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राम भक्ति काव्य परंपरा एवं कृष्ण भक्ति काव्य परंपरा की प्रमुख विशेषताएँ | भक्तिकालीन निर्गुण और सगुण काव्यधाराओं में समान्ता एवं असमानता | रामकाव्य-धारा की समान्य विशेषताएँ | कृष्ण-भक्ति शाखा की सामान्य विशेषताएँ

राम भक्ति काव्य परंपरा एवं कृष्ण भक्ति काव्य परंपरा की प्रमुख विशेषताएँ | भक्तिकालीन निर्गुण और सगुण काव्यधाराओं में समान्ता एवं असमानता | रामकाव्य-धारा की समान्य विशेषताएँ | कृष्ण-भक्ति शाखा की सामान्य विशेषताएँ

राम भक्ति काव्य परंपरा एवं कृष्ण भक्ति काव्य परंपरा की प्रमुख विशेषताएँ

हिंदी साहित्य के पूर्व मध्यकाल में भक्ति की जो पावन गंगा प्रवाहित हुई उसने जन- जन के हृदय को अपूर्व शीतलता और हिंदू जाति को नवीन जीवन-शक्ति प्रदान की। निगुर्ण की अपेक्षा इसकी सगुण भक्ति-धारा जनमन के अधिक अनुकूल पड़ी। सगुण ईश्वरोपासना के आधार बने- राम और कृष्ण। राम को आराध्य मानकर तुलसी आदि भक्त कवियों ने जिस लोक-मंगलकारी काव्य की रचना की, वह रामभक्ति साहित्य के नाम से माना जाता है।

रामकाव्य-धारा की समान्य विशेषताएँ

इस काव्य-धारा की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

(1) राम के चरित का गान- समस्त राम-भक्त कवियों ने अपने आराध्य राम के महिमामय चरित्र का भावपूर्ण गायन किया। राम के शील और सौंदर्य से पूर्व चरित के गायन को ही तुलसी जीवन का परम फल मानते हैं-

“देह धरे कर यह फलु भाई। भजिय राम सब काम बिहाई।”

(2) भक्ति-भावना- राम-भक्त कवियों ने राम के प्रति अपनी अनन्य भक्ति-भावना को व्यक्त किया है और जनम जन्मांतर तक इसी भक्ति की प्राप्ति की कामना व्यक्त की है ‘चातक’ इस भक्ति का आदर्श प्रतीक है।

(3) मर्यादित जीवन की प्रतिष्ठा- ‘मर्यादा’ रामभक्ति’ साहित्य की एक अन्य महत्त्वपूर्ण विशेषता है। राम स्वयं मर्यादा पुरूषोत्तम हैं।

(4) लोकमंगल का संदेश- राम-भक्त कवियों ने समाज को, लोक को अपनी दृष्टि से कभी ओझल नहीं देने दिया। उनकी स्पष्ट घोषणा हैं-

‘परहित सरिस धर्म नहिं भाई। परपीड़ा सम नहिं अधमाई।”

(5) समन्वय की भावना- भारतीय संस्कृति की प्रधान विशेषता समन्वय की भावना है। इसका पूर्ण उत्कर्ष राम-काव्य, विशेषतः तुलसी साहित्य में मिलता है। निगुर्ण सगुण का, भक्ति, ज्ञान और कर्म का, शैव और वैष्णव भक्ति का, शक्ति शील और सौंदर्य का, जीवन के विविध पक्षों का तथा विविध काव्य-शैलियों का समन्वय तुलसी साहित्य में देखा जा सकता है।

(6) मनोरम प्रकृति का वर्णन- राम काव्य में प्रकृति के भी नाना मनोहर चित्र देखने को मिलते हैं। आलंबन, उद्दीपन, उपदेशिका आदि विविध रूपों में प्रकृति का चित्रण किया गया है।

(7) शांत रस की प्रधानता- यों तो राम-काव्य में शृंगार, वीर, रौद्र, करूण आदि अन्य रसों का भी अच्छा उत्कर्ष हुआ है, तथापि वे राम कथा के प्रसंगवश शांत रस के विशाल वट की छाया में पल्लवित हुए हैं। इसकाव्यधारा का प्रधान रस शांत ही हैं।

(8) काव्य रूपों की विविधता- राम भक्ति साहित्य का सृजन दृश्य-काव्य (नाटक) और श्रव्य-काव्य (अन्य काव्य रूप) दोनों ही रूपों में हुआ। श्रव्य-काव्य में प्रबंध (रामचरित मानस) और मुक्तक (विनय-पत्रिका) दोनों ही प्रकार की काव्य-शैलियों का प्रयोग हुआ है।

(9) छंदों का बाहुल्य- इन कवियों ने दोहा, चौपाई, सोरठा, कवित्त, सर्वया, बरवै, छप्पय, कुंडलियाँ, संस्कृत के वर्णवृत्त आदि विविध प्रकार के छंदों का प्रयोग कर काव्य को समृद्ध किया है।

(10) सुष्ठ अलंकार योजना- प्रायः सभी प्रकार के शब्दालंकारों और अर्थालंकारों का अत्यंत स्वाभाविक और भाव-सौंदर्य वृद्धि करने वाला सफल प्रयोग इस धारा की रचनाओं में दृष्टव्य है।

(11) बज एवं अवधी का प्रयोग- इन कवियों की भाषा प्रधानतः अवधी (रामचरित मानस) रही है, पर ब्रज भाषा का (विनय पत्रिका) समान अभिरूचि और अधिकार से प्रयोग करके उन्होंने अपनी अद्भुत भाषा-सामर्थ्य का परिचय दिया है।

भक्तिकाल की कृष्ण-भक्ति शाखा

भगवान् के लोकरंजक स्वरूप की प्रतिष्ठा करने का श्रेय भक्तिकाल की कृष्ण-भक्ति शाखा को प्राप्त है। श्रीमद्भागवत का आधार लेकर श्रीकृष्ण की विविध लीलाओं का वर्णन करना इस काव्यधारा का प्रधान विषय रहा है। सूरदास इस शाखा के प्रधान कवि हैं।

कृष्ण-भक्ति शाखा की सामान्य विशेषताएँ

इस धारा की सामान्य विशेषताएँ इस प्रकार हैं-

(1) श्रीकृष्ण आराध्य देव- इस शाखा के कवियों के आराध्य भगवान विष्णु के षोडश- कला-संपन्न अवतार श्रीकृष्ण है। वह भक्तों को सुख देने और नाना प्रकार की मनोहारिणी लीलाओं से अपने आराधकों को आनंदित करने के लिए अवतार ग्रहण करते हैं। इन कवियों ने श्रीकृष्ण के मधुर-स्वरूप की उपासना को ही प्रधानता दी है।

(2) कृष्ण के मनोरंजक रूप की आराधना- श्रीकृष्ण लीला-पुरूषोत्तम हैं। उनकी मनोहारिणी सरस क्रीड़ाएँ और लीलाएँ ही भक्त जनों को भाती हैं। भगवान श्रीराम की भाँति लोग रक्षा करने वाला स्वरूप कृष्ण भक्तों को कम भाया है। सुदर्शन चक्रधारी कृष्ण की अपेक्षा मुरली मोहन की मूर्ति ही कृष्ण भक्तों के भाव-जगत् में निवास करती है। नंद के आंगन में खेलने वाले दधि-माखन लूटनेवाले, गोचारण करने वाले गोपियों के साथ रास-विहार करनेवाले श्रीकृष्ण की छवियों का अंकन इस धारा के कवियों ने किया है।

(3) सख्य भाव की भक्ति- राम भक्तों के विपरीत कृष्ण भक्त अपने आराध्य को अपना नित्य सहचर मानते हैं। मित्रता के अधिकार से यदा-कदा वह टेढ़ी बात भी कह जाते हैं। उनकी अंतरंग लीलाओं का वर्णन भी वे सखा-भाव से करते हैं। दीनता, दस्य और, याचना इन कवियों को अधिक नहीं सुहाती।

(4) बाल-वर्णन को महत्त्व- पुष्टि-संप्रदाय से प्रभावित होने के कारण भगवान् के बाल- स्वरूप की उपासना को इस काव्यधारा में विशेष महत्व प्राप्त हुआ है। ‘सूर’ का वाल-वर्णन तो अपना सानी नहीं रखता। बाल-मनोविज्ञान के सजीव चित्रण और सूक्ष्म निरीक्षण ने सूरदास के बाललीला वर्णन को अद्वितीय बना दिया है।

(5) भ्रमरगीत परंपरा- भ्रमरगीत की रचना इस काव्य की एक निजी विशेषता है। भौरे को लक्ष्य बनाकर गोपियों के माध्यम से बड़ी मधुर और मार्मिक विरह-उक्तियाँ इन कवियों ने प्रस्तुत की हैं। सूरदास का ‘भ्रमरगीत’ तो सर्व-प्रसिद्ध है। इनके अतिरिक्त नंददास आदि ने भी इस परंपराको विकसित किया है।

(6) गेय पद्धति- इस काव्य शाख की सारी रचनाएँ गेय गाये जाने योग्य हैं, राग, रागिनियों में निबद्ध हैं और संगीतज्ञों द्वारा बहुधा अपनी स्वर-लहरी का माध्यम बनायी जाती हैं।

(7) रस योजना- इस काव्यधारा के प्रधान रस दो हैं- वात्सल्य और शृङ्गार । कृष्ण की बाल-लीलाओं के वर्णन में वात्सल्य रस की अति सफल व्यंजन हुई है। सूरदास’ तो वात्सल्य के सम्राट की पदवी पा गये हैं। श्रृंगार के संयोग और वियोग दोनों ही पक्ष पूर्ण सौंदर्य से इस काव्य में उपस्थित हैं। गोपियों का विरह-वर्णन तो हिंदी-साहित्य की अमूल्य निधि है। इसके अतिरिक्त शांतरस भी विनय आदि की पद रचनाओं में प्राप्त होता है।

(8) छंद योजना- इस काव्य का प्रतिनिधि छंद तो ‘पद’ है। इसके अतिरक्त दोहा,, चौपाई, सवैया, कवित्त आदि छंदों का भी प्रयोग सफलता से हुआ है।

(9) अलंकार- शब्दालंकार और अर्थालकार दोनों ही की मनोहारिणी योजना कृष्णकाव्य में प्राप्त होती है। उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, संदेह और रूपकातिशयोक्ति कृष्णभक्त कवियों के प्रिय अलंकार हैं।

(10) भाषा- कृष्णभक्त कवियों ने अपनी भक्ति-भावना को मुखरित करने का श्रेय ब्रजभाषा को ही प्रदान किया है। ब्रज बोली को भाषा का रूप देने का श्रेय कृष्ण काव्य के शिल्पियों को ही जाता है।

(11) शैली- कृष्णभक्त की रचना प्रधानता मुक्तक शैली में हुई है। गीति शैली का चरम विकास इस काव्य में प्राप्त होता है। भावात्मक, चित्रोपमता, आलंकारिता और वर्णन-विस्तार आदि काव्य की अन्य शैलीगत विशेषताएँ हैं।

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Pankaja Singh

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