मूल्यों को सामाजिक जीवन का वास्तविक आधार माना। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि दुर्थीम सामाजिक घटनाओं की विवेचना में दार्शनिक आधार को महत्वपूर्ण मानते थे। उन्हीं के शब्दों में “समाजशास्त्र को दार्शनिक पूर्व कल्पनाओं अथवा भावनाओं पर आधारित नहीं होना चाहिए, चाहे वे किसी भी रूप में हों। समाजशास्त्र को दर्शनशास्त्र से अलग रखकर ही उसे विकसित किया जा सकता हैं।”

दुर्खीम ने सामाजिक तथ्यों के अध्ययन के लिए सदैव वैज्ञानिक विधि के प्रयोग पर बल दिया। उनका मानना था कि जिस तरह प्राकृतिक घटनाएं कुछ निश्चित नियमों के आधार पर घटित होती हैं, उसी प्रकार सामाजिक घटनाओं के पटित होने के पी कुछ निथित नियम होते हैं। यदि इन नियमों को समझकर एक वैज्ञानिक विधि के द्वारा सामाजिक घटनाओं की विवेचना की जाये, तो समाजशास पी एक निशित विज्ञान बन सकता है। इसके साथ ही दुर्थीम ने समाजशास्त्र की अध्ययन वस्तु का भी निर्धारण किया। उन्होंने दूसरे विद्वानों से मित्र विचार प्रस्तुत करते हुए श्रम विभाजन को एक सामाजिक तथ्य मानते हुए, उसके कारण तथा परिणामों की व्याख्या की।

श्रम- विभाजन को उन्होंने सामाजिक एकता का आधार मानते हुए, यह निष्कर्ष दिया कि यान्त्रिक एकता से सावयवी एकता की ओर होने वाला समाज का विकास श्रम-विभाजन का ही परिणाम है। दुमि पहले समाजशास्त्री थे, जिन्होंने आनुमाविक आधार पर आत्महत्या का अध्ययन करके इसका सामाजिक आधार पर विश्लेषण किया। धर्म के समाजशास्र के रूप में उन्होंने समाजशास की एक नयी शाखा विकसित की। दुर्थीम के इसी योगदान को स्पष्ट करते हुए हेरी-एल्पर्ट ने लिखा है- “दुर्थीम यदि समाजशास्त्रीय सिद्धान्तों के विकास के लिए एक वैज्ञानिक और समाजिक दृष्टिकोण न देते हुए, सामाजिक व्यवहारों को समझने के लिए एक विचारयुक्त और तार्किक पद्धति का व्यवस्थित प्रयोग सम्भव नहीं हो पाता। इस सन्दर्भ में समाजशास्त्र के लिए दुर्शीम के योगदान को संक्षेप में निम्नांकित रूप से समझा जा सकता है।”

समाजशास्त्र में वैज्ञानिक विधि का प्रयोग- अपनी पुस्तक समाजशास्त्रीय पद्धति के नियम में दुर्थीम ने सबसे पहले यह स्पाए किया कि सामाजिक घटनाओं के अध्ययन के लिए एक वैज्ञानिक पद्धति का प्रयोग करना आवश्यक है। दुर्थीम से पहले कॉम्ट तथा स्पेन्सर ने भी सामाजिक घटनाओं की विवेचना के लिए वैज्ञानिक पद्धति पर जोर दिया था, लेकिन दुर्खीम ने विभिन्न घटनाओं के कारण और परिणामों को समझने के लिए ऐतिहासिक और प्रयोगात्मक पद्धतियों को उपयुक्त नहीं माना। दुर्खीम ने तुलनात्मक विधि के प्रयोग को सबसे अधिक महत्त्व दिया। यह वह विधि है, जिसके द्वारा समाज में घटित होने वाली विभिन्न घटनाओं की तुलना करके तथा एक घटना से दूसरी घटना के सह-सम्बन्ध को स्थापित करके उनके कारण को जानने का प्रयत्न किया जाता है। दुर्खीम ने लिखा कि इस पद्धति के उपयोग के लिए आवश्यक है कि किसी सामाजिक घटना की व्याख्या उसके सम्पूर्ण सामाजिक परिवेश में की जाये तथा विभिन्न प्रकार के समाजों में किसी सामाजिक घटना का अध्ययन तुलनात्मक आधार पर किया जाये।

समाजशास्त्र की अध्ययन-वस्तु का निर्धारणः सामाजिक तथ्य – दुर्खीम पहले समाजशास्त्री थे, जिन्होंने समाजशास्त्र को एक स्वतन्त्र रूप देने के लिए इसकी अध्ययन-वस्तु का निर्धारण किया। उनके अनुसार समाजशास्त्र की वास्तविक अध्ययन वस्तु सामाजिक तथ्य (Social Facts) है। सामाजिक तथ्यों का वैज्ञानिक रूप से अध्ययन करने के लिए दुर्खीम ने लिखा कि-“पहला और सबसे मौलिक नियम यह है कि सामाजिक तथ्यों पर वस्तु के रूप में विचार किया जाये।”

इसका अर्थ है कि जिस प्रकार किसी वस्तु को उसी रूप में देखा जाता है जैसी कि वह वास्तव में है, उसी प्रकार सामाजिक घटनाओं तथा तथ्यों का भी पक्षपातरहित होकर अवलोकन करना जरूरी है। सामाजिक तथ्य को परिभाषित करते हुए दुर्खीम का कथन है- “सामाजिक तथ्य कार्य करने, विचार करने तथा अनुभव करने के वे तरीके हैं, जो व्यक्ति की चेतना से बाहर स्थित होते हैं तथा जिनमें दबाव की इतनी क्षमता होती है कि वे व्यक्ति के व्यवहारों को नियन्त्रित करते रहते हैं।” इस प्रकार सभी नैतिक नियम सामाजिक, मर्यादाएँ, धार्मिक- प्रतिमान, वैधानिक आधार पर ही की जानी चाहिए। इस प्रकार सामाजिक तथ्यों की प्रकृति को विस्तार से स्पष्ट करके दुर्खीम ने समाजशास्त्र की अध्ययन वस्तु का निर्धारण करने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया।

अपराध की नयी व्याख्या- साधारणतया सभी विद्वानों ने अपराध को एक विघटनकारी व्यवहार के रूप में स्पष्ट किया है। दुर्खीम ने बिल्कुल भिन्न विचार देते हुए एक बड़ी सामाजिक समस्या का निष्पादन ढूँढ़ने का प्रयत्न किया। उन्होंने विस्तार से यह प्रमाणित किया कि अपराध एक सामान्य सामाजिक तथ्य है तथा यह एक स्वस्थ समाज का लक्षण है। उन्होंने तर्क दिया कि यह मानना गलत है कि अपराध से सामूहिक जीवन को सदैव हानि होती है। वास्तविकता यह है कि समाज की नैतिकता और उपयोगी कानूनों के विकास में अपराध का विशेष योगदान होता है। किसी समाज में जब अपराध होते हैं तब वहाँ की सामूहिक भावना सामाजिक परिवर्तन के लिए तैयार हो जाती है। इसी से समाज में एक नयी नैतिकता का विकास होता है। एक उदाहरण के द्वारा इसे प्रमाणित करते हुए दुर्खीम ने लिखा है कि एथेन्स के कानूनों में व्यक्तिगत स्वतंत्रता को मान्यता नहीं दी गयी थी। इसके बाद भी सुकरात ने व्यक्तिगत स्वतन्त्रता पर बल दिया जिसे उस समय अपराध मानकर सुकरात को दण्डित किया गया। कुछ समय बाद सुकरात का वही अपराध एथेन्स में एक ऐसी नैतिकता को विकसित करने में बहुत उपयोगी सिद्ध हुआ, जो वैयक्तिक स्वतन्त्रता के पक्ष में थी। अपराध और दण्ड के सम्बन्ध को भी दुर्खीम ने भिन्न प्रकार से स्पष्ट किया। उनके अनुसार अपराध पैदा होते हैं, वहाँ अपराधों की दर उतनी ही अधिक हो जाती है। इसका तात्पर्य यह है कि दण्ड-व्यवस्था सामाजिक न्याय तथा क्षतिपूर्ति के नियम पर आधारित होनी चाहिए, दमनकारी कानूनों पर आधारित नहीं। आधुनिक लोक- तान्त्रिक समाजों में दुर्थीम के यह विचार बहुत व्यावहारिक और उपयोगी सिद्ध हो रहे हैं।

श्रम-विभाजन का सिद्धान्त- दुर्खीम से पहले अनेक विद्वानों, जैसे- एडम स्मिथ, स्पेन्सर तथा जॉन स्टुअर्ट मिल ने आर्थिक आधार पर श्रम-विभाजन की विवेचना की थी। इनके विपरीत, दुर्खीम ने श्रम-विभाजन का एक सामाजिक सिद्धान्त प्रस्तुत किया। उनके अनुसार श्रम- विभाजन प्रत्येक युग में सभी समाजों की अनिवार्य विशेषता रही। वास्तव में श्रम-विभाजन का सम्बन्ध जनसंख्या के आधर में होने वाली वृद्धि है तथा यह एक ऐसी नैतिक दशा है, जिसके फलस्वरूप सामाजिक सम्बन्धों की प्रकृति में परिवर्तन होने लगता है। श्रम-विभाजन सामाजिक एकता को बढ़ाने वाला एक प्रमुख आधार है। जिस तरह समाज के नैतिक नियम सामाजिक संगठन में वृद्धि करते हैं, उसी तरह श्रम विभाजन से भी पारस्परिक सहयोग, पारस्परिक निर्भरता कर्त्तव्य भावना और व्यक्तिगत कार्यकुशलता में वृद्धि होती है। श्रम-विभाजन से समाज में एक ऐसी एकता का विकास होता है, जो स्वाभाविक और स्थायी होती है। सामाजिक मूल्यों में समय के अनुकूल परिवर्तन उत्पन्न करने में भी श्रम-विभाजन का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। इसी के आधार पर उन्होंने यान्त्रिक तथा सावयवी एकता की अवधारणा को प्रस्तुत किया। इस प्रकार दुर्खीम ने श्रम-विभाजन के सामाजिक पक्ष को स्पष्ट करके सामाजिक विचारधारा को एक नया रूप दिया।

धर्म की समाजशास्त्रीय विवेचना- अपनी पुस्तक धार्मिक जीवन के आरम्भिक स्वरूप में दुर्खीम ने धर्म की उत्पत्ति तथा सामाजिक प्रकार्यों र्को सामाजिक आधार पर स्पष्ट करके धर्म की एक नयी विवेचना प्रस्तुत की। उन्होंने प्राकृतिक घटनाओं अथवा आत्मा सम्बन्धी विश्वासों के आधार पर धर्म की आलोचना करते हुए लिखा कि यदि ईश्वर ही धर्म की उत्पत्ति का आधार होता, तो धर्म के रूप में कोई परिवर्तन नहीं हो पाता। उन्होंने आस्ट्रेलिया की अरूण्टा जनजाति का आनुभविक अध्ययन करके यह बताया कि धर्म की उत्पत्ति तथा इसके प्राकय को सामाजिक आधार पर ही समझा जा सकता है। वास्तव में, धर्म का सम्बन्ध कुछ वस्तुओं और व्यवहारों को पवित्र मानने से है।

विभिन्न अनुष्ठानों, निषेधों और विश्वासों के दवारा पवित्र वस्तुओं से उन वस्तुओं को अलग रखा जाता है जिन्हें हम अपवित्र या साधारण मानते हैं। पवित्रता की धारणा ही समाज में उसकी सामूहिक चेतना को स्पष्ट करती है। उदाहरण के लिए, अरूण्टा जनजाति में लोग जिस वस्तु को अपना टोटम मानते हैं उसे पवित्र वस्तुओं से उन वस्तुओं को अलग रखा जाता है जिन्हें हम अपवित्र या साधारण मानते हैं। पवित्रता की धारणा ही समाज में उसकी सामूहिक चेतना को स्पष्ट करती है। उदाहरण के लिए, अरूण्टा जनजाति में लोग जिस वस्तु को अपना टोटम मानते हैं, उसे पवित्र समझकर सदैव उसकी रक्षा करते हैं। टोटम उनकी सामूहिक चेतना को स्पष्ट करती है। धर्म समाज में एक नैतिक व्यवस्था को सुदृढ़ बनाना है तथा सामाजिक एकीकरण की प्रक्रिया को प्रोत्साहन देता है। इस प्रकार धर्म एक विभेदकारी तथ्य नहीं है। बल्कि सामाजिक संगठन में वृद्धि करने वाला एक प्रमुख आधार है।

प्रकार्यवाद की नवी व्याख्या- दुर्खीम से पहले अनेक मानव-शास्त्रियों ने प्रकार्यवाद के आधार पर जनजातीय सामाजिक संगठन की विशेषताओं को स्पष्ट किया था। दुर्खीम ने प्रकार्यवाद को एक ऐसे रूप में स्पष्ट किया जिसे आज तक समाजशास्त्रियों द्वारा महत्त्वपूर्ण माना जाता है। दुर्खीम से पहले के विद्वान किसी घटना अथवा विशेषता के लक्ष्य तथा उसके उद्देश्यों स्पष्ट करने के लिए प्रकार्य शब्द का प्रयोग करते थे। किसी सामाजिक घटना के प्रकार्य को जानने का सबसे सरल तरीका यह है कि हम यह जाने लें कि एक विशेष सामाजिक घटना समाज सामान्य आवश्यकताओं को किस सीमा तक पूरा करती है । इस प्रकार टोटम का प्रकार्य पवित्रता की धारणा और समुदाय को एक नैतिक बन्धन में बाँधना है। जबकि श्रम-विभाजन का प्रकार्य विशेषीकरण को प्रोत्साहन देना और सावयवी एकता में वृद्धि करना है। इस प्रकार्यवाद एक ऐसा आधार है, जिसकी सहायता से विभिन्न सामाजिक घटनाओं के कारणों और परिणामों की विवेचना की जा सकती है।

मूल्यों की समाजशास्त्रीय विवेचना- दुर्खीम ने अपनी पुस्तक ‘समाजशास्त्र तथा दर्शनशास्त्र’ में सामाजिक मूल्यों को दर्शन की विषय-वस्तु से अलग करके इनकी सामाजिक प्रकृति को स्पष्ट किया। आपके अनुसार सामाजिक मूल्यों का जन्म सामूहिक विशेषताओं के आधार पर होता है तथा प्रत्येक सामाजिक मूल्य एक समुदाय के सामूहिक जीवन की विशेषता को स्पष्ट करता है। प्रत्येक समाज में जब कभी भी व्यवहार सम्बन्धी कुछ समस्याएँ पैदा होती हैं तो उनका समाधान करने के लिए कुछ ऐसे आदर्श नियम विकसित हो जाते हैं जो सामूहिक इच्छा का प्रतिनिधित्व करते हैं। यही आदर्श नियम सामाजिक मूल्यों का रूप ले लेते हैं। इस तरह सामाजिक मूल्यों का कार्य समुदाय में लोगों के व्यवहारों को नियमित बनाना और सामाजिक संगठन को सुदृढ़ करना होता हैं। दुर्थीम यह मानते हैं कि विभिन्न मूल्यों के आधार पर किसी समुदाय के सामूहिक जीवन की विशेषताओं को भी सरलतापूर्वक समझा जा सकता है।

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Pankaja Singh

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