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आधुनिक काल में राष्ट्रीय चेतना का उदय और विकास | आधुनिक काल में राष्ट्रीय चेतना के उदय और विकास का संक्षिप्त परिचय

आधुनिक काल में राष्ट्रीय चेतना का उदय और विकास | आधुनिक काल में राष्ट्रीय चेतना के उदय और विकास का संक्षिप्त परिचय

आधुनिक काल में राष्ट्रीय चेतना का उदय और विकास

राष्ट्रीय भावना की दृष्टि से आधुनिक काल का हिन्दी काव्य अत्यधिक महत्वपूर्ण है। इस काल के प्रायः सभी प्रमुख कवियों ने राष्ट्रीय भावनाओं को वाणी प्रदान की है। भारतेन्दुजी भारत के उद्धार के लिए भगवान् से प्रार्थना करते हुए लिखते हैं-

डूबत भारत नाथ बेगि जागो अब जागो।

आलम उव एहि इहन हेतु चहुँ दिशि सौं लागों।।

द्विवेदीयुगीन हिन्दी काव्य राष्ट्रीय भावना की दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। छायावादी एवं प्रगतिवादी काव्य में भी राष्ट्रीय चेतना का प्रभाव देखने को मिलता है। चीनी एवं पाकिस्तानी आक्रमण ने भी राष्ट्रीय भावना को जागृत करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। आधुनिककालीन राष्ट्रवादी कविताओं को तीन रूपों में देखा जा सकता है-

अ. अतीत की गौरवगाथा के चित्रण के रूप में,

ब. वर्तमान काल की दुर्दशा के चित्रण के रूप में और

स. राष्ट्र के भावी रूप के चित्रण के रूप में।

अ. अतीत की गौरवगाथा के चित्रण के रूप में-

इस रूप में कवियों का देश-प्रेम दर्शनीय है। उनकी कविताओं में देश-प्रेम का अम्बुधि लहराता है बदरी नारायण ‘प्रेमधन’ के शब्दों में-

वह मनुष्य कहिबे के योग न कबहूँ नीचनर।

जन्मभूमि निज नेह नाहिं जाके उर अन्तर।।

यद्यपि संसार सुखद पल विविध लखाहीं।

जन्मभूमि की पै छवि मन ते बिसरत नाहीं॥

भारत भारती में गुप्तजी अतीत की प्रशंसा करते लिखते हैं-

कौन थे क्या हो गये हैं और क्या होंगे अभी?

आओ विचारें आज मिलकर ये समस्यायें सभी॥

दूसरे स्थल पर वे लिखते हैं-

देखा हमारा विश्व में कोई नहीं अपमान था।

नर देव थे हम और भारत देवलोक समान था।

अतीत का गौरव गाथा का गान करने वाले कवियों में मैथिलीशरण, गुप्त, श्यामनारायण पाण्डेय, सुभद्रा कुमारी चौहान तथा हरिऔध आदि प्रधान हैं। अपने देश के गौरव एवं सम्मान की रक्षा के लिए प्राणोत्सर्ग कर देना श्री माखनलाल चतुर्वेदी श्रेयस्कर मानते हैं-

बलि होने की परवाह नहीं; मै हूँ कष्टों का राज्य रहे।

मै जीता जाता हूँ, माता के हाथ स्वराज्य रहे।

इसी प्रकार देश-रक्षा में मर-मिटने का सन्देश देती हुई सुभद्रा कुमारी चौहान लिखती हैं-

आज तुम्हारी लाली से माँ मस्तक पर हो लाली।

काली जंजीरे टूटें काली यमुना में हो लाली॥

जो परतन्त्र होने को है। पावन दुलार उन हाथों का।

स्वीकृत है माँ का वेदी पर पुरस्कार उन हाथों का॥

ब. वर्तमान दुर्दशा के चित्रण के रूप में-

इस युग में देश परतन्त्र था। भारत माता परतन्त्रता की बेड़ियों में जकड़ी हुई अपनी बेबसी पर आँसू बहा रही थी। ऐसे समय देश के कवियों ने देश की वर्तमान दुर्दशा के चित्रण द्वारा भारतीयों को सचेत एवं सजग होने के लिए सन्देश दिया है। प्रताप नारायण मिश्र के शब्दों में-

महँगी और टिमस के मारे हमहिं क्षुधा पीड़ित तन छाम।

साग-पात लौ मिलै न जी भर लेवी वृथा दूध का नाम॥

तुमहिं कहा प्यावै जब हमरो करत रहत गोवंश तमाम।

केवल सुमुखी अलक उह मा लहि नाथ देवतः तृप्यन्ताम॥

इन दुर्दशाओं के चित्रण के अनन्तर कति जनमानक को जागृत करने का प्रयास करता है। यह सबको जगाकर क्रान्ति की ओर उन्मुख करना चाहता है ताकि सभी देश रक्षा के लिए तत्पर हो जायें और उखाड़ फेके गुलामी की बेड़ियों को। श्री मोहनलाल द्विवेदी सबको जगाते हुए कहते हैं-

जागो हिन्दू मुगल मरहठे, जागो मेरे भारतवासी।

जननी की जंजीरे बजतीं,जगो रहे कड़ियों के छाले॥

सुना रही हूँ तुम्हें भैरवी, जागो मेरे सोने वाले॥

छायावादी कवि ‘प्रसाद’ भी मातृभूमि पर सर्वस्व निछावर करने का उद्घोष करते हैं।

सम्प्रति ‘दिनकर’ के काव्य में राष्ट्रीय भावना की जो लहर दिखायी देती है वह कदाचित् अन्यत्र नहीं मिलती। पाकिस्तानी आक्रमण के समय उन्होंने अहिंसावादी भारतीय जनता के मनोभावों को व्यक्त करते हुए लिखा है-

जिये तो सदा उसी के लिए, यही अभिमान रहे यह हर्ष।

निछावर कर दे हम सर्वस्व, हमारा प्यारा भारतवर्ष॥

ओ गाँधी के शान्त सदन में आग जलाने वाले।

मानवता के बधिक आसुरी महिमा के मतवाले॥

वेसे तो मन मार शील से हम विनम्र जीते हैं।

आततायियों को शोणित भी लेकिन हम पीते हैं।

स. राष्ट्र के भावी रूप का चित्रण-

हिन्दी के राष्ट्रवादी कवियों ने भारत के भावी स्वरूप की कल्पना की है। गुप्त जी भारत के भावी स्वरूप की अवतारणा करते हुए कहते हैं कि-

विद्या कला कौशल में सबका अटल अनुराग हो,

उद्योग का उन्माद हो आलस्य अब का भाग हो।

सुख और दुःख में एक सा सब भाइयों का भाग हो,

अन्तःकरण में गूंजता बस राष्ट्रीयता का राग हो।

निष्कर्ष :

उपर्युक्त विवेचना के आधार पर कहा जा सकता है कि हिन्दी साहित्य में आदिकाल से लेकर आज तक राष्ट्रीय भावना की अजस्र धारा प्रवाहित होती रही है। यद्यपि कालानुसार उसके स्वरूप में परिवर्तन होता रहा है तथापि हिन्दी कवियों ने अपनी रचनाओं में बराबर अपनी राष्ट्रीय भावनाओं का परिचय दिया है और देश की एकता, उसकी रक्षा, उसकी समृद्धि के लिए बराबर देशवासियों को प्रेरणा दी है। उन्हें उनके कर्तव्य का बोध कराया है। उनमें वीरता, साहस एवं त्याग का संचार करके उन्हें देश की आन पर, उसकी वान पर और उसकी शान पर कुर्बान होने को प्रेरित किया है। साथ ही इस बात का उद्घोष भी कर दिया है कि जो मातृभूमि के लिए, अपनी जन्मभूमि के लिए प्राणोत्सर्ग नहीं कर सकते वे पशु हैं। उनका जीवन निरर्थक है-

जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है।

वह नर नहीं नर-पशु निरा और मृतक समान है।।

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Pankaja Singh

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