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समाजिक प्रगति | समाजिक प्रगति के लक्षण | समाजिक प्रगति की विशेषताएं | उद्विकास एवं प्रगति में अन्तर

समाजिक प्रगति | समाजिक प्रगति के लक्षण | समाजिक प्रगति की विशेषताएं | उद्विकास एवं प्रगति में अन्तर

समाजिक प्रगति

जब किसी परिवर्तन को समाज के हित में अच्छा या लाभकारी माना जाता है तो उसे प्रगति कहा जाता है। प्रगति सामाजिक परिवर्तन को एक निश्चित दिशा को दर्शाती है। प्रगति से समाज कल्याण और सामूहिक हित की भावना छिपी होती है। मैकाइवर व पेज प्रगति की तुलना गिरगिट से करते हैं।

ऑगबर्न व निमकॉफ- “प्रगति का अर्थ अच्छाई के लिए होने वाला परिवर्तन है इसलिए प्रगति में मूल्य-निर्धारण होता है।”

वार्ड- प्रगति वह है जो मानवीय सुख में वृद्धि करती है।

लुम्ले के अनुसार- “प्रगति एक परिवर्तन है लेकिन वह इच्छित या मान्यता प्राप्त दिशा में होने वाला परिवर्तन है, किसी भी दिशा में होने वाला परिवर्तन नही है।”

गुरविच तथा मूर के शब्दो में- “प्रगति स्वीकृत मूल्यों के संदर्भ में इच्छित मूल्यों की ओर बढ़ना है।”

गिन्सबर्ग के अनुसार- “प्रगति का अर्थ उस दिशा में होने वाला विकास है जो सामाजिक मूल्यों का विवेकयुक्त हल प्रस्तुत करता है।”

(1) उद्विकास- उद्विकास की अवधारणा का सीधा संबंध जैवकीय उद्विकास से है। 19वीं शताब्दी के समाजशास्त्रीयों ने उद्विकास की अवधारणा का प्रयोग बहुत अधिक किया है। यह सब होते हुए भी इन लेखकों ने उद्विकास में निहित अर्थ को कोई अधिक स्पष्ट नहीं किया है।

उद्विकासस का जनक डार्विन को माना जाता है। जिन्होंने सर्वप्रथम मानव के उद्विकास का उल्लेख किया उनकी दो पुस्तके The Origin of Species (1859) और ‘The Descent of Man’ (1863) इस दिशा में उल्लेखनीय है उद्विकास को समाजशास्त्र में सर्वप्रथम स्पेन्सर ने प्रयोग किया इसलिए स्पेन्सर को सामाजिक उद्विकास का जन्मदाता कहा जात है। स्पेन्सर का कहना है कि जिस तह व्यक्ति को विकास होता है उसी तरह का भी विकास होता है। स्पेन्सर ने अपनी पुस्तक (Social Statues) में विस्तापूर्वक समाज को एक सावयव की तरह उसके उद्विकासीय रूप में रखा है।

डार्विन के अनुसार- उद्विकास की प्रक्रिया में जीवन की संरचना सरलता से जटिलता (Complex) को ओर बढ़ती है। यह प्रक्रिया प्राकृतिक चयन (Number Selection) के सिद्धान्त पर आधारित है।

हरबर्ट स्पेन्सर ने जैविक परिवर्तन की भांति ही सामाजिक परिवर्तन को भी कुछ आंतिरक शक्तियों के कारण संरचना माना है और कहा कि उद्विकास की प्रक्रिया धीरे-धीरे निश्चित स्तरों से गुजरती हुई पूरी होती है।

स्पेन्सर- “उद्विकास कुछ तत्वों का एकीकरण तथा उसे संबंधित वह गति है जिसके दौरान कोई तत्व एक अनिथित तथा असम्बद्ध समानता से निश्चित और सम्बद्ध भिन्नता में बदल जाता है।”

मैकाइवर पेज- “जब परिवर्तन में केवल निरंतरता ही नहीं होती, बल्कि परिवर्तन की एक दिशा भी होती है, तब ऐसे परिवर्तन से हमारा तात्पर्य उद्विकास से होता है।”

ऑगबर्न व निमकॉफ- उद्विकास एक निश्चित दिशा में होने वाले परिवर्तन हैं।

उद्विकास को एक सूत्र द्वारा एक प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है-

उद्विकास-निरंतर + परिवर्तन निश्चित दिशा + गुणात्मक अंतर + ढांचे व कार्य में मित्रता

समाजिक प्रगति के लक्षण या विशेषताएं

(क) समाज बराबर लम्बवत् नीचे से ऊपर के स्तर की ओर बढ़ता है।

(ख) नीचे के स्तर पर सामाजिक संरचना सरल और सजातीय होती है.

(ग) जैसे-जैसे समाज ऊपर के स्तर की ओर बढ़ता है। सामाजिक संरचना की जटिलता और उसकी विजातीय भी बढ़ती जाती है.

(घ) स्पेन्सर के अनुसार जैविकीय विकास का सिद्धान्त भी सभी तरह के विकास पर लागू होता है।

(ङ) नीचे के स्तर से ऊपर के स्तर की ओर बढ़ने के पीछ स्पेन्सर के अनुसार जनसंख्या की वृद्धि और सामाजिक स्तरीकरण वे दो प्रमुख कारक है।

(च) उद्विकास मूल्य निरपेक्ष होता है। इसका समाज के मूल्यों से कोई लेना-देना नही है।

(छ) उद्विकास निरंतर आगे बढ़ने वाली प्रक्रिया है, इसमें पीछे लौटने की बात नहीं होती अर्थात् एक अवस्था के पश्चात् ही दूसरी अवस्था आती है। इसमें चरणों की पुनरावृत्ति नहीं होती है।

(ज) उद्विकास निरंतर एवं धीमी गति से होने वाला परिवर्तन है।

(झ) उद्विकास वस्तु की आंतरिक वृद्धि के कारण होता है,

(ञ) यह एक सार्वभौमिक प्रक्रिया है।

(ट) यह एक निरंकुश प्रक्रिया है जो अपने अनुसार निरंतर चलते रहती है, इसमें कोई हस्तक्षेप नही किया जा सकता है।

उद्विकास एवं प्रगति में अन्तर

(i) प्रगति वांछित उद्विकास है- उद्विकास का अर्थ किसी भी दिशा में होने वाले निरंतर परिवर्तन से है, लेकिन जब यही परिवर्तन सामाजिक मूल्यों और इच्छित लक्ष्यों की ओर होता है तब इसे हम प्रगति कहते हैं।

(ii) प्रगति तुलनात्मक है- प्रत्येक समाज में प्रगति का अर्थ समान नहीं होता हम विचारात्मक उन्नति को प्रगति कह सकते हैं जबकि पश्चिमी समाज भौतिकता को ही प्रगति का आधार मानते हैं।

(iii) प्रगति सामूहिक जीवन में संबंधित होती है- किसी एक या कुछ व्यक्तियों की इच्छाओं के अनुसार प्रगति होना जरूरी नहीं है। प्रगति की संभावना केवल उस स्थिति में ही की जा सकती है जबकि समाज में होने वाला परिवर्तन सामूहिक मूल्यों अथवा लक्ष्यों को प्राप्त करने में सहायक हो रहा हो।

(iv) प्रगति स्वाचालित नहीं होता- प्रगति उद्विकास के समान स्वयं होने वाले परिवर्तन नहीं है बल्कि यह मनुष्य के सक्रिय प्रयत्नों एवं परिश्रम पर आधारित है।

(v) प्रगति की धारणा केवल मनुष्य से सबंधित है।

(vi) प्रगति में लाभ अधिक हानि काम होती है।

(vii) प्रगति की धारणा परिवर्तनशील है।

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Pankaja Singh

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