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नागाओं के जीवन का वर्णन | नागाओं के प्रगतिशील जीवन के लिए कुछ सुझाव

नागाओं के जीवन का वर्णन | नागाओं के प्रगतिशील जीवन के लिए कुछ सुझाव

नागाओं के जीवन का वर्णन

भारत भूमि का इतिहास काल से ही आदिवासियों का निवास स्थान रहा है। खास कर आसाम का पहाड़ी और उसके आस-पास के क्षेत्र भारत के आदिवासियों का एक प्रसिद्ध केन्द्र रहा है। भारत की उत्तरी-पूर्वी सीमा पर उत्तरी पूर्वी सीमान्त प्रदेश (MEFA) स्थित है, जिसका क्षेत्रफल लगभग 32,848 वर्गमील है तथा इस अर्द्ध-चन्द्राकार प्रदेश में लगभग दो दर्जन से अधिक आदिवासी जातियाँ निवास करती हैं जिनकी कुल संख्या लगभग 8 लाख है। इस 8 लाख की आबादी वाले क्षेत्र में नागा जातियों के व्यक्तियों की भी गणना है। नागा जाति के वितरण में तथा अन्य जातियों के वितरण में अन्तर केवल इतना है कि नागा आसाम की पहाड़ियों के अलावा मणिपुर प्रदेश तथा तिरुक डिवीजन में फैले हुए हैं। नागा जिनकी कुल संख्या केवल 5 लाख 80 हजार के लगभग है, उनमें से 4 लाख 25 हजार आसाम में 1 लाख 25 हजार मणिपुर में तथा 30 हजार तिरुक डिवीजन में फैले हुए हैं। इस जाति के थोड़े से गुमराह व ईसाई मिशनरी प्रेरित युवकों ने इस सीमान्त प्रदेश में भारत सरकार के सामने ऐसी समस्याएँ उपस्थित कर दी हैं जिसके फलस्वरूप आसाम के राज्यपाल को नागाओं का निवास स्थान अशान्त प्रदेश घोषित करना पड़ा। इसके बाद हमारी राष्ट्रीय सरकार ने यह देखा कि इससे भी काम नहीं चलता है तथा नागा प्रदेश में अशान्ति बढ़ती जा रही है तो केन्द्रीय सरकार ने भारतीय संविधान राज्य अधिनियम के अन्तर्गत 1 दिसम्बर, 1963 को नागाओं का एक अलग प्रदेश बनाकर नगालण्ड राज्य के नाम से भारत का 16वाँ राज्य घोषित किया। इस प्रान्त के अन्दर निवास करने वाले मुख्यतः नागा ही हैं।

धरातल-

वह प्रदेश जिसमें नागा निवास करते है, भारत के आसान प्रान्त में भारत सीमा पर स्थित है, जिसकी समुद्र तल इसे ऊँचाई लगभग 3000 फीट से 10,000 फीट तक है। यह प्रदेश वर्मा की सीमा से मिला हुआ है और भारत के अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा अधिक ऊबड़-खाबड़ है। जो भाग सबसे अधिक ऊँचा है उसकी ऊँचाई लगभग 930 फीट के है। उसके निकटवर्ती भाग में अनेक पर्वतीय ढाल एवं उठी-उठी पर्वत श्रेणियाँ मिलती है, जिसके परिणामस्वरूप आवागमन की सुविधाओं का अभाव है। मोटार मार्ग के लिए कुछ गिनी-चुनी सड़कं हैं तथा आम प्रयोग के  लिए पर्वतों को छीलकर कुछ पगडण्डियाँ बना ली गयी हैं। भार वाहन के लिए टट्टुओं का प्रयोग किया जाता है एवं आवश्यक सामग्री “विमान” द्वारा पहुँचाई जाती है। प्रदेश का इस प्रकार का ऊँचा-नीचा धरातल इस समुदाय के विकास में बहुत बड़ा रोड़ा रहा है।

जलवायु-

धरातल की भाँति यहाँ की जलवायु के दृष्टिकोण से प्राकृतिक वातावरण भी अति संजीव है। वैसे औसतन वर्षा व तापक्रम 600 80°C के मध्य रहता है। गर्मियों में कड़ाकें की गर्मी पड़ती है तथा ताप 100°C से भी अधिक हो जाता है। सर्दियों में तापक्रम एकदम गिर जाता है और अक्सर बर्फ पड़ने लगती है। ऊंची पर्वत श्रेणयों पर प्रायः सर्दियों में वर्षा बर्फ के रूप में होता है। वर्षा इन भागों में अधिक होती है और वर्षा का वार्शिक औसत 100 इंच से भी अधिक है। दक्षिणी पश्चिमी भागों में वर्षा अपेक्षाकृत अधिक होता है। कभी-कभी यह 200 इंच से भी अधिक हो जाती है। वर्ष में लगभग 5-6 माह वर्षा होती रहती है जो अधिकांशतः गर्मी की ऋतु में होती है। अधिक ताप तथा अधिक वर्षा अनेक प्रकार की कीड़े-मकोड़े मच्छरों को जन्म देती है जिसके फलस्वरूप इस भाग में अनेक बीमारियाँ फैल जाती हैं जिनमें काला बुखार, पेचिश, खाज, कोढ़ इत्यादि हैं। काला बुखार अक्सर नागाओं को घेरे रहता है। पेचिश भी बहुत होती है। 90 प्रतिशत से अधिक नागा इन बीमारियों के शिकार रहते हैं। इण्डियन स्टेट ऑफ सर्वे के आधार पर इनमें बीमारियों का कारण संक्रामक रोगों के प्रति लापरवाही एवं इनका गन्दा रहना है। भोजन की अव्यवस्था इन्हें पेचिश का रोगी बना देती है तथा जलवायु की दशाएँ इन्हें और भी बीमार करने में सहायता करती है।

वातावरण के प्रति मानव उत्तरदायित्व-

नागा लोग कद के छोटे होते हैं। पुरुषों का कद 5 फीट के आस-पास तथा स्त्रियों का कद 4-5 के आस-पास होता है। इनाक रंग पीला और चौड़े अथवा गोल चेहरे वाले होते हैं। इनके शरीर की बनावट ठोस होती है और इनके By Mussless बड़े मजबूत होते हैं। ये अपनी आकृति तथा व्यक्तित्व और प्रकृति के द्वारा तनिक भी प्रभावित नहीं करते हैं, ये वास्तव में प्रोफेसर रिजले के भारतीय जातियों के वर्गीकरण के आधार पर मंगोल जाति के हैं। तिब्बत की सीमा पर ये तिब्बत के निवासियों भारत सरकार ने नागाओं को विकास के मार्ग पर बढ़ाने के लिए कार्यक्रमों और योजनाएँ लागू कर और नागाओं के जीवन में विकास करने का प्रयत्न किया तो नागा लोगों ने इसे अपनी स्वतंत्रता में भारत सरकार का हस्तक्षेप समझा। नागाओं ने समझा कि भारत एक भिन्न देश है जो उनकी स्वतंत्रता का अन्त करना चाहता है। इसलिए नागाओं ने अपनी भारत सरकार के विरुद्ध विद्रोह की आवाज खड़ी कर दी। ईसाई मिशनरियों के बहकावे में नागाओं के नेता फिजो ने इस बात की घोषणा की कि नागा एक पृथक् देश है और नागा अपनी स्वतंत्रता के लिए भारत से जीवन भर लड़ते रहेंगे। इस समस्या को सुलझाने के लिए भारत सरकार ने 1950 में नागा राष्ट्रीय समिति के सभापति फिजो को आमंत्रित किया। काफी विचार-विमर्श करने के बाद कोई नतीजा नहीं निकला क्योंकि फिजो ने नागा प्रदेश को एक पृथक् देश बनाने की माँग की आर इस बात को पूरा न मानने पर फिजो ने नागाओं को भड़काया। नागा पिछड़ी जाति के रूढ़िवादी और अंधविश्वासी भी हैं, इसलिए उन्होंने फिजो के विचारों का आँख मींच कर समर्थन किया और इस प्रकार नागाओं की समस्या देश के लिए दिन-प्रतिदिन बढ़ती गयी।

नागाओं में न अधिक शिक्षा का प्रचार है और सिवाय अपने नेता की आज्ञाओं के पालन करने के न कोई निश्चित राजनैतिक विचार है। क्वीन्सान उपविभाग के नागा राजनीति में कुछ रुचि लेते हैं। उनकी गणना शिक्षित नागाओं में की जाती है। इस भाग में फैले हुए नागाओं की संख्या लगभग एक लाख है, जिनमें से लगभग 33 प्रतिशत अर्द्ध-शिक्षित हैं। नागाओं में भी  अनेक उपजातियाँ हैं जिनमें आपसी रीति-रिवाजों में भी थोड़ा-सा अन्तर है। इन जातियों में कभी-कभी युद्ध भी हो जाया करते हैं और दुश्मन का सिर काट कर लाना वीरता की निशानी मानी जाती हैं। प्रत्येक नागा अधिक से अधिक नरमुण्ड एकत्रित करने की कोशिया करता है और उसको पूरा करने का प्रयत्न करता है। देवी-देवताओं को प्रसन्न करने के लिए, आत्माओं की शान्ति के लिए ये नर बलि चढ़ाते हैं।

नागा लोग कपड़ों का बहुत कम प्रयोग करते हैं और अधिकांशतः इनकी पोशाक ऐसी होती है जो बहादुरी का प्रदर्शन करती है। सींगों को गले में बाँधना, गले में नरमुण्डों की माला लटकाना, कमर के हिस्से में खाल लटका कर उसमें दाँतों को लगाना तथा सिर पर सींगों का ताज पहनाना इन लोगों का सामाजिक कार्य होता है। पहले इन जातियों के लोगों में विवाह तथा मिलना-जुलना बहुत कम था, लेकिन अब अन्य जातियों के सम्पर्क में आ जाने से इनमें विवाह आदि प्रारम्भ हो गये हैं। विवाह और उत्सवों पर ये सजावट करते हैं, नाच-गाना भी होता है और खाना-पीना भी चलता है। दूल्हा-दुल्हन दोनों मोर पंखों का बना हुआ आभूषण ग्रहण करते हैं। मोर पंखों का प्रयोग करना इनके यहाँ शुभ कार्य समझा जाता है। ऐसे सांस्कृतिक उत्सवों पर सामूहिक भोज तथा जश्न मनाया जाता है। इन सबकी देखकर नागाओं की वास्तविक स्थिति की झलक स्पष्ट दिखाई देती है। नगालैण्ड में कुछ पशु मिलते हैं, लेकिन फिर भी ये उन पशुओं का लाभ नहीं उठाते। कुछ नागा भैंस पालते हैं जो केवल सामान होती है क्योंकि दूध दुहना इनको आता नहीं है अथवा दूध दुहना ये अपने स्तर से नीचा काम समझते हैं।

प्रथम पंचवर्षीय योजना में विकास-

मैदान में पाई जाने वाली जातियों से नागा जाति की समस्याएँ भिन्न हैं क्योंकि मैदान में निवास करने वाले व्यक्तियों को कृषि एवं अन्य सभ्य कार्य जीवन निर्वाह के लिए आसानी से मिल जाते हैं, लेकिन नागा आज भी अपने आहार के लिए अधिकांशतः शिकार पर निर्भर हैं। नागा क्षेत्र में कुछ अनाज और फलों की खेती का ध्यान सभ्य जातियों के सम्पर्क में आने से हुआ। भारत सरकार ने प्रथम पंचवर्षीय योजनाओं में इनके विकास के लिये अनेक कार्य किये। सबसे प्रथम कार्य इनके भोजन में माँस की मात्रा को कम करना था, जिससे इनमें हिंसा की प्रवृत्ति कम हो। इसके लिये अनेक स्थानों पर खेती का प्रचार किया और प्रति एकड़ पैदावार बढ़ाने के लिए फसलों की किस्मों में वृद्धि की और अनेक प्रकार के सुधार किये गये। चावल एवं चाय की खेती पर भी अधिक ध्यान दिया गया। अच्छे किस्म के बीज भी इन्हें दिये गये। कृषि पर इस प्रकार से 2.5 करोड़ रुपया व्यय किया गया। ब्रह्मपुत्र नदी की घाटी के समीप “पासी घाट” नामक स्थान पर जिस पर 1947 में कृषि फार्म तथा शिक्षा केन्द्र खोला गया, नागा विकास केन्द्र की स्थापना की गयी और इस केन्द्र में नागाओं के जीवन में अनेक प्रकार के सुधार लाने के प्रयत्न किये गये। यद्यपि नागा आदिवासी एवं अन्धविश्वासी हैं, लेकिन फिर भी कुछ नागाओं का खेती की ओर ध्यान आकर्षित हुआ। इसका थोड़ा असर नागाओं की हिंसातमक प्रवृत्ति पर अवश्य हुआ।

द्वितीय पंचवर्षीय योजना में विकास-

द्वितीय पंचवर्षीय योजना के अन्तर्गत नागा क्षेत्र की ओर विशेष ध्यान दिया गया। इस योजना के अन्तर्गत आसाम के प्रदेशों में 25-30 गाँवों के एक-एक विकास केन्द्र बनाये गये। खेती में अनेक प्रकार के सुधार किये गये। अच्छा बीज, पर्याप्त मात्रा में खाद इन सभी बातों पर ध्यान दिया। खेती के उत्पादन पर अनेक प्रकार के प्रयास किये गये। खेतों का उत्पादन बढ़ाने और खेती का विस्तार करने के लिए एक करोड़ 20 लाख की लागत की योजना के अन्तर्गत 8 सरकारी फार्म खोले गये और नागाओं की खेती के लिए धन दिया गया। इस खेती के विकास में नागा लोगों ने कुछ भाग अवश्य लिया एवं रुचि  दिखलाई। खेती फार्म के अलावा सरकार ने इनसे जनसम्पर्क स्थापित करने के लिए यातायात साधनों का विकास और शिक्षा का प्रसार किया। साथ ही साथ स्वास्थ्य रक्षा, पानी की सुविधा, शिक्षा एवं घरेलू उद्योग-धन्धों पर अधिक ध्यान दिया गया। इस द्वितीय पंचवर्षीय योजना में 1360 मील लम्बी सड़क बनायी गई, जिसमें 450 मील लम्बी पककी सड़क बनायी गई। शेष सड़कें केवल पहाड़ी भागों को काटकर केवल सामान ढोने को बनाई गई। पी. डब्ल्यू. डी. एवं एम. ई. एस. के द्वारा अनेक पगडन्डियाँ बनाई गई, जिससे आन्तरिक क्षेत्र में निवास करने वाले नागाओं से सम्बन्ध स्थापित हो सके। इसी योजना में नागा लोगों की भाषा को अक्षर का रूप देकर शिक्षा के लिये पाठ्य- पुस्तक बनाई गयीं और हिन्दी एवं उनकी भाषा के माध्यम से प्रचार किया गया।”

तृतीय पंचवर्षीय योजना में विकास-

प्रथम एवं द्वितीय पंचवर्षीय योजनाओं के तुलनातमक रूप से भारत सरकार ने नागाओं में मूल परिवर्तन लाने के लिए कई गुने कार्य किये। इस योजना का उद्देश्य यद्यपि भारत में उद्योग-धंधों का विकास, रोजगार, कृषि एवं सिंचाई के विकास तथा बढ़ती हुई जनसंख्या की दर को कम करना इत्यादि थे, लेकिन फिर भी भारत में मिलने वाली अनेक जातियों और पिछड़े हुए वर्गों पर भी अधिक ध्यान दिया गया था। नागा क्षेत्र में सबसे बड़ा कार्य इस योजना में यह हुआ कि 1 दिसम्बर, 1963 की भारत सरकार ने नगालैण्ड प्रदेश का गठन किया। यह नवीन नगालैण्ड भारत का 16वाँ प्रान्त है, जिसका क्षेत्रफल लगभग 6366 वर्गमील है और इस प्रान्त की जनसंख्या 3,70,000 है। जनसंख्या का प्रति वर्ग मील घनत्व लगभग 70 व्यक्ति है। इस नगालैण्ड प्रान्त में 860 गाँव हैं जिसकी राजधानी कोहिमा है। नगालैण्ड के बनाये जाने का मुख्य उद्देश्य नागाओं के जीवन में विकास और प्रगति लाना था। शिक्षा के क्षेत्र में अनेक विकास किये गये और अकेले नगालैण्ड में ही लगभग 716 शिक्षा केन्द्र खोले गये जिनमें 2 टीचर्स कॉलेज, 2 डिग्री कॉलेज, 18 इण्टरमीडिएट कॉलेज, 28 हाईस्कूल तथा शेष जूनियर व प्राथमिक पाठशालाएं हैं, जिनमें लगभग 70 हजार विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। शिक्षा के इस प्रचार से नागा एवं नागा बच्चों में काफी विकास हुआ है। शिक्षा के साथ-साथ यातायात के साधनों में भी बड़ी तीव्रता से विकास किया गया और अब भी विकास वड़ी तेजी से जारी है।

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Pankaja Singh

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