भूगोल

गोंड जनजाति | गोंड जनजाति की अर्थव्यवस्था तथा समाज | गोंड लोगों के जीवन पर पर्यावरण के प्रभाव

गोंड जनजाति | गोंड जनजाति की अर्थव्यवस्था तथा समाज | गोंड लोगों के जीवन पर पर्यावरण के प्रभाव

गोंड जनजाति  

भूगोलवेत्ताओं के अनुसार विन्ध्याचल पर्वत भारत की सबसे प्राचीन पर्वत श्रेणी है और क्योंकि गोंड इसी प्रदेश के रहने वाले हैं, अतः मानवशास्त्री इन्हें भारत की सबसे प्राचीन आदिवासी जाति बताते हैं। मध्य प्रदेश में गोडों की जनसंख्या अधिक होने के कारण ही इस प्रदेश का नाम “गोंडवाना” पड़ा था। “आइने अकबरी” में भी इनका इसी नाम से उल्लेख होता था और 16वीं तथा 18वीं शताब्दी में इनके समृद्धिशाली राज्य का पता चलता है। इनके राज्यवंश के 48वें राजा का नाम संग्रामसिंह अधिक प्रसिद्ध था। धीरे-धीरे मराठों एवं मुगलों ने इनका राज्य छीन लिया और ब्रिटिश काल तक आते-आते इन राजवंशियों को दुबारा जंगलों की ओर आज्ञातवास करना पड़ा। जंगलों में आवागमन की असुविधा होती है, अतः अंग्रेज भी यहाँ तक नहीं पहुँच सके। इस क्षेत्र के सम्बन्ध में डब्ल्यू. वी. ग्रियर्सन महोदय ने कहा है कि, “यदि भारत का कोई भाग अंग्रेज अफसरों तथा विदेशी यात्रियों के लिए अज्ञात कहा जा सकता है तो वह वसतर जयपुर जमींदारों का विस्तृत भाग है।”

इस भौगोलिक पृथकत्व के कारण ही ये आदिवासियों के रूप में आ गये।

भौगोलिक वातावरण-

मध्य प्रदेश का वह सम्पूर्ण दक्षिणी-पूर्वी भाग जिसे गोंड आदिवासियों का मुख्य क्षेत्र बसतर कहते हैं एक पहाड़ी एवं पठारी भाग है। इस क्षेत्र की सामान्य ऊँचाई 610 मीटर से 763 मीटर है, लेकिन इस क्षेत्र में कुछ पर्वत अधिक ऊँचाई वाले हैं जिनमें अभूजमूर पर्वत ही 915 मीटर से भी ऊँचा है एवं पूर्वीघाट तो कहीं-कहीं पर 1830 मीटर से भी  अधिक ऊँचा है। यही नहीं इस क्षेत्र के मैदान जो नदियों ने काट-छाँट कर बनाये हैं, काफी ऊंचे हैं जिनकी सामान्य ऊंचाई 245 से 175 मीटर है। यदि इस क्षेत्र को जलवायु की दृष्टि से देखा जाये तो यह क्षेत्र न तो अधिक गर्म है और न ही अधिक ठण्डा। जब नागपुर एवं अमरावती ग्रीष्मकाल में प्रचण्ड गर्मी से झुलस जाते हैं उस समय क्षेत्र में स्थित जगदलपुर अपेक्षाकृत काफी ठण्डा होता है।

समुद्र तल से अधिक ऊंचाई एवं सदाबहार जंगलों का आधिक्य इस क्षेत्र में शीतलता बनाये रखने में बहुत सहायक होते हैं। बस्तर का दक्षिणी भाग नीचा होने के कारण काफी गर्म रहता है। इस क्षेत्र की मुख्य नदियाँ गोदावरी और इन्द्रावती हैं जो इस क्षेत्र में अनेक सहायक नदियाँ सहित बहती हैं एवं ये अनेक संकरी एवं गहरी घाटियों का निर्माण करती हैं। इन्द्रावती नदी तो अपने मनोरम दृश्यों के लिए प्रसिद्ध है। इनके मार्ग में कई जगह जलप्रपात मिलते हैं, जिनमें सबसे प्रसिद्ध एवं सुन्दर 28 मीटर ऊँचा चित्रकूट जलप्रपात है।

प्रजाति एवं उप-जाति-

प्रो. हैडन (Haddon) के अनुसार यह जनजाति भारत की आदि द्राविड़ियन समुदाय की कृष्णवर्णीय एवं दीर्घ कपालीय जनजातियों में है। सी. एस. वैंकटाचार महोदय के अनुसार, “मध्य भारत के गोंडों का सम्बन्ध दक्षिण के उन सादिकालीन द्राविडियन लोगों से है जिन्हें द्राविडियन लोगों ने अपनी भाषा प्रदान की थी।”

भारत में अंग्रेजों के आने के पहले तक ये लोग हिन्दुओं में गिने जाते थे एवं ऐसा ज्ञात होता है कि प्राचीन समय में इनमें दो वंश थे एक राजा गोंड और दूसरा धुर गोंड राजा गोंड वे थे जो शासन करते थें आजकल ये लोग 12 उप-शाखाओं में बँटे हुए हैं-राजगोंड, रघुवाल, ददेव, कललिया, पादल, धोली, ओभूपाल, थोटपाल, कोइलामुतूले, कोहकायाल, कोलाय आर मुंदिपाल। गोंडों में वंश किसी पेड़ के पौधे के नाम या किसी जानवर के नाम पर होते हैं। उदाहरण के लिये-नागवंश, कच्छवंश, वकुलवंश, तेदुवंश आदि इसह तरह कुछ के वंश जानरों के नाम पर होते हैं।

आकृति-

गोंडों के शरीर का रंग काला तथा शरीर की लम्बाई 1 मीटर 65 सेन्टीमीटर तक होती है अर्थात् कद छोटा होता है। इनकी नाम छोटी तथा सिर गोल होता है। आँखों की आभा काली होती है। इनका मुहँ चौड़ा होता है तथा होंठ बड़ा होता है। बाल लम्बे-लम्बे और काले होते हैं।

अधिवास-

गोंड लोग गाँव की स्थापना में सबसे अधिक ध्यान इस बात पर देते है कि गाँवों से उनके खेत जिन्हें ये पेंडा कहते हैं दिखलाई पड़ने जरूरी हैं। इसके अतिरिक्त ये पानी की प्राप्ति एवं खेतों की उर्वरा शक्ति को भी ध्यान में रखते हैं, लेकिन पास में पानी नहीं भी मिले आर खेतों में सर्वरा शक्ति है तथा घर अच्छी तरह दिखलाई देते हैं तो ये लोग पानी दूर से लाने का कष्ट कर लेते हैं और गाँव की स्थापना कर देते हैं। ग्राम की स्थापना में जंगल की निकटता भी ध्यान में रखते हैं, क्योंकि जंगल समीप होने से इनकी लकड़ी की आवश्यकताएँ पूरी हो जाती हैं।

गोंड लोगों के गाँव अधिकतर छोटे होते हैं। एक ग्राम में अक्सर 15-20 घर होते हैं जो दो कतारों में बनाये जाते हैं जिनके बीच में 18 से 20 मीटर चौड़ी कच्ची सड़क होती है। इनके घर अधिकतर झोपड़ियों के बने होते हैं। झोपड़ियों में साल की लकड़ी, बाँस तथा घास का प्रयोग प्रचुरता से किया जाता है। प्रत्येक घर के पीछे मासिक धर्म से होने वाली स्त्रियों को रहने के लिये एक झोपड़ी होती है, जिनका द्वारा गाँव के बाहर की ओर होता है। इस झोपड़ी का छप्पर अरंडों के फलों तथा पत्तों का बना होता है। घर के पीछे की ही ओर सूअरों के रहने का घर होता है। प्रत्येक गाँव में एक देव मन्दिर तथा गौतुल गृह अर्थात् कुँआरे लड़के-लड़कियों के सोने का घर होना आवश्यक होता है। गोंड अपने मकान की दीवाले लकड़ी के लट्ठों को गाड़ कर बनाते हैं।  मकानों की दीवालों की ऊँचाई 1 मीटर तक होती है, परन्तु मध्य भाग लगभग 2 मीटर ऊँचा होता है।

वस्त्र-

गोंड लोग वस्त्र बहुत कम धारण करते हैं। कहा जाता है कि “मारी” जाम की उप-जाति वाले गोंड प्रायः नग्नावस्था में ही रहकर जंगलों में घूमते रहते हैं एवं प्राकृतिक साधनों पर जीवन यापन करते हैं। उन्नत परिवार के गोंड लोग भी प्रायः एक छोटा कपड़ा घुटनों से ऊपर कमर तक और साफे जैसी वस्तु सिर पर पहनते हैं। बाकी शरीर खुला ही रहता है। जो अधिक धनी होते हैं वे एक कपड़ा और रखते हैं, जिसे वे अपने शरीर पर ओढ़ने के काम में लाते हैं। गरीब लोग केवल एक लंगोटी पहन कर ही सारा जीवन व्यतीत कर देते हैं। स्त्रियाँ लाल किनारी का लूगरा जो केवल घुटनों से कुछ नीचे तक ही आता है और एक कपड़ा बदन में इस पार से उस पार लपेट लेती हैं। उत्सवों एवं नृत्य के समय ये लोग खूब सजते हैं। स्त्रियाँ गले में मालाएं पहनती हैं और पाँव में घुंघरू बाँधती हैं। ये लोग लाल रंग के बहुत शैकीन होते हैं।

भोजन-

गोंडों की मुख्य भोजन-सामग्री मक्का, बाजरा, कोदो, ज्वार, महुवा के फूल और फल तथा जंगली जड़ी-बूटी एवं शिकार से प्राप्त गोश्त है। ये लोग शिकार करने में बड़े दक्ष होते हैं। ये गड्ढे खोदकर बड़े-बड़े जानवरों को उसमें फंसा कर उनका शिकार करते हैं। चूहे, गिलहरी आदि छोटे-छोटे जानवरों को भी ये बड़े चाव से खाते हैं। हिरण, सूअर, बकरी और मुर्गा को देवी-देवताओं पर बलि चढ़ा कर खाते हैं। ये लोग इमली बड़े ही चाव से खाते हैं। आंवला, जामुन, ऊपर, वेर, आम, पीपल की नयी पत्तियाँ, बाँस तथा करील के नर्म टुकड़ों की सब्जी अधिक बनाते हैं। ये लोग वर्षा के दिनों में लाल चींटियों को खोज-खोज कर खाते हैं।

व्यवयास-

जिस प्रदेश में ये गोंड रहते हैं उस प्रदेश में ऐसा कोई भी कारखाना नहीं है, जिसका उल्लेख किया जाये। अतः लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि करना तथा लकड़ी काटना है। फिर भी इन लोगों के व्यवसाय अनेक प्रकार के हैं। व्यवसायों व पेशों के आधार पर गोंडों की कई उप-जातियाँ होती हैं जिनमें निम्न मुख्य हैं-

मुरिया- कुशल लुहार।

अरीरा- जुलाहे तथा टोकरी बुनने वाले।

कूअख- कवट तथा धीमर और मछली मारने वाले।

रावत- पशुपालक व चरवाहे और

राजगॉड- कृषक ।

जंगली जातियाँ अब भी जंगली जीवन-यापन कर रही हैं। कुछ लोग जंगलों में खेती भी कर लेते हैं। इनकी मुख्य कृषि प्रणाली दिप्पा (Dippa) और कुकी की झूम (Shum of Kuki)  है। इस प्रकार की कृषि प्रणाली में जहाँ भी झाड़ीदार वन पाये जाते हैं कुछ भूमि कृषि के लिए चुन ली जाती है। उस क्षेत्र से पेड़ों को गिरा दिया जाता है और सफाई के लिए आग लगा दी जाती है। इस तरह जब भूमि साफ हो जाती है जब उसमें ये गने बनाकर उसमें बीज डाल देते हैं। इसमें बैगा लोग हल द्वारा खेती करना पाप समझते हैं क्योंकि उनका विश्वास है कि हल चलाने से धरती माता को कष्ट होता है। गोंडों के अन्य वर्ग (बैगा वर्ग को छोड़कर) कभी-कभी बहुत छोटे- छोटे हलों द्वारा जुताई का कार्य करके बीजों को खेत में फेंक देते हैं। इस प्रकार बीज को फेंकने की प्रणाली को ये लोग “छिदुआ” कहते हैं। इसके बाद ये अपनी मातृ-देवियों को बलिदान करते हैं या जंगल के अन्य देवी-देवताओं की पूजा करते हैं।

जहाँ पहाड़ों की ढाल कम है वहाँ सीढ़ीदार खेतों का निर्माण किया जाता है। इस प्रकार की कृषि प्रणाली को “पेंदा” (Penda) कहा जाता है। इस प्रकार की कृषि प्रणाली में एक वर्ष  कृषि करके 2 या 3 वर्षों के लिए भूमि परती छोड़ दी जाती है ताकि नई सम्भव हो सके। जहाँ पानी की सुविधा है या सिंचाई के साधन सुगम तथा पर्याप्त है वहाँ पर पानी के बहाव को रोकने के लिए लकड़ी के बड़े-बड़े लट्ठे रख दिय जाते हैं जिससे पानी बहकर बेकार न जाये। इससे भूमि की आर्द्रता बनी रहती है। इस पर भी बलिदान किये जाते हैं। नृत्य और गानों का आयोजन किया जाता है।

चूँकि गोंड लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि करना है और अपना अधिकांश समय जंगलों को साफ करके खेत बनाने, बोने, रखवाली करने आदि में हो व्यतीत करते हैं, अतः ये लोग जंगलों से अनेक वस्तुएँ बीन-बटोर लाते हैं। बस्तर प्रदेश की प्रकृति बड़ी ठेदार है। यह इस बात से प्रमाणित होता है कि यहाँ पर कभी भी अकाल नहीं पड़ा है। गोंड लोग अनेक प्रकार के जंगली फल, जड़ी-बूटियाँ तथा फल-फूल वनों से ही प्राप्त करते हैं। यहाँ अनेक प्रकार के उपयोगी वृक्ष उदाहरणतः इमली, सियोना, अचर, तेन्दू, सियारी, महुआ, जामुन, साबूदाने व खजूर आदि पाये जाते हैं। जंगलों में खाने लायक वस्तुएँ लाना स्त्रियों का काम है। गोंद, शहद आदि भी ये ही एकत्रित करती हैं।

विवाह प्रथाएँ-

गोंड लोगों में विवाह की निम्नलिखित प्रथाएँ प्रचलित हैं-

(1) सादा विवाह में लड़का और लड़की के निश्चित मत जान लेने पर वृद्ध लोग विवाह का प्रबन्ध करते है। इन लोगों में बारात लड़की के यहाँ से लड़के के यहाँ पर आती है जिनमें पुरुष एवं स्त्री सभी आते हैं। लड़के वाले के यहाँ एक चबूतरे पर लड़का और लड़की में अंगूठी का आदान-प्रदान होता है। कन्यादान, पाणिग्रहण संस्कार तथा दहेज आदि का काम पंडित या पुरोहित का होता है, लेकिन कुछ विवाहों में वैवाहिक कार्य ये स्वयं कर लेते हैं। चन्द्रमा के उदय होने के वाद मण्डप के नीचे गड़ी लकड़ी के चारों ओर वर और वधू को घुमाया जाता है जो दो पुरुषों की गोदी में अलग-अलग बैठे होते हैं। वर और वधू दोनों पीत वस्त्र धारण करते हैं। वैवाहिक कार्यक्रम के पश्चात् सुन्दर नृत्य का आयोजन किया जाता है। इसमें नर्तक मोर पंखों से सजते हैं। नव-विवाहिता वर एवं वधू अलग एक नये घर में चले जाते हैं। इसके दूसरे दिन “किचला माँदी” का उत्सव होता है। इसमें गाँव के कुएँ पर स्त्री-पुरुष मिलकर कीचड़ और पानी की होली खेलते हैं। इसके पश्चात् बारात विदा होती है और वैवाहिक संस्कार समाप्त माना जाता है।

(2) दूसरी प्रथा में लड़की अपना विवाह स्वयं ही तय करती है तथा एक निश्चित दिन कुछ लोगों के सामने पूजा की सामग्री आर पानी अपने चुने हुए पति पर छिड़क देती है। जिन- जिन लोगों के सामने वह ऐसा करती है वे विवाह के साक्षी के रूप में होते हैं। इसके पश्चात् भोज, नृत्य आदि होता है। यह विवाह भी कानूनी माना जाता है।

(3) गोंड़ों में विवाह की तीसरी प्रथा लमझना की प्रथा होती है। इसमें वर और वधू एक मत हो जाने पर वर गरीबी के कारण वधू के पिता को दहेज नहीं दे पाता है तो वर अपने ससुर के घर रहकर निःशुलक कार्य किया करता है। जब ससुर चाहता है तो कायदे से विवाह कर देता है। कभी-कभी तो वर को 5-5 वर्ष तक निःशुल्क कार्य करना पड़ता है। वर को इस दशा में रहने को ये लोग “चरधिया” कहते हैं जिसका अभिप्राय होता है “ससुर का प्राणी” लेकिन यह प्रथा अब कम होती जा रही है।

(4) विधवा विवाह- गोंड लोगों में विधवा विवाह की भी प्रथा है। पति के मर जाने पर पत्नी प्रायः अपने पति के छोटे भाई से विवाह कर लेती है। कहीं-कहीं गोंडों में बहुपत्नी की भी प्रथा है।

गोंडों के विवाह संस्कार में पंचायती भोज का स्थान महत्त्वपूर्ण है। इसके पश्चात् सभी प्रकार के विवाह कानूनी मान लिये जाते हैं।

रीति-रिवाज-

गोंडों में सगोत्रीय विवाह नहीं होते हैं। मामा की लड़की से विवाह हो सकता है। इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक तथा सामाजिक संस्था युवा लड़के एवं लड़कियों का शयनागार होता है, जिसे ये लोग अपनी भाषा में गौतुल गृह (Gotul) कहते हैं। इन गौतुल गृहों में केवल अविवाहित लड़के एवं लकड़ियाँ ही रहती हैं। इसमें केवल एक बहुत बड़ा कमरा होता है जिसमें जाने तथा आने के लिए केवल एक ही द्वारा होता है। दीवार में खिड़कियाँ तथा अन्य किसी भी प्रकार के झरोखे नहीं होते हैं। गाँव के सभी अविवाहित बच्चे, बड़े लड़के तथा लड़कियाँ यहाँ पर जाचती और गाती हैं। इनमें सभी प्रकार की सामाजिक, आर्थिक तथा शिक्षात्मक योजनाएँ कार्यान्वित की जाती हैं। कन्या सदस्यों को मोटियारी तथा लड़के सदस्यों की चेतिक कहते हैं। यहाँ पर अधिक आयु की मोटियारी छोटी आयु के चेतिको को शिक्षा प्रदान करती है। हैडसन के मतानुसार, “ये शयनागार गृह विकास की दिया। में प्रथम स्तर थे, जबकि सम्पूर्ण ग्राम इकट्ठा रहा करता था।” यहाँ पर अविवाहित लड़के व लड़कियों को न भेजना जातीय अपराध समझा जाता हैं यहाँ तक कि अविवाहित लड़के एवं लड़कियों को गौतुल गृहों में न भेजने पर पंचायत की ओर सये जुर्माना होता है। इसलिये प्रत्येक माता-पिता अपने बच्चों को प्रसन्नतापूर्वक यहाँ भेजते हैं। इनका एक नेता होता है जिसे ‘सलाऊ’ कहते हैं। यह सबसे बड़ा पदाधिकारी तथा मुखिया होता है। प्रत्येक लड़की को गौतुलगृह में प्रवेश करते ही इसको नमस्कार करना पड़ता है। यह गौतुल गृह के सब कार्यों को देखता है। सलाऊ किसी भी लड़की से प्यार खुलेआम कर सकता है। उस लड़की से कोई गौतुल गृह का सदस्य प्यार नहीं कर सकता है। सलाऊ तब तक विवाह नहीं करता, वह गौतुल गृह का नेता बना रहता है। जब यह विवाह कर लेता है तो दूसरा सलाऊ सर्वसम्मति से निर्वाचित कर लिया जाता है। विवाहित पुरुष तथा स्त्री गौतल गृह के सदस्य नहीं होते, लेकिन विधवाओं ओर विधूरों को गौतूल गृह का सदस्य बना लिया जाता है।

गौतुल गृह का महत्त्व इन लोगों के सामाजिक जीवन में बहुत अधिक है। यदि बसती वालों पर कोई भी विपत्ति आतों है या अन्य दैनिक तथा सामाजिक कार्यों के लिए किसी प्रकार की सहायता की आवश्यकता होती है तो ग्राम का मुखिया सलाऊ से सहायता माँगता है। सलाऊ अपनी सेना को लेकर बस्ती वालों का काम निःशुल्क करता है। बस्तियों के बड़े-बड़े सामाजिक उत्सव आदि के प्रबन्धकर्ता प्रायः गौतुल गृहवासी होते हैं। इस प्रकार गौतुल गृह समाज सेवा के लिए एक प्रकार से शिक्षा केन्द्र हैं।

सामाजिक दृष्टिकोण से भी गौतुल गृह बड़े उपयोगी संस्था प्रमाणित होते हैं। इन लोगों के लिए गौतुल गृह नियंत्रण, शिक्षा, कृषि, शिकार, मधु संचय एवं अन्य व्यवसायों का ज्ञान प्रदन करने के केन्द्र होते हैं। ये इनकी संस्कृति के संरक्षक होते हैं। यहाँ पर यह भ्रम हो सकता है कि गौतुल गृहों में रहने वाले युवक व युवातियों के आचार व चरित्र का पतन अवश्य होगा, लेकिन वास्तव में ऐसी कोई बात नहीं होती।

धार्मिक विश्वास-

सभी पहाड़ी जातियों की भाँति गोंड भी जादू-टोना, भूत-प्रेत में विश्वास करते हैं। इसलिए बीमारी या मृतक संस्कार के समय इनकी मनौती की जाती है। इसे ये लोग ‘गुनिया’ कहते हैं। इनके देवी-देवताओं अनेक हैं। सर्ष आदि के काटने पर नारायण देव की पूजा की जाती है। यह पूजा प्रति तीन वर्ष के पश्चात् की जाती है। शीतला, हैजा आदि के प्रकोप  से बचने के लिए भी पूजा की जाती है। देवी-देवताओं तथा मृतक पूर्वजों के प्रेतात्माओं को बलि दी जाती है। नृत्य भी किया जाता है। जिस पशु को बलि पर चढ़ाते हैं उसका खून खेतों में डाल दिया जाता है ताकि उपज अधिक हो। ऐसा इनका विश्वास है। ये आधिभौतिक सत्ता में विश्वास करते हैं तथा आत्मा का अस्तित्व मानते हैं। इनमें कई प्रकार के जादू टोनों की अनेक प्रथाएँ प्रचलित हैं। शिकार के लिए ‘बागेश्वर’ को बलि चढ़ाना, मछली पकड़ने में सफलता के लिए पूर्वजों की मठिया के सामने ‘सेलानृत्य’ करना, महामारी शान्त करने के लिए बनि देना, वर्षा के लिए ‘मौथी भवानी’ के सामने नृत्य करना, फसल अच्छी करने के लिए ‘बाही ससुर’ नामक देवता की पूजा करना तथा फसल काटने के बाद ‘दूल्हादेव’ पूजा करना इन्हीं टोटकों के प्रतीक हैं-जो इन्हें हिन्दू कहे जाने के अधिकारी भी बनाते हैं।

गोंड लोग बहुत ईमानदार होते हैं। ये अपने स्वामी की गुलामी नहीं छोड़ना चाहते हैं। बाप कर्जा नहीं चुका पाता तो बेटे को कर्जा देना पड़ता है। इस प्रकार ये जीवन भर स्वामीह की गुलामी करते हैं, जिसे ये “कबड़ी” कहते हैं। यसे लोग अपने को रानी दुर्गाबाई की सन्तान बतलाते हैं।

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Pankaja Singh

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