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हिन्दी नाटक का उद्भव | हिन्दी नाटक का विकास | हिन्दी नाटक के विकास में भारतेन्दु अथवा प्रसाद के योगदान

हिन्दी नाटक का उद्भव | हिन्दी नाटक का विकास | हिन्दी नाटक के विकास में भारतेन्दु अथवा प्रसाद के योगदान

हिन्दी नाटक का उद्भव एवं विकास

सामान्यतः निबन्ध के लिए ‘लेख’ एवं ‘प्रबन्ध’ दो शब्दों का प्रयोग किया जाता है। निबन्ध एवं प्रबन्ध दोनों ही शब्द संस्कृत वाङ्मय के हैं और इनका प्रयोग काव्य के दो रूपों के लिए होता है। प्रवन्ध की अपेक्षा निबन्ध का क्षेत्र छोटा है, संकुचित है, सीमित है। लेख शब्द लिखे हुए का द्योतक है।

  1. हिन्दी निबन्ध का उद्भव-

हिन्दी निबन्ध उद्भव के विषय में मतैक्य नहीं। डॉ0 वार्ष्णेय यदि पं. बालकृष्ण भट्ट को हिन्दी का प्रथम निबन्धकार घोषित करते हैं तो विश्वनाथ जी सदासुखलाल को हिन्दी का प्रथम निबन्धकार स्वीकार करते हैं। किन्तु आचार्य शुक्ल ने इन दोनों से भिन्न भारतेन्दु हरिश्चन्द को हिन्दी का प्रथम निबन्धकार मानते हैं। यहाँ यह भी स्मरणीय है कि डॉ0 रामचन्द्र तिवारी व्यक्ति विशेष को हिन्दी निबन्ध का जन्मदाता नहीं मानते वरन् भारतेन्दु युग को इस विधा के सूत्रपात का श्रेय प्रदान करते हैं।

  1. विकास-

इस प्रकार कहा जा सकता है कि जिस प्रकार हिन्दी गद्य का विकास भारतेन्दु युग से हुआ उसी प्रकार निबन्ध लेखन की परम्परा का श्रीगणेश उन्हीं के युग से हुआ। अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से हिन्दी निबन्ध साहित्य के विकास को हम तीन कालों में विभक्त कर सकते हैं।

(अ) भारतेन्दु काल- हिन्दी साहित्य की अन्य विधाओं की भाँति निबन्ध का सूत्रपात भीभारतेन्दु हरिश्चन्द्र के हाथों हुआ। उन्होंने विभिन्न प्रकार की पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से अपने युग के अन्य साहित्यकारों को निबन्ध लिखने को प्रेरित किया। डॉ0 रामविलास शर्मा के मतानुसार भारतेन्दु युग में पत्र-साहित्य ने जो उन्नति की उससे निबन्ध रचना को विशेष प्रोत्साहन मिला। इसी प्रकार पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से भारतेन्दु जी ने साहित्यकारों का एक विशिष्ट मण्डल तैयार किया। ‘खुशी’ ‘सूर्योदय’, एक अद्भुत अपूर्व स्वप्र’ आदि भारतेन्दु जी के प्रसिद्ध निबन्ध हैं। उनके मण्डल के साहित्यकारों में पा) प्रताप नारायण मिश्र, बालकृष्ण भट्ट और चौधरी बदरीनारायण के नाम प्रमुख हैं।

प. प्रताप नारायण मिश्र ने विभिन्न प्रकार के निबन्ध लिखे। वे मनामौजी एवं विनोदप्रिय थे। अतः उनके निबन्धों में हास्य-व्यंग्य और विनोद प्रियता सर्वत्र परिलक्षित होती है। इस युग के दूसरे महान् निबन्धकार श्री बालकृष्ण भट्ट हैं। विषय विवेचन, भाषा और साहित्यिकता की दृष्टि से इनके निबन्ध अत्यधिक सफल हैं, आँख, कान, नाक, कवि चितेरे की डाँडा-मेड़ी आदि इनके प्रसिद्ध निबन्ध हैं। चौधरी बदरीनारायण ‘प्रेमधन’ भारतेन्दु युग के तीसरे प्रमुख कलाकार हैं। यद्यपि आपने बहुत कम निबन्ध लिखे हैं फिर भी वे परिष्कृत भाषा और विषय के विवेचन की दृष्टि से पूर्ण है। इनकी भाषा का नमूना देखिये- ‘दोनों दलों की दलादली में दलपति का विचार भी दल-दल में फंसा रह गया।’

भारतेन्दु युग के निबन्धों में समाज-सुधार और राजनीतिक चेतना को ही अधिक प्रश्रय मिला। इस युग के अन्य निबन्धकारों में बाबू सीताराम, ठाकुर जगमोहन सिंह, लाला श्रीनिवास, अम्बिकादत्त व्यास और पं0 राधाचरण गोस्वामी के नाम उद्धृत किये जा सकते हैं। वास्तव में यह युग निबन्धों के आविर्भाव का युग था।

(ब) द्विवेदी काल- यह काल निबन्ध साहित्य के विकास का काल था। द्विवेदी जी का आश्रय पाकर निबन्ध साहित्य विकसित होने लगा था। उसकी सुरभि से आकर्षित होकर अन्य साहित्यकारों ने इस क्षेत्र में प्रवेश किया, द्विवेदी जी ने हिन्दी साहित्य में अनुवाद कर अन्य निबन्धकारों का मार्गदर्शन किया। ‘सरस्वती पत्रिका के सम्पादन काल में उन्होंने अन्य साहित्यकारों के निबन्ध प्रकाशित कर निबन्ध साहित्य के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। ‘रसज्ञ रञ्जन’, ‘साहित्य सन्दर्भ’ और ‘साहित्य सीकर’ आदि उनके निबन्ध संग्रह हैं। इनके निबन्ध विचारात्मक हैं।

इस काल के अन्य निबन्धकारों में पं. माधव प्रसाद मिश्र, बाबू गोपालराम गहमरी, बालमुकुन्द गुप्त, चन्द्रधर शर्मा गुलेरी, अध्यापक पूर्णसिंह, बाबू गुलाबराय और डॉ0 श्यामसुन्दरदास का नाम आदर से लिया जा सकता है।

संक्षेप में कहा जाता है कि इतना होने पर भी द्विवेदी युगीन निबन्ध सात्यि के कुछ अभाव खटकते अवश्य हैं जिनका उल्लेख करना आवश्यक है। इस समय ललित निबन्धों का एक प्रकार से अभाव ही रहा। कलात्मक निबन्धों की रचना की ओर लेखकों का ध्यान अधिक न जा सका। परन्तु जो कुछ भी कलात्मक साहित्य आज हमें प्राप्त हो रहा है, उनका बीजवपन द्विवेदी जी के समय में ही हो चुका था। दूसरे इसे युग के निबन्धों में नरीसता आ गयी है और पाठक का जी ऊबने लगता है। इस अभाव के होते हुए भी द्विवेदी युग का निबन्ध साहित्य अपने प्रतिश्ठित आसन से गिरा नहीं सकता। हिन्दी साहित्य के विस्तार के साथ-साथ भाषा की अभिव्यंजना शक्ति का जो विकास हुआ है उसका बहुत कुछ श्रेय इस युग के निबन्ध साहित्य को ही देना पड़ेगा। द्विवेदी युगीन अन्य निबन्धकारों में कृष्णबिहारी मिश्र, गंगा प्रसाद अग्निहोत्री, रामदास गौड़, गौरीशंकर, हीराचन्द्र ओझा, मनन द्विवेदी और बैंकटेश नारायण तिवारी प्रमुख हैं।

(स) वर्तमान काल- वर्तमान काल निबन्ध की प्रौढ़ता का काल है। आज हिन्दी में विभिन्न विषयों पर विभिन्न शैलियों में लिखे गये निबन्ध प्राप्त हैं। इस काल का प्रारम्भ आचार्य रामचन्द्र शुक्ल से होता है। शुक्ल जी ने सर्वप्रथम साहित्यिक और मनोवैज्ञानिक निबन्ध लिखकर वर्तमान काल के अन्य लेखकों का मार्ग प्रशस्त किया। इनके निबन्धों की भाषा शुद्ध, उच्च और प्रभावशाली है। गम्भीरता एवं समास शैली इनके निबन्धों की विशेषता है।

शुक्लजी ने ‘करुणा’, क्रोध, लोभ, और नीति आदि मानसिक आवेगों पर उच्चकोटि के विश्लेणात्मक निबन्ध लिखे हैं, शब्द-शक्तियों पर उनका पूर्ण अधिकार है। उनके निबन्ध विचारात्मक, आत्मव्यंजक, वर्णनात्मक तथा कलात्मक हैं। ‘चिन्तामणि’ (भाग एक और दो) आपके निबन्धों के संग्रह हैं।

इस काल के अन्य निबन्धकारों में प्रेमचन्द, पद्मसिंह, प्रसाद, निराला, बख्शी, हजारीप्रसाद द्विवेदी, जैनेन्द्रकुमार, डॉ. धीरेन्द्र वर्मा, डॉ. नगेन्द्र, डॉ. रामकुमार वर्मा, सियारामशरण गुप्त, डॉ. नन्ददुलारे वाजपेयी, इलाचन्द जोशी, आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र, शान्तिप्रिय द्विवोदी, अज्ञेय, वासुदेवशरण अग्रवाल, विनयमोन शर्मा शिवदान सिंह आदि हैं। प्रसाद जी के निबन्ध विचारपूर्ण और भावात्मक हैं, क्योंकि पहले वे कवि हैं, बाद में निबन्धकार। उनके निबन्धों का संग्रह ‘काव्य और कला तथा अन्य निबन्ध’ नाम से प्रकाशित हुआ है।

प्रेमचन्द जी उपन्यासकार, कहानीकार और निबन्धकार है। उनके निबन्धों का संग्रह कुछ विचार नाम से प्रकाशित हुआ है। इस प्रकार आज हिन्दी का निबन्ध साहित्य अपनी व्यापकता का परिचायक है जो इसके उज्जवल भविष्य का पूर्वाभास है।

हिन्दी नाटकों की परम्परा का मूल स्रोत जन-नाटक ही है। डॉ. ओझा को स्पष्ट मान्यता है कि ‘हिन्दी नाटक की परम्परा का मूल स्रोत यह जन-नाटक ही है जो स्वप्र आदि नाम से अपने प्राचीन रूप में अब तक विद्यमान हैं। क्रमशः इन जन नाटकों की एक शाखा ने विकसित होकर साहित्यिक रूप धारण किया । इतना ही नहीं उनकी मान्यता है कि हिन्दी का नाट्य साहित्य विक्रम की तेरहवीं शताब्दी से प्रारम्भ हो गया था। सावती से चौदहवीं शताब्दी तक मिलने वाला नाटक साहित्य परम्परागत नाट्य साहित्य की एक शाखा है।’ इस प्रकार स्पष्ट है कि डॉ0 ओझा की दृष्टि में अपभ्रंश के रासक हिन्दी के आदि नाटक हैं।

विकास- मौलिक नाटकों में उद्रयन का ‘हनुमान नाटक’, प्रेमचन्द का ‘रामायण महानाटक तथा विश्वनाथ सिंह का ‘आनन्द रघुनन्दन’ आदि प्रमुख हैं। आचार्य शुक्ल ने ‘आनन्द रघुनन्दन को हिन्दी का प्रथम मौलिक नाटक माना है। किन्तु भारतेन्दु जी अपने पिता द्वारा लिखित ‘नहुष’ को हिन्दी का प्रथम मौलिक नाटक मानते हैं। ‘जमानत के इन्दर सभा’ नाटक को भारतेन्दु जी ‘भ्रष्ट- नाटक’ संज्ञा से विभूषित करते हैं।

(ख) प्रसाद युग- यह युग नाटकों के उत्कर्ष का स्वर्ण युग था। प्रसाद का इस क्षेत्र में उस समय पदार्पण हुआ जब देश में चतुर्दिक राष्ट्र और सांस्कृतिक चेतना का प्रसार हो रहा था। पाश्चात्य संस्कृति का भी बोलबाला हो चला था। इस विषम परिस्थिति को देखकर प्रसाद का अन्तस् हाहाकार कर उठा। उन्हें भारतीय संस्कृति से अगाध प्रेम था। इसलिए उसकी उपेक्षा उन्हें असहनीय प्रतीत हुई। फलतः उनकी दृष्टि भारत के अतीत पर गयी और वे उसके गायक बन बैठे और भारतीय उच्चादर्शों एवं संस्कृति की उन्नति के लिए उन्हें नाटक सर्वाधिक श्रेष्ठ साधन प्रतीत हुए। परिणामस्वरूप वे नाटकों के प्रणयन में लग गये। उनके आगमन से हिन्दी नाटकों में क्रान्तिकारी परिवर्तन हुए। उनके नाटकों में ऐतिहासिक और दार्शनिक भावुकता क मणिकांचन योग हुआ। प्रायः उनके सभी नाटकों का वस्तु महाभारत के बाद से हर्ष के काल तक सम्बन्धित है। उनके नाटकों में इतिहास और कल्पना का उद्भुत समन्वय स्थापित हुआ है तथा साथ ही प्रेम और सौन्दर्य के भी मधुरतम चित्र उपलब्ध हैं उन्होंने भारतीय पाश्चात्य नाटक साहित्य की अभिवृद्धि की।

प्रसाद जी के नाटकों यदि एक ओर देश-भक्ति की सरस धारा प्रवाहित होती है तो दूसरी ओर राष्ट्रीय चेतना का शंखनाद भी होता रहता है। उनके नाटकों में कर्तव्य की बलिदेवी पर कुर्बान हो जाने का सन्देश है। ‘सज्जन’, कल्याणी-परिणय, विशाख, प्रायश्चित, राज्यश्री, जनमेजय का नागयज्ञ, अजातशुतु कामना एवं पूंट, स्कन्दगुप्त, चन्द्रगुप्त, ध्रुवस्वामिनी, आदि उनके प्रसिद्ध नाटक हैं।

प्रसाद जी ने हिन्दी नाटकों में कथानक नाट्यकला तथा टेकनिक आदि सभी में परिवर्तन किया है। उनकी इस परिवर्तित नाट्यकला के प्रभाव से सम-सामयिक अन्य नाटककार भी अछूते न रहे। इसी युग में ही जहाहँ प्रतीकवादी नाटकों का बीजारोपण हुआ वहीं दूसरी ओर यथार्थवादी नाटकों का भी प्रणयन हुआ। इस युग के अन्य नाटककारों में हरिकृष्ण प्रेमी, उदयशंकर भट्ट आचार्य चतुसेन शास्त्री, सेठ गोविन्द दास प्रमुख है।

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