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सांस्कृतिकरण की प्रक्रिया | आधुनिक समाज में मुख्य सांस्कृतिक प्रक्रिया

सांस्कृतिकरण की प्रक्रिया | आधुनिक समाज में मुख्य सांस्कृतिक प्रक्रिया

सांस्कृतिकरण की प्रक्रिया

डॉ. एम.एन.श्रीनिवास (Dr. M.N. Srinivas)- के अनुसार सामान्य रूप से संस्कृतिकरण एक जाति को जातीय संस्तरण में ऊंचा पद प्राप्त करने योग्य बनाना है। संस्कृतिकण की प्रक्रिया के अन्तर्गत केवल उच्च जाति के रीति-रिवाजों और आदतों का ही नहीं अपितु उनके विचारों, मूल्यों तथा आदर्शों को भी ग्रहण करना आता है। वंश समूह के क्षेत्र में संस्कृतिकरण वंश के महत्व पर बल देता है और इसीलिए उच्च वंश के साथ समरूपता स्थापित करना भी संस्कृतिकरण की प्रक्रिया में आता है।

संस्कृतिकरण की प्रक्रिया का एक स्थानीय स्वरूप हो सकता है- ब्राह्मणों की तुलना में क्षेत्रीय, वैश्व व शूद्रों की संस्कृति में स्थानीय (Local) सांस्कृतिक तत्व अधिक देखने को मिलते हैं। इसीलिए देश के विभिन्न भागों में क्षत्रिय या वैश्य होने का दावा करने वाली जातियों में परस्पर गहरी भिन्नताएँ पाई जाती हैं। यह बात शूद्रों के विषय में और भी स्पष्ट रूप में लागू होती है। अतः शूद्रों में कुछ उपजातियों की जीवन-पद्धति का अत्यधिक संस्कृतिकरण स्थानीय स्वरूप के अनुसार हुआ है।

डॉ. निवास के अनुसार संस्कृतिकरण के लिए न किसी विशेष आर्थिक स्तर की आवश्यकता होती है और न उसकी किसी समूह की आर्थिक स्थिति पर कोई अनिवार्य प्रभाव पड़ता है। तथापि यह सच है कि आर्थिक स्तर ऊंचा होने से संस्कृतिकरण में सहायता अवश्य ही मिलती है। इसके अतिरिक्त राजनीतिक सत्ता प्राप्त होने से शिक्षा स्तर बढ़ने से और नेतृत्व का अवसर मिलने से संस्कृतिकरण में सहायता मिलती है।

ब्रिटिश शासन काल में जनजातीय समाज में संस्कृतिकरण की प्रक्रिया प्रारम्भ हो गई- भारत में जनजातियों ने हजारों वर्षों तक अपनी संस्कृति के अपरिवर्तित स्वरूप को अक्षुण्य बनाये रखा किन्तु ब्रिटिश शासन की स्थापना के बाद ‘ईसाई मिशनरियों'(Christian Missionaries) ने उनके बीच जाकर अपने धर्म प्रसार के माध्यम से अपनी संस्कृति का प्रसार किया। जनजातियों की दयनीय आर्थिक स्थिति का लाभ उठाते हुए उनके बीच खाद्यान्न, कपड़े एवं औषधियों का वितरण कर ईसाइयों ने उन्हें अपनी तरफ आकर्षित किया। इसके बाद उन्होंने हिन्दू धर्म और हिन्दू संस्कृति के प्रति घृणा की भावना पैदा की। इसके उपरान्त अपने धर्म की तरफ आकर्षित कर उन्हें धर्म परिवर्तन के लिए प्रोत्साहित किया। उनकी आर्थिक सहायता तथा उनके आर्थिक प्रचार के कारण जनजातीय समाज में ईसाई धर्म अपनाने वालों के समूह बनने लगे। धर्म प्रचार के माध्यम से उन्होंने जनजातीय संस्कृति में हस्तक्षेप प्रारम्भ किया। इस प्रकार सांस्कृतिक प्रसार की प्रक्रिया ने जनजातीय समाज में उन लोगों के जीवन को सांस्कृतिक परिवर्तन की प्रक्रिया में ला खड़ा किया। जिन्होंने ईसाई धर्म अपनाया।

संस्कृतिकरण की प्रक्रिया में एक जाति-विशेष को आदर्श मान लिया जाता है और जो निम्न जाति या जनजाति उसे आदर्श मानती है- वह अपनी उस आदर्श जाति के ही रीति-रिवाज, कर्मकाण्ड, विचारधारा व जीवन-पद्धति को अपनाने का प्रयत्न करती है। दर्श जाति द्विज जातियाँ अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्व ही होते हैं जिनका कि यज्ञोपवीत संस्कार होता है। इनमें ब्राह्मण आदर्श सबसे श्रेष्ठ होता है क्योंकि द्विजों में ब्राह्मण सर्वश्रेष्ठ है। परन्तु आधुनिक भारतीय समाज में ब्राह्मण आदर्श के अतिरिक्त क्षत्रिय, वैश्व एवं शूद्र आदर्श भी संस्कृतिकरण के आदर्श हो सकते हैं। उदाहरणार्थ , एक हरिजन ब्राह्मण बनने का सपना न देखकर शूद्र आदर्श को ही अपना लक्ष्य मान सकता है।

डॉ. श्रीनिवास ने इस सत्य को स्वीकार किया है कि, “यह जरूरी नहीं कि संस्कृतिकरण के माध्यम से किसी जाति को जनजातीय संस्तरण में ऊंचा स्थान मिलही जायेगा।” यह बात हरिजनों पर विशेष रूप से लागू होती है। डॉ. श्रीनिवास के शब्दों में, “किसी अस्पृश्य जाति का संस्कृतिकरण कितना भी पूर्ण क्यों न हो वह अस्पृश्यता की बाधा को पार करने में असमर्थ है।” और शायद इसीलिए एक हरिजन को क्षत्रिय, वैश्य या ब्राह्मण की स्थिति को प्राप्त करते हम नहीं देखते।

भारतीय ग्रामीण समुदाय में संस्कृतिकरण की प्रक्रिया में प्रभु जाति (Dominant Caste)-की भूमिका की महत्वपूर्ण है- प्रभु जाति होने के लिए किसी भी जाति में निम्नलिखित तीन विशेषताएँ आवश्यक हैं- (1) स्थानीय समुदाय में उपलब्ध कृषियोग्य भूमि में से एक बड़े भाग पर उस जाति का स्वामित्व हो, (2) उस जाति की सदस्य संख्या काफी हो तथा (3) स्थानीय सोपान में उस जाति को उच्च स्थान प्राप्त हो। भारतीय गाँवो में प्रभुता स्थापित करने में भूमि का मालिक होना एक बड़ा निर्णायक तत्व है। भूमि पर स्वामित्व से केवल आर्थिक शक्ति की नहीं बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा भी बढ़ती है और इसीलिए वह प्रभु जाति के रूप में उभरता है और संस्कृतिकरण की प्रक्रिया में एक आदर्श जाति के रूप में मान लिया जाता है, चाहे जातीय सोपान में उसकी स्थिति नीची ही क्यों न हो। उदाहरण के लिये, पंजाब के कुछ भागों में जाट ‘भूस्वामी ब्राह्मणों को अपने सेवक समझते हैं और पूर्वी उत्तर प्रदेश माधोपुर गाँव के किसी समय प्रभुता सम्पन्न ठाकुर अपने गुरूओं एवं पुरोहितों के अतिरिक्त अन्य किसी ब्राहाण के हाथ का बना भोजन नहीं खाते थे। कुछ भी हो प्रभु जाति की अपनी एक स्थानीय प्रतिष्ठा (Local Prestige) होती है और अन्य जाति के लोग उस प्रभु जाति के व्यवहार, जीवन के ढंग आति का अनुकरण करने का प्रयास करते हैं। इस प्रकार यदि स्थानीय प्रभु जाति ब्राह्मण है तो वहाँ संस्कृतिकरण की प्रवृत्ति ब्राह्मण आदर्श की ओर होगी। यदि वह प्रभु जाति राजपूत या बनिया हो तो क्षेत्रीय या वैश्य आदर्श की ओर। प्रत्येक स्थानीय प्रभु जाति की ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य आदर्श की अपनी- अपनी अलग धारणा होती है।

संस्कृतिकरण की प्रक्रियाओं में ब्राह्मण आदर्श की प्रायः सभी लोग सर्वश्रेष्ठ मानते हैं क्योंकि इसके साथ धार्मिक तथा शुद्धातावी आदर्श की धारणा जुड़ी हुई है। यही कारण है कि क्षत्रिय तथा अन्य मदिरासेवी एवं मांसाहारी समूह भी इस आदर्श की श्रेष्ठता को स्वीकार करते हैं। अधिकतर क्षेत्रो में मांसाहारी व मदिरा सेवन निम्न जातियों के चिह्न माने जाते हैं। ब्राहाण, पुरोहित शाकाहारी होते हैं। इस प्रकार शाकाहारी एवं मदिरा त्याग के शुद्धतावादी आदर्श को जाति व्यवस्था में सदैव ही अन्य आदर्शों से ऊंचा माना जाता रहा है। संस्कृतिकरण इसी ऊँचे आदर्श की ओर क्रियाशील होता है।

डॉ. श्रीनिवास के अनुसार, संस्कृतिकरण की प्रक्रिया भारतीय समाज में बहुत पहले से ही चलती आ रही है- हाँ, इतना अवश्य है कि पहले जमाने में संस्कृतिकरण का ब्राह्मणों द्वारा वैधीकरण आवश्यक था। मध्ययुगीन भारत के अध्येता श्री बर्टन स्टीन ने लिखा है कि “दक्षिणी भारत में विजयनगर राज्य के शक्तिशाली शासकों को भी ब्राह्मणों की वैधतादायी क्षमता को मानना और उसका मूल्य चुकाना पड़ता था।” यदि किसी भी जाती का कोई व्यक्ति राजा बनने के उपरान्त अपने को उच्च जाति का घोषित करना चाहता था तो यह तभी सम्भव था जबकि ब्राह्मण किसी संस्कार के द्वारा उसके दावे को स्वीकार करके वैधता प्रदान करे। भारतीय इतिहास में इस प्रकार के बहुत उदाहरण मिलते हैं जबकि निम्न जाति के किसी व्यक्ति ने अपनी सैनिक शक्ति के आधार पर सत्ता की स्थापना की और ब्राह्मण ने उसका राज्याभिषेक संस्कार करके उसे क्षत्रिय जाति का घोषित किया।

संस्कृतिकरण की प्रक्रिया को बहुधा निम्न जाति या जनजातियों के ऊपर की ओर गतिशीलता के रूप में देखा जाता है- इस गतिशीलता के परिणामस्वरूप सामाजिक या जातीय व्यवस्था में स्थिति (Satus) या पद-मूलक परिवर्तन होते हैं।

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Pankaja Singh

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