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भारत में कृषि का वर्गीकरण | भारतीय कृषि की विशेषताएँ

भारत में कृषि का वर्गीकरण | भारतीय कृषि की विशेषताएँ

भारत में कृषि का वर्गीकरण

भारतीय कृषि को मुख्यतः 6 भागों में विभाजित किया जा सकता है-

  1. स्थानान्तरण कृषि- कृषि की इस पद्धति के तहत किसान अपने परिवार को खाद्य आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए कृषि करता है। यदि अपने परिवार की आवश्यकताओं की पूर्ति के बाद खाद्यान्न बच जाता है, तो उसका उपयोगा अन्य वस्तुओं के लेन-देन में किया जाता है। स्थानान्तरण कृषि में क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था लगभग स्थायी होती है और उसका आधार पूर्णतः ग्रामीण उत्पादन ही होती है। इस प्रकार की कृषि के लिए भूमि का निर्माण अधिकांशत: जंगलों में आग लगाकर किया जाता है। इस प्रकार की कृषि का चक्र चार से आठ वर्ष तक का होता है, कभी-कभी यह पाँच से पन्द्रह वर्ष का भी होता है। भारत के विभिन्न क्षेत्रों में स्थानान्तरण कृषि को विविध नामों से पुकारा जाता है, यथा-असम में झूम, केरल में पोणम, आंध्र प्रदेश और उड़ीसा में पोडू तथा मध्य प्रदेश में बीवर, मशान, पेण्डा और बीरा।

इस प्रकार की कृषि मुख्यत: असम, नागालैण्ड, मेघालय, मणिपुर, त्रिपुरा, मिजोरम, मध्य प्रदेश, आन्ध्र प्रदेश, उड़ीसा आदि के वन क्षेत्र में की जाती है। इसके अंतर्गत शुष्क धान, गेहूं, मक्का, छोटे ज्वार, तम्बाकू और गन्ना मुख्यतः उत्पादित होते हैं

  1. स्थानबद्ध कृषि- कृषि की इस पद्धति के तहत किसी एक स्थायी और निश्चित निवास स्थान पर रहने वाला किसान और उसका परिवार मिल-जुलकर कृषि कार्य करता है। इस प्रकार की कृषि में किसान फसलों में परिवर्तन करता है और वह भूमि तथा फसलों की अपेक्षाकृत अधिक देख-रेख करता है। भारत के अधिकांश कृषक कृषि की इसी पद्धति को अपनाते हैं और इसके लिए बैल और भैंस पशु तथा हलों (लकड़ी और लोहे का हल) का उपयोग करते है।
  2. रोपण कृषि- कृषि की इस पद्धति के तहत किसी एक नकदी फसल का उत्पादन विस्तृत वागान में किया जाता है। यह कृषि मुख्यतः, उष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों में की जाती हैं रोपण कृषि वाले क्षेत्रों में वागान बहुत बड़े-बड़े होते हैं और ये मुख्यत: कम जनसंख्या वाले क्षेत्रों में पाये जाते हैं। भारत में केरल, आन्ध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश और उत्तर प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में इस प्रकार की जाती है। रोपण कृषि की प्रमुख फसलें हैं-चाय, रबड़, कपास, पटसन, अत्रनास, केला, गन्ना, ताड़ और नारियल।
  3. गहन कृषि- विश्व में जिन कुछ गिने-चुने क्षेत्रों में गहन कृषि की जाती है, उनमें भारत भी प्रमुख है। इस प्रकार की कृषि में अधिकाधिक उत्पादन प्राप्त करने के उद्देश्य से प्रति इकाई भूमि पर पूंजी और श्रम का व्यय अपेक्षाकृत अधिक किया जाता है। गहन कृषि में अधिक मात्रा में रासायनिक उर्वरक, अच्छे किस्म के बीच, कीटनाशक, सिंचाई, शस्यावर्त्तन तथा हरी खाद का भरपूर प्रयोग किया जाता है। यद्यपि कृषि की इस पद्धति से उत्पादन में कम समय में ही अत्यधिक वृद्धि होती है, तथापि यह पद्धति मानव-जीवन और पर्यावरण दोनों ही के लिए। खतरनाक समस्या बनकर ऊभरी है, क्योंकि रासायनिक उर्वरकों तथा कीटनाशकों के उपयोग से भूमि की उर्वरा शक्ति में ह्रास हुआ है और वायु तथा जल भी प्रदूषित हुए हैं।
  4. मिश्रित कृषि- कृषि की यह पद्धति अत्यन्त लाभदायक है। इस पद्धति के तहत किसान कृषि कार्य के साथ-ही-साथ पशु पालन का कार्य भी करता है। इसमें कृषि भूमि का लगभग 20 प्रतिशत चारागाह के रूप में तथा 80 प्रतिशत फसलोत्पादक के रूप में उपयोग किया जाता है। हाल के वर्षों में भारत में यह पद्धति तेजी से विकसित हो रही है, हालांकि पशुपालन के साथ-साथ कृषि प्राचीनकाल से ही होती आ रही है। गुजरात, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और बिहार में कृषि की इस पद्धति का विकास हो रहा है और ऐसा होना अपेक्षित भी है।
  5. पूँजी आधारित कृषि- कृषि की यह पद्धति उन क्षेत्रों में अपनायी जा रही है, जहाँ कृषि के लिए पूर्णत: मशीनों की आवश्यकता होती है। इस पद्धति में पूँजी का अधिकाधिक व्यय होता है, यद्यपि कृषि से आय भी अधिक होती है। भारत में इस प्रकार की कृषि अभी बहुत ही न्यून क्षेत्रों में होती है। बागवानी कृषि के अन्तर्गत ऐसे क्षेत्रों की खोज अभी जार है।

भारतीय कृषि की विशेषताएँ

संसार के कृषि प्रधान देशों में भारत का नाम अग्रणी है। इस तथ्य को सारा संसार जानता है कि जब विश्व के अधिकांश मनुष्य असभ्य थे तथा जंगलों में पशुओं का समान विचरण किया करते थे, उस समय भारतीय किसान खेतों में सोना पैदा किया करते थे। वर्तमान में उन्नत कहे जाने वाले राष्ट्रों के निवासियों का जीवन जब पशुओं के मांस पर निर्भर था, उस समय के लोग आखेट तथा कृषि दोनों प्रकार के कर्मों द्वारा अपना जीवन निर्वाह करते थे।

इस प्रकार भारत मुख्य रूप से कृषि प्रधान देश है। देश की लगभग 70 प्रतिशत आबादी अपनी जीविका कृषि द्वारा यापन करती है। कृषि भारतीय राष्ट्र का मेरुदण्ड है। प्रतिवर्ष 2 प्रतिशत की दर से वृद्धि करने वाली आबादी को भोजन जुटाने के लिए 5 लाख मीट्रिक टन अतिरिक्त अनाज की आवश्यकता पड़ती है। अभी तक इस समस्या का समाधान विदेशों से अनाज मँगाकर पूर्ण किया जाता था। परन्तु इधर 4 वर्षों से भारत अनाज के मामले में आत्मनिर्भर है।

किन्तु सन् 1980-81 और 81-82 की अवधि में प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण हमारे खाद्यान्नों का उत्पादन कुछ कम हुआ था, अतः विदेशों से काफी मात्रा में गेहूँ का आयात करना पड़ा था। 1982 के सूखा के परिणामस्वरूप भी देश में खाद्यान्न उत्पादन आवश्यकता के अनुपात में कम रहा। अतः 1983 में भी देश में खाद्यान्न आयात करना पड़ा था। इसके अतिरिक्त उद्योग- धन्धोंके लिए कच्चा माल प्रदान करने के लिए तथा कृषि उपजों का निर्यात करने के लिए कृषि का विशेष महत्व है। क्षेत्रफल तथा उत्पादन की दृष्टि से भारत संसार के कृषि प्रधान देशों में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। देश की लगभग 40 प्रतिशत भूमि कृषि कार्य हेतु प्रयुक्त होती है। भारत कुछ फसलों की पैदावार में तो बहुत आगे है। उदाहरणार्थ गन्ने की कृषि का क्षेत्रफल भारत में ही सबसे अधिक है। लाख के उत्पादन में भारत को एकाधिकार प्राप्त है। कपास की पैदावार संयुक्त राज्यअमेरिका के बाद दूसरे स्थान पर है। चावल तथा चाय में भारत चीन के साथ होड़ लेता है। देश के निर्यात का लगभग 40 या 45 प्रतिशत भाग कृषि उपजों द्वारा ही प्राप्त होता है। देश की उन्नति के लिए कृषि की उन्नति परमावश्यक है। फिर भारतीय कृषि अन्य उन्नतिशील देशों की अपेक्षा पिछड़ी हुई है। इसका कारण यह है कि भारतीय कृषक आलसी हैं, देश में खाद तथा उत्तम बीज का उचित वितरण नहीं है, भूमि के अपरदन है, कृषि के लिए भारतीय किसान वर्षा पर निर्भर है।

भारतीय कृषि की निम्नांकित विशेषताएँ हैं-

  1. भारत में देश के कुल क्षेत्रफल 30.8 करोड़ हेक्टेयर का 40 प्रतिशत कृषि के लिए, उपलब्ध है जबक चीन में 12 प्रतिशत, जापान में 16 प्रतिशत, ब्रिटेन में 23 प्रतिशत, अमेरिका में 12 प्रतिशत तथा रूस में 10 प्रतिशत भूमि पर खेती का कार्य किया जाता है।
  2. देश की कुल कृषि योग्य भूमि के 80 प्रतिशत क्षेत्रफल पर अनाज, 8 प्रतिशत पर अखरोट फसलें तथा रेशेदार पदार्थ, तिलहन एवं चारा प्रत्येक 4 प्रतिशत क्षेत्रफल पर उत्पन्न किया जाता है।
  3. खेती की भूमि की कमी तथा अज्ञानता और आर्थिक परिस्थितियों के कारण भारतीय किसान शस्य परिवर्तन नहीं कर पाता है। अत: मिट्टी में रसायनिक तत्व की कमी होती जा रही है।
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Pankaja Singh

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