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आदिकाल का सामान्य परिचय | आदिकालीन साहित्य की प्रवृत्तियाँ | आदिकालीन साहित्य की विशेषताएँ

आदिकाल का सामान्य परिचय | आदिकालीन साहित्य की प्रवृत्तियाँ | आदिकालीन साहित्य की विशेषताएँ

आदिकाल का सामान्य परिचय-

आदिकाल हिंदी साहित्य के इतिहास का प्रारंभिक चरण है। इसको वीरगाथा काल भी कहा जाता है। इसकी कालावधि विक्रम की 11वीं शताब्दी के मध्य (संवत् 1050) से लेकर विक्रमी संवत् की 14वीं शती के तृतीय चरण (संवत् 1375) तक मानी जाती है। यह काल लड़ाई-भिड़ाई, सामान्य पृष्ठभूमि, विदेशी आक्रमण तथा पारस्परिक कलह का युग था। सामान्य परिस्थिति की दृष्टि से यह काल विकेंद्रीकरण का युग था।

यहाँ के राजे संगठित रूप से मुसलमान आक्रमणकारियों का सामना नहीं कर सके। फलतः वे एक-एक करके पराजित होते गये- इनकी शक्ति क्षीण होती गई और यहाँ-उत्तरी भारत में मुसलमानों का प्रभुत्व स्थापित हो गया।

यहाँ के राजाओं का बल-प्रदर्शन एक-दूसरे की नारियों के अपहरण तक सीमित हो गया था। मुसलमानों के सामने आत्म-समर्पण करने वाले राजाओं के अलावा राजपूत राजाओं का वर्ग ऐसा भी था जो निरंतर संघर्ष में विश्वास करता था और युद्ध में वीरगति प्राप्त करना वीर जीवन की बहुत बड़ी उपलब्धि मानता था।

नारियों में वीर-पत्नी होने की भावना प्रबल थी। वे युद्ध से भागकर आने वाले पति की पत्नी अथवा पुत्र की माता होना निंदनीय मानती थीं। आल्ह खंड की निम्नलिखित एक ही पंक्ति तत्कालीन समाज में व्याप्त युद्ध एवं वीरता के वातावरण को स्पष्ट कर देती है-

“बरस आठरह छत्री जीवै, आगे जीवन को धिक्कार।”

इस समय के कवि कर्म का स्वरूप समझने के लिए आचार्य पं. रामचंद्र शुक्ल का यह कथन पढ़ने योग्य है- “राजा भोज की सभा में खड़े होकर राजा की दान-शीलता का लंबा-चौड़ा वर्णन करके लाखों रूपये पाने वाले कवियों का समय बीत चुका था। राजदरबारों में शास्त्रार्थों की वह धूम नहीं रह गई थी। पांडित्य के चमत्कार पर पुरस्कार का विधान भी ढीला पड़ गया था। इस समय तो जो भाट या चारण किसी राजा के पराक्रम, विजय, शुत्रु-कन्या हरण आदि का अत्युक्तिपूर्ण आलाप करता था, या रण-क्षेत्रों में जाकर वीरों के हृदयों में उत्साह की तरंगे भरा करता था, वही सम्मान पाता था।”

आदिकालीन साहित्य की प्रवृत्तियाँ एवं विशेषताएँ

(1) आश्रयदाताओं की अतिशयोक्तिपूर्ण प्रशंसा-

इस युग का साहित्य प्रायः राज्याश्रित कवियों द्वारा लिखा गया। ये कवि अपने आश्रयदाता राजा को सर्वश्रेष्ठ वीर, पराक्रमी सम्राट, अद्वितीय रूपवान, अनुपम दानवीर, दृढ़प्रतिज्ञ, शरणागत वत्सल आदि सिद्ध करके उसका अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन किया करते थे। इन कवियों ने अत्यंत अतिशयोक्तिपूर्ण प्रशंसाएँ एवं प्रशस्तियाँ लिखीं। इस झोंके में उन्हें ऐसे-ऐसे इतिहास प्रसिद्ध वीरों को पराजित करता हुआ दिखा देते थे, जो उनके समकालीन हीन थे- पूर्ववर्ती थे या परवर्ती हुए। इस प्रकार ऐतिहासिकता की दृष्टि से अनेक वर्णन दोषपूर्ण हो गये। इस काल की बहुत सी सामग्री को संदिग्ध मानने का यह एक बहुत बड़ा कारण है।

(2) वीर रस की प्रधानता तथा उसके साथ श्रृंगार रस का समावेश-

ये कवि जहाँ आश्रयदाता के शौर्य का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन करते थे, वहाँ वे किसी सुंदरी कन्या पर आसक्त होने के कर्तव्य का भी पालन करते थे। इस हेतु उस सुंदरी कन्या के सौंदर्य का बढ़ा-चढ़ाकर वर्णन करना भी आवश्यक हो जाता था। श्रृंगारपरक रचना की प्रवृत्ति क्रमशः बलवती होती गई थी। आगे चलकर इसकी पूर्ण अभिव्यक्ति विद्यापति की रचनाओं में दिखाई देती है।

नारियों के विलाप में यथा करूण रस की मार्मिक व्यंजना पायी जाती है।

(3) चरित काव्य लिखने की प्रवृत्ति-

इस काल में लिखे गये अनेक रासो ग्रंथ इस प्रवृत्ति की देन हैं। इनमें कवि अपने नायक को भगवतस्वरूप बताकर कथावस्तु में धार्मिकता का हल्का-सा पुट देनेका प्रयत्न करते थे। विद्यापति की कीर्तिलता इस प्रवृत्ति का अच्छा उदाहरण है-

पुरूष कहाणी हौं कहौं जसु पत्यावै पुन्नु ।

(4) राष्ट्रीय भावना का अभाव-

देश की स्थिति तथा उसके भविष्य के प्रति न राजा की रूचि थी और न उनके आश्रित कवि की। उनके राज्य की सीमा ही राष्ट्र की सीमा थी।

(5) प्रचारात्मक रचनाएँ लिखने की प्रवृत्ति-

बौद्ध एवं जैन मुनियों तथा नाथ सिद्धों ने उपदेश मूलक तथा हठ योग का प्रचार करने वाली अनेक रचनाएँ लिखीं। इनमें उच्च कोटि के काव्य के दर्शन होते हैं। विद्वानों का एक वर्ग इन्हें काव्येतरर रचनाएँ मानता है। डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी के मतानुसार “जिस प्रकार नंददास, हितहरिबंस आदि की रचनाएँ काव्य की कोटि में आती हैं, उसी प्रकार इस युग के ये धर्म ग्रंथ भी काव्य-कोटि में आ जाते हैं।”

(6) युद्धों का सजीव वर्णन-

इस काल की रचनाओं की बहुत बड़ी विशेषता है। इस युग के कवियों की वीर वचनावली में हमें शस्त्रों की झंकार स्पष्ट सुनाई पड़ती है। ओजपूर्ण पदावली में युद्ध के वीर रस पूर्ण वर्णन हिंदी साहित्य की अक्षय निधि हैं। जगनिक का परमाल रासो (आल्ह खंड) तो मानों वीर रस के जीवंत उदाहरण है।

(7) भाषा के विविध रूप-

श्इस युग के ग्रंथों में हमको भाषा के तीन रूप मिलते हैं। अपभ्रंश, डिंगल और पिंगल। युद्ध प्रधान वर्णनों की भाषा डिंगल है। वह वीरतापूर्ण स्वर के बहुत उपयुक्त है। डिंगल का अर्थ कई प्रकार से किया गया है। एक व्युत्पत्ति डींग मारना भी है। चारण कवि अपनी कविता में डींग भरी बातें लिखा करते थे। द्वित्ववर्ण इसकी विशेषता है, जिसके कारण वह विशेष प्रभावशाली बन जाती है। पिंगल ब्रजभाषा का पूर्व साहित्यिक रूप कहा जा सकता है। श्रृंगारिक वर्णनों में पिंगल का प्रयोग पाया जाता है। कुछ लोगों ने इस भाषा को हिंदी का प्रारंभिक रूप ‘अवहट्ट’ कहा है। विद्यापति ने अपनी कविता की भाषा को देशी वाणी कहा-

‘देसल बयना सब जन मिट्ठा।’

(8) छंदों की विविधता एवं उनके संगत प्रयोग-

इस युग के ग्रंथों में कई छंदों के प्रयोग पाये जाते हैं, यथा-छप्पय, कवित्त, दूहा (दोहा), घाघड़ी, त्रोटक, गाथा, तोमर, सट्टक, आर्या, रोला, उल्लाला, पद्धरि, कुण्डलियाँ आदि। विशेषता यह है कि इनके प्रयोग सर्वथा कलात्मक हैं। छंद सर्वत्र भाव को वहन करने में सर्वथा समर्थ हैं। डॉ. श्यामसुंदरदास तथा डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी ने इस विशेषता पर बहुत बल दिया है। पृथ्वीराज रासो के छंद-विधान को लक्ष्य करके डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी ने लिखा है कि “रासो के छंद जब बदलते हैं तो श्रोता के चित्त में प्रसंगानुकूल नवीन कल्पना उत्पन्न करते हैं।” डॉ. श्यामसुंदरदास ने इस संबंध में अधिक सटीक बात कही है, यथा- “इनके दंदों में मुक्त प्रवाह मिलता है वे तुकांत आदि के बंधनों से जकड़े हुए नहीं हैं। x  x x x x पृथ्वीराज रासो में छंद परिवर्तन बहुत हुआ है और उनके कारण कहीं भी अस्वाभाविकता नहीं आयी है।”

उपसंहार-

आदिकाल में हमें कई काव्य रूपों का विकास दिखाई पड़ता है। इनमें भक्तिकाल में मुखरित होने वाली चरित काव्य शैली और कवित्त छप्पय की वीर काव्य शैली का मूल रूप पाते हैं। चारण काव्य की छप्पय-पद्धति नवीन साहित्यिक मोड़ की सूचना देती है। डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने ठीक ही कहा है कि इस काल की रचनाओं ने हिंदी साहित्य के आदि भाग का निर्माण किया तथा भविष्य की रचनाओं के लिए मार्ग-दर्शन किया। भाषा विकास की दृष्टि इस काल के ग्रंथों का विशेष महत्व है।

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